शिवकुमार ‘बिलगरामी’ की रचनाएँ

कौन चितेरा चँचल मन से 

कौन चितेरा चँचल मन से अन्तर मन में झाँक रहा है ।
कौन हमारे मन की ताक़त अपने मन से आँक रहा है ।

कौन पथिक है अति उत्साही
पथ के जो निर्देश न माने,
प्रेमपथों के सत्य न समझे,
प्रेमपथों के मोड़ न जाने,

कौन हठीला दुर्गम पथ पर, मन के घोड़े हाँक रहा है ।

किसने मेरे सपने देखे
किसको गहरी नीन्द न आए,
कौन उनीन्दा जाग रहा है
अर्ध निशा में दीप जलाए,

कौन विधर्मी तप्त हृदय में, चान्द रुपहला टाँक रहा है ।

कौन विरत है खुद के तन से
किसका ख़ुद पर ध्यान नहीं है,
किसने दंश न झेले तन पर
किसको विष का ज्ञान नहीं है,

कौन सँपेरा साँप पिटारी, खोल रहा है, ढाँक रहा है ।

आपकी आवाज़ हूँ मैं

आपकी आवाज़ हूँ मैं, आज भी और कल रहूँगा ।

जिस व्यथा ने शक्ति छीनी
आप जिसको सह न पाए,
जिस व्यथा ने शब्द छीने
आप जिसको कह न पाए,

आपकी उस हर व्यथा को गीत गाकर मैं कहूँगा ।

जिस तड़प ने कर दिए हैं
आपके मृदु होंठ नीले,
जिस तड़प ने भर दिए हैं
आँख में आँसू हठीले,

उस तड़प के वेग को अब, मैं तड़प कर ख़ुद सहूँगा ।

जिस हताशा और घुटन में
आपका जीवन पला है,
जिस निराशा और तपन में
आपका तन-मन जला है,

उस निराशा और तपन में, मैं नदी बनकर बहूँगा ।

धूप में एक बून्द कब तक.

धूप में इक बून्द कब तक, जँग करती द्रुत हवा से ।
द्रुत हवा में धूप कब तक, बन्द रखती होंठ प्यासे ।

रात का गहरा अन्धेरा
ओस बून्दें दे गया जो,
पौ फटी तो सूर्य का बल
साथ अपने ले गया वो,

शौर्य का बल दर्द देता, दर्द हो कम किस दवा से ?

नवसबल आखेट आतुर
इस धरा पर नृत्य करते,
एक क्षण लगता नहीं, जब
वो थिरक कर प्राण हरते,

माँस के भूखे वही हैं, रक्त के जो हैं पिपासे ।

गर्म साँसों की हवा से
मन-हृदय के खेत सूखे,
शुष्क खेतों में उगे हैं
क्षुप जवासे रक्त भूखे,

आँख में चुभते बहुत हैं, पैर में चुभते जवासे ।

मुझे भर नैन रोने दो 

नहीं कहता हूँ मैं तुमसे सुकूँ की नींद सोने दो ।
रहो बस दूर तुम मुझसे, मुझे भर नैन रोने दो ।

बसूँ मैं भी न आँखों में
न तुम दिल में उतर पाओ,
व्यथा गर अश्रु बन निकले
उसे चुपचाप पी जाओ,

अगर कुछ-कुछ हुआ भी हो तो अब कुछ भी न होने दो ।
रहो बस दूर तुम मुझसे, मुझे भर नैन रोने दो ।

करोगे क्या मुझे पाकर
रहोगे क्यों मेरे होकर,
चढ़ें जो फूल मस्तक पर
वही हों पैर की ठोकर,

मुझे तन्हा ही रहने दो मुझे पलकें भिगोने दो ।
रहो बस दूर मुझसे मुझे भर नैन रोने दो ।

कोई कुछ लेके पाता है
कोई कुछ देके पाता है,
जगत में तो हमेशा गुल
मगर ख़ुशबू लुटाता है,

जिसे जिसमें क़रार आए, उसे उसमें ही खोने दो ।
रहो बस दूर मुझसे, मुझे भर नैन रोने दो ।

मैं तुम्हारी ही कृपा से..

मैं तुम्हारी ही कृपा से नित्य निर्मल हो रहा हूँ ।
मैं तुम्हारा नेह पाकर और उज्ज्वल हो रहा हूँ ।

भाव सुन्दर और कोमल
जग रहे हैं इस हृदय में,
सद्-विचारों के पखेरू
उड़ रहे हैं मन-निलय में,

मैं तुम्हारी इस दया से भाव विह्वल हो रहा हूँ ।
मैं तुम्हारा पाकर और उज्ज्वल हो रहा हूँ ।

प्रेम की इक दृष्टि से मैं
तृप्त होता जा रहा हूँ,
एक पल के साथ से मैं
सुख युगों का पा रहा हूँ,

मैं तुम्हारी पाद-रज से नित्य निश्छल हो रहा हूँ ।
मैं तुम्हारा नेह पाकर और उज्ज्वल हो रहा हूँ ।

भेद के जो बन्ध थे वो
टूटते ही जा रहे हैं,
और भी अवरोध थे जो
वो किनारा पा रहे हैं,

मैं नदी-सा बह रहा हूँ, नित्य कल-कल हो रहा हूँ ।
मैं तुम्हारा नेह पाकर और उज्ज्वल हो रहा हूँ ।

शक्तियाँ कितनी अलौकिक
जग रही तन में निरन्तर,
पुष्प कितने खिल रहे हैं
दिव्य चेतन मन-पटल पर,

मैं निरन्तर ‘ऊँ’ का स्वर मन्त्र का बल हो रहा हूँ ।
मैं तुम्हारा नेह पाकर और उज्ज्वल हो रहा हूँ ।

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