शिव कुशवाहा की रचनाएँ

लोक परंपराएं 

लोक परंपराएँ
पैठ जाती हैं गहरे तक
समाज में
चली आती हुई परंपरा और रीति रिवाज
नहीं मिटते आसानी से
लोक में जीवित रहते हैं वे
किसी न किसी कहानी के रूप में,

चलती रहती हैं पात्रों की
एक उपेक्षित शृंखला
पौराणिक या ऐतिहासिक
संसार पटल पर हो जाते हैं अमर
जैसे कोई नायक
पा जाता है अमरता का पद
उसी तरह लोक में
अमर हो जाते हैं कुछ अविजित नायक
चलता रहता है उनका नाम
कुछ बदले हुए नाम के साथ।

लोक परम्पराओं के
नहीं होते एतिहासिक दस्तावेज
पीढ़ी दर पीढ़ी
समय के साथ-साथ
चलती हैं आख्यानों में उनकी दास्तान
सुने जाते हैं उनके गीत
गाई जाती हैं उनकी प्रशस्तियाँ
हर साल जीवित हो
उठते है लोक की चेतना में।

लोक और उसकी परंपराएँ
जुड़ी रहती हैं
जन सामान्य के भावों से
हम कितना भी नकार लें
लेकिन लोक और उसकी परंपराएँ
रहेंगी जीवित
समाज के आखिरी आदमी के
समाप्त होने तक…

बदरंग चेहरे

सांझ के गहरे होने के साथ
गहरा जाती है बदरंग चेहरे की निराशा
एक पग जब बढ़ना मुश्किल हो जाता है
तब गहरे दिन की बढ़ती कालिमा
कह देती है चुपचाप आगे बढ़ने के लिए.

अस्त होते हुए सूरज की शिथिल किरणें
दूर तक ले जाती है हमारा अस्तित्व
लंबी छाया में हम देख लेते हैं मुरझाता अक्स
कभी कभी समझ आने की तह तक
हम समझ ही नहीं पाते
कि दिन ढलने के साथ ही ढल जाती है
जिंदगी की रंगीन दुनियाँ
बदरंग पृष्ठों की भूमिका कि तरह
साफ साफ नहीं दिखते शब्द
कविता कि संवेदना भी हो जाती है अस्पष्ट।

गहरे धूमिल-धूंधलके में दिखाई देंगे
कुछ चेहरे जिनकी पहचान
मटमैली-सी उभर आती है जेहन में
राह की सकरी मेढ़ पर
धीरे-धीरे बढ़ रही लम्बी होती हुई छाया
और उसके इर्द-गिर्द टूट रहा उम्मीदों का बाँध।

गोल घूमती हुई पृथ्वी अपनी धुरी पर
छोड़ देती है बदरंग चेहरे
जो देखते रहते हैं लगातार दुनियाँ की तेज़ रफ्तार
बदरंग चेहरों की दुनियाँ बढ़ रही है
साथ ही साथ बढ़ रही धीरे-धीरे दिनमान की कालिमा…

कविता की भाषा 

मैं कविता लिपिबद्ध नहीं
बल्कि कविता में रोपता हूँ स्वयं को
साहित्य के धरातल पर

इस आस में कभी न कभी तो अँखुआएँगी
कविता कि किल्लियाँ
हरियाएँगी कविता कि डालियाँ।

फिर कभी जब थक जाऊंगा इस जीवन-यात्रा में
तब लिखते हुए समय की इबारत के साथ
बह जाऊंगा भावों की गहरी नदी में।

सूरज की नई किरणों के साथ
सुवासित हो रही कविता कि भाषा
और मकरन्द कण की मानिंद
बिखर रही कविता कि आखिरी पंक्ति
कवि क्षितिज के उस पार निहारता है सूनी पगडंडियाँ…

कवि का रिक्त स्थान

एक कवि का जाना
जैसे एक युग का अस्त होना
सूरज की किरणों की तरह
फैलती है उसकी कविता कि परिधि
अर्थ-संवेदना डूबती इतराती है
कविता कि अंतश्चेतना में।

भावसंपृक्ति के अलिखित दस्तावेज़
रखे रह जाते हैं
दिमाग की नसें भी दे जाती हैं जवाब
खुली आंखों से कवि देखता है संसार
और एक दिन
उड़ जाता है पक्षी की तरह,
अपने घरौंदे से
सब कुछ छोड़कर…

