शाद अज़ीमाबादी की रचनाएँ

ढूँढोगे अगर मुल्कों मुल्कों मिलने के नहीं, नायाब हैं हम

ढूँढोगे अगर मुल्कों मुल्कों मिलने के नहीं, नायाब हैं हम
ताबीर है जिसकी हसरत-ओ-गम ऐ हमनफ्सों वोः ख्वाब हैं हम

ऐ दर्द पता कुछ तू ही बता अब तक ये मोअम्मा हल न हुआ
हम मैं है दिल-ए-बेताब निहां या आप दिल-ए-बेताब हैं हम

मैं हैरत-ओ-हसरत का मारा खामोश खड़ा हूँ साहिल पर
दरया-ए-मोहब्बत कहता है आ कुछ भी नहीं पायाब हैं हम

लाखों ही मुसाफिर चलते हैं मंजिल पे पोहंचते हैं दो एक
ऐ अहल-इ-ज़माना कद्र करो नायाब न हों कम्याब हैं हम

मुर्गान-ए-क़फ़स को फूलों ने ऐ शाद ये कहला भेजा है
आ जाओ जो तुमको आना है ऐसे मैं भी शादाब हैं हम

तमन्नाओं में उलझाया गया हूं 

तमन्नाओं में उलझाया गया हूं
खिलौने दे कर बहलाया गया हूं

हूं इस कूचे के हर ज़र्रे से आगाह
इधर से मुद्द्तों आया गया हूं

नहीं उठते क्यों क़दम जानिब-ए-दैर
किसी मस्जिद में बहकाया गया हूं

दिल-ए-मुज़्तर से पूछ ऐ रौनक़-ए-महफ़िल
मैं ख़ुद आया नहीं, लाया गया हूं

ऐ शब-ए-ग़म हम हैं और बातें दिल-ए-नाकाम से

ऐ शब-ए-ग़म हम हैं और बातें दिल-ए-नाकाम से
सोते हैं नाम-ए-ख़ुदा सब अपने घर आराम से
जागने वालों पे क्या गुज़री वो जानें क्या भला
सो रहे हैं जा के बिस्तर पर जो अपने शान से
जीते जी हम तो ग़म-ए-फ़र्दा की धुन में मर गये
कुछ वही अच्छे हैं जो वाक़िफ़ नहीं अंजाम से
[फ़र्दा= भविष्य; वाक़िफ़= जानकार]
नाला करने के लिये भी ताब-ए-ख़ुश दरकार है
क्या बाताऊँ दिल हटा जाता है क्यों इस काम से
[ताब-ए-ख़ुश= खुशनुमा महौल; दरकार= ज़रूरत]
देखते हो मैकदे में मैकशो साक़ी बग़ैर
किस क़िस्म की बेकसी पैदा है शक़्ल-ए-जाम से
[बेकसी= बेबसी/ मजबूरी]

कहाँ है उसका कूचा, कौन है वो?.

कहाँ है उसका कूचा, कौन है वह? क्या खबर क़ासिद!
पर इतना जानते हैं, नाम है आशिक़नवाज़ उसका॥

न छोडे़ जुस्तजूये-यार ख़िज्रे-शौक से कह दो।
किसी दिन खुद लगा लेगी, पता उम्रेदराज़ उसका॥

अबस[1] शिकवा है मय-सी चीज़ का, वाइज़ है क्यों दुश्मन।
बसीरत[2] जब नहीं, बेशक बजा है अहतराज़ उसका॥

अब इसका ज़िक्र क्या क़ासिद पै जो गुज़री गुज़रने दो।
न कहना इस ख़बर को ‘शाद’ से दिल है गुदाज़[3] उसका॥

वो जिबह करके यह कहते हैं 

वोह जिबह करके यह कहते हैं मेरी लाश से-।
“तड़प रहा है कि मुँह देखता है तू मेरा॥

कराहने में मुझे उज़्र क्या मगर ऐ दर्द।
गला दबाती है रह-रह के आबरू मेरा॥

कहाँ किसी में यह क़ुदरत सिवाय तेग़े-निगाह।
कि हो नियाम में और काट ले गुलू मेरा॥

निकहते-गुल बहुत इतराती हुई फिरती है

निकहते-गुल[1] बहुत इतराई हुई फिरती है।
वोह कहीं खोल भी दें तुर्रये-गेसू[2] अपना।

निकहते-ख़ुल्देबरीं[3] फैल गईं कोसों तक।
वोह नहा कर जो सुखाने लगे गेसू अपना॥

लिल्लाह हम्द! कदूरत[4] नहीं रहने पाती।
मुँह धुला देता है हर सुबह को आँसू अपना॥

गम में परवाना-ये-मरहूम के[5]थमते नहीं अश्क।
शमअ़! ऐ शमअ़! ज़रा देख तो मुँह तू अपना॥

सुबू अपना-अपना है, जाम अपना-अपना

सुबू अपना-अपना है जाम अपना-अपना।
किये जाओ मयख़्वार काम अपना-अपना॥

न फिर हम न अफ़सानागो ऐ शबे-ग़म!
सहर तक है क़िस्सा तमाम अपना-अपना॥

जिनाँ[1] में है ज़ाहिद, तेरे दर पै हम हैं।
महल अपना-अपना, मुक़ाम अपना-अपना॥

हुबाबो![2] हम अपनी कहें या तुम्हारी।
बस एक दम-के-दम है क़याम अपना-अपना॥

कहाँ निकहते-गुल, कहाँ बूए-गेसू।
दमाग़ अपना-अपना मशाम[3] अपना-अपना॥

ख़राबात में मयकशो! आके चुन लो।
नबी अपना-अपना इमाम अपना-अपना॥

जब किसी ने हाल पूछा रो दिया

जब किसी ने हाल पूछा रो दिया!
चश्मेतर! तूने तो मुझको खो दिया॥
दाग़ हो या सोज़ हो, या दर्देग़म।
ले लिये ख़ुश होके जिसने जो दिया॥

हम-से सहरागर्द को छोड़ ऐ गुबार 

हमसे सहरा-गर्द को छोड़ ऐ ग़ुबार!
तू कहाँ तक पीछे-पीछे आएगा॥

खो गए हैं दोनों जानिब के सिरे।
कौन दिल की गुत्थियाँ सुलझाएगा॥

मैं कहाँ, वाइज़ कहाँ, तौबा करो!
जो न समझा खु़द वोह क्या समझाएगा॥

बाग़ में क्या जाऊँ, सर पर है ख़िज़ाँ।
गुल का उतरा मुँह न देखा जाएगा।

तेरे कमाल की हद कब कोई बशर समझा

तेरे कमाल की हद कब कोई बशर समझा।
उसी क़दर उसे हैरत है, जिस क़दर समझा॥

कभी न बन्दे-क़बा खोल कर किया आराम।
ग़रीबख़ाने को तुमने न अपना घर समझा।

पयामे-वस्ल का मज़मूँ बहुत है पेचीदा।
कई तरह इसी मतलब को नामाबर समझा॥

न खुल सका तेरी बातों का एक से मतलब।
मगर समझने को अपनी-सी हर बशर समझा॥

वो खुशनिगाह नहीं, जिसमें खुदानुमाई नहीं

वो खु़शनिगाह नहीं, जिसमें ख़ुदनुमाईं नहीं।
यह चश्मदीदा हैं, बातें सुनी-सुनाई नहीं॥

