शुभम श्री की रचनाएँ

मेरे हॉस्टल के सफ़ाई कर्मचारी ने सेनिटरी नैपकिन फेंकने से इनकार कर दिया है

ये कोई नई बात नहीं
लम्बी परम्परा है
मासिक-चक्र से घृणा करने की
‘अपवित्रता’ की इस लक्ष्मण-रेखा में
क़ैद है आधी आबादी
अक्सर
रहस्य-सा खड़ा करते हुए सेनिटरी नैपकिन के विज्ञापन
दुविधा में डाल देते हैं संस्कारों को…

झेंपती हुई टेढ़ी मुस्कराहटों के साथ ख़रीदा-बेचा जाता है इन्हें
और इस्तेमाल के बाद
संसार की सबसे घृणित वस्तु बन जाती हैं
सेनिटरी नैपकिन ही नहीं, उनकी समानधर्माएँ भी
पुराने कपड़ों के टुकड़े
आँचल का कोर
दुपट्टे का टुकड़ा

रास्ते में पड़े हों तो
मुस्करा उठते हैं लड़के
झेंप जाती हैं लड़कियाँ

हमारी इन बहिष्कृत दोस्तों को
घर का कूड़ेदान भी नसीब नहीं
अभिशप्त हैं वे सबकी नज़रों से दूर
निर्वासित होने को

अगर कभी आ जाती हैं सामने
तो ऐसे घूरा जाता है
जिसकी तीव्रता नापने का यंत्र अब तक नहीं बना…

इनका कसूर शायद ये है
कि सोख लेती हैं चुपचाप
एक नष्ट हो चुके गर्भ बीज को

या फिर ये कि
मासिक-धर्म की स्तुति में
पूर्वजों ने श्लोक नहीं बनाए
वीर्य की प्रशस्ति की तरह

मुझे पता है ये बेहद कमज़ोर कविता है
मासिक-चक्र से गुज़रती औरत की तरह
पर क्या करूँ

मुझे समझ नहीं आता कि
वीर्य को धारण करनेवाले अंतर्वस्त्र
क्यों शान से अलगनी पर जगह पाते हैं
धुलते ही ‘पवित्र’ हो जाते हैं
और किसी गुमनाम कोने में
फेंक दिए जाते हैं

उस ख़ून से सने कपड़े
जो बेहद पीड़ा, तनाव और कष्ट के साथ
किसी योनि से बाहर आया है

मेरे हॉस्टल के सफ़ाई कर्मचारी ने सेनिटरी नैपकिन
फेंकने से कर दिया है इनकार
बौद्धिक बहस चल रही है
कि अख़बार में अच्छी तरह लपेटा जाए उन्हें
ढँका जाए ताकि दिखे नहीं ज़रा भी उनकी सूरत

करीने से डाला जाए कूड़ेदान में
न कि छोड़ दिया जाए

‘जहाँ-तहाँ’ अनावृत …
पता नहीं क्यों

मुझे सुनाई नहीं दे रहा
उस सफ़ाई कर्मचारी का इनकार

गूँज रहे हैं कानों में वीर्य की स्तुति में लिखे श्लोक…

मिस वीणावादिनी, तुम्हारी जय हो बेबी

हे वीणावादिनी, शुभ्रवस्त्रा देवी
तुम्हारी जय हो
तुम्हारे विलुप्तप्राय वाहन हंस की भी जय हो
जय हो हे कमलनयनी या नयनों की क्षीण ज्योति वाली
विद्या की देवी या अविद्या की, ज्ञान-अज्ञान की
तीक्ष्ण नाक, सुघड़ अधर, सुदीर्घ कण्ठ वाली
या चपटी नाक, मोटे अधर, छोटे कण्ठ वाली
उन्नत उरोज, क्षीण कटि, घने केश वाली
या सपाट उरोज, स्थूल कटि, श्वेत केश वाली
सुन्दर रोमावलियुक्त योनि वाली
या श्यामवर्ण योनि वाली
कदलीस्तम्भ के समान जंघाओं वाली
या मेद क्षीण होने की रेखाओं भरी जंघा वाली
धनुष के समान पिण्डली वाली
या बबूल की छाल जैसी पिण्डली वाली
तुम्हारे लालिमायुक्त चरणों की जय हो
तुम्हारे रजकणधूसरित बिवाई फटे पैरों की जय हो
तुम्हारे चरण के आभायुक्त नखों की जय हो
जय हो तुम्हारे नाखून के भीतर बैठे मैल की
पिता के प्रकोप से बची हुई
हे वाणी की देवी
तुम्हारी मूकता की जय हो
हे क्रोध, रोष, कालिमा से दूर रहने वाली
लक्ष्मी से विमुख करने वाली
तुम्हारी सहनशीलता की जय हो
हे पतिविहीन ज्ञान की साध्वी
अन्धकार से प्रकाश की ओर ले जाने वाली
ममतामयी देवी
प्रकाश के क्रय-विक्रय में सफलता का वर दो
वर दो सेंसर से निडर होने का
समस्त उल्लुओं को ज्ञान का वर दो
हंसों को यातना का, अवसाद का वर दो
सभी वरों के एवज में
हम तुम्हें प्रणाम करेंगे
मूर्ति स्थापित करेंगे, ‘जवानी के आग ना सहल जाला रजऊ’ पर नृत्य करेंगे
पण्डाल में नीला चलचित्र देखेंगे
उरोजों और कटि प्रदेशों पर प्रहार करते हुए विसर्जन करेंगे
प्रिय देवी, वीणावादिनी
हमें वर दो बेबी.

बेटी का पिता होना

कितनी मुलायम हो जाती है
माथे की शिकन
एक बेटी का पिता बनने के बाद

ख़ुद-ब-ख़ुद-ब-ख़ुद छूट जाता है
मुट्ठियों का भिंचना, नसों का तनना
कॉफ़ी हाउस में घण्टों बैठना

धीरे-धीरे संयत होता स्वर
धीमे…धीमे…पकती गम्भीरता
और, देखते…देखते… मृदु हो उठता चेहरा

एक बेटी का जन्म लेना
उसके भीतर उसका भी जन्म लेना है
सफ़ेद बालों की गिनती
ओवरटाइम के घण्टे
सबका
निरन्तर बढ़ना है

बेटी का बाप होना
हर लड़के के नाम के साथ ‘जी’ लगाना है
या शायद…चरागाह में उगा पौधा होना

लेकिन
(बहुत मजबूर हो कर लिया गया कर्ज़

और उसके सूद तले दबा कर्ज़दार हो कर भी
बेटी का पिता होना
एक साहसी सर्जक होना है
(या सर्जक मात्र केवल !)

गोरक्क्षक से विनती

प्रिए गोरक्क्षक जी,

सादर परनाम। आसा है सकूसल होगे एबम् आनन्द होगे।
पूजनिया गोमाता के उद्धार करने के लिए
कोटी कोटी नमन
आगे दरखास करता हु कि मेरे पास भी एक गइया है उजरकी
करकी बिका गई भादो मे
अत्यंत दुख होता है कि मेरे बाबूजी के समय
बथान पर एक दर्जन माल जाल था
अब बथान सुना लगता है
प्रंतु बिवसता यह थी के
करकी का नखड़ा बहुत्ते जादा था
बिना खल्ली के कुट्टी में मूंह नय देती थी
तरकारी भी खिलाने परता था, केला कोबी पपीता भी
रोज पंखा चलाने परता था, गाना बजाने परता था डेक मे
आठ कीलो दूध होता था
तो पर भी कोय किनता नय था
जरसी गाय का पतला दूध
खुआ भी नय परता था ठिक से
भला हुआ बिकाई
उजरकी देहाती है
चार कीलो में ऐसा मोटा छाली होता है
भैंसी दूध को फैल करती है
प्रंतु सबिनय निबेदन है कि
उसके हेतु भी कुट्टी नय जुट रहा है
घांस गढ़ने बहुत दुर जाना परता है
जिसके रस्ता में मेरी बहीन को छौड़ा सब बहूत तंग करता है
अभी तक उसके कारन चार कचिया हेरा गया
चरवाही जमीन पर भी एम्स खुलने वाला है
सो उ भी घेरा गया
कभी कभी खेत में घुसाते थे चोरा के
सो खेत पर भी एपाटमेंट बनने लगा
अतः आप कृप्या कर के उजरकी के हेतु भी
पाँच कट्ठा बढ़िया जमीन का बंदोबस्ती का प्रबंध करवाने की कृप्या कीजिए
अन्यथा सकरेटेरिएट अथवा आपके कारजालय के मैदान में पसु को चरने का अनुमति दिलबाइए

आपका बिस्वासी

क्लासरूम कविता

पता नहीं क्यों
हिन्दी पढ़नेवाली लड़कियाँ एन०सी०सी० में जाती हैं

जबकि
अँग्रेज़ी की लड़कियाँ ‘ज्वायन’ करती हैं एन०एस०एस०

बस इतना ही तो अं त र है

जितना आपके, वो क्या कहते हैं…
सीलमपुर और सफ़दरजंग में

देरिदा की मुस्कान

उसने हमारे दिमागों को
नींबू की तरह निचोड़ दिया है

अवधारणा के जंगल में
भाषा की भूलभुलैया है

भटकाया है हमें इसी फ़्राँसीसी ने
(हालाँकि कम्युनिस्ट मन ख़ुश होता है,
‘देरिदा अमेरिका की उपज नहीं है’! )

संरचना और विखण्डन की धूप-छाया में
छींकने लगते हैं विचार
लेकिन सैकड़ों बार ‘देरिदा इज मैड’ का पाठ करने के बाद भी
प्यार आ जाता है आख़िर में

पर अब और नहीं
देरिदा की मुस्कान पर उसे दो धुमक्के लगाने का मन होता है

अब हम सिर्फ़ ‘देरिदा फॉर बिगिनर्स’ पढ़ेंगे
और खूब हँसेंगे

जटिल अवधारणाओं के प्रति यह बड़ा मूर्ख प्रतिरोध है
फिर भी..