अपनी कविताओं में जिंदा रहता है ताउम्र
कवि जो बुनता है अपना रचना संसार
उसके ही इर्द-गिर्द ढूँढते हैं हम
साहित्य में कवि का रिक्त स्थान…

अंधेरा और सूरज 

उदयाचल से
आहिस्ता आहिस्ता
सरकता हुआ सूरज
क्षितिज पर
ठहरकर निहारता है
अंधेरे के भग्न अवशेष।

छांटता हुआ
तमस-आवरण
भेद देता है
अंधेरे का अंतस्तल
निर्मिमेष झांकता बढ़ता है
किंतु अंधेरे का राज्य अब भी
बना हुआ अप्रमेय।

सूरज की चमचमाती किरणें
अब तक
नहीं ढहा पायीं
अंधेरे के दुर्गम किले।

अंधेरा अनुच्चरित होकर भी
बजाता है अपनी विजय तूर्य
अस्तित्व के इस महादमनीय युद्ध में
अंधेरा लगा देता है
अपनी पूरी ताकत।

अंधेरा और सूरज
अस्मिता कि
आभ्यांतरिक तह पर पहुँच
करते हैं द्वंद्व युद्ध।

अप्रतिहत विजयकामी सूर्य
चल देता है
अस्ताचल की यात्रा पर
निस्तेज हो
देखता जाता है
अंधेरे का विराट साम्राज्य…

खत्म होती शामों के साथ 

दिन के ढल जाने पर भी
मनुष्य चलना नहीं छोड़ता
चिड़िया उड़ना नहीं छोड़ती
नदियाँ बहना नहीं छोड़ती
उसी तरह सूरज भी नहीं बदलता अपना रास्ता

खत्म होती शामों के साथ
पक्षी लौटते हैं बिखरे हुए अपने घोंसलों में

अंधेरा बढ़ जाने के बावजूद
किसान को कोई फर्क नहीं पड़ता
वह अपनी फसलों को
सर्द हुए मौसम में सींचता है
और मजदूर अपनी खटराग में उलझे
दो वक्त की रोटी का इंतज़ाम करता है

जैसे अंधेरे के साथ रोशनी
दिन के साथ रात और दुख के साथ सुख
कभी साथ नहीं छोड़ते एक दूसरे का
वैसे ही रास्ते भी नहीं छोड़ते किसी राही का साथ

गहराती हुई शाम के धुंधलके में
कुछ स्मृतियाँ उभर आती हैं
कुछ पीड़ाएँ भी देती हैं दस्तक
और याद आता है वह सब कुछ
जो आंखों के सामने कुछ अधूरेपन के साथ
एक रील की मानिंद खुलती जाती है हमारे सामने

खत्म होती शामों के साथ
अंकित होते हैं पूरे के पूरे बीते हुए दिन
जिन पर लिखा होता है समूचे देश का इतिहास,

कि कुछ घटनाएँ दर्ज हो जाती हैं
स्याह हो रहे समय के माथे पर
जिन्हें याद करने पर कलेजा सहम उठता है।

भाषा की अनुभूतियां

पक्षियों की तरह नहीं होती
मनुष्यों की भाषा
पक्षियों की अनुभूति
भाषा के साथ जुड़ी रहती है
इसलिए वे सदियों तक
समझते हैं अपने आत्मिक संवाद

मनुष्य भाषाओं पर झगड़ते हैं
उसके संवेदनसिक्त हर्फ़ों को
हथियार बनाकर
भेदते हैं एक दूसरे का हृदय

मनुष्यों की भाषा के शब्द
ग्लोबल हो रही दुनिया में
बड़ी बेरहमी से
संस्कृतियों से हो रहे हैं दूर

भाषिक सभ्यता के खंडहर में
दबे हुए मनुष्यता के अवशेष
और शिलालेखों पर उकेरी गयी
लिपियों के अंश
अपठित रह गए मनुष्यों के लिए

भाषा कि अनुभूतियाँ
विलुप्त हो रही हैं
अवसान होते खुरदरे समय में

कि अब छोड़ दिया है मनुष्यों ने
संवेदना कि भाषा में बात करना…

फूल और स्त्री

खिले हुए फूलों की सुंदरता
सबसे अधिक आकर्षित करती है
एक स्त्री को
और एक स्त्री की सुंदरता
पूरी दुनिया को करती है नजरबंद

खिले हुए फूलों के
बहुत करीब होती स्त्री
और स्त्री बहुत करीब होती है
सुकोमल भावनाओं के.