ख़याल से है कहीं दूर आस्तानए-दोस्त!
वहाँ का शौक़ है दिल को, जहाँ रसाई नहीं॥

मरीज़े-हिज्र को लाज़िम है तेरे ज़ुल्म की याद।
दवा यही है मगर हमने आज़माई नहीं॥

वोह आशिक़ों से है नाराज़ क्यों, खु़दा जाने?
वफ़ूरे-शौक़ का होना कोई बुराई नहीं॥

ज़बाँ पै ज़िक्र मगर दिल में वसवसा ऐ ‘शाद’।
ख़ता मुआफ़ यह धोका है पारसाई नहीं॥

मेरी तलाश में मिल जाए तू, तो तू ही नहीं

मेरी तलाश में मिल जाए तू, तो तू ही नहीं।
इस अम्रेख़ास में कुछ जाए, गुफ़्तगू ही नहीं॥

नियाज़मंद को लाज़िम है चश्मतर रखना।
अदा नमाज़ न होगी अगर वज़ू ही नहीं॥

वोह दामन अपना उठाए हुए हैं क्यों दमे-क़त्ल?
खु़दा के फ़ज़्ल से याँ जिस्म में लहू ही नहीं॥

रुस्वाइयाँ गज़ब की हुईं तेरी राह में

रुस्वाइयाँ ग़ज़ब की हुईं तेरी राह में।
हद है कि ख़ुद ज़लील हूँ अपनी निगाह में॥

मैं भी कहूँगा देंगे जो आज़ा[1] गवाहियाँ।
या रब! यह सब शरीक थे मेरे गुनाह में॥

थी जुज़वे-नातवाँ[2] किसी ज़र्रे में मिल गई।
हस्ती का क्या वजूद तेरी जलवागाह में॥

ऐ ‘शाद’! और कुछ न मिला जब बराये नज़्र[3]
शर्मिंदगी को लेके चले बारगाह में[4]

अब इंतिहा का तिरे ज़िक्र में असर आया 

अब इंतिहा का तिरे ज़िक्र में असर आया
कि मुँह से नाम लिया दिल में तू उतर आया

बहुत दिनेां पे मिरी चश्‍म में नज़र आया
ऐ अश्‍क ख़ैर तो है तू किधर किधर आया

हज़ार शुक्र कि इस दिल में तू नज़र आया
ये नक़्शा सफ़्हा-ए-ख़ाली पे जल्द उतर आया

बशर हबाब की सूरत हमें नज़र आया
भरी जो क़तरे के अंदर हवा उभर आया

ज़बाँ पे आता है नाला भी सौ करिश्‍मों से
कहाँ से आप के अंदाज़ का असर आया

अदम में ऐश में है चलता हूँ मैं भी ले ऐ दिल
जहाँ में जितने मुसीबत के दिन थे भर आया

लिखे को रोइए अब ता-ब-हश्र तुर्बत में
कि मेरे मरने पे ख़त ले के नामा-बर आया

पड़ा है शब से यूँ ही अब तलक न ली करवट
दिल-ए-सितम-ज़दा उस की गली से मर आया

हज़ार शुक्र ख़ुदा का यही ग़नीमत है
न ख़ैर आया मिरे दिल को और शर आया

रिया तो दिल में थी माथे पे अब है उस का निशाँ
कहाँ का दाग़ कहाँ दफ़अतन उभर आया

मुक़ीम-ए-दिल है डँवाँ डोल रह के अब ईमाँ
बुतों के क़हर से छूटा ख़ुदा के घर आया

हमारे पा-ए-तलब ने बड़ी मुहिम सर की
कि कट के सामने क़ातिल के अपना सर आया

शराब पी के मैं पहुँचा फ़लक पे ऐ साक़ी
कहाँ से उन कई क़तरों में ये असर आया

वो चाहे बद कहे क़ासिद बुतों को या मुझ को
हरम में चैन से ईमान जा के धर आया

लहद में शाना हिला कर ये मौत कहती है
ले अब तौ चौंक मुसाफ़िर कि अपने घर आया

हज़ार शुक्र हुआ आफ़्ताब-ए-हश्र तुलूअ
बड़ी तो लाज रही ये कि तू नज़र आया

गवाहियाँ हुईं आज़ा की हश्र में मक़्बूल
वो पाक हो गए इल्ज़ाम मेरे सर आया

हुजूम-ए-ग़म ने सिखाने की लाख कोषिष की
हमें तो आह भी करना न उम्र भर अया

जो चंद दिन में हुई ज़ी-कमाल कौन हैं ‘शाद’
हमें तो शेर का कहना न उम्र भर आया

उसी को शेर समझते हैं ‘शाद’ अहल-ए-मज़ाक़
उधर पढ़ा कि दिलों में इधर उतर आया

अभी भी इक उम्र पे जीने का न अंदाज़ आया

अभी भी इक उम्र पे जीने का न अंदाज़ आया
ज़िंदगी छोड़ दे पीछा मिरा मैं बाज़ आया

मुज़्दा ऐ रूह तुझे इश्‍क़ सा दम-साज़ आया
नकबत-ए-फ़क्ऱ गई शाह-ए-सर-अफ़राज आया

पास अपने जो नया कोई फ़ुसूँ-साज़ आया
हो रहे उस के हमें याद तिरा नाज़ आया

पीते पीते तिरी इक उम्र कटी उस पर भी
पीने वाले तुझे पीने का न अंदाज़ आया

दिल हो या रूह ओ जिगर कान खड़े सब के हुए
इश्‍क़ आया कि कोई मुफ़सिदा-पर्दाज़ आया

ले रहा है दर-ए-मय-ख़ाना पे सुन-गुन वाइज़
रिंदो हुश्‍यार कि इक मुफ़सिदा-पदोज़ आया

दिल-ए-मज़बूर पे इस तरह पहुँची वो निगाह
जैसे उस्फ़ूर पे पर तौल के शहबाज़ आया

क्यूँ है ख़ामोश दिला किस से ये सरगोशी है
मौत आई कि तिरे वास्ते हमराज़ आया

देख लो अश्‍क़-ए-तवातुर को न पूछो मिरा हाल
चुप रहो चुप रहो इस बज़्म में ग़म्माज़ आया

इस ख़राबे में तो हम दोनों हैं यकसाँ साक़ी
हम को पीने तुझे देने का न अंदाज़ आया

नाला आता नहीं कन-रस है फ़क़त ऐ बुलबुल
मर्द-ए-सय्याह हूँ सुन कर तिरी आवाज़ आया

दिल जो घबराए क़फ़स में तो ज़रा पर खोलूँ
ज़ोर इतना भी न ऐ हसरत-ए-परवाज़ आया

देखिए नाला-ए-दिल जा के लगाए किस से
जिस का खटका था वही मुफ़सिदा-पदोज़ आया

मुद्दई बस्ता-ज़बाँ क्यूँ न हो सुन कर मिरे शेर
क्या चले सेहर की जब साहिब-ए-एजाज़ आया

