शाह ‘नसीर’की रचनाएँ

गो सियह-बख़्त हूँ पर यार लुभा लेता है

गो सियह-बख़्त हूँ पर यार लुभा लेता है
शक्ल-ए-साया के मुझे साथ लगा लेता है

तू वो है नाम-ए-ख़ुदा ऐ बुत-ए-काफ़िर कि तिरे
ज़ाहिद-ए-काबा-नशीं भी क़दम आ लेता है

दिल पे तलवार सी कुछ लगती है जब ग़ैर को तो
पास अबरू के इशारे से बुला लेता है

क्यूँ न फूले दिल-ए-सद-चाक हमारा यारो
गुल समझ कर वो उसे सर पे चढ़ा लेता है

मौज-ए-दरिया तू कब अठखेली से यूँ चलती है
पर तिरी कब्क-दरी चाल उड़ा लेता है

ज़ुल्फ-ए-मुश्‍कीं को न छेड़ उस की दिला मान कहा
अपने क्यूँ सर पे बला अहल-ए-ज़फा लेता है

ख़ाल-ए-मश्‍शाता बना काजल का चश्‍म-ए-यार पर

ख़ाल-ए-मश्‍शाता बना काजल का चश्‍म-ए-यार पर
ज़ाग को बहर-ए-तसद्दुक रख सर-ए-बीमार पर

मुझ को रहम आता है दस्त-ए-नाजुक-ए-दिल-दार पर
मैं ही रख दूँगा गला ऐ हम-दमो तलवार पर

बे-सुवेदा हाथ दिल मत डाल ज़ुल्फ-ए-यार पर
माश पहले पढ़ के मंतर फेंक रू-ए-यार पर

गर हिफाज़त रूख़ की है मंजूर तो मिटवा न ख़त
बाग़बाँ रखता है काँटें बाग़ की दीवार पर

कौन कहता है कि सब्ज़ा आग पर उगता नहीं
ख़त है पैदा यार के देखो रूख़-ए-गुलनार पर

देख मिज़गाँ पर मिरी तुग़यानी-ए-सैल-ए-सरिश्‍क
नूह का तूफ़ाँ न देखा होवे जिस ने ख़ार पर

जिस को देखा ही नहीं उस के वतन में क़द्र-ए-ख़ाक
बाग़ से हो कर जुदा पहुँचे है गुल दस्तार पर

हक़ अगर पूछो तो एजाज़-ए-सर-ए-मंसू था
वर्ना लगना था तअज्जुब फल का नख़्ल-ए-दार पर

तेरी तुर्बत पर चढ़ाने ढूँडता है किस के फूल

तेरी तुर्बत पर चढ़ाने ढूँडता है किस के फूल
तेरी आँखों का हूँ कुश्‍ता रख दे दो नर्गिस के फूल

एक दिन हो जाऊँगा तेरे गले का हार मैं
सूँघने को मत लिया कर हाथ में जिस तिस के फूल

बिस्तर-ए-गुल पर जो तू ने करवटें लीं रात को
इत्र-आगीं हो गए ऐ गुल-बदन सब पिस के फूल

कुछ ख़बर भी है तुझे चल फ़ातिहा के वास्ते
आज हैं ऐ शोख़ तेरे आशिक़-ए-मुफ़लिस के फूल

और ही कुछ रंग है सीने के दाग़ों का मिरे
इस रविश के हैं कहाँ तेरे सिपर पर मिस के फूल

क्या नवा-संजी करें ऐ हम-सफ़ीरान-ए-चमन
आ गई फ़ज़्ल-ए-ख़िजाँ गुलशन से सारे खिसके फूल

हैं मह ओ ख़ुर्शीद जो शाम ओ सहर तुझ पर से वार
सीम ओ ज़र के फेंकते हैं बीच में मजलिस के फूल

किस ने सिखलाई है तुझ को ये रविश रफ़्तार की
मिट गए कालीं के जो तेरे क़दम से घिस के फूल

फुलझड़ी से कम नहीं मिज़गाँ-ए-अश्‍क-अफ़शां तिरी
मोतिया के देखना झड़ते है मुँह से इस के फूल

रंग-ए-ख़ूब-ओ-ज़िश्‍त में क्यूँ फ़र्क़ समझे है ‘नसीर’
ख़ार भी तू है उसी का हैं बनाए जिस के फूल

