शैलजा नरहरि

लड़की

बहुत ज़ोर से हँसती हो तुम
ऐसे नहीं हँसते
मुसकुराना तो और भी ख़तरनाक है

चलते वक़्त भी ध्यान रखा करो
क़दमों की आवाज़ क्यों आती है

सुबह जल्दी उठा करो

सब के बाद ही सोते हैं
औरों का ख़याल रक्खा करो
सब को खिला कर ही खाते हैं

क्या करती हो
तुम्हें कुछ नहीं आता
कुछ तो सीखो
पराये घर जाना है

हाँ! ठीक ही कहा है
तुम्हारा कोई घर नहीं है
ये घर तुम्हारे पिता का है
फिर होगा तुम्हारे पति का घर
और बाद वाला तुम्हारे पुत्र का

तुम तो लक्ष्मी हो
उन का भी कोई घर नहीं है
लक्ष्मी हो कर भी
चरण दबाती हैं विष्णु भगवान के
चरणों में बैठी हैं युगों से
क्षीर-सागर घर नहीं होता
शेषनाग भी भगवान विष्णु की ही पसंद हैं
लक्ष्मी हो या तुम
भाग्य तो सब का एक सा ही है

गाय और तुम

खूँटे से बँधी रहो
जितनी ज़रूरत है उतनी बड़ी रस्सी है

दुनिया बड़ी बदनाम है
बाहर तुम्हारा क्या काम है

तुम्हारे सींग हमने नहीं काटे हैं
काटने पर तुम बुरी लगोगी
ये सींग मारने के लिये नहीं हैं

रम्भाने की क्या ज़रूरत है
हम तुम्हें भूखा कहाँ रखते हैं

तुम्हारे रहने से आँगन की शोभा है
तुम्हारी तो पूजा होती है
जैसा पुजारी चाहेगा वैसी ही पूजा होगी

तुम हमारे देश में नारी का मापदण्ड हो
तुम्हारी जैसी औरत ही हिन्दुस्तानी होती है
ज़ियादा गड़बड़ करे तो कहानी होती है

यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते – रमन्ते तत्र देवता
ये हमने कहा ही तो है
कहने में क्या हर्ज़ है
ये तो हमारा फर्ज़ है

देर तक छाँव को न भाये हम 

देर तक छाँव को न भाये हम
उम्र भर धूप में नहाये हम

रास्ते गुमरही के थे जिसके
उस क़बीले को छोड़ आये हम

बज़्म में आज़ वो न पहचाने
जिन की यादों में मुस्कुराये हम

ज़िन्दगी भी ज़मीं पे मिलती है
मौत को क्यूँ ख़रीद लाये हम

अब परिन्दे तलक नहीं आते
जिस दरीचे पे खिलखिलाये हम

दिया अपना जो उसने वास्ता तो

दिया अपना जो उसने वास्ता तो
ख़ुशी इक दे गया मुझसे मिला तो

मुसलसल दर्द है,तनहाइयाँ हैं
यही है उनसे अपना सिलसिला तो

कोई तनहा सहेगा दर्द कब तक
करेगा इश्क़ इक दिन फ़ैसला तो

अभी तक आँख में तस्वीर जो है
यही है दर्द की अब तक दवा तो

मेरी मायूसियाँ कुछ भी न देंगी
हंसी से हो सकेगा राबिता तो

ख़ुदी को मार कर जीना है मुश्किल
ख़ुदा दिखलाये कोई रास्ता तो

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