मरते हुए इनसान को देखना

उसने तब भी मुझे हैरान अजनबियत से देखा
दया से नहीं कौतूहल से देखा
जितना हो सकता था
निर्मम होकर देखा
जैसे मैं किसी फ़िल्म का कोई सीन हूँ
जो उसकी जागती आँखों के आगे साकार हूँ

मैंने अपनेपन की आख़िरी उम्मीद खोजी
पर उसके हाथ में कैमरा देखा

मैंने ख़ुद को मर जाने दिया
एक बहुत कोमल याद को याद करते हुए

मैंने ख़ुद को दर्ज हो जाने दिया एक साधारण घटना की तरह
खुद्दारी से मरते हुए

जन्मशतियों के मौसम में 

जन्मशतियाँ मनाने का मौसम है आजकल
गोष्ठियाँ आयोजित करने का सरकारी समय
चिन्ता मत करो, ज़रूर मिलेगा अनुदान
किसी अकादमी में जगह कोई
दर्जन भर सेमिनारों में जा कर
ज़रूर ख़त्म होगा दुःख
हर महीने की तकलीफ़देह जी०पी०एफ़०-इनकम टैक्स का

दोस्ती-दुश्मनी का पुराना हिसाब-किताब
सौवें साल में ही कर लो बराबर
(क्योंकि तुम्हारे शतायु साहित्यकार की भाषा विलुप्ति के कगार पर है !)

सच में बहुत मेहनत की तुमने यार !
अफ़सोस
सैकड़ों पत्रिकाओं के हज़ारों पन्नों में संस्मरण रँगने के बावजूद
नहीं कर पा रहे हो अमर

मरे हुए शब्द

तुम भूल जाते हो कि तुम्हारी बात समझनेवाले
बच्चों का साइन्स जर्नल ख़रीदना ज़्यादा ज़रूरी समझते है !

मत लिखो अमर कविताएँ…शाश्वत साहित्य
सरस सलिल में छापो कुछ आवारा शब्द

भरोसा रखो

ये जन्मशतियाँ
तुम्हारे वातानुकूलित सेमिनार-रूमों से निकलने को छटपटा रही हैं
बरिस्ता में नहीं लहराएगा साहित्य का परचम

ऑक्सीजन मिलेगा उसे
अभी-अभी प्रखण्ड से सब-डिविजन बन कर ख़ुश शहर के गलीज नुक्कड़ों पर

कहोगे कि तुम अनुभवी हो और हम हैं नादान
लेकिन नहीं जानते तुम

तुम्हारे अनुभवों का असर ये है
कि सरेआम कविताएँ पढ़ते हुए

हम झेलने को मजबूर हैं
किसी चिकलिट की व्यंग्य भरी मुस्कान

सभागारों से बाहर निकलो और देखो हमारी हालत
हज़ारों सपने लिए समानधर्मा बनने आई नई पीढ़ी की

सौ साल बाद

अपने अपने कॉलेजों में चन्द अटेण्डेन्स की ख़ातिर
दिन भर तुम्हारा विमर्श सुनते अपना मैसेज पैक ख़त्म करते हम

परीक्षा में कोट करने को लिख चुके हैं तुम्हारे दो चार जुमले
अपने सतही आशावाद के साथ

तुम्हारा ख़ुश होना
हमें ‘फ़नी’ लग रहा है

फिर भी सुन रहे हैं तुम्हारा ‘आह्वान’ !

कहोगे कि हम बिलकुल भरोसे के लायक नहीं
सच…बिलकुल सच

हर सेमिनार में बदलती तुम्हारी प्रतिबद्धता ने
हमें भी बना दिया है
धोखेबाज़

मत बोलो इतने झूठ लगातार

तुम्हारा ख़ुश होना
हमें ‘फ़नी’ लग रहा है

फिर भी सुन रहे हैं तुम्हारा ‘आह्वान’
कहोगे कि हम बिलकुल भरोसे के लायक नहीं

सच…बिलकुल सच
हर सेमिनार में बदलती तुम्हरी प्रतिबद्धता ने

हमें भी बना दिया है
धोखेबाज़

मत बोलो इतने झूठ लगातार
अब भी तो कुछ सोचो

पेंगुइन से एक अँग्रेज़ी अनुवाद की तुम्हारी ख़्वाहिश के चलते
अपनी पहचान बदलने पर तुले हैं साहित्य के छात्र

क्यों नहीं जाते
उन राजकीय उच्चविद्यालयों में

बड़ी मुश्किल से इस्तरी किए कपड़ों में
इन्तज़ार कर रही हैं जहाँ

उम्मीद की कई किरणें
जाओ ना…

पुनश्च : पहले तुम निबट लो जन्मशती से, अपना कवि चुन कर

हम अपने कवि चुन लेंगे…

कविताएँ चन्द नम्बरों की मोहताज हैं, भावनाओं की नहीं

भावुक होना शर्म की बात है आजकल और कविताओं को दिल से पढ़ना बेवकूफ़ी
शायद हमारा बचपना है या नादानी

कि साहित्य हमें ज़िन्दगी लगता है और लिखे हुए शब्द साँस
कितना बड़ा मज़ाक है

कि परीक्षाओं की तमाम औपचारिकताओं के बावजूद
हमे साहित्य साहित्य ही लगता है, प्रश्न पत्र नहीं

ख़ूबसूरती का हमारे आस-पास बुना ये यूटोपिया टूटता भी तो नहीं !
हमे क्यों समझ नहीं आता कि कोई ख़ूबसूरती नहीं है उन कविताओं में
जो हमने पढ़ी थीं बेहद संजीदा हो कर
कई दिनों तक पाग़लपन छाया रहा था
अनगिनत बहसें हुई थीं

सब झूठ था

हमारा प्यार…हमारा गुस्सा…हमारे वो दोस्त, उनके शब्द…
क्योंकि तीन घण्टे तक बैठ कर नीरस शब्दों में देना पड़ेगा मुझे बयान

अजनबियों की तरह हुलिया बताना पड़ेगा उन तीस पन्नों में
मेरे इतने पास के लोगों का

नहीं कह सकती

कि नागार्जुन ने जब लिखा शेफ़ालिका के फूलों का झरना
तो झरा था आँख से एक बूँद आँसू

नहीं बता सकती कि धूमिल से कितना प्यार है
कितना गुस्सा है मुझे भी रघुवीर सहाय की तरह

नागार्जुन-धूमिल-सर्वेश्वर-रघुवीर
सिर्फ़ आठ नम्बर के सवाल हैं !

कैसी मजबूरी है कि उनकी बेहिसाब आत्मीयता का अन्तिम लक्ष्य
छह नम्बर पाने की कोशिश है !

न चाहते हुए भी करना पड़ेगा ऐसा
क्योंकि शब्दों से प्यार करना मुझे सुकून देगा और चन्द पन्नों के ये बयान “कैरियर”

सेमेस्टर के पिंजरे में

हम भाषाओं का उद्भव पढ़ना शुरू करते हैं

और
सोचते हैं

जान जाएँगे एक दिन
अपनी भाषाओँ के अतीत का रहस्य

‘पाठ’ और ‘संरचना’ से लदे
‘हेप’ लेक्चर सुनते हैं

कि इतिहास क्या है
वह नहीं है जो हम सोचते हैं

वह है जो टीचर ने बताया है
चौदहवीं सदी की कविता पढ़ते-पढ़ते

देखते हैं क्लास के लडकों का चेहरा
जो कैरियर की चिन्ता के बावजूद खिल जाता है

विद्यापति की व्याख्या पर

इतना सब करते हुए उम्मीद रखते हैं कि
बहुत-बहुत रचनात्मक हो जाएँगे हम एक दिन

परीक्षाओं और टर्म पेपरों से घिरे हम
कितने भोलेपन से गढ़ लेते हैं

एक ख़ूबसूरत झूठ
जबकि हमें मालूम है

हर छोटा दिमाग़ यू०जी०सी० और सिविल्स की चिन्ता में क़ैद है
और बड़ा दिमाग़ कई-कई चिन्ताओं में !