रिंद फैलाए हैं चुल्लू को तकल्लुफ़ कैसा
साक़िया ढाल भी दे जाम ख़ुदा-साज़ आया

न गया पर न गया शम्अ का रोना किसी हाल
गो कि परवाना-ए-मरहूम सा दम-साज़ आया

एक चुपकी में गुलू तुम ने निकाले सब काम
ग़म्ज़ा आया न करिश्‍मा न तुम्हें नाज़ आया

ध्यान रह रह के उधर का मुझे दिलवाता है
दम न आया मिरे तन में कोई दम-साज़ आया

किस तरह मौत को समझूँ न हयात-ए-अबदी
आप आए कि कोई साहिब-ए-एजाज़ आया

बे-‘अनीस’ अब चमन-ए-नज़्म है वीराँ ऐ ‘शाद’
हाए ऐसा न कोई ज़मज़मा-पदोज़ आया

ऐ बुत जफ़ा से अपनी लिया कर वफ़ा का काम

ऐ बुत जफ़ा से अपनी लिया कर वफ़ा का काम
बंदों से काम आ कि यही है ख़ुदा का काम

किस जा था क़स्द शौक़ ने पहुँचा दिया किधर
कहते न थे ठगों से न ले रहनुमा का काम

कहता है दिल सुना मुझे गेसू की दास्ताँ
आज उस ने सर पे डाल दिया है बला का काम

तासीर को न आह से पूछूँ तो क्या करूँ
क्यूँ ख़ुद उठा लिया दिल-ए-बे-मुद्दआ का काम

अपनी सी तू तो कर उन्हें फिर इख़्तियार है
सुनना है उन का काम पहुँचना दुआ का काम

सीने में दाग़ खिलते ही जाते हैं हर नफ़स
अब अपनी साँस करती है बाद-ए-सबा का काम

मूसा फ़क़त न थे तिरे आईना-दारों में
ईसा भी करते थे लब-ए-मोजिज़-नुमा का काम

हर रात अपनी आँखों को रोना है फ़र्ज़-ए-ऐन
ताअत-गुज़ार करते हैं जैसे ख़ुदा का काम

था भी ज़लील हुस्न की सरकार में ये दिल
कम-बख़्त को सुपुर्द हुआ इल्जिता का काम

ऐ ‘शाद’ मेरी सख़्त-ज़बानी पे है ख़मोश
नासेह भी अब तो करने लगा अंबिया का काम

काबा ओ दैर में जल्वा नहीं यकसाँ उन का

काबा ओ दैर में जल्वा नहीं यकसाँ उन का
जो ये कहते हैं टटोले कोई ईमाँ उन का

जुस्तुजू के लिए निकलेगा जो ख़्वाहाँ उन का
घर बता देगा कोई मर्द-ए-मुसलमाँ उन का

तू ने दीदार का जिन जिन से किया है वादा
हाए रे उन की ख़ुशी हाए रे अरमाँ उन का

अपने मिटने का सबब मैं भी बता दूँ ऐ शौक़
काश छू जाए मिरी ख़ाक से दामाँ उन का

छोड़ कर आए हैं जो सुब्ह-ए-वतन सी शय को
मर्तबा कुछ तो समझ शाम-ए-ग़रीबाँ उन का

जिन की आग़ोश-ए-तसव्वुर में है वो हूर जमाल
कहीं सच हो न यही ख़्वाब-ए-परेशाँ उन का

जो इस उलझाओ के ख़ुद हैं मुतमन्नी दिल से
क्या बिगाड़ेगी तिरी ज़ुल्फ़-ए-परेशाँ उन का

सर में सौदा-ए-ख़िरद पाँव में ज़ंजीर-ए-शुकूक
भेद पाएगा न इस शक्ल में इंसाँ उन का

हम दुआ दें तुझे दिल खोल के ऐ पहलु-ए-तंग
टूट कर सीने में रह जाए जो पैकाँ उन का

चाक करने का है इल्ज़ाम मिरे सर नाहक़
हाथ उन के हैं हम उन के हैं गरेबाँ उन का

वो मिटा क्यूँ नहीं देते मुझे हैरत तो ये है
उन के कहने में है दिल दिल में है अरमाँ उन का

उन शहीदान-ए-मोहब्बत में तौ मैं साफ़ कहूँ
कोई इतना नहीं पकड़े जो गरेबाँ उन का

वही ऐसे हैं कि ख़ामोश सब की सुन कर
सब को दावा है कि हूँ बंदा-ए-फ़रमाँ उन का

पहले हम नीयत-ए-ख़ालीस से वज़ू तो कर लें
ठहर ऐ ख़ाक ठहर पाक है दामाँ उन का

चाहें दोज़ख़ में उतारें कि जगह ख़ुल्द में दें
दख़्ल क्या ग़ैर को घर उन के हैं मेहमाँ उन का

कहीं पैबंद की कोशीश कहीं तदबीर-ए-रफ़ू
जामा-ए-तन से बहुत तंग हैं उर्यां उन का

कीजिए शाना ओ आईना की हालत पे निगाह
सीना-सद-चाक कोई है कोई हैराँ उन का

मान लो पाँव ज़ंजीर भी उतरी लेकिन
भाग कर जाए कहाँ क़ैदी-ए-ज़िंदाँ उन का

जिन शहीदों ने ब-सद-दर्द तड़प कर दी जान
छिन गया हाथ से जीता हुआ मैदाँ उन का

हम तो क्या चीज़ हैं जिबरील तो जा लें उन तक
रोक लेता है फ़रिश्‍तों को भी दरबाँ उन का

मस्त जाते हैं ख़राबात से मस्जिद की तरफ़
राह पुर-शोर है अल्लाह निगह-बाँ उन का

हम शब-ए-हिज्र के जागे न क़यामत में उठें
जब तलक ख़्वाब से चौंकाए न अरमाँ उन का

वहम तू ही ख़लल-अदांज़ हुआ है वर्ना
कौन जूया नहीं ऐ रहज़न-ए-ईमाँ उन का

दिन क़यामत का ढला सब ने मुरादें पाईं
रह गया देख के मुँह ताब-ए-फ़रमाँ उन का

मरने वालों का अगर साथ दिया पूरा कर
ले जनाज़ा भी उठा हसरत ओ अरमाँ उन का

हक़ जताते हैं शहीदान-ए-मोहब्बत बेकार
क्या ये मरना था बड़ा कार-ए-नुमायाँ उन का

‘शाद’ घबरा गया इक उम्र से जीते जीते
वो बुला लें मुझे इस वक़्त तो एहसाँ उन का

किस पे क़ाबू जो तुझी पे नहीं क़ाबू अपना

किस पे क़ाबू जो तुझी पे नहीं क़ाबू अपना
किस से उम्मीद हमें जब न हुआ तू अपना

जाम-ए-मय देख के जाता रहा क़ाबू अपना
लड़खड़ाता हूँ पकड़ ले कोई बाज़ू अपना

निकहत-ए-गुल बहुत इतराती हुई फिरती है
वो कहीं खोल भ दें तुर्रा-ए-गेसू अपना

उस ने फिर कर भी न देखा कि ये है कौन बला
हम को था ज़ोम कि चल जाएगा जादू अपना

जिस को समझे हो वही चीज़ नहीं मुद्दत से
हम दिखा देंगे कभी चीर के पहलू अपना

पर-ए-परवाज़ निकलने दे क़फ़स में सय्याद
काम देगा यही टूटा हुआ बाज़ू अपना

मिल गए ख़ाक में दर पर तिरे इतना बैठे
इस रियाज़त पे भी अब तक न हुआ तू अपना

ग़म नही जाम-ए-तिलाकार उठा रख साक़ी
क्या ग़रज़ हम को सलामत रहे चुल्लू अपना

चौकड़ी भूल के मुँह तकते हैं मुझ वहशी के
आके इस पाँव पे सर रखते हैं आहू अपना

कौन ऐ तुल-ए-शब-ए-ग़म तिरा झगड़ा रक्खे
आज क़िस्सा ही किए देते हैं यकसू अपना

निकहत-ए-ख़ुल्द-ए-बरीं फैल गई कोसों तक
वो नहा कर जो सुखाने लगे गेसू अपना

लिल्लाहिल-हम्द कुदूरत नहीं रहने पाती
मुँह धुला देता है हर सुब्ह को आँसू अपना

शादी ओ ग़म के रहेंगे यही रगड़े झगड़े
क़िस्सा जिस वक़्त तलक होगा न यकसू अपना

ग़म में परवाना-ए-मरहूम के थमते नहीं अश्‍क
शम्अ ऐ शम्अ ज़रा देख तो मुँह तू अपना

बे-अदब मुसहफ़-ए-रूख़्सार पे झुक पड़ते हैं
रखिए शानों पे ज़रा घेर के गेसू अपना

सीना-ए-तंग से घबरा के गया दिल तो गया
मुँह दिखाए न मुझे अब ये सियह-रू अपना

फँसने वाला था फँसा आ के तिरी ज़ुल्फ़ों में दिल
ब-ख़ुदा इस में नहीं जुर्म सर-ए-मू अपना

