शैलजा पाठक की रचनाएँ

पायताने बैठ कर १

एक छोटे ब‘चे की हथेली में
तेल से अम्मा एक गोल बनाती
कहती ये लो लड्डू
भैया दूसरी हथेली बढ़ा देता
अब दूसरी में पेड़ा
भैया देर तक मुस्कराता…ƒघर के आंगन में भागता
मीठा हो जाता
गप-गप खा जाता लड्डू-पेड़ा
खुशियों के आंगन में ममता की बड़ी ƒानी छांव होती है
जहां बाबा की पुरानी बड़ी कुर्सी पर
अम्मा भैया को बैठा देती ये कहकर
अब लो तुम राजा
भैया झूम जाता
बताशे में पानी डाल कर
तुम ही खिला सकती थी गोलगप्पा
जादूगरनी…तुम ही थी
सूना आंगन…हवा में हिलती कुर्सी
खाली हथेलियों का खारापन
हमारी दोनों मुट्ठियां तुम्हारे सामने हैं
तुमने बारी-बारी से दोनों को चूमा ये कहकर
एक में हंसी एक में खुशी
हमने अपनी आंखें ढंक ली हैं
तुम नदी सी समा रही हो हथेलियों में
बस एक बार दे दो ना वही लड्डू-पेड़ा
हमें पता है तुम नहीं टालोगी।

पायताने बैठ कर २ 

मझली चाची के हलदियाईन हाथ
टह लाल आंखें
चूल्हे पर खदकते अदहन से सवाल
ना कभी कोई सुना ना सुन पायेगा
तीज पर कसी चूडिय़ां
छनछनाती नहीं
कलाई पर गोल चिपकी सी होती हैं
जैसे कलेजे को ƒघेरे रहता है दर्द
ठीक होली की शाम चुडि़हारिन
उतार लेगी पुरानी चूडिय़ां
पहना जायेगी नई
चाची झोंक दी जायेगी आग में लकड़ी की तरह
रात मन के सूने आंगन में
जलेगी होली
अतीत का हुड़दंग
मंजीरे पर फाग गाते लोग
पिसती भांग का नशा
सामने वाली खिड़की पर
एकटक निहारती एक जोड़ी आंख
भीगकर भी ना भीग पाई उसके रंग से
रात वीराने चाचा का संदेसा
आज हम बड़का टोला में रुकेंगे
फागुनहटा चले तो गांव ƒघर बड़ा याद आवे है
अम्मा कहती रही
धरती लाल रंग गई आज
चाची कोरी की कोरी
बड़का टोला से देर रात तक
आती रही नाच-गाने की आवाज
मोरे नैना कटीले दरोगा जी
सब दुश्मन निगोड़े दरोगा जी।

पायताने बैठ कर ३

वो अलग रहते हुए एक दूसरे से Œप्यार करते
करते रहते अपने काम
अपने-अपने शहर के मौसम में मिलाते
दूसरे शहर की गर्मी, Œयार करते
रात की चमकती सफेद चांदनी में
अपने रंगीन सपनों को ƒघोलते और प्यार करते

अलग-अलग किताब पढ़ते हुए
वो मोड़ देते एक साथ कोई पन्ना
वो रुकते और Œप्यार करते
उनके Œप्यार में नहीं आती वो शाम
न आती कोई तारीख न ˆत्योहार मिलाते उनको

पर प्यार में अलग भी कब थे दोनों
धरती हरी होती, आकाश नीला, सपने चमकीले

किताबों के कई पन्ने मुड़े हुए
लड़की के बाल लम्बे और खूबसूरत थे
लड़के की उलझनें उलझे बालों से भी ज्यादा उलझी
एक दिन सफेद ƒघोड़े पर चमकते कपड़ों वाला राजकुमार
धूल उड़ाता आता
और लम्बे बालों वाली राजकुमारी को उठा ले जाता

ये फोटो बड़े किताब के बड़े रंगीन पन्ने पर बनी थी
लड़की राजकुमारी नहीं रस्ते आसान नहीं
सफेद ƒघोड़े खाली सूने रास्तों पर ओझल
लड़के के हाथ में Œप्यार वाली किताब
लड़की के होंठ पर मिलन वाले गीत।