देश के एक उन्मुक्त विश्वविद्यालय में
हम साहित्य पढनेवाले पालतू जानवर हैं

हमारे और आसमान के दरम्यान है
सेमेस्टर का मजबूत पिंजरा…

ब्लैकबोर्ड पर सवाल टँगा है…

एक : कुसुम

ब्लैकबोर्ड पर सवाल टँगा है
जवाब देना है कुसुम को

डिफरेंशियल इक्वेशन !!
अब कैसे समझाए कुसुम पापा को

कि कैलकुलस की ट्यूशन ज़रूरी है
एन०सी०ई०आर०टी० का सहस्रपाठ नहीं

चुपचाप खड़ी है सिर झुकाए
क्लास के सत्तर लड़कों की टेढ़ी मुस्कान के सामने

देख रहा है उसे देश का भविष्य
गणित का अर्जुन

अपूर्व दया से
खीझ उठे हैं टीचर

‘रोटी बनाओ जा कर
कैलकुलस तुमसे बनने का नहीं

दिमाग़ में रत्ती भर धार नहीं
मैथ्स पढ़ने का शौक चर्राया है

रटो जा कर बौटेनी-जूलॉजी…’
बैठ गई है चुपचाप कुसुम

गहन आलोचनात्मक विमर्श चल रहा है
5 : 75 के लिंगानुपातवाली कक्षा में

गणित पढ़ने का जन्मसिद्ध अधिकार ले कर उत्पन्न
पचहच्चर कुलदीपक (भावी इंजीनियर)

व्यस्त हैं शिक्षक के साथ
हँसी-ठहाकों भरी बहस में

आखिर यह गणित के भविष्य का सवाल है !!
इक्कीसवीं सदी की कई बड़ी घटनाएँ

हमें नहीं मालूम
जैसे हम नहीं जानते कि

पाँच फुट की साँवली बदसूरत कुसुम ने
(जो प्रेम-पत्र पाने की योग्यता नहीं रखती)

पाए हैं गणित में 100
हतप्रभ खड़ा है अपूर्व
देखता हुआ 99

दो : तान्या

भौतिकी लिपस्टिक नहीं है
न ही सर्कुलर मोशन झुमके हैं

थर्मोडायनामिक्स भी कोई ब्रेसलेट नहीं है
जिसे तान्या इस्तेमाल करती चले

दूधिया गुलाबी चेहरा पाने के बाद
उसे अधिकार नहीं है ऐसा करने का

तान्या का काम है प्यारी बेवकूफ़ बातें करना
पढ़ता है निशान्त

बनाता है नोट्स तान्या के लिए
जानते हुए भी कि उसे वो समझ नहीं आएगा

ख़ुश है तान्या
ख़ुश है निशांत

ब्लैकबोर्ड पर सवाल टँगा है
फिजिक्स का सबसे मुश्किल सवाल

कई हाथ उठे हैं एक साथ
पर टीचर ने पकड़ा है

बातों में व्यस्त तान्या-निशान्त को
‘तुम !!’

निशान्त – सर, मैं ?
नहीं तान्या !

चिन्तित है निशान्त
मुस्करा रही है तान्या

ब्लैकबोर्ड के पास हो कर भी
उसे महसूस हो रही है पैरों पर

कई जोड़ी आँखों की आग
शर्ट पर उभरे ब्रा के स्ट्रेप पर लगी

कई नज़रें
नहीं देखते हुए भी देख पा रही हैं

व्यग्र हैं सब, अधीर हैं..
चॉक लिए बैठे हैं निशान्त, अतुल, रजत सब..

पर ये क्या ?
न्यूमेरिकल बनाया तान्या ने !

जवाब सही है !!
(यानी फ़िजिक्स के सर भी…)

इक्कीसवीं सदी की एक और बड़ी घटना घटी
जिस दिन तान्या ने वह सवाल बनाया

उसी दिन उसने घर जाने के लिए रिक्शा लिया
फिलहाल निशान्त की बाइक की शान है

‘फेमिना टू एफ०टी०वी०’ निकिता!!

तीन : नुज़हत

बामुलाहिजा होशियार
बेगम नुज़हत तशरीफ ला रही हैं –

अभूतपूर्व उत्साह के साथ चिल्ला रहा है
क्लास का प्लेबॉय रोहित

जी हाँ !

यह बायोलॉजी सेक्शन है
जहाँ 85 प्रतिशत बहुसंख्यक आबादी

दलित होने का दंश झेल रही है
किसी अदृश्य नियम से शासित कर रहा है उसे

कक्षा का अल्पसंख्यक सवर्ण वर्ग
नुज़हत टॉपर है

नुज़हत सबकुछ जानती है
नुज़हत मेहनती है

तो क्या हुआ ?
रोहित पल्सर पर घूमता है

रोहित गॉगल्स लगता है
रोहित रोहित है !

ब्लैकबोर्ड पर सवाल टँगा है

फ़ीमेल रिप्रोडक्टिव सिस्टम का डायग्राम
बायोलॉजी पढ़ने का सुख लूट रहे हैं अल्पसंख्यक

मैथ्सवालों की ईर्ष्या, कॉमर्सवालों की चिढ़..
‘इनके तो मुँह में चाँदी का चम्मच है !’

पूछ रही है टीचर
सब हैं चुप

सोना..अनु..प्रेरणा..मेघा
टीचर का चेहरा बुझ रहा है

वह देख रही है कुछ मुस्कराहटें
समझ रही है उनका मतलब

अन्तिम उम्मीद की तरह देखा उसने नुज़हत को
नुज़हत ने हामी भरी

गर्व से खड़ी है मैम
नुज़हत उकेर रही है

फेलोपियन ट्यूब, ओवरी, यूटेरस
नुज़हत बता रही है

हायमन है ये
ये है सर्विक्स

चेहरे गम्भीर हैं
रोहित अमित सबके

नज़रों से कह रही हैं
सोना प्रेरणा बहुत कुछ उन्हें

पता नहीं क्यों विचित्र हो गया है आज
क्लास का माहौल

नुज़हत ने तुलना करने को बना दिया है
दूसरा रेखाचित्र भी

मेल रिप्रोडक्टिव सिस्टम
बताती जा रही है विस्तार से

ऐसे सुन रही है टीचर
मानो बीथोवन की कोई धुन हो

अचानक उठ गए हैं सोना प्रेरणाओं के कन्धे
झेंप रहे हैं रोहित अमित सब

नुज़हत जब चुप हुई
जाने क्यों

बहुसंख्यकों ने बजाई ताली
जाने किस ख़ुशी में ??

सिर्फ़ तुम्हारे लिए… सिमोन

 (1)

तुमने मुझे क्या बना दिया, सिमोन ?
सधे क़दमों से चल रही थी मैं

उस रास्ते पर
जहाँ

जल-फूल चढ़ाने लायक
‘पवित्रता’
मेरे इन्तज़ार में थी

ठीक नहीं किया तुमने…
ऐन बीच रस्ते धक्का दे कर
गलीज भाषा में इस्तमाल होने के लिए

बोलो ना सिमोन, क्यों किया तुमने ऐसा ?

(2)

‘तुम
मेरे भीतर शब्द बन कर
बह रहे हो

तिर रहा है प्यास-सा एहसास
बज रही है
एक कोई ख़ूबसूरत धुन’

काश ऐसी कविता लिख पाती
तुमसे मिलने के बाद

मैंने तो लिखा है
सिर्फ़
सिमोन का नाम

पूरे पन्ने पर
आड़े-तिरछे

(3)

मुझे पता है
तुम देरिदा से बात शुरू करोगे

अचानक वर्जीनिया कौंधेगी दिमाग़ में
बर्ट्रेंड रसेल को कोट करते करते

वात्स्यायन की व्याख्याएँ करोगे
महिला आरक्षण की बहस से

मेरी आज़ादी तक
दर्जन भर सिगरेटें होंगी राख़

तुम्हारी जाति से घृणा करते हुए भी
तुमसे मैं प्यार करूँगी

मुझे पता है
बराबरी के अधिकार का मतलब
नौकरी, आरक्षण या सत्ता नहीं है
बिस्तर पर होना है
मेरा जीवन्त शरीर

जानती हूँ…

कुछ अन्तरंग पल चाहिए
‘सचमुच आधुनिक’ होने की मुहर लगवाने के लिए

एक ‘एलीट’ और ‘इंटेलेक्चुअल’ सेक्स के बाद
जब मैं सोचूँगी

मैं आज़ाद हूँ
सचमुच आधुनिक भी…
तब

मुझे पता है
तुम एक ही शब्द सोचोगे
‘चरित्रहीन’

(4)

जानती हो सिमोन,

मैं अकसर सोचती हूँ
सोचती क्या, चाहती हूँ

पहुँचाऊँ
कुछ प्रतियाँ ‘द सेकण्ड सेक्स’ की

उन तक नहीं
जो अपना ब्लॉग अपडेट कर रही हैं

मीटिंग की जल्दी में हैं
बहस में मशगूल हैं

‘सोचनेवाली औरतों’ तक नहीं

उन तक

जो एक अदद दूल्हा ख़रीदे जाने के इन्तज़ार में

बैठी हैं

कई साल हो आए जिन्हें
अपनी उम्र उन्नीस बताते हुए

चाहती हूँ

किसी दिन कढ़ाई करते
क्रोशिया चलते, सीरियल देखते

चुपके से थमा दूँ एक प्रति
छठे वेतन आयोग के बाद

महँगे हो गए हैं लड़के
पूरा नहीं पड़ेगा लोन

प्रार्थना कर रही हैं वे
सोलह सोमवार

पाँच मंगलवार सात शनिवार
निर्जल…निराहार…

चाहती हूँ
वे पढ़ें
बृहस्पति व्रत कथा के बदले
तुम्हें, तुम्हारे शब्दों को
जानती हो
डर लगता है
पता नहीं

जब तक वे खाना बनाने
सिलाई करने, साड़ियों पर फूल बनाने के बीच

वक़्त निकालें
तब तक

संयोग से कहीं सौदा पट जाए
और
तीस साल की उम्र में

इक्कीस वर्षीय आयुष्मती कुमारी के
परिणय सूत्र में बँधने के बाद

‘द सेकण्ड सेक्स’ के पन्नों में
लपेट कर रखने लगें अपनी चूड़ियाँ

तब क्या होगा, सिमोन ?