शाम से जेब में इक तल्ख़ दवा रक्खी है
आज क़िस्सा ही किए देते हैं यकसू अपना

वहम ओ इदराक ओ ख़यालात ओ दिल ओ ख़्वाहिश-ए-दिल
सब तो अपने हैं मगर क्यूँ नहीं क़ाबू अपना

‘शाद’ समझाते हैं क्यूँ ग़ैर लिया क्या उन का
चश्‍म-ए-तर अपनी है जान अपनी है आँसू अपना

किस बुरी साअत से ख़त ले कर गया

किस बुरी साअत से ख़त ले कर गया
नामा-बर अब तक न आया मर गया

जाते ही दिल उस गली में मर गया
मरने वाला बेवफ़ाई कर गया

दिल तो जाने को गया लेकिन मुझे
उस भरी महफ़िल में रूस्वा कर गया

हसरतें थीं जीने वाली जी गईं
मरने वाला था दिल अपना मर गया

ग़म की लज़्ज़त इब्तिदा में थी मगर
इस क़दर खाया कि अब जी भर गया

हर निवाला उस का अब तो तल्ख़ है
उम्र नेमत थी मगर जी भर गया

क्या कहूँ अहवाल उठती बज़्म का
पहले मिना बाद को साग़र गया

दिल ने इक दिन भी न देखा तुझ को आह
उस गली तक ख़्वाब में अक्सर गया

मरने वाले दिल तुझे अब क्या कहूँ
ख़ैर बख़्शा मैं ने जो कुछ कर गया

क्या कहूँ इन आँसुओं का ज़ोर ओ शोर
आँखें झपकी थीं कि चुल्लू भर गया

दिल गिला करता था ख़ूब उस शोख़ का
तजि़्करा महशर का सुन कर डर गया

जिस जगह दारा को भेजा था वही
कुछ दिनों के बाद अस्कंदर गया

जिस का कहलाता है वाँ थी क्या कमी
ऐ गदा क्यूँ माँगने दर-दर गया

दिल ने सब्क़त की हवास ओ सब्र पर
पहले सुल्ताँ बाद को लश्‍कर गया

मुँह से निकला था कि पहुँचा अर्श पर
नाला-ए-दिल नाम ऊँचा कर गया

दिल ये उमडा मय से ख़ाली देख कर
जाम अश्‍कों से लबालब भर गया

गिर न जाए ख़ाक पर क़तरा कोई
बस बस ऐ साक़ी कि साग़र भर गया

मय-कशो मातम करो अब ‘शाद’ का
हाए क्या मय-ख़्वार रहलत कर गया

‘शाद’ क्या कुछ कम हैं दो कम साठ साल
ज़िंदगी से बस दिल अपना भर गया

कुछ कहे जाता था ग़र्क़ अपने ही अफ़्साने में था 

कुछ कहे जाता था ग़र्क़ अपने ही अफ़्साने में था
मरते मरते होश बाक़ी तेरे दीवाने में था

हाए वो ख़ुद-रफ़्तगी उलझे हुए सब सर के बाल
वो किसी में अब कहाँ जो तेरे दीवाने में था

जिस तरफ़ जाए नज़र अपना ही जल्वा था अयाँ
जिस्म में हम थे कि वहशी आईना-ख़ाने में था

बोरिया था कुछ शबीना मय थी या टूटे सुबू
और क्या इस के सिवा मस्तों के वीराने में था

हँसते हँसते रो दिया करते थे सब बे-इख़्तियार
इक नई तरकीब का दर्द अपने अफ़्साने में था

दून की लेता तो है ज़ाहिद मगर मैं क्या कहूँ
मुत्तक़ी साक़ी से बढ़ कर कौन मय-ख़ाने में था

पास था ज़ंजीर तक का तौक़ पर क्या मुनहसिर
वो किसी में अब कहाँ जो तेरे दीवाने में था

देर तक मैं टकटकी बाँधे हुए देखा किया
चेहरा-ए-साक़ी नुमायाँ साफ़ पैमाने में था

हाए परवाने का वो जलना वो रानो शम्अ का
मैं ने रोका वर्ना क्या आँसू निकल आने में था

ख़ुद-गरज़ दुनिया की हालत क़ाबिल-ए-इबरत थी ‘शाद’
लुत्फ़ मिलने का न अपने में न बेगाने में था

‘शाद’ कुछ पूछो न मुझ से मेरे दिल के दाग़ को
टिमटिमाता सा चराग़ इक अपने वीराने में था

क्या फ़क़त तालिब-ए-दीदार था मूसा तेरा /

क्या फ़क़त तालिब-ए-दीदार था मूसा तेरा
वही शैदा था तिरा मैं नहीं शैदा तेरा

दीदा-ए-शौक़ से बे-वजह है पर्दा तेरा
किस ने देखा नहीं इन आँखों से जल्वा तेरा

ख़ुद नज़ाकत पे न क्यूँ बोझ हो पर्दा तेरा
क्या किसी आँख ने देखा नहीं जल्वा तेरा

मिट गई शोरिश-ए-तूफ़ान-ए-हवादिस ऐ मौज
अब वही तू वही बहता हुआ दरिया तेरा

चैन से शहर-ए-ख़मोशाँ में हर इक सोता है
आसरा सब को है ऐ वादा-ए-फ़र्दा तेरा

मंज़िलत एक की भी होगी न वैसी ब-ख़ुदा
हश्र में आएगा जिस शान से रूस्वा तेरा

ज़िंदगी कहती है अरमाँ कोई अब है न उम्मीद
कब तलक साथ करूँ मैं तन-ए-तन्हा तेरा

बे-सबब मेरी ख़मोशी नहीं ऐ शाहिद-ए-हुस्न
दामन-ए-सब्र से ढँकता नहीं पर्दा तेरा

यूँ हबाबों का न दिल तोड़ ख़ुदा-रा ऐ मौज
इन्हीं क़तरों के तो मिलने से है दरिया तेरा

वही रंगत वही ख़ुशबू वही नाज़ुक-बदनी
फूल ने नक़्श उतारा है सरापा तेरा

तुझ से मिलने का जो है शौक़ तो दर दर न फिरे
पाँव तोड़े हुए बैठा रहे शैदा तेरा

ऐ गुल आती है ख़िज़ाँ बाग़ में ठहरा न मुझे
देखूँ इन आँखों से उतरा हुआ चेहरा तेरा

काश ज़ाहिद रूख़-ए-रौशन से उठा लें वो नक़ाब
फिर तो कुछ रिंद की रिंदी है न तक़्वा तेरा