पायताने बैठ कर ४ 

शरीर पर अपना होना लिखती रात
धीरे से कंधों से होती
बेआवाज़ लुढ़क गई
हमने दूरियों के कोरे पन्नों पर लिखी
शक शुबहा दुश्मनी ईर्ष्या के
कुछ ऐसे मन्त्र
जिसे एक बार फूंक दिया जाए
तो हरे पेड़ से सारी कोमल पत्तियां झड़ जाएं
सूखे पत्तों के ढेर में लगी आग
सुलगती है देर तक
जलती है मिनटों में
बुझती है हमारी ही
हथेलियों की टेढ़ी रेखाओं के बीच
जहां दर्ज नहीं था ये रिश्ता
अच्छा ही हुआ…सब ख़त्म
हमारे मन की पवित्र नदी में
मेरी आस्था के दीये से जलते हो तुम
ये तुमने कभी नहीं जाना
और मैंने माना ही नहीं अब तक कि
एक झूठ को सच कैसे मान गये तुम।

पायताने बैठ कर ५

अम्मा कहती थी सवा किलो की करधनी थी
जब आंगन में भाई ने चढ़ाई
पूरा गांव उचक कर देखने लगा
सोलह छड़ा और भारी भरकम पाजेब
जिसके घूँघरू बजते ही अम्मा अपने साड़ी का
पल्ला सर पर खींच लेती

कमर नहीं रही, ना रहे पैर, गहने की छनमन जि़‹दा है
डेढ़ तोले की अंगूठी जिसमें जड़ा था गुलाबी पˆथर
समय के साथ खूब ƒघिसा तीन नया टांका डलवाकर
अपनी तर्जनी में पहने रही अम्मा
आखिरी अंगूठी उतारने पर
कुछ ना कहीं आंगन बिलख उठा
गहनों की एक पोटली है…गठरी भर अम्मा
और ना जाने कितनी कहानी…
हाथी, डिजाइन के कंगन की अलग कहानी
और जाली वाले कंगन की अलग
मुंह दिखाई में मिला झुमका हमेशा
कुछ हल्का ही लगा अम्मा को
ममिया सास रही, यही दी बहुत है

और अम्मा उस हाथ में पहरे वाला आर्मलेट?
अम्मा बड़े ताव से उठाती उसमें लगे मीना के बारे में बताती
कहती बनारस के काशी साह के
यहां से खास बनवाया गया
ब€से में रखी नीली-पीली लाल हरी
फीकी चटक साडिय़ों के किस्से
ब€से के अतल में दबा चांदी का
तमाम सि€का झम से बज जाता
अम्मा तौलिया डाल कर दबा देती
ऐसे ही किस्सों सी भरी थी अम्मा की ज़िन्दगी

समय कोई भी हो
खाली उकसा दो कि शुरू हो जाये अम्मा
तब का हुआ कि…

अब सि‹धोरे से बंधी जर्जर डोरी में
तुम्हारी अटूट आस्था बंधी है
तुम्हारे गहनों की कहानियों में
ना जाने कैसी उदासी चिपकी है
पीढा पड़ा है उपेक्षित जो खरीदा था फेरी वाले से
केत्ता मोल चल करे कि 50 बोलत रहा 35 में दिहा
वाह रे अम्मा…पर सब छोड़ गई
गहनों-कपड़ों से भरा लदा है ƒघर

बक्से के अतल में सिक्के
पर अब खनकते नहीं…रुदन करते
तौलिया आंसू पोंछता सा
पिता भरी नजर से देख लेते हैं
तुम्हारी कपड़ों की अलमारी
ˆयोहारों के कितने रंग बंद हैं उसमें
भूरे एलबम की सफेद-काली फोटो में
गहनों से लदी फंदी अम्मा सकुचाई सी
पिताजी का जवाहर कोट
और वीर स्टूडियो…
फ़क्र से बोलती रही यों कहानियां
उदास संदूक में बंद कपड़े उदास से हैं
कमर की करधनी और पाजेब गूंगे
सिकड़ी कितनी थी…सब उलझी सी है
सारे हिसाब गड़बड़ाए हैं अम्मा

आज ही अलमारी से मिला है नया बैग
कब खरीदा था? कहां जाने की तैयारी चुपचाप
कई बार ऊपर वाला ‹न्योता छपवाता है
उस पर एक का नाम लिखा होता
यहां जाना बड़ा जरूरी होता है
निचाट उदास बादल को फाड़ कर देखो
हम अवाक है तुम बोल रही हो
इधर से उधर से गहनों से कपड़ों से
बाबा के आंगन में फैला बनारस का गहना
रात मुंह खोले किस्सा सुन रही है
तब का हुआ कि…।