अथ मार्शा-स्टीफ़न प्रेमकथा

वर्षों गुलमोहर तोड़ता रहा स्टीफ़न
रक्ताभ शिखाओं पर क़दमताल करता
प्रार्थना करती रही मार्शा जोड़ा फूल की
डलिया भर गुलमोहर थे
कहाँ था उसका जोड़ा फूल ?
पर उस बरस जो गुलमोहर फूला
जगा स्टीफ़न का कवि-हृदय
गालों पर खिले गुलमोहर
हथेली में कुम्हलाया जोड़ा फूल
मार्शा ने वसन्त का रूप धरा
थरथराने लगी हवाएँ
काँपने लगा स्टीफ़न

नाचते-नाचते ताल टूट जाती है
बीड़ी में भी राख ही राख
राँची जाएगी बस !
उसे ढोल उठाने भी नहीं ले जाएगा कोई
भार से झुके शरीफ़ों का रस टपकता है
कोए तालू से चिपकते हैं
मिठास नहीं रुचती
कच्चे अमरूद की खोज में भटक रहा है स्टीफ़न

कास का जंगल राँची नहीं जाता
जाती है बस
टका लगता है
इसू को अढ़हुल गछना सफल हुआ
उन्हें सामान ढोने वाला चाहिए !

बस की सीट गुद-गुद करती है
नशा लगता है, नींद भी
नहीं, मार्शा ही बैठेगी सीट पर
स्टीफ़न खड़ा रहेगा
रह-रहकर महुआ किलकता है
बेहोशी टूटती नहीं
खिड़की के पास मार्शा
उसके बगल में स्टीफ़न
खड़ा पसिंजर देह पर लदता है न इसलिए
उल्टी करने में भी दिक़्क़त नहीं होगी
मार्शा का मन घूमेगा तो
वो जेब में इमली का बिया रख लेगा
नहीं नहीं,
ये वाला सपना नहीं
वही उल्टी करेगा खिड़की से
मार्शा की देह से सटकर
तब भी पीठ नहीं सहलाएगी ?
उंह, सपने में भी लाज लगती है

सरदार कुड़कुड़ाता है
छूटते ही हँसी-ठट्ठा
नम्बरी छिनाल है सब
मार्शा को रह-रहकर पेट में करेंट लगता है
झालमुढ़ी खाया नहीं जाता
स्टीफ़न ठोंगा ले लेता है
इतनी मिर्ची में ही बस !
चः चः
बस निश्चल खड़ी है
स्टीफ़न का दिल दहलता है
मार्शा की आँख

लेडिस भीतर
जेंस छत पर
यह कैसा नियम ?
स्टीफ़न जेंस है कि लेडिस
मार्शा दुविधा में है
सरदार ही जाने

ढोल कस कर पकड़ने पर भी डर लगता है
जरकिंग से पेट दुखाता है
लगता है ढोल समेट खड्डे में गिर पड़ेगा
छत तप रही है
स्टीफ़न के पिघलते हुए हृदय में
सीट पर बैठने की इच्छा कसकती है
पहले धीरे-धीरे, फिर तेज़

अनजान रास्तों पर
सिर्फ पेड़ पहचान में आते हैं
आदमी एक भी नहीं
ठसाठस भरी बस में
स्टूल पर मार्शा नहीं
घर नजर आता है स्टीफ़न को
ताड़ के पंखे की फर-फर हवा
उसके पसीने की गन्ध जाने कैसी तो लगती है ।

बस की फ़र्श फर बैठा हवा खाता स्टीफ़न
उसकी नाक पर लाली है, मार्शा के गालों पर
लड़कियों के दल का अट्टहास
मधुर है
छत की मार से
यहाँ का करुणा मिश्रित उपहास

यह तो किसी स्वप्न में नहीं देखा था
कि हतदर्प योद्धा की तरह यात्रा करनी होगी
माथा घूमता है, जी मिचलाता है
यह तो मार्शा को होना था
उसे क्यों हुआ
जेंस बनने में कहाँ चूक हुई ?
मन होता है मार्शा के हाथ से पंखा फेंक दे
और
फूट-फूट कर रोए उसकी गोद में
सरदार ने बहुत कस कर माराSS

उसने गुलमोहर का सबसे सुन्दर फूल तोड़ा
सबसे सुरीली बाँसुरी बजाई
सबसे अच्छा शिकार किया
सबसे तेज़ नाचा
फिर भी वो चली गई
भाई-बहनों का पेट मोरपंख से नहीं भरता
स्टीफ़न नहीं जान पाया
मार्शा जानती थी

बेर डूबी
कोरे घड़े की तरह डूब गया उसका दिल
छाती में दर्द होता है
आँखों में चुनचुनाहट
जाने हवा-बयार लगी कि मन्तर का बान
देह में ताप है कि मन में
पंखा होंकने से मन और घूमता है
जीवन की सारी उपलब्धियां व्यर्थ हैं
उसकी जीत, उसका मान, उसकी कला
एक थरिया भात तक नहीं कमा सका
हर बार हारा है स्टीफ़न

लड़कियां चली गईं
जंगल उदास हुए, घर बंजर
एकाएक टूटा आकर्षण का तिलिस्म
दिन-रात लुका-छिपी खेलता वसन्त
सूखे पत्तों-सा दरक गया
पहले बच्चों की चहचहाहट को पाला लगा
फिर
चेहरों पर
गरमी की अन्तहीन दोपहर पसर गई

मन नहीं लगता
चाँद का निकलना
रात की सूचना है
और सूर्योदय
मैदान जाने की वेला भर
जंगलों को नमी
और
स्टीफ़न के कवि-हृदय को नौकरी की तलाश है !

मार्शा के घर पर खपड़े लगे
लिपे हुए आँगन में
उसकी हथेलियों की छाप धुँधला गई
चिकनी दीवारों से मिट गए सदा-सुहागिन के फूल
अब वहाँ
सीतको साबुन का विज्ञापन है

स्टीफ़न खपड़े तोड़ देना चाहता है
चाँदी की हँसुली भी
जो मार्शा की माँ ने पहना है
लेकिन हर बार
कटोरे में माड़-भात खाता टुडू दिख जाता है
हड्डियों पर माँस चढ़ रहा है
स्टीफ़न पर बुखार

एक एक कर लौट रही हैं लड़कियाँ
माएँ जड़ हैं, पिता मौन
पैसे मुर्दा पड़े हैं
सुरमी गिन रही है
सरदार ने अठारह बार
ईंट-भट्टे वाले ने तीन महीने
दिल्ली में साल भर
मृत्युशोक में डूबे हैं घर, जंगल, पहाड़

हर पर्व में लौटता है स्टीफ़न
समन्दर पार से पंछी लौटते है
रेल, बस, मौसम, फूल, हवा, बरसात
सब लौटते हैं
सिवाय मार्शा के

कोई नहीं जानता
सुना है उधर भाड़े पर बच्चा पैदा करने का काम चलता है
बिदेस सप्लाई भी
कौन जाने सादी-ब्याह ही…
कोई नहीं जानता
मार्शा का पता
स्टीफ़न का भाग्य ।

बाबू बजरँगी

पता नहीं वह कौन सा दिन था
इतवार या सोमवार
मैंने यूँ ही एक किताब उठाई

लिबरेशन का नया अंक था
दूसरे या तीसरे सफ़े पर बाबू बजरँगी की स्टोरी थी
गोकि यह स्टोरी मैं कितनी दफ़े कितने अख़बारों मैगजीनों में पढ़ चुकी
फिर भी इस दफ़े बाबू बजरँगी का भूत मेरे पीछे पड़ गया है

मैंने रात की पहली नींद का पहला सपना देखा
बाबू बजरँगी गर्भवती औरतों का गर्भ त्रिशूल पर नचाता जा रहा था

मैंने दूसरा सपना देखा
म्याँमार में भयानक गोलीबारी हो रही थी
एक बड़ा सा त्रिशूल बर्मी औरतों का पेट फाड़ रहा था
विएतनाम की सड़क पर एक बदहवास बच्ची दौड़ती चली जा रही थी
उसके पीछे बाबू बजरँगी त्रिशूल लिए बढ़ा आ रहा था
इराक की दबी हुई राख से उसने एक भ्रूण खोज निकाला और
पालमीरा के धवस्त अवशेषों में सलीब की तरह टाँग दिया