स्त्री के विचार
होते हैं फूलों की तरह कोमल
और हृदय होता है
पंखुड़ियों की तरह उन्मुक्त

धरती पर गिरे हुए फूल
अपनी खूबसूरती नहीं छोड़ते
उसी तरह एक स्त्री
सम्हालती है खुद को
बचा लेती है अपने लिए
खोया हुआ अपना सत्व

कि फूल और स्त्री
पूरी दुनिया के इतिहास में
सबसे सुंदर और मार्मिक अभिव्यक्त है…

उम्मीद के पहाड़

समय अपने सुनहरे पंख लगाकर
उड़ रहा है हमारे इर्द गिर्द
मुठ्ठी में फिसलती हुई बालू की मानिंद
वह जा रहा है हमारी पहुँच से बहुत दूर

आकाश में उड़ रहे पंक्षी
समय की पदचाप सुन रहे हैं
वे महसूस कर रहे हैं
धरती पर विस्तार लेता उदासी का परिवेश

नदी में तैर रही मछलियाँ
तरंगों की छिपी हलचल देख रही हैं
वे महसूस कर रही हैं
पानी में घुल रही विषैली दवाइयाँ

धरती पर उगे हुए पेड़
हवा के रुख को पहचान रहे हैं
वे महसूस कर रहे हैं
घिरे हुए खुद को खतरनाक गैसों के आवरण में

अब उम्मीद के पहाड़
दरक रहे हैं बहुत तेजी से
और साथ ही साथ दरक रहा है
हमारे अंदर का खोया हुआ अपनापन…

बचे रहेंगे शब्द

नेपथ्य में चलती क्रियाएँ
बहुत दूर तक बहा ले जाना चाहती हैं
जहाँ समय के रक्तिम हो रहे क्षणों को
पहचानना बेहद मुश्किल हो चला है

तुम समय के ताप को महसूस करो
कि जीवन-जिजीविषा कि हाँफती साँसों में
धीरे-धीरे दम तोड़ रही हैं हमारी सभ्यताएँ

स्याह पर्दे के पीछे
छिपे हैं बहुत से भयावह अक्स
जो देर सबेर घायल करते हैं
हमारे इतिहास का वक्षस्थल
और विकृत कर देते हैं जीवन का भूगोल

हवा में पिघल रहा है
मोम की मानिंद जहरीला होता हुआ परिवेश
और तब्दील हो रहा है
हमारे समय का वह सब कुछ
जिसे बड़े सलीके से संजोया गया
संस्कृतियों के लिखित दस्तावेजों में

बिखर रही उम्मीद की
आखिरी किरण सहेजते हुए
खत्म होती दुनिया के आखरी पायदान पर
केवल बचे रहेंगे शब्द,
और बची रहेगी कविता कि ऊष्मा..

स्त्री संवेदना की महानदी है 

करुणा के उत्स की पहली कलगियाँ
स्त्री के अस्तित्व के साथ ही अवतरित हुई

धरती की उर्वरा कोख से फूटी नई कोपल की मानिंद
स्त्री की कोख से ही जन्में सबसे पहले
वेदना के अनकहे आख्यान

स्त्री प्रेम की सुकोमल भावना से अभिसिक्त
खोजती है एक मुक्कमल रास्ता
वह अंधेरे में रोशनी की तलाश करती हुई
बढ़ रही है दुनिया के अंतिम छोर पर
जहाँ सिसक रहे हैं कविता के बहुआयामी शब्द

अपने जीवन के अलिखित दस्तावेज
सहेज लेती है अन्तस् के किसी कोने में
और वेदना का महाकाव्य रचते हुए
समेट लेती है पूरी दुनिया को अपने आँचल में
वह स्नेह की असीम गहराइयों में उतरकर
छाँटती है जीवन की उदासियाँ

स्त्री केवल भाव नहीं है,
वह संवेदना कि महानदी है
जो प्रवाहित हो रही है अंतस्तल में चेतना बनकर…

