शील की रचनाएँ

उर्वर धरती

गति में प्रगति
प्रगति में जीवन
जीवन में
नव जीवन भरती
मेरे गीत उजागर करती
बाँझ नहीं
यह उर्वर धरती।

राह हारी मैं न हारा 

राह हारी मैं न हारा !

थक गए पथ धूल के —
उड़ते हुए रज-कण घनेरे ।
पर न अब तक मिट सके हैं,
वायु में पदचिह्न मेरे ।
जो प्रकृति के जन्म ही से —
ले चुके गति का सहारा !
राह हारी मैं न हारा !

स्वप्न मग्ना रात्रि सोई,
दिवस संध्या के किनारे
थक गए वन-विहग, मृग, तरु —
थके सूरज-चाँद-तारे ।
पर न अब तक थका मेरे —
लक्ष्य का ध्रुव-ध्येय तारा ।
राह हारी मैं न हारा !

अथ के लिए चलो

रीति को रथ दो !
प्रीति को पथ दो !
गीति को कथ दो !
नीति को मथ दो !

अथ के लिए चलो
गाँव-गली
डगर-डगर
हाट-बाट नगर-नगर
जागृति को स्वर दो !

सुषमा के आँगन में
नव जीवन भर दो !

बीच के लोग /

खाते-पीते, दहशत जीते
घुटते-पिटते बीच के लोग।
वर्ग-धर्म पटकनी लगाता,
माहुर माते बीच के लोग।

घर में घर की तंगी-मंगी,
भ्रम में भटके बीच के लोग।
लोभ-लाभ की माया लादे,
झटके खाते बीच के लोग।

घना समस्याओं का जंगल,
कीर्तन गाते बीच के लोग।
नीचे श्रमिक, विलासी ऊपर,
बीच में लटके बीच के लोग।

कनफटा

साँप के निकल जाने पर —
छूट जाती है,
घसिलन की लकीर।

लोग मुहावरा पीटते हैं —
मुहावरा,
कनफटा मुहावरा नहीं पीटता,
साँप का गला दबा कर
तोड़ देता है विषदन्त।

विषधरों से मुक्ति के लिए —
देश को
कनफटों की ज़रूरत है।

लोहा बजेगा

चला धौंकनी,
कुन्द कुदालों को गरमा कर —
पैना कर दूँ।

पानी धर दूँ,
लोहे में भी आत्मा भर दूँ,
जन-जीवन उत्साहित कर दूँ,
श्रम, सार्थक हो सृजन पर्व का,
श्रम, सार्थक हो नए वर्ष का —

लोहा खनकेगा,
ठनकेगा,
बोलेगा-बजेगा।

05 मार्च 1959

वह

वह उलहाने नहीं देती
कहती है साफ़-साफ़
देती है सूझ-बूझ
जिसमें नहीं मीन-काफ़।

दुनिया बदलने का
दम, मंसूबे,
रात में बँधाती,
दिन में सँवारती।

वह कवि की
अन्तर्मुखी-अपराजित
वाणी है — वह !

मेघ न आए 

मेघ न आए।
सूखे खेत किसानिन सूखे,
सूखे ताल-तलैयाँ,
भुइयाँ पर की कुइयाँ सूखी,
तलफ़े ढोर-चिरैयाँ।
आसमान में सूरज धधके,
दुर्दिन झाँक रहे।
बीज फोड़कर निकले अंकुर
ऊपर ताक रहे।

मेघ न आए।
सावन बीता, भादों बीते,
प्यासे घट रीते के रीते,
मारी गई फसल बरखा बिन,
महँगे हुए पिरीते।
धन के लोभी दाँत निकाले,
सपने गाँठ रहे।
बीज फोड़कर निकले अंकुर
ऊपर ताक रहे।

मेघ न आए।
आये भी तो धुपहे बादल,
धूल-भरे चितकबरे बादल,
पछुवा के हुलकाए बादल,
राजनीति पर छाए बादल,
पूर्वोत्तर के पचन झकोरे,
धरती माप रहे।
बीज फोड़कर निकले अंकुर
ऊपर ताक रहे।
मेघ न आए।

बैल

तक-तक तक-तक बैल।
हुई ठीक दुपहर है प्यारे,
मृग-मरीचिका चली किनारे।
खेत पड़ा है पैर पसारे,
ओ मौके के मीत हमारे।
तुम पर बड़ा भरोसा मुझको,
माँ ने पाला-पोसा तुमको।
मेहनत के दिन यार न झिझको,
हिम्मत मत हारो मत ठिठको।
तय कर ली है हमने-तुमने, सात हराई गैल।
तक-तक तक-तक बैल।।

आती होगी घर की रानी,
लिए तुम्हें चोकर की सानी।
मुझको लपसी-ठंडा पानी,
पगी प्रेम में ठगी बिकानी।
फर-फर उड़ती चूनर काली,
आती होगी बनी मराली।
रंजे नयन अधरों में लाली,
अंग-अंग में भरे वहाली।
मृदु मुस्कान चपल चितवन से ठगती छलिया छैल।
तक-तक तक-तक बैल।।