पायताने बैठ कर ६ 

हाथ के इशारे से उड़ जाती है चिडिय़ा
तालियों की आवाज से उड़ते देखे तमाम कबूतर
झिड़क देने से मासूम ब‘चे
तिरस्कार करने से नाते-रिश्ते
फूंक देने से हथेली पर रखा पंख
पानी उलीचने से जमीं पर पड़ा गर्द

दबा लेने से नहीं दबता मन का दर्द
छुपा लेने से नहीं छुपते ज़ख्म
विदा कहने से नहीं चले जाते तुम
खुश हूं कहने से रिसती हैं आंखें
जाओ यहां से…पर कसकता है कलेजा
भूल गई तुम्हें
कहते ही बेगाना हो जाता है मेरा ही ƒघर

सुबह दोपहर शाम की सीढिय़ां चढ़ता समय
अगर रुक जाए ना
पिछली तारीखों में तुम्हारे पास जाऊं
कुछ बिगड़े समीकरण सुलझाऊं

चले जाओ कहते ही कश्तियां डगमगाती हैं
रुक जाओ की आवाज़ पर
धाराएं सतरंगी रूमाल दिखाती बलखाती हैं
बड़ी दूर चली गई है सपनों वाली नाव
प्रेम के गीत तुम्हारा साथ
पर मैंने नहीं बजाई थी ताली
न किये इशारे न झिड़का था कभी न तिरस्कार
हथेली पर प्रेम के कोमल पंख को किसने फूंका
संगमरमर के शहर में
टकराते पंख की कराहें सुन रही हूं मैं

ये आवाजें जाने का कोई इशारा नहीं समझतीं।

पायताने बैठ कर ७ 

हम नेवार की खटिया कस देते
सीधी हो जाती बाबा की कमर

उनके उठाये हाथ के आशीष में
मेरे गाल के थपथपाने में
बाबा की आश्वस्त मुस्कराहट में
मुझे दिखा करता था बसंत

बसंत याद से खटिया के नीचे रखे
लोटे के पानी में भरा रहता है
मैंने देखा है बसंत
बाबा के पायताने बैठी गुडिय़ा
बतियाती रहती है दुनिया-जहान
बाबा की झपकती आंख
चल भाग यहां से, की झूठ में
बसंत गुदगुदी करता खिलखिलाता

और उनके चादर में
अपना मुंह ढांप सो जाता।

पायताने बैठ कर ८ 

चल सखी चूडिय़ां बांट लें
मिला ले तेरी हरी में मेरी लाल
बीच में लगा कर देख ये बैंगनी-सफेद
कुछ नई में पुरानी मिला कर पहनते हैं
अब जो आये हैं नैहर चल खूब खनकते हैं

चल खाते हैं बासी रोटी
दाल में मिलाते हैं मिर्च का अचार
सिलबट्टे पर धनिया की चटनी पीसते हैं
बाजरे की रोटी में गुड़ मीसते हैं
लगाते हैं अम्मा को मेहंदी
बाबू का भारी वाला जैकेट मुस्कराते से फिचते हैं
कर देते हैं साफ भाई का कमरा
चढ़ आते हैं ऊंची अटारी
उलटी पैर की भूतनी से डर कर चिपट जाते हैं
अब जो आये हैं नैहर
चल खेत में पानी सा उतर जाते हैं

भरते हैं भौजी के सि‹होरा में पीला सिंदूर
रात की बात कर साथ खिलखिलाते हैं
भतीजी के लिए बना देते हैं कपड़े की गुडिय़ा
उसको नथिया और हसली पहनाते हैं
उसकी आंख में भरते हैं काला सा काजल
कान में झुमका लटकाते हैं
अब जो आये हैं नैहर…अम्मा की गुडिय़ा बन जाते हैं

चल सखी रात बांट लें
मन की बात बांट लें
आंख में सूख रही सदियों से नदी
होंठों को सिल लेते हैं
कल जाना है ससुराल
आ गले मिल लेते हैं
अम्मा को नहीं बताएंगे
भाई से छुपा ले जायेंगे
भौजी जान भी नहीं पाएगी

खूंटे से बंधी गाय सब समझ जाएगी
दरवाजे से निकलते हमसे उलझ जाएगी
चाटेगी हथेली के छाले
हमारी रीढ़ में एक रात कांप जायेगी
हमारी छाती में सूखी कहानी हरी हो जाएगी
चिरई चोंच का दाना छोड़ जायेगी

चल चुपचाप रो लें
मांग भर सिंदूर, हाथ भर चूड़ी, बाल में गजरा सजायेंगे
मन की गांठ साथ लिए जायेंगे
हम बड़का ƒघर की Žब्याहता हैं अब
नैहर को अपने चुप से ठग जायेंगे