बेरंग हो चुकी धरती पर 

ठूठ हो चुके सम्बंधो में
अब पानी की कमी जाहिर हो चुकी है
कदम दर कदम जब साथ चलना ज़रूरी होता है
तब संताने छोड़ देती है उनका हाथ

उनके ध्वंस होते हुए सपनों ने
देख ली है सम्बंधों की हकीकत
कराह रही मानवीय संवेदना को
अब पढ़ लिया है उनकी पथराई आंखों ने

उन्मुक्त आकाश की ऊचाइयों पर
डेरा बनाने वाले पक्षी की तरह
उनकी बेरंग हो चुकी ज़िन्दगी भी
अब निर्द्वन्द जीना चाहती है अपना जीवन
साथ ही साथ देखना चाहती है वह सब कुछ
जो एक जीवन जीने के लिए होता है ज़रूरी

जाहिर हो चुका है
कि भाषा ने भी तोड़ दिया है अपना दम
कवि की कलम कांप जाती है बार बार
कविता भी असमर्थ हो गयी है
चंद शब्दों की व्यथा-कथा कहने में

हम बेरंग हो चुकी धरती पर सीखें रंग भरना
क्योंकि बेरंगी में तब्दील हो रही दुनियाँ
अब बाट जोह रही है फिर अपने रंग में वापस होना…

कविता में बचा रहेगा आदमी

धुंध के अपारदर्शी पर्दे में
फीकी पड़ चुकी चेहरों की रंगत
आंखों के सामने मटमैले बिम्ब
और चेतना में धुंधले अक्स
उघाड़ते हैं अनसुलझे रहस्य

पिघलते हुए ग्लेशियर की तरह
अब मनुष्य की संवेदना भी
धीरे धीरे बह रही है

दरक रहे बाँध के पास
अब भी मौजूद है
वर्जनाओं का पूरा इतिहास

अब यह कहना
कि सच से मुखातिब होना
समय के साथ न चलने के मानिंद
बनकर कर रह गयी है
मनुष्यता कि अधूरी दास्तान

मानव सभ्यता के
खत्म होने के
आखिरी पड़ाव पर भी
शब्दों में बची रहेगी दुनियाँ
और कविता में बचा रहेगा आदमी…

प्रेम में डूबना जान पाया हूं

हवा के शीतल झोंके की तरह
तुम मेरे मानस में आकर ठहर गयी हो
अब मैं प्रेम के अनिवर्चनीय आनंद में डूबा हूँ
निहार रहा हूँ तुम्हारे आस पास अपनी परछाई

तुम्हारी हर एक बात ठंडी बयार की तरह ही
छू लेती है मेरे आर्द्र मन की गहराई
में पढ़ लेता हूँ वह सब कुछ
जो तुमने मेरे लिए लिखा है
प्रेम की सुकोमल तूलिका से

मैं चलता रहा हूँ तुम्हारे साथ
बादल की छाया लेकर कड़ी धूप में
और तुम
फूल के रंग में रंगी सुवासित हो रही हो
मेरे जीवन के बेरंग आयामों में

जैसे तेज़ हवाओं के साथ
बारिश की बूंदें धरती को कर देती हैं शीतल
उसी तरह तुम मेरे धूसरित हो रहे जीवन को
बना देती हो खुशनुमा
खींच देती हो एक अमिट मुस्कान

प्रिये!
मैं प्रेम लिखना नहीं जानता था
और न प्रेम की कविता करना ही
किंतु प्रेम में डूबना जान पाया हूँ
कि तुम्हारे प्रेम ने मुझे
कविता करना सिखा दिया है और प्रेम करना भी…

पानी की बूंदों का राग

दूर क्षितिज पर घिर रहे बादलों को
देखकर महसूसता हूँ
कि धरती बुझाती सी दीखती है
अपनी अभिशप्त पीड़ा
मनुष्य, पशु-पक्षी, पेड़-पौधे, नदी और पहाड़
मनाते हुए उत्सव बादल की बूंदों का स्वागत करते हैं

प्रेमी युगल बादल से गिरी हुई बूंदों पर
उकेरते हैं प्रेम की अव्यक्त वर्णमाला
वे अपनी अनुभूतियों को विस्तार देकर
स्मृतियों की गुहा के उस पार
सहेज लेते हैं जन्मजन्मांतर तक