अपने मय-ख़ाने से घबरा के मैं बाहर आया
जब हरम से कोई निकला न शनासा तेरा

उस पे क्या ज़ोर भला जिस पे हो उस का क़ाबू
चश्‍म-ए-शौक़ अपनी सही दिल तो है शैदा तेरा

जुस्तुजू शर्त है मिल जाएगा ज़ीना भी ज़रूर
सामने है नज़र-ए-शौक़ के मुखड़ा तेरा

वुसअत-ए-क़दरत-ए-हक़ होगी न महदूद कभी
नहीं मिलने का सिरा ज़ुल्फ़-ए-चलीपा तेरा

बज़्म-ए-आख़िर है तक़ाज़ा न कर ऐ महफ़िल-ए-शौक़
अब कहाँ साफ़ भला साग़र ओ सहबा तेरा

‘शाद’ ग़ज़लें नहीं आयात-ए-ज़ुबूर इन को समझ
लहन-ए-दाऊद से कुछ कम नहीं नग़्मा तेरा

अब जवानी की उमंगें न उमंगों की ख़ुष्ी
‘शाद’ को है फ़क़त ऐ मौज सहारा तेरा

क्यूँ हो बहाना-जू न क़ज़ा सर से पाँव तक

क्यूँ हो बहाना-जू न क़ज़ा सर से पाँव तक
ज़ालिम हैं आप की है अदा सर से पाँव तक

साकित हैं बाद-ए-मर्ग क़वा सर से पाँव तक
मोहरें लगा गई हैं क़ज़ा सर से पाँव तक

घेरे थी तुझे को ब़र्क-ए-अदा सर से पाँव तक
क्यूँ नख़्ल-ए-तूर जल न गया सर से पाँव तक

ज़ंजीर बन गई है क़ज़ा सर से पाँव तक
गोया रगें हैं दाम-ए-बला सर से पाँव तक

मैं ख़ुद ज़बान-ए-शुक्र बना सर से पाँव तक
डूबे न क्यूँ असर में दुआ सर से पाँव तक

मुँह चाँद उस पे ज़ुल्फ़-ए-रसा सर से पाँव तक
क्यूँ लोट-पोट हो न अदा सर से पाँव तक

सिद्क़ ओ सफ़ा सिखाता है नज़्ज़ारा-बाज़ को
आईना-ए-जमाल तिरा सर से पाँव तक

क़ासिद कहे गया मिरी ज़र्दी-ए-रूख़ का हाल
इस दास्ताँ का ख़ूब रंगा सर से पाँव तक

ऐ शम्अ तुझ से साफ़ मैं कहता हूँ दिल का हाल
जलना ही था तो जल न गया सर से पाँव तक

पीरी में काँपने लगे आज़ा-ए-जिस्म सब
हुश्‍यार हिल गई ये बिना सर से पाँव तक

शायद ख़िजाँ सबा का फ़साना सुना गई
हर नख़्ल-ए-बाग़ काँप गया सर से पाँव तक

दरिया-ए-इश्‍क़ में मुझे रखना न था क़दम
डूबा तो ख़ूब डूब गया सर से पाँव तक

ली नख़्ल-ए-तूर की न ख़बर तुम ने ऐ कलीम
तुम देखते रहे वो जला सर से पाँव तक

आग़ाज़ ही में आप ने कर दी ज़बान बंद
क़िस्सा हमारा सुन न लिया सर से पाँव तक

फैलाएँ या न हाथ को फैलाएँ शर्म से
दस्त-ए-तलब हैं तेरे गदा सर से पाँव तक

तेरा कहाँ जमाल कहाँ जल्वा-गाह-ए-तूर
मूसा न फिर न देख लिया सर से पाँव तक

अल्लाह ‘शाद’ ग़ैर की ये ऐब-जूईयाँ
तू ख़ुद पे कर निगाह ज़रा सर से पाँव तक

ग़म-ए-फ़िराक़ मय ओ जाम का ख़याल आया

ग़म-ए-फ़िराक़ मय ओ जाम का ख़याल आया
सफ़ेद बाल लिए सर पे इक वबाल आया

मिलेगा ग़ैर भी उन गेल ब-शौक़ ऐ दिल
हलाल करने मुझे ईद का हिलाल आया

अगर हैं दीदा-ए-रौशन तो आफ़्ताब को देख
उधर उरूज हुआ और इधर ज़वाल आया

लुटाए देते हैं इन मोतियों को दीदा-ए-शौक़
भर आए अश्‍क कि मुफ़लिस के हाथ माल आया

लगी नसीम-ए-बहारी जो मअरिफ़त गाने
गुलों पे कुछ नहीं मौकूफ़ सब को हाल आया

पयाम-बर को अबस दे के ख़त उधर भेजा
ग़रीब और वहाँ से शिकस्ता-हाल आया

ख़ुदा ख़ुदा करो ऐ ‘शाद’ इस पे नख़वत क्या
जो शाइरी तुम्हें आई तो क्या कमाल आया

जिए जाएँगे हम भी लब पे दम जब तक नहीं आता

जिए जाएँगे हम भी लब पे दम जब तक नहीं आता
हमें भी देखना है नामा-बर कब तक नहीं आता

पहुँचना था जो अर्ज़-ए-हाल को अर्श-ए-मुअज़्ज़म तक
कई शब से वही नाला मिरे लब तक नहीं आता

दिल अपना वादी-ए-ग़ुर्बत में शायद मर रहा जा कर
न आने की भी इक मीआद है कब तक नहीं आता

वहाँ औरों के क़िस्सों को भी सुन कर वो खटकते हैं
यहाँ अपनी ज़बाँ पर हर्फ़-ए-मतलब तक नहीं आता

यहाँ तक सीना-तंगी से ज़ईफ़ ओ ज़ार है नाला
चला जो सुब्ह को वो ता-ब-लब शब तक नहीं आता

जहाँ तम्हीद की वो और क़िस्से छेड़ देता है
किसी सूरत से ज़ालिम हर्फ़-ए-मतलब तक नहीं आता

बुला भेजें न जब तक ‘शाद’ को वो अपने कूचे में
इजारा है तिरा ऐ शौक़ हाँ तब तक नहीं आता

जिसे पाला था इक मुद्दत तक आग़ोश-ए-तमन्ना में 

जिसे पाला था इक मुद्दत तक आग़ोश-ए-तमन्ना में
वही बानी हुआ मेरे ग़म ओ दर्द ओ अज़िय्यत का

उसी के हाथ से क्या क्या सहा सहना है क्या क्या कुछ
इलाही दो जहाँ में मुँह हो काला इस मुरव्वत का

करें इंसाफ़ का दावा असर कुछ भी न ज़ाहिर हो
मज़ा चक्खा है ऐसे दोस्तों से भी मोहब्बत का

मिटाएँ ताकि अपने ज़ुल्म करने की नदामत को
निकालें ढूँढ कर हर तरह से पहलू शिकायत का

हसद जी में भरा लाग है इक उम्र से दिल में
करें ज़ाहिर अगर मौक़ा है इज़हार-ए-अदावत का

तमअ में कुछ न समझें बाप और भाई की हुरमत को
अमल देखो तो ये फिर कुछ करें दावा शराफ़त का

मिरी उम्र-ए-दो-रोज़ा बेकसी के साथ कटती है
न अपनों से न ग़ैरों से मिला समरा रियाज़त का