देखो आंतर करो न साथी,
विचक-विचक पग धरो न साथी।
मेरे साथी जग के साथी,
मन के साधी घन के साथी।
बीघा डेढ़ हो गया इनका,
पूरा काम हो गया उनका।
मुझको रोटी तुमको तिनका,
है आधार यही जीवन का।
चलो पेट भर लें चल करके दुखिया बैल टुटैल।
तक-तक तक-तक बैल।।

हल की मूठ गहो

क्षेत्र क्षीण हो जाए न साथी —
हल की मूठ गहो!
नवोन्मेष को मुखरित स्वर दो,
अभ्यागत आगत को बल दो,
अंकुर को जल-धूप —
पवन से कह दो, समुद बहो।
हल की मूठ गहो।
क्षेत्र क्षीण हो जाए न साथी —
हल की मूठ गहो!
अगणित कुश-कंटक उग आए,
बैलों से बबूल टकराए।
ये हैं, कृषि के रोग —
बीज के दुश्मन,
इन्हें दहो।
हल की मूठ गहो।
क्षेत्र क्षीण हो जाए न साथी —
हल की मूठ गहो!

15 अगस्त 1947 

आज देश मे नई भोर है—
नई भोर का समारोह है
आज सिन्धु-गर्वित प्राणों में
उमड़ रहा उत्साह
मचल रहा है
नए सृजन के लक्ष्य बिन्दु पर
कवि के मुक्त छन्द-चरणों का
एक नया इतिहास ।

आज देश ने ली स्वंत्रतता
आज गगन मुस्काया ।
आज हिमालय हिला
पवन पुलके
सुनहली प्यारी-प्यारी धूप ।
आज देश की मिट्टी में बल
उर्वर साहस—
आज देश के कण-कण
ने ली
स्वतंत्रता की साँस ।

युग-युग के अवढर योगी की
टूटी आज समाधि
आज देश की आत्मा बदली
न्याय नीति संस्कृति शासन पर
चल न सकेंगे—
अब धूमायित-कलुषित पर संकेत
एकत्रित अब कर न सकेंगे ,श्रम का सोना
अर्थ व्यूह रचना के स्वामी
पूंजी के रथ जोत ।

आज यूनियन जैक नहीं
अब है राष्ट्रीय निशान
लहराओ फहराओ इसको
पूजो-पूजो-पूजो इसको
यह बलिदानों की श्रद्धा है
यह अपमानों का प्रतिशोध
कोटि-कोटि सृष्टा बन्धुओं को
यह सुहाग सिन्दूर ।

यह स्वतंत्रता के संगर का पहला अस्त्र अमोध
आज देश जय-घोष कर रहा
महलों से बाँसों की छत पर नई चेतना आई
स्वतंत्रता के प्रथम सूर्य का है अभिनंदन-वन्दन
अब न देश फूटी आँखों भी देखेगा जन-क्रन्दन
अब न भूख का ज्वार-ज्वार में लाशें
लाशों में स्वर्ण के निर्मित होंगे गेह
अब ना देश में चल पाएगा लोहू का व्यापार
आज शहीदों की मज़ार पर
स्वतंत्रता के फूल चढ़ाकर कौल करो
दास-देश के कौतुक –करकट को बुहार कर
कौल करो ।

आज देश में नई भोर है
नई भोर का समारोह है ।

(रचनाकाल : रात्रि 14 अगस्त 1947 )

आदमी का गीत 

देश हमारा धरती अपनी, हम धरती के लाल
नया संसार बसाएँगे, नया इन्सान बनाएँगे
सौ-सौ स्वर्ग उतर आएँगे,
सूरज सोना बरसाएँगे,
दूध-पूत के लिए पहिनकर
जीवन की जयमाल,
रोज़ त्यौहार मनाएँगे,
नया संसार बसाएँगे, नया इन्सान बनाएँगे ।

देश हमारा धरती अपनी, हम धरती के लाल।
नया संसार बसाएँगे, नया इन्सान बनाएँगे ।।

सुख सपनों के सुर गूँजेंगे,
मानव की मेहनत पूजेंगे
नई चेतना, नए विचारों की
हम लिए मशाल,
समय को राह दिखाएँगे,
नया संसार बसाएँगे, नया इन्सान बनाएँगे ।

देश हमारा धरती अपनी, हम धरती के लाल।
नया संसार बसाएँगे, नया इन्सान बनाएँगे ।।

एक करेंगे मनुष्यता को,
सींचेंगे ममता-समता को,
नई पौध के लिए, बदल
देंगे तारों की चाल,
नया भूगोल बनाएँगे,
नया संसार बसाएँगे, नया इन्सान बनाएँगे।

देश हमारा धरती अपनी, हम धरती के लाल।
नया संसार बसाँगे, नया इन्सान बनाएँगे ।।

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