पानी की बूंदों का राग
बच्चों के लिए बूंदों का राग
उनके बचपन को लौटा लाता है
वे देर तक बूंदों के साथ करते हैं अठखेलियाँ
बूंदों पर कूद-कूद कर उसके राग से कदमताल करते हुए
बूंदों के राग को बना देते हैं गतिमान

सूख रही फसलों के लिए
बादल की बूंदों का राग लेकर आता है नया जीवन
किसान की आंखों में कौंध जाती हैं उम्मीदें
जब बादल की बूंदों का राग घुलता है परिवेश में

कभी कभी पानी की बूंदे बन जाती हैं बेहद खतरनाक
जब बाढ़ का पानी देहरी लांघकर
घरों में कर जाता है प्रवेश
भयावह लगती हैं बारिश की बूंदें और उसका राग
जिंदगी की अनेक अभीप्साएँ
बह जाती हैं पानी के बूँदों के साथ

पानी की बूंदों का राग
कहीं प्रेम के असीमित पंख खोलता है
कहीं खेलने का असीमित स्पेस देता है
कहीं आशाओं के खेत पर फुहार बन स्वप्न संजोता है
और कहीं बहा ले जाता है
शेष जीवन की अधूरी ख्वाहिशें

बिखरते हुए समय की दहलीज़ पर
बाढ़ की विभीषिका को भांपते हुए
सतह पर उभर आयी लकीरों के गाढ़ेपन के साथ
पानी की बूंदों का राग
अब पृथ्वी के गुरुत्वाकर्षण बल में समाहित होकर
विध्वंस की तरफ बढ़ रहा है लगातार…

दुनिया लौट आएगी

निःशब्दता के क्षणों ने
डुबा दिया है महादेश को
एक गहरी आशंका में

जहाँ वीरान हो चुकी सड़कों पर
सन्नाटा बुन रहा है एक भयावह परिवेश
एक अदृश्य शत्रु ने
पसार दिए हैं अपने खूनी पंजे

सिहर उठी है संवेदना
ठिठक गयी हैं अभिव्यक्तियाँ
शब्दों ने जैसे अपना लिया है मौन
भावनाएँ जैसे जम गयी हैं
हृदय के किसी कोने में बर्फ के मानिंद

संक्रमण के ख़तरनाक दौर में
जहाँ सुरक्षित नहीं हैं हम
लेकिन भविष्य की पीढ़ी को
सुरक्षित देखना चाहती हैं
हमारी आशान्वित आँखें

हमारे भविष्य की आंखे
टकटकी लगाए देख रही हैं
आशाओं के अथाह समुद्र में
उनकी स्पंदित सांसों के साथ
अब समय ठहर गया है

और ठहर गयी है मनुष्यों की रफ़्तार
दुनिया धीरे धीरे
तब्दील हो रही है
एक अव्यक्त भय में

दुनिया लौट आएगी
जल्द अपने रास्ते पर
अभी हवाओं में कुछ ज़हर ज़्यादा है…

जब इंसान नहीं होंगे 

गहरे अंधेरे अदृश्य पथों पर
असंख्य लोग चले जा रहे कतारबद्ध
विक्षिप्त मनोदशा से पीडित
जंग लग चुकी बुद्धि
जो हो चुकी है गिरवी,
विज्ञान और तर्क से दूर
बढ़ रहे लगातार
धर्मान्धता की ओर

वे नहीं चीन्ह पाते
इंसानियत का उजला रास्ता
भेडों की पंक्ति की मानिंद
चले जा रहे एकदम सीधे
रास्ते के अगल बगल
नहीं देख पाते गहरी खाईयाँ
वे नहीं मानते इंसानियत
उनके लिए धर्म है सबसे ज़रूरी

वे आशाओं को धूमिल कर
शर्मसार कर रहे हैं इंसानियत
उन्हें नहीं जगा पा रहे हैं
उनके धर्म के पहरुआ

वे नेस्तनाबूद करने पर उतारू हैं
खुदा कि खूबसूरत दुनिया
उनके लिए सवेरा नहीं होता
वे धर्मान्धता को मानते हैं
अपने जीवन आखिरी रास्ता

समझाना होगा उन्हें
कि उनकी पीढियाँ बढ़ रही हैं
आगे…बहुत आगे
इस संक्रमण के मुहाने पर
धर्म की व्याख्याएँ हो रही हैं असंगत
अब पहचान लिया गया है
धर्म से पहले इंसान का होना ज़रूरी है