जिसे देखा जिसे पाया ग़रज़ का अपनी बंदा था
जहाँ मैं अब मज़ा बाक़ी नहीं ख़ालिस मोहब्बत का

हमारा कल्बा-ए-अहज़ाँ है हम हैं या किताबें हैं
रहा ब़ाकी न कोई हम-नशी अब अपनी क़िस्मत का

ख़ुदा आबाद रक्खे ‘शाद’ मेरे उन अज़ीज़ों को
मज़ा चखवा दिया अल-क़र्ज़-ओ-मिक़राज़-उल-मोहब्बत का

तमाम उम्र नमक-ख़्वार थे ज़मीं के हम 

तमाम उम्र नमक-ख़्वार थे ज़मीं के हम
वफ़ा सरिश्‍त में थी हो रहे यहीं के हम

निकल के रूह डंवाडोल हो न जाए कहीं
हज़ार हैफ़ न दुनिया के हैं न दीं के हम

नज़र उठा के न देखा किसी तरफ़ ता-उम्र
रहे ख़याल में इक चश्‍म-ए-सुर्मा-गीं के हम

ज़मीं छुड़ाई गई हम से जब बना कर ख़ाक
यहाँ पे क्या न रहे ऐ सबा कहीं के हम

यहाँ मकाँ है तो क्यूँ आसमाँ की सैर करें
मकीं हैं ‘शाद’ अज़ल से इसी ज़मीं के हम

ज़माना ‘शाद’ हमें क्यूँ भूला नहीं देता
न हजू के न सज़ा-वार आफ़रीं के हम

ता-उम्र आश्‍ना न हुआ दिल गुनाह का

ता-उम्र आश्‍ना न हुआ दिल गुनाह का
ख़ालिक भला करे तिरी तिरछी निगाह का

तन्हा मज़ा उठाता है दिल रस्म-ओ-राह का
बीना तो है पे बस नहीं चलता निगाह का

जी भर के देख लूँ तो कर इस जुर्म पर शहीद
यूँ अपने सर पे ख़ून न ले बे-गुनाह का

रोना जो हो तो रो ले बस ऐ चश्‍म वक़्त-ए-नज़अ
अब आज ख़ात्मा भी है रोज़-ए-सियाह का

पहुँचा के हम का क़ब्र में जाते हैं अपने घर
लीजिए उन्हों ने वादा किया था निबाह का

तक़दीर हश्र से हमें लाई बहिश्‍त में
अरमान दिल में रह गया उस दाद-ख़्वाह का

पा-पोश नाज़ करती है उन की ज़मीन पर
चश्‍मक-ज़न-ए-सिपहर है गोशा कुलाह का

देखा न कारवाँ ने पलट कर कि कौन हूँ
मेरी तरह न हो कोई वामाँदा राह का

मंज़िल के क़तअ करने का मोहकम हुआ जो क़स्द
इक इक दरख़्त ख़िज़्र बना मेरी राह का

ढोए कहाँ तक इस तन-ए-ख़ाकी को उम्र भर
अब रूह को मिले कोई गोशा निबाह का

बेहतर कहीं थे मुझ से वो मय-ख़्वार साक़िया
हीला जो ढूँडते रहे अफ़ु-ए-गुनाह का

अश्‍कों का सिलसिला कहीं टूटे भी ऐ फ़िराक़
थक भी चुके क़दम मिरी फ़रियाद ओ आह का

इक तुझ पे मुनहसिर नहीं ऐ ख़िज़्र कर न नाज़
हर राह-रौ को तकता है वामाँदा रहा का

रक्खा जिनाँ में भी हमें मग़्मूम ता-अबद
इक़रार हम से ले के हमारे गुनाह का

इज़हार-ए-ग़म किया तो ये उसे ने दिया जवाब
चेहरा गवाही देता है झूठे गवाह का

गूग़ा-ए-हश्र दिल में समाता नहीं मिरे
हंगामा याद है मुझे फ़ुर्क़त में आह का

भिजवा दिया बहिश्‍त में पूछा न दिल का हाल
क्या ख़ूब फ़ैसला किया इस दाद-ख़्वाह का

क्या जानिए तलाश-ए-असर में कहाँ गई
अब तक कहीं पता न लगा मेरी आह का

सीने में अपने नाला ओ शेवन का शोर है
मातम हमेशा है दिल-ए-ग़फ़राँ-पनाह का

यूसुफ़ को ऐ सिपहर कुएँ में गिरा तो दे
मंज़ूर इम्तिहाँ है ज़ुलेख़ा की चाह का

क्यूँकर न अहल-ए-बज़्म में ऐ ‘शाद’ हो रसूख़
नेमुल-बदल हूँ ‘रासिख़’-ए-गुफ़राँ-पनाह का

