शाहिद कबीर की रचनाएँ

आज हम बिछड़े हैं तो कितने रंगीले हो गए

आज हम बिछड़े हैं तो कितने रंगीले हो गए
मेरी आंखें सुर्ख़ तेरे हाथ पीले हो गए

कब की पत्थर हो चुकी थीं, मुंतज़िर आँखें मगर
छू के जब देखा तो मेरे हाथ गीले हो गए

जाने क्या एहसास साज़-ए-हुस्न के तारों में है
जिनको छूते ही मेरे नग़मे रसीले हो गए

अब कोई उम्मीद है ‘शाहिद’ न कोई आरज़ू
आसरे टूटे तो जीने के वसीले हो गए

अंदर का सुकूत कह रहा है

अंदर का सुकूत कह रहा है
मिट्टी का मकान बह रहा है

शबनम के अमल से गुल था लरज़ाँ
सूरज का इताब सह रहा है

बिस्तर में खुला कि था अकहरा
वो जिस्म जो तह-ब-तह रहा है

पत्थर को निचोड़ने से हासिल
हर चंद नदी में रह रहा है

आईना पिघल चुका है ‘शाहिद’
साकित हूँ मैं अक्स बह रहा है

कर्ब चेहरे से मह ओ साल को धोया जाए

कर्ब चेहरे से मह ओ साल को धोया जाए
आज फ़ुर्सत से कहीं बैठ के रोया जाएर

फिर किसी नज़्म की तम्हीदर उठाई जाए
फिर किसी जिस्म को लफ़्ज़ों में सुमोया जाए

कुछ तो हो रात की सरहद में उतरने की सज़ा
गर्म सूरज को समुंदर में डुबोया जाए

बज गए रात के दो अब तो वो आने से रहे
आज अपना ही बदन ओढ़ के सोया जाए

नर्म धागे को मसलता है कोई चुटकी में
सख़्त हो जाए तो मोती में पिरोया जाए

इतनी जल्दी तो बदलते नहीं होंगे चेहरे
गर्द-आलूद है आईने को धोया जाए

मौत से ख़ौफ़-ज़दा जीने से बेज़ार हैं लोग
इस अलमीये पे हँसा जाए कि रोया जाए

कुछ देर काली रात के पहलू में लेट के

कुछ देर काली रात के पहलू में लेट के
लाया हूँ अपने हाथों में जुगनू समेट के

दो चार दाँव खेल के वो सर्द पड़ गया
अब क्या करोगे ताश के पŸाों को फेट के

उस साँवले से जिस्म को देखा ही था कि बस
घुलने लगे ज़बाँ पे मज़े चाकलेट के

जैसे कोई लिबास न हो उस के जिस्म पर
यूँ रास्ता चले है बदन को समेट के

मैं उस के इंतिज़ार में बैठा ही रह गया
कपड़ों में रख गया वो बदन को लपेट के

हर फ़लसफ़े को वक़्त ने ऐसे मिटा दिया
जैसे कोई नुक़ूश मिटा दे सलेट के

वो हँस रहा था दूर खड़ा और चंद लोग
ले जा रहे थे उस को कफ़न में लपेट के

ग़म का ख़ज़ाना तेरा भी है मेरा भी

ग़म का ख़ज़ाना तेरा भी है मेरा भी
ये नज़राना तेरा भी है मेरा भी

अपने ग़म को गीत बना कर गा लेना
राग पुराना तेरा भी है मेरा भी