कि धर्म कैसे रहेगा सुरक्षित
जब इंसान ही नहीं होंगे धरती पर…

कंधों पर बैठे हुए लोग

लीक की सीध पर
कुछ धुंधला सा अक्स उभर आने पर
दीखती है कविता मुझे
कंधे पर लटकाए
कुछ अनकहे से खुरदरे शब्द
जो उधेड़ देते हैं
मन के भीतर बसे
अभिव्यक्ति के कोरे कैनवास को…

जहाँ चलना ही जीवन की
न खत्म होने वाली चिरंतन क्रिया है
इसके बनिस्बत कि दुनियाँ का हर आदमी
यही सोचता है
कि कंधे पर बैठकर लोग निकल जाते हैं आगे
छोड़ देते हैं अपना अवलम्ब।

कंधों पर बैठे हुए लोग
ज़रूरी नहीं
कि ढो रहे हों इस नाजायज समय को
लड़खड़ाते कदमों के पदचाप
सुनते हुए
वे कंधों से उतरकर
थाम लेते हैं
मजबूत इरादों के साथ गिरते हुए शिखर…

बरगदी छाया से दूर

पुराने बरगद
नहीं पनपने देते नए पौधे
जहाँ तक छाया रहती है
वहाँ नहीं उगने देते नई किल्लियाँ
उसकी आत्महंता जड़े
सोख लेती है धरती की उर्वरा शक्ति
जहाँ कुछ उग आने की संभावना के इतर
उगने से पहले ही
सूख जाती हैं नवकोंपलें।

फैलती हुई जड़ों की परिधि
विस्तार लेती हुईं उसकी शाखाएँ
कद ऊंचे से और अधिक ऊंचा होता हुआ
जहाँ वह नहीं देखता
अपने आस पास
छोटे छोटे नव विकसित कोपलें
जो हरियाना चाहती हैं
लेकिन बरगद
आखिरी दम तक
सोख ही लेते हैं उनकी प्राण वायु…

बरगदी छाया से दूर
उगते हुए नये पौधे
धीरे धीरे उठ रहे हैं ऊपर
अपने आस पास उग आये नए कोंपलों को
बांटते है उर्वरा शक्ति,
धरती में पनपती हुई अनेक तरु शिखाएँ
घटित होते हुए समय की असलियत
पहचान ही लेती हैं
कि बरगदी छाया
आत्मुग्ध बरगद की एक स्थिति है…

उम्मीदों का नया आकाश

किसी शहर की सड़क की
परित्यक्त पुलिया के किनारे
ठहरकर देखना कभी
कि वहाँ दिखेंगे तुम्हें
धंसते हुए से धरातल
मटमैले से भावों को समेटे
स्याह बादलों में
गुम होता हुआ जीवन

जीवन, हाँ वह जीवन
जो संघर्ष करता है
अधियारे भोर से लेकर मटमैली शाम तक
जिजीविषा से जूझते हुए
बाज़ार के किनारे पर
लगा लेते हैं अपनी उम्मीदों का संसार
जैसे जैसे ढलती है साँझ
उनकी उम्मीदें का आकाश धुंआ होता जाता है
बाज़ार में सन्नाटे के साथ
सिमट जाती हैं
उनके जीवन की रंगीनियाँ

शहरी बस्तियों से दूर
टिमटिमाता है
अधजला सा दीपक
जो बुझती हुई ज़िन्दगी का सम्बल बनकर
बार बार उम्मीदों को रखता है जिंदा
अलसुबह फिर से सड़क के किनारे
गुलजार होती है उनकी दुनियाँ
और वे फिर नए सिरे से
उठा लेते हैं अपने सिर
उम्मीदों का एक नया आकाश…