क़दम न रख मिरी चश्‍म-ए-पुर-आब के घर में

क़दम न रख मिरी चश्‍म-ए-पुर-आब के घर में
भरा है मौज का तूफ़ाँ हबाब के घर में

कहे है देख के वो अक्स-ए-रूख़ ब-साग़र-ए-मय
नुज़ूल-ए-माह हुआ आफ़्ताब के घर में

मुदाम रिंद करें क्यूँ न आस्ताँ-बोसी
हरम है शैख़-ए-मशीख़त-मआब के घर में

हमारे दिल में कहाँ आबले हैं ऐ साक़ी
चुने हुए हैं ये शीशे शराब के घर में

तड़प को देख मिरे दिल की बर्क़-ए-आतिश-बार
ख़जिल हो छुप गई आख़िर सहाब के घर में

दिला न क्यूँके करूँ इख़्तिलात की बातें
हिजाब क्या है अब उस बे-हिजाब के घर में

‘नसीर’ देख तो क्या जलवा-ए-ख़ुदाई है
हमारे उस बुत-ए-ख़ाना-ख़राब के घर में

शमीम-ए-ज़ुल्फ-ए-मुअम्बर जो रू-ए-यार से लूँ 

शमीम-ए-ज़ुल्फ-ए-मुअम्बर जो रू-ए-यार से लूँ
तो फिर ख़ता है मिरी मुश्‍क गर ततार से लूँ

क़दम रखे मिरे सीने पे आ के गर वो निगार
हिना का काम मैं ख़ून-ए-दिल-ए-फ़गार से लूँ

अगर मिले तिरे हाथों से ऐ जुनूँ फ़ुर्सत
क़िसासे-आब्ला-पाई मैं नोक-ए-ख़ार से लूँ

मिरे हुज़ूर ये लोटे है तेरी छाती पर
जो पहुँचे हाथ तो बदला गुलों के हार से लूँ

दिला बजे कहीं घड़ियाल ता मैं घड़ियों का
हिसाब उस शब-ए-हिज्र-ए-सियाह-कार से लूँ

अजब है सैर किसी दिन तो साथ बाग़ में चल
कहाँ तलक मैं क़दम इज्ज़ ओ इंकिसार से लूँ

पटा-पटी का मिरे पास गर ने हो ख़ेमा
तो यार तेरे लिए अब्र-ए-नौ बहार से लूँ

जो मय-कशी का इरादा हो कुछ तिरे दिल में
चमन में साग़र-ए-गुल दस्त-ए-शाख़सार से लूँ

अगर सुराह-ए-गुचाँ में हो न बादा-ए-सुर्ख़
तो शी
शा-ए-मय-ए-ख़स सर्व-ए-जुई-बार से लूँ

न होवे मुतरिब-ए-नग़मा-सरा तो इस का काम
क़सम है मुझ को तिरी अंदलीब-ए-ज़ार से लूँ

लगे न हाथ कोई गर रबाब-ओ-चंग-नवाज़
तो अपने दोष पे रख बीन को मैं तार से लूँ

ये जी में हो कि न देखे कोई तो पर्दे को
किनार-ए-आब-ए-रवाँ चादर आबशार से लूँ

बलाएँ लेने से मेरे अगर ख़ुशी हो तिरी
बलाएँ मेहर से इख़्लास से प्यार से लूँ

गर उस पे भी गुल-ए-आरिज़ का तू न दे बोसा
तो फिर मैं जब्र करूँ अपने इख़्तियार से लूँ

‘नसीर’ मदरसा-ए-इश्‍क में मुतव्विल का
सबक़ न क्यूँके मैं जुल्फ़-ए-दराज़-ए-यार से लूँ

उस काकुल-ए-पुर-ख़म का ख़लल जाए तो अच्छा

उस काकुल-ए-पुर-ख़म का ख़लल जाए तो अच्छा
दिल सर से बला तेरे ये टल जाए तो अच्छा

बोसे का सवाल उस से करूँ हूँ तो कहे है
चले रे मिरे कुछ मुँह से निकल जाए तो अच्छा

इसबात न हो दावा-ए-ख़ूँ उस पे इलाही
सूरत मिरे क़ातिल की बदल जाए तो अच्छा

ले सर पे बवाल अपने पतंगों का न ऐ शम्अ
तू और भी जोबन से जो ढल जाए तो अच्छा

डसने को मिरा दिल है तिरी ज़ुल्फ़ की नागिन
ताऊस-ख़त उस को जो निगल जाए तो अच्छा

हम चश्‍मी तेरी चश्‍म से करता है ये बादाम
उस को कोई पत्थर से कुचल जाए तो अच्छा

ज़ुल्फों के तसर्रूफ में है बे-वजह रूख़-ए-यार
कुफ़्फार का काबे से अमल जाए तो अच्छा

ख़ूँ हो के रवाँ दिल हो गर आँखों से तो बेहतर
या इश्‍क़ की आतिश में ये जल जाए तो अच्छा

लब पर से बुलाक़ अपनी दम-ए-बोसा उठा दो
अंदेशा-ए-ज़म्बूर-ए-असल जाए तो अच्छा

पहलू से निकल जाए अगर दिल तो बला से
तू छोड़ के ख़ाली न बग़ल जाए तो अच्छा

कहते हैं ‘नसीर’ अपनी न तुम आह को रोको
ये तीर निशाने पे जो चल जाए तो अच्छा

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