मेरे हर सपने में बाबू बजरँगी का त्रिशूल एक अजन्मे बच्चे का शव नचाता हुआ चला आता है
यह बात मैंने अपनी साइकोलॉजिस्ट को बताई
जो हाल ही में शिकागो से क्लिनिकल साइकोलॉजी पढ़ कर लौटी है
घुँघराले बालों वाली वह सुन्दर गुजराती लड़की हंसी
मुसलमानों के साथ ऐसा ही होना चाहिए

आपको जब भी बाबू बजरंगी का खयाल सताए
आप ठण्डे पानी से हाथ धो लीजिए और मन्त्राज चैण्ट कीजिए —
सर्वे भवन्तु सुखिनः, सर्वे सन्तु निरामया

मैं रोज़ सेब खाना चाहती हूँ

मैं रोज़ सेब खाना चाहती हूँ
मैं रोज़ अनार भी खाना चाहती हूँ
मुझे आम भी पसन्द हैं और चिनिया केले भी
अनानास भी अच्छा लगता है, चीकू भी, अँगूर भी
कीवी कभी खाए नहीं, ब्लूबेरी और तमाम तरह की बेरी पता नहीं कौन लोग खाते हैं
कई सालों तक इन फलों को मैंने केवल निहारा है
सिर्फ इस आस में कि देखने से भी शरीर में ख़ून बढ़ेगा

मेरे पास क्या नहीं था
बढ़िया नेपाली गाँजा, असल मलाणा क्रीम
जब चाहो तब ओल्ड मॉंक, स्मिरनॉफ या बीपी
मालबरो क्लोव या क्लासिक माइल्ड
ख़रीदना नहीं पड़ता था
मिल जाता था, बस, कोई भी पिला देता था
लेकिन चौंसठ रुपए का एक सेब ख़रीद लेने की हिम्मत नहीं हुई कभी
अँगूर का मौसम आकर चला गया
बड़ा दुख लगा
लीची आई तो मन बनाया अबकी लीची खाऊँगी
बहुत मोल-मोलाई के बाद भी डेढ़ सौ रुपए से नीचे कोई तैयार ही नहीं होता था
मन हुआ वैशाली एक्सप्रेस पकड़ कर मुज़फ्फपुर चली जाऊँ
फिर तत्काल का किराया याद कर के मन मार लिया

मैं चाहती हूँ केवल कविता लिखूँ
मतलब केवल कविता लिखना मेरा काम हो
मैं कहानियाँ भी लिखना चाहती हूँ, उपन्यास भी
अब या तो मैं सेब खा लूँ या कविता लिख लूँ

काश ! दुनिया इतनी आरामदेह होती कि
मेरा अपना एक कमरा होता (छत पर नहीं, वहाँ गर्मी होती है)
एक लाइब्रेरी होती जिसमें सब हार्डबाउण्ड किताबें होतींं
(जिन्हें कहीं से चुराया न गया होता)

हर रोज़ सेब खाने की सहूलियत होती
काश ! कविता लिखने से सेब मिल पाता !

कॉमरेड-1

पूरी शाम समोसों पर टूटे लोग
दबाए पकौड़े, ब्रेड रोल
गटकी चाय पर चाय
और तुमने किया मेस की घण्टी का इन्तज़ार
अट्ठाइस की उम्र में आईना देखती
सूजी हुई आँखें
कुछ सफ़ेद बाल, बीमार पिता और रिश्ते
स्टूडियो की तस्वीर के लिए माँ का पाग़लपन
घर
एक बन्द दरवाज़ा

हमारी आँखों में
तुम हँसी हो
एक तनी हुई मुट्ठी
एक जोशीला नारा
एक पोस्टर बदरंग दीवार पर
एक सिलाई उधड़ा कुर्ता
चप्पल के खुले हुए फीते की कील
पॉलीसिस्टिक ओवेरियन सिण्ड्रोम
भी हो तुम चुपके से

यूँ ही गुज़रती है ज़िन्दगी
पोलित-ब्यूरो का सपना
महिला-मोर्चे का काम
सेमिनारों में मेनिफ़ेस्टो बेचते
या लाठियाँ खाते सड़कों पर
रिमाण्ड में कभी-कभी
अख़बारों में छपते
पर जो तकिया गीला रह जाता है कमरे में
बदबू भरा
उसे कहाँ दर्ज करें कॉमरेड ?

कॉमरेड-2

टेप से नापकर 20 सेण्टीमीटर का पोल और उसका शरीर
बराबर हैं
तिस पर एक झलंगी शर्ट 90 के शुरूआती दिनों की
और जींस पुरातत्व-विभाग का तोहफ़ा
पैंचे की सिगरेट के आख़िरी कश के बाद भी
पराठे का जुगाड़ नहीं
तो ठहाके ही सही
सेकेण्ड डिवीजन एम० ए० होल-टाइमर
मानसिक रोगी हुआ करता था
पिछले महीने तक
दिवंगत पिता से विरासत में पार्टी की सदस्यता लेकर
निफ़िक्र खिलखिलाता
ये कॉमरेड
दुनिया की ख़बर है इसे
सिवाय इसके कि
रात बाढ़ आ गई है घर में
पन्द्रह दिनों से बैलेन्स ज़ीरो है !

भाकपा (माले)

पापा का मर्डर
चाचा लापता
ड्राइँग बेरंग
निकर बड़ी
नम्बर कम
डाँट ज़्यादा
पेन्सिल छोटी
अँगूठा बड़ा

इससे पहले कि ग्रेनाइट चुभ जाए
गोलू ने लगाई रेनॉल्ड्स की ठेपी पेन्सिल के पीछे
सो पेन्सिल भी गिरी कहीं बैग के छेद से
अब जो ज़ोर-ज़ोर से रो रहा है गोलुआ
इसको अपनी पेन्सिल दे दें?

शादी के बाद

पढ़ लेना
घूम लेना
पहन लेना
उड़ लेना
हमारी ज़िम्मेदारी नहीं
अच्छा बुरा हमारा नहीं
जैसा वे चाहें
उनकी ज़िम्मेदारी

एक ज़िम्मेदारी से दूसरी ज़िम्मेदारी में तब्दील होते हुए
ख़ूबसूरत सपने थे, प्रेरक कथाएँ थीं
टीचरों और डॉक्टरों की, आइ०ए०एसों० की भी
सर्दियों में परीक्षा देने-दिलाने का सपना
एक कोई सेण्टर जहाँ बाइक की पिछली सीट पर बैठे जाया जाएगा
और एक दिन कोई बहुत प्यार से रिजल्ट लाएगा
बधाई हो तुम पास हुईं फर्स्ट डिवीजन

लेकिन पेट में बच्चा लेकर चालीस रोटियाँ बेलने का कोई उदाहरण रहा था पहले
यह मालूम नहीं
फेल होकर घर रहने और दिन के दो बजे पोंछा लगाकर नहाने का कोई उदाहरण भी नहीं था
उनके लिए आलू की तरी, माँजी के लिए उबली लौकी, पापाजी के लिए करेले का जूस और बिट्टूजी के लिए पराँठे
इनका टिफ़िन, उनका टिफ़िन, फिर नाश्ते के बर्तन
फिर दिन का खाना, दिन के बर्तन
फिर शाम का नाश्ता, शाम के बर्तन, शाम की आरती
रात का खाना, रात के बर्तन

इस बीच उठते चाय सोते चाय खड़े खड़े बैठे बैठे चाय चाय
इतनी चाय कि कोई कहे भूकम्प आया, भागो
तो सुनाई दे तीन चाय
कहाँ दबे थे अब तक ये उदाहरण?

मोजे में रबर 

वन क्लास के गोलू सेकेण्ड ने
क्लास की मॉनीटर से
सुबह-सुबह अकेले में
शर्माते हुए
प्रस्ताव रखा —
अपनी चोटी का रबर दोगी खोल कर?
‘सर मारेंगे’
‘दे दो ना
सर लड़की को नहीं मारेंगे
मेरा मोजा ससर रहा है !’