तेरी ज़ुल्फ़ें ग़ैर अगर सुलझाएगा 

तेरी ज़ुल्फ़ें ग़ैर अगर सुलझाएगा
आँख वालों से न देखा जाएगा

सब तरह की सख़्तियाँ सह जाएगा
क्यूँ दिला तू भी कभी काम आएगा

एक दिन ऐसा भी नासेह आएगा
ग़म को मैं और ग़म मुझे खा जाएगा

ऐ फ़लक ऐसा भी इक दिन आएगा
जब किए पर अपने तू पछताएगा

वस्ल में धड़का है नाहक़ हिज्र का
वो दिन आएँगे तुझे समझाएगा

आ चुके अहबाब उठाने मेरी लाश
नाज़ उस को देखिए कब लाएगा

चोट खाए दिल का मातम-दार है
मेरा नाला भी तड़पता जाएगा

छोड़ दे हम वहशियों को ऐ ग़ुबार
पीछे पीछे तू कहाँ तक आएगा

मुंतज़िर है जान-ए-बर-लब-आमदा
देखिए कब फिर के क़ासिद आएगा

हिज़्र में नाले ग़नीमत जान ले
फिर तो ख़ुद ऐ ज़ोफ़ तू पछताएगा

नीम-कुश्‍ता हैं तो हैं फिर क्या करें
कुछ अगर बोलें तो वो शरमाएगा

जोश-ए-वहशत तुझ पे सदक़े अपनी जान
कौन तलवे इस तरह सहलाएगा

और भी तड़पा दिया ग़म-ख़्वार ने
ख़ुद है वहशी क्या मुझे बहलाएगा

राह-रौ तुझ सा कहाँ ऐ ख़िज़्र-ए-शौक़
कौन तेरी ख़ाक-ए-पा को पाएगा

बाग़ में क्या जाएँ आती हैं ख़िज़ाँ
गुल का उतरा मुँह न देखा जाएगा

मेरी जाँ मैं क्या करूँगा कुछ बता
जब तसव्वुर रात भर तड़पाएगा

क्यूँ न मैं मुश्‍ताक़ नासेह का रहूँ
नाम तेरा उस के लब पर आएगा

दिल के हाथों रूह अगर घबरा गई
कौन उस वहशी को फिर बहलाएगा

खो गए हैं दोनों जानिब के सिरे
कौन दिल की गुत्थियाँ सुलझाएगा

मैं कहाँ वाइज़ कहाँ तौबा करो
जो न समझा ख़ुद वो क्या समझाएगा

थक के आख़िर बैठ जाएगा ग़ुबार
कारवाँ मुँह देख कर रह जाएगा

दिल के हाथों से जो घबराओगे ‘शाद’
कौन इस वहशी को फिर समझाएगा

कम न समझो शौक़ को ऐ ‘शाद’ तुम
इक न इक बढ़ के ये आफ़त लाएगा

है ख़िजाँ गुल-गश्‍त को जाओ न ‘शाद’
गिर्या-ए-षबनम न देखा जाएगा

कुछ न कहना ‘शाद’ से हाल-ए-ख़िजाँ
इस ख़बर को सुनते ही मर जाएगा

था अजल का मैं अजल का हो गया 

था अजल का मैं अजल का हो गया
बीच में चौंका तो था फिर सो गया

लुत्फ़ तो ये है कि आप अपना नहीं
जो हुआ तेरा वो तेरा हो गया

काटे खाती है मुझे वीरानगी
कौन इस मदफ़न पे आ कर रो गया

बहर-ए-हस्ती के उमुक़ को क्या बताऊँ
डूब कर मैं ‘शाद’ इस में खो गया

ना जाँ-बाज़ों का मजमा था न मुश्‍ताक़ों का मेला था 

ना जाँ-बाज़ों का मजमा था न मुश्‍ताक़ों का मेला था
ख़ुदा जाने कहाँ मरता था मैं जब तू अकेला था

घरौंदा यूँ खड़ा तो कर लिया है आरज़ूओं का
तमाशा है जो वो कह दें कि मैं इक खेल खेला था

बहुत सस्ते छूटे ऐ मौत बाज़ार-ए-मोहब्बत में
ये सौदा वो है जिस में क्या कहें क्या क्या झमेला था

अगर तक़दीर में होता तो इक दिन पार भी लगता
ये दरिया झेलने को यूँ तो ऐ दिल ख़ूब झेला था

हमेशा हसरत-ए-दीदार पे दिल ने क़नाअत की
बड़े दर का मुजाविर था बड़े मुर्शिद का चेला था

कहाँ दिल और फ़ुसून-ए-इश्‍क़ की घातें कहाँ या रब
न पड़ता था बलाओं में अभी कम-बख़्त अनीला था

जहाँ चाहे लगे जिस दिल को चाहे चूर कर डाले
ज़बाँ से फेंक मारा बात थी नासेह कि ढेला था

तमाशा-गाह-ए-दुनिया में बताऊँ क्या उम्मीदों की
तन-ए-तन्हा था मैं ऐ ‘शाद’ और रेलों पे रेला था

न दिल अपना न ग़म अपना न कोई ग़म-गुसार अपना

न दिल अपना न ग़म अपना न कोई ग़म-गुसार अपना
हम अपना जानते हर चीज़ को होता जो यार अपना

जमे किस तरह इस हैरत-कदे में ए‘तिबार अपना
न दिल अपना न जान अपनी न हम अपने न यार अपना

हक़ीक़त में हमीं को जब नहीं ख़ुद ए‘तिबार अपना
ग़लत समझी अगर समझी है तन को जान-ए-ज़ार अपना

कहीं है दाम अरमाँ का कहीं दाने उम्मीदों के
अजल करती है किस किस घात से हम को शिकार अपना

इलाही ख़ैर हो अब के बहार-ए-बाग़ ने फिर भी
जमाया बे-तरह बुलबुल के दिल पर ए‘तिबार अपना

जो मय को ढाल भी लें हम तो साक़ी के इशारे पर
नहीं इस के अलावा मय-कदे में इख़्तियार अपना

अगर क़ासिद हक़ीक़त में पयाम-ए-वस्ल लाया है
तो क्यू आँसू भरे मुँह देखता है ग़म-गुसार अपना

ज़रूरत क्या किसी को इस तरफ़ हो कर गुज़रने की
अलग ऐ बेकसी बस्ती से है कोसों मज़ार अपना

मआज़ अल्लाह फ़ुर्क़त की हैं रातें क़ब्र की रातें
अभी से याँ हुआ जाता है सुन सुन कर फ़िशार अपना

गुलों की सुर्ख़ रंगत जिस्म में लौके लगाती है
दिखाती है तमाशा किस की आँखों को बहार अपना

ख़तर क्या कश्‍ती-ए-मय को भला मौज-ए-हवादिस का
न बेड़ा पार हो क्यूँकर कि ख़ुद साक़ी है यार अपना

छुपा लेगा किसी दिन अर्श तक को अपने दामन में
दिखा देगा तमाषा फैल कर मुषश्‍त-ए-ग़ुबार अपना

ख़बर क्या ग़ैब की ग़म-ख़्वार को और याँ ये आलम है
कहा जाता नहीं अपनी ज़बाँ से हाल-ए-ज़ार अपना

नहीं करता गवारा राह-रौ के दिल पे मैल आना
उड़ा करता है रस्ते से अलग हट कर ग़ुबार अपना

दम आया नाक में फ़रियादियों के शोर औ ग़ौग़ा से
क़यामत में अबस क्यूँ खींच लाया इंतिशार अपना

हम इक मेहमाँ हैं हम से दोस्ती करने का हासिल क्या
नहीं कुछ इस जहाँ में ऐ शब-ए-ग़म ए‘तिबार अपना

कुछ ऐसा कर कि ख़ुल्द आबाद तक ऐ ‘शाद’ जा पहुँचे
अभी तक राह में वो कर रहे हैं इंतिज़ार अपना

फ़क़त शोर-ए-दिल-ए-पुर आरज़ू था

फ़क़त शोर-ए-दिल-ए-पुर आरज़ू था
न अपने जिस्म में हम थे न तू था

हर इक के पाँव पर झुकते कटी उम्र
न समझे हम कि किस क़ालिब में तू था

जहाँ पहुँचे उसी का नूर पाया
जिधर देखा वही ख़ुर्शीद-रू था

जगह दामन में अपने क्यूँ न देते
कि तिफ़्ल-ए-अश्‍क़ अपना ही लहू था

कहूँ क्या दिल की मैं नाज़ुक-मिज़ाजी
ख़ुदा बख़्शे निहायत तुंद-ख़ू था

मैं कैफ़िय्यत कहूँ क्या बज़्म-ए-मय की
कि मीना हाथ में आँखों में तू था

ग़श आया उस ने तौली तेग़ जब जब
अजब हल्का हमारा भी लहू था

बहुत ढूँढा कहीं पाया न हम ने
बता दे ये कि किस गोशे में तू था

बचा क़ातिल का दामन लिल्लाहिल-हम्द
बहुत खौला हुआ अपना लहू था

उदू थे साक़िया सब मय-कदे में
यही इक आस थी पल्ले पे तू था

लिबास-ए-कुहना जब था अपना सद-चाक
तो फिर बेकार पैबंद ओ रफ़ू था

ग़ज़ब में आ के तुझ को तोड़ता शैख़
नतीजा बहस का क्या ऐ सुबू था

तिरी तस्वीर थे हम भी किसी वक़्त
यही नक़्शा हमारा हू-ब-हू था

नज़र में हेच था कौनैन साक़ी
लबालब जाम था हम थे सुबू था

सज़ा लग्ज्शि की पाते बज़्म में हम
ख़ुदा को ख़ैर करना था कि तू था

हम अपने होश में बाक़ी थे हर तरह
मगर जब तू हमारे रू-ब-रू था

तुझे से मुँह फुला लेते अजब क्या
सबा ग़ुचों का भी आख़िर नुमू था

चले हम बाग़ से ऐ ‘शाद’ किस वक़्त
बहार आने को थी गुल का नुमू था

ये रात भयानक हिज्र की है काटेंगे बड़े आलाम से हम 

ये रात भयानक हिज्र की है काटेंगे बड़े आलाम से हम
टलने की नहीं ये काली बला समझे हुए थे शाम से हम