संकल्प 

सूरज की
घूमती हुई वृत्त परिधि
बन गयी है
धधकता हुआ शोला

अलसुबह से
बरसना शुरु हो जाती है
तपती हुई किरणजाल

तपते हुए लोग
तपती हुई सडके
तपते हुए गलियारे

और इस तपते हुए
सूरज के भाल तले
चले जा रहे लोग

सुविधाभोगी लोग
वातानुकूलित वाहनों से
नहीं फर्क पडता
तिलमिलाए सूरज से खौफ से

इसी तपते हुए
सूरज के खरजाल में
तन्लीन हुए
श्रम कण बहाते लोग

भरी दुपहरी में
काटते हुए
गेहूँ की बालियाँ

इस ताप को
धता बताते हुए
मन में संकल्प लेते से
प्रतीत होते लोग

वह संकल्प जो
तपती दुपहरी भी
जिसे डिगा न सके

संकल्प जो
विषम परिस्थति में भी
साथ नहीं छोडता

अन्नदाता हैं वह
जो भरते हैं पेट
देश के सभी जन का

नहीं करते भेद
अमीर गरीब का
बहाते हुए श्रम कण
करते हैं मनुजता का पोषण…

दोमुँहे 

हवाओं का रूख
अब हो चला विषैला
समाज की सभ्यताओं को
झूठा साबित
करने के लिए
हो रहे षड्यंत्रों के बीच
बताना ज़रूरी है
दोमुँहों को।

कि तुम्हारी
बिजबिजाती बुद्धि में
भरा है सदियों पुराना
कूड़ा कचरा।

जो गाहे बगाहे
कुलबुलाने लगता है
सत्ता कि डोरी के
करीब पहुँच कर।

मदांधता में डूबे
इतिहास को बरगलाते
प्रश्नचिन्ह लगाते
इतिहास की महानता पर।

तुम्हारी जिह्वा कि अपंगता
साफ साफ कह गयी
कि अभी भी तुम
इतिहास को मिटाना
समझते हो अपनी बपौती।

समय रच रहा है अपना इतिहास
वो दिन दूर नहीं
जब ध्वस्त होते हुए दिखेंगे
तुम्हारे किले
जहाँ बैठकर रचते हो षड्यंत्र
समाज को तोड़ने का…

चिड़ियां डर रही हैं

उन्मुक्त आकाश में
उड़ान भरने वाली चिड़ियाँ डरी हुई हैं
अपने स्याह होते परिवेश से

दिशाओं में विचरने के लिए
नहीं है उनके पास खुला स्पेस
वे नहीं कर पा रही हैं वह सबकुछ
जो चिड़िया होने के लिए होता है ज़रूरी

उनके लिए चारो ओर उदासी है
उनके लिए हर तरफ पहरा है
उनके लिए सुरक्षित है केवल भय
उनकी अस्मिता ख़तरनाक माहौल के
बीचो बीच जूझ रही है

गिद्ध मंडरा रहे हैं चिड़ियों के ऊपर
वे घात लगाए देख रहे हैं
उनकी सी छोटी दुनिया
और मौका मिलते ही खूनी पंजो से
नोचकर फेक देते हैं उनके पंख

बहेलियों ने भी बिछा रखे हैं अपने जाल
वे धोखे से झपटना चाहते हैं
उड़ती हुई चिड़िया कि अस्मिता

चिड़ियाँ डर रही हैं अपनी उड़ान भरने से,

कि वे अब सुरक्षित नहीं हैं अपने घोसलों में
और स्वच्छन्द आकाश में तो बिल्कुल भी नहीं…

शब्दों की दुनिया

कविता के शब्द
अब कल्पनालोक में नहीं विचरते
वे जीवन के गहरी उदासियों की
महागाथा में संचरण कर
उगलते हैं रोशनाई की नई इबारत

कविता के बिम्ब
अपने स्याहपन को छोड़कर
सीधे सीधे पैठ जाना चाहते हैं
लोक की अन्तश्चेतना में

भाषा छोड़ रही है
अपनी परंपरागत प्रतीक योजना
वह कविता के साथ
नए भावबोध में व्यंजित हो रही है

कविता में गढ़े हुए प्रतिमान
तेजी से बिखर रहे हैं

अंधेरे में शब्दों की दुनिया
अपने अर्थ खो रही है
वह बदल रही है अपना परिवेश
कृत्रिम भावों का मुलम्मा फीका पड़ चुका है

भावों पर खतरे को महसूसते हुए
अंधेरे में डूबी हुई शब्दों की दुनिया
बढ़ जाना चाहती है
अपने उजलेपक्ष की ओर।

कि कविता अब मुस्कुराते हुए
अपने नए शिल्प में
मुकम्मल होने का इंतज़ार कर रही है…

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