मेरा बॉयफ्रेंड

छठी कक्षा के नैतिक-शिक्षा पाठ्यक्रम के लिए प्रस्तावित निबन्ध)

मेरा बॉयफ्रेण्ड एक दोपाया लड़का इन्सान है
उसके दो हाथ, दो पैर और एक पूँछ है
(नोट- पूँछ सिर्फ़ मुझे दिखती है)
मेरे बॉयफ्रेण्ड का नाम हनी है
घर में बबलू और किताब-कॉपी पर उमाशंकर
उसका नाम बेबी, शोना और डार्लिंग भी है
मैं अपने बॉयफ्रेण्ड को बाबू बोलती हूँ
बाबू भी मुझे बाबू बोलता है
बाबू के बालों में डैण्ड्रफ है
बाबू चप-चप खाता है
घट-घट पानी पीता है
चिढ़ाने पर 440 वोल्ट के झटके मारता है
उसकी बाँहों में दो आधे कटे नीबू बने हैं
जिसमें उँगली भोंकने पर वो चीख़ता है
मेरा बाबू रोता भी है
हिटिक-हिटिक कर
और आँखें बन्द कर के हँसता है
उसे नमकीन खाना भौत पसन्द है
वो सोते वक़्त नाक-मुँह दोनों से खर्राटे लेता है
मैं एक अच्छी गर्लफ्रेण्ड हूँ
मैं उसके मुंह में घुस रही मक्खियाँ भगा देती हूँ
मैंने उसके पेट पर मच्छर भी मारा है
मुझे उसे देख कर हमेशा हँसी आती है
उसके गाल बहुत अच्छे हैं
खींचने पर 5 सेण्टीमीटर फैल जाते हैं
उसने मुझे एक बिल्लू नाम का टेडी दिया है
हम दुनिया के बेस्ट कपल हैं
हमारी एनिवर्सरी 15 मई को होती है
आप हमें विश करना

रि‍सर्च स्‍कॉलरों का गीत 

बाबा नागार्जुन की ‘पुरानी जूतियों का कोरस’ से प्रेरित होकर

खेतिहर रिसर्चर

गोभी के सब फूल कट गए
भिण्डी और बैंगन बोना है
आमों के मौसम में अबकी
फिर मचान पर सोना है
थीसिस लिखनी थी कॉर्बन पर, गाइड गया जापान
केमिस्ट्री का रिसर्च स्कॉलर, हलक में अटके प्राण

कुक रिसर्चर

एक टीन गुझिया बनवाया
तीज हो गया पार
जितिया पर अब फेना घोलो
कैसा अत्याचार
हिस्ट्री में पीएच०डी० ब्याह आइ०ए०एस० से करना था
गाइड के कीचन में देखा ये सुन्दर सपना था

छोटे शहर का रिसर्चर

तीन बजे भोर से लगा है लाइन में
आठ बजे तत्काल कहाँ
फिजिक्स के रिसर्चर की
कहाँ, है मुक्ति कहाँ ?
गाइड का दामाद आ गया, टीसन से लाना है
बेटी का भी इस असाढ़ में गौना करवाना है

जुगाड़ू रिसर्चर

मेरिट का भण्डार पड़ा है
माल रहे भरपूर
पचास हज़ार में थीसिस लिखाओ
माथा रक्खो कूल
राहर खूब हुआ अबकी सोयाबीन भी लगवाएँगे
ए जी, याद दिलाना कॉलेज तनखा लाने जाएँगे

धोखा खाया हुआ रिसर्चर

चार साल तक झोला ढोए
गाइड निकला धोखेबाज़
हमसे पॉलीटिक्स कराके
अपना किया विभाग पर राज
नहीं परमानेण्ट चलो एडहॉक सेट हो लेंगे
वर्ना उस चूतिए के नाम पर ब्लाउज पीस बेचेंगे

कॉमरेड रिसर्चर

कम्युनिस्ट समझ कर इसके अण्डर में आया था
साला संघी निकला सबको धोखे में डाला था
नवरात्रि का व्रत, माथे पर तारापीठ की भस्म
विचारधारा का प्रश्न है साथी, अब पीएच०डी० बन्द

शोषित रिसर्चर

एम०ए० से ही नम्बर देता, स्माइल पास करता था
पीएच०डी० में आकर जाना क्यों इतना मरता था
डिग्री के चक्कर में चुप हूँ, मुफ़्त एक बदनामी
रिटायरमेंट के समय गाइड को चढ़ गई नई जवानी
बच्चे हैं यू०एस० में इसके, बीवी है गांधारी
रेप केस की धमकी इसको दे-देकर मैं हारी

गाइड प्रेमी रिसर्चर

धन्य-धन्य मेरे गाइड का फिर से हुआ प्रोमोशन
किंगफिशर घटिया है अबकी फ्रेंच वाइन देंगे हम
सर ने बोला सोमवार सो इण्टरव्यू देना है
टॉप सीक्रेट मित्र यहाँ पर मेरा ही होना है
सर खुद हैं पैनल में प्रिंसिपल से कर ली है सेटिंग
देखें कैसे रोड़ा अटकाती है सेकिण्ड डिविजिन

भाग्यहीन रिसर्चर

पहला गाइड कामधेनु था पर हो गया सस्पेण्ड
दूजे ने फिर दुनिया छोड़ी, हुआ था एक्सीडेण्ट
अब तो बंजर धरती जैसी गाइड संग रोना है
हाय शनि महाराज मेरे साथ और क्या होना है
कॉलेज की उम्मीद नहीं अब बी०एड० करना होगा
नई कविता के ज्ञाता को कारक रटना होगा

बूबू-1 

दूदू पिएगी बूबू
ना
बिकिट खाएगी
डॉगी देखेगी
ना
अच्छा बूबू गुड गर्ल है
निन्नी निन्नी करेगी
ना
रोना बन्द कर शैतान, क्या करेगी फिर ?
मम्मा पास

बूबू-2 

खिलौने सीज़ हो गए तो
पेन के ढक्कन से सीटी बजाई
डाँट पड़ी
तो कॉलबेल ही सही
ड्राइँग बनाई दो-चार
और कपड़े रंग डाले
अख़बार देखा तो प्रधानमंत्री का शृंगार कर दिया
मूँछे बना दी हीरोइनों की
मन हुआ तो
जूतों के जोड़े बिखेरे
नोचा एक खिला हुआ फूल
चबाई कोंपल नई करी पत्ते की
हैण्डवॉश के डब्बे में पानी डाला
पिचकारी चलाई थोड़ी देर
रसना घोला आइसक्रीम के लिए
तो शीशी गिराई चीनी की
चॉकलेट नेस्तनाबूद किए फ्रिज से
रिमोट की जासूसी की
शोर मचाया ज़रा हौले-हौले
कूदा इधर-उधर कमरे में
खेलती रही चुपचाप
पापा जाने क्या लिख रहे थे सिर झुकाए
बैठी देखती रही
फिर सो गई बूबू
सपने में रोया
पलंग से गिरी अचानक
तो बुक्का फाड़ के रोया
अभी पापा की गोद में
कैसी निश्चिन्त सोई है छोटी बूबू

उस लड़के की याद /

तीन दिन की शेव में
हर लड़का हॉट लगता है
(ऐसा मेरा मानना है)
और जिम के बदले
अस्पताल में पड़ा हो हफ़्ते भर
तो आँखें दार्शनिक हो जाती हैं
पीली और उदास
जलती हुई और निस्तेज
बिना नमक की हँसी और सूखी मुस्कुराहटें
चले तो थक जाए
भरी शाम शॉल ओढ़ कर शून्य में ताके
एक बार खाए, तीन बार उल्टी करे
दुबक जाए इंजेक्शन के डर से
उस लड़के के उदास चेहरे पर हाथ फेरती लड़की
मन ही मन सोचती है
मैं मर जाऊँ पर इसे कुछ न हो
बीमार लड़के प्रेमिकाओं पर शक करने लगते हैं
मन नहीं पढ़ पाते बीमार लड़के

सफल कवि बनने की कोशिशें

ऐसा नइ कि अपन ने कोशिश नइ की
सूर्योदय देखा मुँह फाड़े
हाथ जोड़े
जब तक रुक सका सूसू
चाँद को निहारा
मच्छरों के काट खाने तक
हंसध्वनि सुना किशोरी अमोनकर का
थोड़ी देर बाद लगावेलू जब लीपीस्टिक भी सुना
कला-फ़िल्में देखीं
कला पर हावी रहा हॉल का एसी
वार एण्ड पीस पढ़ा
अंतर्वासना पर शालू की जवानी भी पढ़ी
बहुत कोशिश की
मुनीरका से अमेरिका तक
कोई बात बने
अन्त में लम्बी ग़रीबी के बाद अकाउण्ट हरा हुआ
बिस्तर का आख़िरी खटमल
मच्छरदानी का अन्तिम मच्छर मारने के बाद
लेटे हुए
याद आई बूबू की
दो बूँदें पोंछते-पोंछते भी चली ही गईं कानों में
तय करना मुश्किल था
रात एक बजे कविता लिखने में बिजली बर्बाद की जाए
या तकिया भिगोने में
अपन ने तकिया भिगोया
आलोचक दें न दें
अलमारी पर से निराला
और बाईं दीवार से मुक्तिबोध
रोज़ आशीर्वाद देते हैं
कला की चौखट पर
बीड़ी पिएँ कि सुट्टा
व्हिस्की में डूब जाएँ कि
पॉकेटमारी करें
सबकी जगह है ।

औरतें 

उन्हें एशिया का धैर्य लेना था
अफ़्रीका की सहनशीलता
यूरोप का फ़ैशन
अमेरिका का आडम्बर
लेकिन वे दिशाहीन हो गईं
उन्होंने एशिया से प्रेम लिया
यूरोप से दर्शन
अफ़्रीका से दृढ़ता ली
अमेरिका से विद्रोह
खो दी अच्छी पत्नियों की योग्यता
बुरी प्रेमिकाएँ कहलाईं वे आख़िरकार

जब तक भाषा देती रहेगी शब्द

साथ देगा मन
असंख्य कल्पनाएँ करूँगी
अपनी क्षमता को
आख़िरी बून्द तक निचोड़ कर
प्यार करूँगी तुमसे
कोई भी बन्धन हो
भाषा है जब तक
पूरी आज़ादी है ।

प्यार

गंगा का
सूरज का
फ़सलों का
फूलों का
बोलियों का अपनी
और
तुम्हारा
मोह नहीं छूटेगा
जैसा भी हो जीवन
जब तक रहेगी गन्ध तुम्हारे सीने की जेहन में
मन नहीं टूटेगा ।