कौन है अपना कौन पराया क्या सोचें
छोड़ ज़माना तेरा भी है मेरा भी

शहर में गलियों गलियों जिस का चर्चा है
वो अफ़्साना तेरा भी है मेरा भी

तू मुझ को और मैं तुझ को समझाऊँ क्या
दिल दीवाना तेरा भी है मेरा भी

मय-ख़ाना की बात न कर वाइज़ मुझ से
आना जाना तेरा भी है मेरा भी

जैसा भी है ‘शाहिद’ को अब क्या कहिए
यार पुराना तेरा भी है मेरा भी

ज़मीं पे चल न सका आसमान से भी गया

ज़मीं पे चल न सका आसमान से भी गया
कटा के पर को परिंदा उड़ान से भी गया

किसी के हाथ से निकला हुआ वो तीर हूँ जो
हदफ़ को छू न सका और कमान से भी गया

भुला दिया तो भुलाने की इंतिहा कर दी
वो शख़्स अब मिरे वहम ओ गुमान से भी गया

तबाह कर गई पक्के मकान की ख़्वाहिश
मैं अपने गाँव के कच्चे मकान से भी गया

पराई-आग में कूदा तो क्या मिला ‘शाहिद’
उसे बचा न सका अपनी जान से भी गया

ठुकराओ अब कि प्यार करो मैं नशे में हूँ 

ठुकराओ अब कि प्यार करो मैं नशे में हूँ
जो चाहो मेरे यार करो मैं नशे में हूँ

अब भी दिला रहा हूँ यक़ीन-ए-वफ़ा मगर
मेरा न ए‘तिबार करो मैं नशे में हूँ

अब तुम को इख़्तियार है ऐ अहल-ए-कारवाँ
जो राह इख़्तियार करो मैं नशे में हूँ

गिरने दो तुम मुझे मिरा साग़र संभाल लो
इतना तो मेरे यार मैं नशे में हूँ

अपनी जिसे नहीं उसे ‘शाहिद’ की क्या ख़बर
तुम उस का इंतिज़ार करो मैं नशे में हूँ

तुम से मिलते ही बिछड़ने के वसीले हो गए

तुम से मिलते ही बिछड़ने के वसीले हो गए
दिल मिले तो जान के दुश्मन क़बील हो गए

आज हम बिछड़े हैं तो कितने रंगील हो गए
मेरी आँखें सुर्ख़ तेरे हाथ पीले हो गए

अब तिरी यादों के निश्तर भी हुए जाते हैं कुंद
हम को कितने रोज़ अपने जख़्म छीले हो गए

कब की पत्थर हो चुकी थीं मुंतज़िर आँखें मगर
छू के जब देखा तो मेरे हाथ गीले हो गए

अब कोई उम्मीद है ‘शाहिद’ न कोई आरज़ू
आसरे टूटे तो जीने के वसीले हो गए

नींद से आँख खुली है अभी देखा क्या है 

नींद से आँख खुली है अभी देखा क्या है
देख लेना अभी कुछ देर में दुनिया क्या है

बाँध रक्खा है किसी सोच ने घर से हम को
वर्ना अपना दर ओ दीवार रे रिश्ता क्या है

रेत की ईंट की पत्थर की हो या मिट्टी की
किसी दीवार के साए का भरोसा क्या है

घेर कर मुझर को भी लटका दिया मस्लूब के साथ
मैं ने लोगों से ये पूछा था कि क़िस्सा क्या है