जब क़ैस पहाड़ इस सर से टले ईद आई तब आई जान में जान
तो देर अजब आलम में रहे होंटों को मिलाए जाम से हम

था मौत का खटका जाँ-फ़रसा सद शुक्र कि निकला वो काँटा
गर हो न क़यामत का धड़का अब तो हैं बड़े आराम से हम

ता-मंज़िल-ए-जानाँ साथ रहा कम-बख़्त तसव्वुर ग़ैरों का
शौक़ अपने क़दम खींचा ही किया पल्टा ही किए हर गाम से हम

उल्फ़त ने उन्हीं की हक़ की तरफ़ फेरा मिरे दिल को शुक्र-ए-ख़ुदा
तामीर करें मस्जिद कोई क्यूँकर न बुतों के नाम से हम

ऐ हम-नफ़सो दम लेने दो भूले हुए नग़्मे याद आ लें
आए हैं चमन में उड़ के अभी छूटे हैं इसी दम दाम से हम

बातों में गुज़रते हिज्र के दिन ऐ काश कि दोनों मिल जाते
हम से है दिल-ए-नाकाम ख़फ़ा आज़ुर्दा दिल-ए-नाकाम से हम

यूँ उन के अदब या ख़ातिर से हर बात को ले लें अपने सर
जब दिल है उन्हीं के क़ाबू में फिर पाक हैं हर इल्ज़ाम से हम

वो समझे कि हम ने मार लिया हम समझे मिलेंगे आख़िर वो
मिलते ही निगह के दोनों ख़ुश आग़ाज़ से वो अंजाम से हम

दुनिया में तख़ल्लुस कोई न था क्या नील का टीका ‘शाद’ ही था
तुम वजह ने पूछो कुछ इस की चिढ़ जाते हैं क्यूँ इस नाम से हम

लुत्फ़ क्या है बे-ख़ुदी का जब मज़ा जाता रहा 

लुत्फ़ क्या है बे-ख़ुदी का जब मज़ा जाता रहा
यूँ न मानूँ मैं मगर साग़र तो समझाता रहा

ताक़ से मीना उतारा पाँव में लग्ज़िश हुई
की न साक़ी से बराबर आँख शरमाता रहा

मुझ सा हो मज़बूत दिल तब मय-कशी का नाम ले
मोहतसिब देखा किया मजबूर झल्लाता रहा

क्या करूँ और किस तरह इस बे-क़रारी का इलाज
यार के कूचे में भी तू दिल को बहलाता रहा

नौजव़ाँ क़ातिल को अच्छी दिल-लगी हाथ आ गई
जब तलक कुछ दम रहा बिस्मिल को ठुकाराता रहा

‘शाद’ वक़्त-ए-नज़अ था ख़ामोश लेकिन देर तक
नाम रह रह कर किसी का ज़ेर-ए-लब आता रहा

सियाहकार सियह-रू ख़ता-शिआर आया

सियाहकार सियह-रू ख़ता-शिआर आया
तिरी जनाब में तेरा गुनाहगार आया

ख़िज़ाँ का दौर गया मौसम-ए-बहार आया
मगर न इस दिल-ए-बे-सब्र को क़रार आया

कहीं जवाब न तू ने दिया यहाँ के सिवा
जहाँ में यूँ तो बहुत मैं तुझे पुकार आया

सरा-ए-दहर में छोड़ा तन-ए-कसी़फ अपना
ये बोझ सर से मुसाफ़िर तिरा उतार आया

हमारे नाला-ए-दिल का न पूछिए अहवाल
गली से यार की हिम्मत भी अब के हार आया

पड़ी जो कैस के ऊपर नज़र बयाबाँ में
मुझे ग़रीब के ऊपर ग़ज़ब का प्यार आया

न अपने पाँव से आना मिला गली में तिरी
यहाँ भी चार के काँधों पे मैं सवार आया

ये इजि़्तराब है क्यूँ है किधर का क़स्द ऐ रूह
कहाँ से आई तलब किस जगह से तार आया

बुरा ख़िज़ाँ का हो देखे जो सूखे सूखे होंट
ग़रीब फूल पे मुझ को ग़ज़ब का प्यार पाया

मिरी न पूछ कि तेरी गली में ख़ाक हूँ मैं
तुझी को मेरी वफ़ा का न ए‘तिबार आया

लहद ने खोल के आग़ोश दी जगह जो मुझे
लिपट के रह गए हम को भी ख़ूब प्यार आया

यक़ीन जान ले साक़ी कि ख़ुम की ख़ैर नहीं
ख़ुदा न कर्दा जो अब के मुझे ख़ुमार आया

मिरे नसीब कहाँ इस तरह के दीदा-ए-तर
सुनूँ ये ख़ुश-ख़बरी कान से कि यार आया

निगह ने उन की जहाँ सैद-ए-नौ को ताक लिया
अदा ने उन की कहा ले नया षिकार आया

तिरे फ़िराक के ख़ूगर न मर मिटे जब तक
क़ज़ा के आने का तब तक न ए‘तिबार आया

दिला पलट गया क़िस्मत का पहले ही पासा
अब अपनी जीत कहाँ दिल जब अपना हार आया

जब इख़्तियार चमन पर नहीं तो हम को क्या
हज़ार बार अगर मौसम-ए-बहार आया

शिकायत-ए-दिल-मुज़्तर कहाँ तलक ऐ मौत
दुआएँ दूँगा तुझे गर इसे क़रार आया

जवाब-ए-ख़त का न क़ासिद से माजरा पूछो
है साफ़ चेहरे से ज़ाहिर कि शर्मसार आया

नज़र में फिर गई चाल आप की जवानी की
जो लड़खड़ाता हुआ कोई बादा-ख़्वार आया

जो माँगते तो हमें बाग़बाँ से क्या मिलता
ग़रीब फूल तो दामन को भी पसार आया

न अपने नाला-ए-दिल को मिला जवाब कहीं
निकल के दिल से मुझे अर्श तक पुकार आया

अदम में ‘शाद’ को क्या वलवला हो जन्नत का
कि ये ग़रीब तो हस्ती से दिल को मार आया

हरगिज़ कभी किसी से न रखना दिला ग़रज़

हरगिज़ कभी किसी से न रखना दिला ग़रज़
जब कुछ ग़रज़ नहीं तो ज़माने से क्या ग़रज़

फैला के हाथ मुफ़्त में होगे ज़लील हम
महरूम तेरे दर से फिरेगी दुआ ग़रज़

दुनिया में कुछ तो रूह को इस जिस्म से है काम
मिलता है वर्ना कौन किसी से बिला ग़रज़

वस्ल ओ फ़िराक़ ओ हसरत ओ उम्मीद से खुला
हमराह है हर एक बक़ा के फ़ना ग़रज़

इक फिर के देखने में गई सैकड़ों की जाँ
तेरी हर इक अदा में भरी है जफ़ा ग़रज़

देखा तो था यही सबब-ए-हसरत-ओ-अलम
मजबूर हो के तर्क किया मुद्दआ ग़रज़

क्यूँकर न रूह ओ जिस्म से हो चंद दिन मिलाप
इस को जुदा ग़रज़ है तासे उस को जुदा ग़रज़

इल्ज़ाम ता-कि सर पे किसी तरह का न हो
ऐ ‘शाद’ ढूँढती है बहाने क़ज़ा ग़रज़

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