प्याज खाने की तलब

वह भरसक अपने धुले हुए कपड़े पहन कर गया
गोकि शनि बाजार में पुराने मैले कपड़े पहनना बेहतर होता मोल-जोल के लिए

आभिजात्य विद्रूपता को उसी तरह ढक देता है
जैसे ग़रीबी ईमानदारी को

उसने प्लास्टिक बोरी पर विराजमान प्याज के पहाड़ से
बहुत सतर्क बेपरवाही से दो बड़े प्याज लुढ़काए

लगभग उस कुत्ते के पैरों तक जो एक ख़ूब बड़ा-सा लाल टमाटर खा रहा था

उसका मन हुआ प्याज छोड़ पहले कुत्ते को एक लात मारे और आधा टमाटर बचा ले

धड़कते दिल के साथ वह आगे बढ़ा
मानो झोले में प्याज नहीं बम रखे हों

उसके और प्याज वाले के बीच मसाले, गुब्बारे, जलेबी, हरेक माल दस रुपया के ठेलों जितनी दूरी थी

अचानक सुरक्षित-सा महसूस करता हुआ वह फलों का मुआयना करने लगा
इस इन्तज़ार में कि फल ख़रीदने वालों को देख सके

कई मिनट बाद उसने एक आख़िरी निगाह स्टीकर लगे सेबों पर डाली
मानो वे प्लास्टिक के हों

पूरे रास्ते वह कच्चे प्याज की गन्ध को सोचता रहा

कभी उसके घर में ईंट पर चौकियाँ रखकर हर कमरे में प्याज बिछाया जाता था
वह किसी दूसरी ही ज़िन्दगी की बात थी

बुखार, ब्रेक अप, आइ लव यू

104 डिग्री
अब पुलिस मुझे आइ० पी० सी० लगाकर गिरफ़्तार कर ले
तो भी नहीं कहूँगी कि मैंने तुमसे प्रेम किया है
प्रेम नहीं किया यार
प्रेम के लायक लिटरेचर नहीं पढ़ा
देखो, बात बस ये है कि..
..कि तुम्हारे बिना रहा नहीं जा सकता ।
कहो तो स्टाम्प पेपर पे लिख के दे दूँ
नहीं.. नहीं..नहीं..


मैंने तुम्हारे दिमाग़ का दही बनाया है
लड़ाई की है, तंग किया है ?
हाँ, किया है
तो लड़ लो
(वैसे तुमने भी लड़ाई की है पर अभी मैं वो याद नहीं दिला रही)
तुम भी तंग कर लो
ब्रेक-अप क्यों कर रहे हो ?
ये मानव अधिकारों का कितना बड़ा उल्लंघन है
कि
आधे घण्टे तक फ्रेंच किस करने के बाद तुम बोलो —
हम ब्रेक-अप कर रहे हैं !
102 डिग्री
अफ़सोस कि मैं कुछ नहीं कर सकती
तुम्हारा ‘नहीं’ चाहना
इस ‘नहीं’ को हाँ कैसे करूँ, कैसे ?
प्लीज बोलो ना
‘नहीं’ दुनिया का सबसे कमीना शब्द है
उससे भी ज्यादा है ‘ब्रेक-अप’


अब एक प्यारे से लड़के की याद में
होमर बनने का क्या उपाय है दोस्तों ?
चाहती हूँ वो लिखूँ..वो लिखूँ.. कि
आसमान रोए और धरती का सीना छलनी हो
पानी में आग लगे, तूफ़ान आए
पर रोती भी मैं ही हूँ, सीना भी मेरा ही छलनी होता है
आग-तूफ़ान सब मेरे ही भीतर है
बाहर सब बिन्दास नॉर्मल रहता है
काश पता होता
प्यार कर के तकलीफ़ होती है
काश
(हज़ारों सालों से कहते आ रहे हैं लोग लेकिन अपन ने भाव कहाँ दिया.. देना चाहिए था )
99 डिग्री
तुम्हें याद है जब एग्जाम्स के वक़्त मुझे ज़ुकाम हुआ था
कैसे स्टीम दिला-दिला कर तुमने पेपर देने भेजा था
और बारिश में भीग कर बुखार हुआ था
तो कितना डाँटा था
अब भी बुखार आता है मुझे
आँसू भी आने लगे हैं आजकल साथ में


कितनी आदतें बदलनी पड़ेंगी
ख़ुद को ही बदल देना पड़ेगा शायद
जैसे कि अब बेफ़िक्र नहीं रहा जा सकता
ख़ुश नहीं हुआ जा सकता कभी
और
सेक्स भी तो नहीं किया जा सकता


वो सारी किसेज जो पानी पीने और सूसू करने जितनी ज़रूरी थीं ज़िन्दगी में
किसी सपने की मानिन्द ग़ायब हो गई हैं..
ओह कितनी यादें हैं, फ़िल्म है पूरी
कभी ख़त्म न होने वाली
मेरी सब फ़ालतू बातें जिनसे मम्मी तक इरिटेट हो जाती थी
तुम्हीं तो थे जो सुन कर मुस्कुराया करते थे
और तुम, जिसकी सब आदतें मेरे पापा से मिलती थीं
और वो मैसेज याद हैं
हज़ारों एस० एम० एस०.. मैसेज-बॉक्स भरते ही डिलीट होते गए
उन्हें भरोसा था कि ख़ुद डिलीट होकर भी
उन्होंने एक रिश्ते को ‘सेव’ किया है
दुनिया का सबसे प्यारा रिश्ता..
तुम चिढ़ जाओगे कि ये सब लिखने की बातें नहीं हैं
क्यों नहीं हैं ?
तुम्हारे प्यारे होठों से भी ज़्यादा प्यारे डिम्पल
और उनसे भी प्यारी मुस्कुराहट की याद
मुझे सेक्स की इच्छा से कहीं ज़्यादा बेचैन करती है
तुम्हारे शरीर की ख़ुशबू जिसके सहारे हमेशा गहरी नींद सोया जा सकता है
वही तुम, जिसे निहारते हुए लगता है —
काश इसे मैंने पैदा किया होता..
ज़िन्दा रहने की चन्द बुनियादी शर्तें ही तो हैं न
हवा, पानी, खाना और तुम
तुम..
101 डिग्री
मैं उन तमाम लड़कियों से
जो प्यार में तकिए भिगोती हैं और बेहोश होती हैं
माफ़ी माँगना चाहती हूँ
वो सभी लोग जो बी० पी० एल० सूची के राशन की तरह
फ़ोन रीचार्ज होने का इन्तज़ार करते हैं
जो ऑक्सीजन की बजाय सिगरेट से साँस लेते हैं
वोदका के समन्दर में तैरते हैं
हमेशा दुखी रहते हैं
उन पर ली गई सारी चुटकियाँ, तंज, ताने, मज़ाक
मैं वापस लेती हूँ
104 डिग्री
और तुम
तुम तो कभी ख़ुश नहीं रहोगे
रिलेशनशिप..अण्डरस्टैण्डिंग.. ईगो.. स्पेस..
नहीं जानती थी मैग्जीन्स से बाहर भी
इन शब्दों की एक दुनिया है


तुम्हारे सारे इल्ज़ाम मैं क़बूल करती हूँ
हाँ, मुझमें हज़ारों कमियां हैं
मैंने तुम्हें जंगलियों की तरह प्यार किया है
कि तुम्हें गले लगाने के पहले
फ़्लैट की किस्त और इंश्योरेंस पॉलिसी नहीं जोड़ी
अपना साइकोएनालिसिस नहीं किया
हाँ, मुझे नहीं समझ आता ‘ब्रेक-अप’ का मतलब
नहीं आता !
तुम्हें गुस्सा आता है तो आए
लेकिन
आइ लव यू
जितनी बार तुम्हारा ब्रेक-अप, उतनी बार मेरा आइ लव यू..

पोएट्री मैनेजमेंट

कविता लिखना बोगस काम है!
अरे फालतू है!
एकदम

बेधन्धा का धन्धा!
पार्ट टाइम!
साला कुछ जुगाड़ लगता एमबीए-सैमबीए टाइप
मज्जा आ जाता गुरु!
मने इधर कविता लिखी उधर सेंसेक्स गिरा
कवि ढिमकाना जी ने लिखी पूंजीवाद विरोधी कविता
सेंसेक्स लुढ़का
चैनल पर चर्चा
यह अमेरिकी साम्राज्यवाद के गिरने का नमूना है
क्या अमेरिका कर पाएगा वेनेजुएला से प्रेरित हो रहे कवियों पर काबू?
वित्त मंत्री का बयान
छोटे निवेशक भरोसा रखें!