संग-रेज़ों के सिवा कुछ तिरे दामन में नहीं
क्या समझ कर तू लपकता है उठाता क्या है

अपनी दानिस्त में समझे कोई दुनिया ‘शाहिद’
वर्ना हाथों में लकीरों के अलावा क्या है

पाया नहीं वो जो खो रहा हूँ

पाया नहीं वो जो खो रहा हूँ
तक़्दीर को अपनी रो रहा हूँ

इस सोच में ज़िंदगी बिता दी
जागा हुआ हूँ कि सो रहा हूँ

फिर किस से उठेगा बोझ मेरा
इस फ़िक्र में ख़ुद को ढो रहा हूँ

काँटों को पिला के ख़ून अपना
राहों में गुलाब बो रहा हूँ

झरना हो नहीं हो या समुंदर
कूज़े में सब सुमो रहा हूँ

हर रंग गँवा चुका है पहचान
पानी में क़लम डुबो रहा हूँ

पत्थर के लिबास को मैं ‘शाहिद’
शीशे की सिलों पे धो रहा हूँ

पुकारती है जो तुझ को तिरी सदा ही न हो

पुकारती है जो तुझ को तिरी सदा ही न हो
न यूँ लपक कि पलटने को हौसला ही न हो

तमाम हर्फ़ ज़रूरी नहीं हों बे-मअ’नी
ये आसमान इधर झुक के टूटता ही न हो

मिले थे यूँ कि जुदा होके ऐसे मिलते हैं
हमारे बीच कभी जैसे कुछ हुआ ही न हो

हर एक शख़्स भटकता है तेरे शहर में यूँ
किसी की जेब में जैसे तिरा पता ही न हो

जो होता जाता है मायूस दिन-ब-दिन तुझ से
ज़रा क़रीब से देख इस को आईना ही न हो

जहाँ को छान के बैठा है इस तरह ‘शाहिद’
तमाम उम्र मैं जैसे कभी चला ही न हो

बे-सबब बात बढ़ाने की ज़रूरत क्या है

बे-सबब बात बढ़ाने की ज़रूरत क्या है
हम ख़फ़ा कब थे मनाने की ज़रूरत क्या है

आप के दम से तो दुनिया का भरम है क़ाएम
आप जब हैं तो ज़माने की ज़रूरत क्या है

तेरा कूचा तिरा दर तेरी गली काफ़ी है
बे-ठिकानों को ठिकाने की ज़रूरत क्या है

दिल से मिलने की तमन्ना ही नहीं जब दिल में
हाथ से हाथ मिलाने की ज़रूरत क्या है

मैं न हिंदू न मुसलमान मुझे जीने दो

मैं न हिंदू न मुसलमान मुझे जीने दो
दोस्ती है मेरा ईमान मुझे जीने दो

कोई एहसाँ न करो मुझपे तो एहसाँ होगा
सिर्फ़ इतना करो एहसान मुझे जीने दो

सबके दूख-दर्द को बस अपना समझ कर जीना
बस यही है मेरा अरमान मुझे जीने दो

लोग होते हैं जो हैरान मेरे जीने से
लोग होते रहें हैरान मुझे जीने दो

रूह को क़ैद किए जिस्म के हालों में रहे 

रूह को क़ैद किए जिस्म के हालों में रहे
लोग मकड़ी की तरह अपने ही जालों में रहे

जिस्म को आईना दिखाते हैं साए वर्ना
आदमी के लिए अच्छा था उजालों में रहे

वक़्त से पहले हो क्यूँ ज़हन पे ख़ुर्शीद का बोझ
रात बाक़ी है अभी चाँद प्यालों में रहे

फिर तो रहना ही है घूरे का मुक़द्दर हो कर
फूल ताज़ा है अभी रेशमी बालों में रहे

शौक़ ही है तो बहर-हाल तमाशा बनिए
ये ज़रूरी नहीं वो देखने वालों में रहे

अब कैलेंडर में नया ढूँढ़िए चेहरा ‘शाहिद’
कब तलक एक ही तस्वीर ख़यालों में रहे

रेत की लहरों से दरिया की रवानी माँगे

रेत की लहरों से दरिया की रवानी माँगे
मैं वो प्यासा हूँ जो सहराओं से पानी माँगे

तू वो ख़ुद सर कि उलझ जाता है आईनों से
मैं वो सरकश कि जो तुझ से तिरा सानी माँगे

वो भी धरती पे उतारी हुई मख़्लूक़ ही है
जिस का काटा हुआ इंसान न पानी माँगे

अब्र तो अब्र शजर भी हैं हवा की ज़द में
किस से दम भर को कोई छाँव सुहानी माँगे

उड़ते पत्तों पे लपकती है यूँ डाली डाली
जैसे जाते हुए मौसम की निशानी माँगे

मैं वो भूला हुआ चेहरा हूँ कि आईना भी
मुझ से मेरी कोई पहचान पुरानी माँगे

ज़र्द मल्बूस में आती है बहारें ‘शाहिद’
और तू रंग ख़िज़ाओं का भी धानी माँगे

लपक रहे हैं अँधेरे, हवा सुराग़ में है

लपक रहे हैं अँधेरे, हवा सुराग़ में है
ये देखना है कि कितना लहू चिराग़ में है

सब अपने-अपने चिराग़ों को ले के चलते हैं
किसी की शम्मा में लौ है किसी के दाग़ में है

किसी दलील से क़ाईल[1] न होंगे दीवाने
जो बात दिल में बसी है वही दिमाग़ में है

लपक रहा है हर इक़ सिम्त ख़ौफ़ का आसेब[2]
जो जंगलों में था कल तक वह आज बाग़ में है

महक रही है उजड़ कर भी ज़िंदगी “शाहिद”
किसी की याद की ख़ुश्बू अभी दिमाग़ में है

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