आरबीआई फटाक रेपो रेट बढ़ा देगी
मीडिया में हलचल
समकालीन कविता पर संग्रह छप रहा है
आपको क्या लगता है, आम आदमी कैसे करेगा सामना इस संग्रह का?
अपने जवाब हमें एसएमएस करे
अबे, सीपीओ (चीफ पोएट्री ऑफिसर) की तो शान पट्टी हो जाएगी!
हर प्रोग्राम में ऐड आएगा
रिलायंस डिजिटल पोएट्री
लाइफ बनाए पोएटिक
टाटा कविता
हर शब्द सिर्फ़ आपके लिए
लोग ड्राईंग रूम में कविता टाँगेंगे
अरे वाह बहुत शानदार है
किसी साहित्य अकादमी वाले की लगती है
नहीं जी, इम्पोर्टेड है
असली तो करोड़ों डॉलर की थी
हमने डुप्लीकेट ले ली
बच्चे निबन्ध लिखेंगे
मैं बड़ी होकर एमपीए करना चाहती हूँ
एलआईसी पोएट्री इंश्योरेंस
आपका सपना हमारा भी है
डीयू पोएट्री ऑनर्स, आसमान पर कटऑफ
पैट (पोएट्री एप्टित्युड टेस्ट) की परीक्षाओं में
फिर लडकियाँ अव्वल
पैट आरक्षण में धांधली के खिलाफ
विद्यार्थियों ने फूँका वीसी का पुतला
देश में आठ ने काव्य संस्थानों पर मुहर
तीन साल की उम्र में तीन हज़ार कविताएँ याद
भारत का नन्हा अजूबा
ईरान के रुख से चिंतित अमेरिका
फ़ारसी कविता की परम्परा से किया परास्त!

ये है ऑल इण्डिया रेडिओ
अब आप सुनें सीमा आनंद से हिंदी में समाचार
नमस्कार!!
आज प्रधानमन्त्री तीन दिवसीय अंतर्राष्ट्रीय काव्य सम्मेलन के लिए रवाना
इसमें देश के सभी कविता गुटों के कवि शामिल हैं
विदेश मंत्री ने स्पष्ट किया है कि भारत किसी भी कीमत पर काव्य नीति नहीं बदलेगा
भारत पाकिस्तान काव्य वार्ता आज फिर विफल हो गई
पाकिस्तान का कहना है कि इक़बाल, मंटो, और फ़ैज़ से भारत अपना दावा वापस ले
चीन ने आज फिर ने काव्यलंकारों का परीक्षण किया
सूत्रों का कहना है कि यह अलंकार फ़िलहाल दुनिया के सबसे शक्तिशाली
काव्य संकलन पैदा करेंगे
भारत के प्रमुख काव्य निर्माता आशिक़ आवारा जी का आज तड़के निधन हो गया
उत्तरप्रदेश में आज फिर दलित कवियों पर हमला
उधर खेलों में भरत में लगातार तीसरी बार
कविता अंत्याक्षरी का स्वर्ण पदक जीत लिया है
भारत ने सीधे सेटों में ६-५, ६-४, ७-२ से यह मैच जीता
समाचार समाप्त हुए!

आ गया आज का हिंदू, हिंदुस्तान टाइम्स, दैनिक जागरण, प्रभात ख़बर
युवाओं पर चढ़ा पोएट हेयर स्टाइल का बुख़ार
कवयित्रियों से सीखें ह्रस्व दीर्घ के राज़
३० वर्षीय एमपीए युवक के लिए घरेलू, कान्वेंट एजुकेटेड, संस्कारी वधू चाहिए
२५ वर्षीय एमपीए गोरी, स्लिम, लम्बी कन्या के लिए योग्य वर सम्पर्क करें

गुरु मज़ा आ रहा है
सुनाते रहो
अपन तो हीरो हो जाएँगे
जहाँ निकलेंगे वहीं ऑटोग्राफ़
जुल्म हो जाएगा गुरु
चुप बे
थर्ड डिविज़न एम ए
एमपीए की फ़ीस कौन देगा?
प्रूफ़ कर बैठ के
ख़ाली पीली बकवास करता है!

(इस रचना पर कवयित्री को 2016 का भारत भूषण अग्रवाल पुरस्कार मिला है)

पागलों के अस्पताल में 

पीले सूट वाली औरत को लगता है पड़ोसियों ने उनकी वीडियो बना ली
जो वाट्सएप पर ऑल इण्डिया घूम रही है

बुर्के वाली औरत परेशान है पति से जो रोज़ रात को छत पर चला जाता है
किसी गुप्त प्रेमिका से मिलने

बैसाखी के सहारे खड़े बूढ़े को दौरे पड़ते हैं और वह चीख़ता है
मुझे मत मारो बेटा

गोल चेहरे वाले सुन्दर लड़के को नींद नहीं आती रात भर

लाल फ्रॉक वाली छोटी बच्ची बोलती नहीं कुछ

बींधने वाली आँखों का समन्दर है जिनकी लहरें किसी जलती हुई भट्टी से आती मालूम होती हैं

पालतू बिल्ली की मौत से अवसादग्रस्त लोग भी उतने ही परेशान हैं
जितने यू०पी०एस०सी० के असफल प्रतियोगी

प्रियजनों की निर्मम हत्याओं से जड़ लोग
युद्ध की विभीषिका से बच कर भागे शरणार्थी
अस्पताल के लॉन में सर्दियों की गुनगुनी धूप सेंक रहे गार्ड मरीज़ों के सम्बन्धियों को पागलपन की दास्तानें सुना रहे हैं
जिन्हें कुत्ते भी बड़ी कौतूहल भरी दिलचस्पी से सुन रहे हैं
जैसे उन्होंने कभी पागल होकर किसी को काटा ही नहीं

और इन सबसे बेख़बर कैपेचीनो पी रही
वह नीली आँखों वाली डॉक्टर बर्गर खाती हुई
कई जोड़ी जड़ आँखें चुपचाप उसे देख रहीं
खाते हुए

बिल्लू का दाख़िला-1 

बिल्लू ने बहुत ज़ोरदार पर्चा लिखा पी० एच० डी० प्रवेश का
“कबिर बरे आलूचक हे
रेनू लीखे है सताइस गो कहनी
नामौर जी कहे है कबीता की नयि परतीमान मे
अगेय जी अमिर आदमि थें
सुक्ल जी परसंसा करते हए दूबेदी जी आलूचना”
अंतिम प्रश्न परेमचंद की सामाजिक चेतना
जिसका बिल्लू ने गर्दा छोड़ाया-
“परेमचंद्र उत्तर परदेस मे जनम लीये थें, उनके बाबूजी का नाम नवाब राय था, उ भुक सें मर गयें थे”
बिल्लू ने बण्टा पीते हुए लल्लन को ललकारा
कलम तोर के लीखे हैं भायजी, अबरी फस किलास टौप रिजल्ट
लेकिन हरामजादा मास्टर अंधरा कोढ़िया
फैल नंबर दे दिया बिटीचो

बिल्लू का दाख़िला-2

बिल्लू हार नहीं माना, रार नई ठाना
दूबे जी के पास रोया
चौबे जी के पास गाया
पाण्डे जी की तरकारी लाया
सहाय जी का घर बदलवाया
सहाय जी ने शर्मा जी को फ़ोन किया
शर्मा जी ने वर्मा जी को
वर्मा जी ने महेसर जी को कहलवाया
महेसर जी ने रामेसर जी को
बिल्लू इण्टरव्यू देने आया
बेटा बैठो, आज नाश्ते में क्या खाया
दूद-रोटी-चिन्नी-केला
आहा अद्भुत
इस प्रकार बिल्लू ने विश्वविद्यालय में प्रवेश पाया

तिरबेदी जी का व्यक्तित्व-कृतित्व

आप शायद न जानते हों
ऐसा है कि तिरबेदी जी बड़े नामौर आलोचक हैं
जिस ज़माने में कहानियाँ लिखा करते थे
मोहन राकेश इनसे डिक्टेशन लेता था
निर्मल वर्मा लन्दन से मज़मून माँगता था
और कविताएँ तो पूछिए मत
लड़कियाँ ख़ून से ख़त लिखा करती थीं कसम रामचन्द्र शुक्ल की
ऐंवेई नहीं है भई, मेधावी व्यक्ति हैं
हिन्दी साहित्य के इतिहास में कुछ नहीं तो दस पन्ना कहीं नहीं गया है
तो जिन दिनों तिरबेदी जी का नागार्जुन, शमशेर, अज्ञेय, त्रिलोचन
गो कि सैकड़ो नामचीन अदीबों में उठना-बैठना था
नेपाल की विदेश-यात्रा कर आए थे
बस्ती के डिग्री कॉलेज में बकरियाँ गिनना अखरने लगा
और जैसी कि कहावत है — प्रतिभा साधन की मोहताज नहीं होती
सो तिरबेदी जी मन्नू के खलिहान पर दो घण्टे पसीना बहाकर
कनस्तर भर शुद्ध सरसों तेल पेरवा आए
और वो मालिश की अपने गुरुजी की
बूढ़े की हड्डियाँ अस्सी पार भी दमदार हैं
बाबा बिसनाथ की किरपा से बलियाटिकी ख़तम हुई
और कापी कालेज नखलऊ नस्तर लींबू बोलते-बोलते
तिरबेदी जी सर्वहारा, साम्राज्य, चेतना, मुक्ति दोहराने लगे
इस प्रकार तिरबेदी जी मालिश काल समाप्त कर बाबा काल में प्रविष्ट हुए
तत्पश्चात कई प्रकार के पवित्र तिकड़म और दान-पुण्य करते हुए
कई काल तक पत्नी पुत्रादि संग सुखी जीवन व्यतीत किया

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