पर गाय से नजर नहीं मिलायेंगे
चल ना चूडिय़ों में मिलाते हैं कुछ नई कुछ पुरानी
आटे में खूब सारा पानी…खिलखिलाते हैं
अब जो आये हैं नैहर
चल खनकते हैं…
फिर…चुपके से टूट जाते हैं।

पायताने बैठ कर ९ 

रेलगाडिय़ों के लिए बचाई जा रहीं पटरियां
यात्रियों के उतरने को बनाये गये Œप्लेटफॉर्म
हवाओं को काट कर उड़ाये गये होंगे हवाईजहाज
स्याही की खेती कवियों की बेचैन रातों का किस्सा होगी
मुंडेर पर बचे धान से पहचान जाती है गौरय्या हमारी फितरत

रेशमी डोरियों की नोंक पर बिंधी मछली की चीख होगी
संवेदना को बचाने की जुगाड़ में
समय ने सरका दिए खाली का$गज़
जेब में बचा अकेला सि€का भूल जाता है खनकना
कि खनकने की खातिर भिडऩा पड़ता है

जाल से छान लिए गये कबूतरों ने
आसमान चुन लिया बार-बार
बिखरी कविता को संभाला
सहेज ठीक-ठाक किया
हिज्जे-मा˜त्राओं को असा-कसा

मैंने अभी-अभी लिखा तुम्हारा नाम
कबका लिखा जाना था ना इसे
मैं देर से समझती हूं
कि पलटती मोड़ पर छूट गई तुम्हारी नजरों से
एक मौन कुछ बोलता सा रहा

मैंने बड़ी देर से दुरुस्त किये ƒघरौंदे
ओह! तो तुम बरसे थे…भीगी थी
तुमने तपाया था धूप सा
लाल थीं आंखें प्यासी रेत बिखरती रही
‘किसे किसके लिए बनाया गया’ की खोज ने
मुझे तुमसे दूर कर दिया

दरम्यान सुना बड़ी पहाडिय़ां खड़ी कर दी गईं
उफनती नदियों को छोड़ दिया गया
बंद हो गई स्याही की खेती

हौले से निकल जाती हूं
उन रेल पटरियों पर
Œलेटफॉर्म सदियों से
एक मुसाफिर की खातिर बिछा है

पहाड़ी गीत के मीठे बोल सा सपना
एक थी मैना
एक था पिंजरा
और एक राजा भी था…।

कमाल की औरतें १ /

देर तक औरतें अपने साड़ी के पल्लू में
साबुन लगाती रहती हैं
कि पोंछ लिए थे भीगे हाथ
हल्दी के दाग…अचार की खटास या थाली की गर्द
या झाड़ लिया था नमक
पोंछ लिया था छुटके ने अपना मटियाला हाथ

साथ इसके ये भी कि गठियाकर रखा था
ज़माने भर का दर्द
सर्द बिस्तर पर निचुडऩे के बाद का माथा पोंछा था शायद
बाद मंदिर की आरती की थाली भी
बेचैनियों पर आंख का पानी भी

ज़माने भर के दाग धŽबे को
एक पूरा दिन खोंसे रही
अपनी कमर के गिर्द
अब देर तक अपना पल्लू साफ करेंगी औरतें
कि पति के मोहक क्षणों में
मोहिनी-सी, नीले अम्बर-सी तन जायेंगी
ये कपड़े को देर तक धोती नज़र आएंगी
मुश्किल के पांच दिनों से ज्यादा मैले कपड़े
ज़माने का दाग

ये अपनी हवाई चŒपलों को भी धोती हैं देर तक
ƒघर की चहारदीवारी के बाहर पैर ना रखने वाली
घूमती रहती हैं…अपनी काल्पनिक यात्राओं में दूरदराज
ये जब भाग-भाग कर निपटाती हैं अपने काम
ये नाप आती हैं सम‹दर की गहराई
देख आती हैं नीली नदी…चढ़ आती हैं ऊंचे पहाड़
मायके की उस खाट पर
अपने पिता के माथे को सहला आती हैं
जो जाने कब से बीमार है
इनकी चप्पलें हजार-हजार यात्राओं से मैली हैं
ये देर तक ब्रश से मैल निकालती पाई जाती हैं

ये देर तक धोती रहती हैं मुंह की आग
भाप को मिले ƒघड़ी भर आराम
ये चूडिय़ों में फंसी कलाइयों को निकाल बाहर करती हैं
जब धोती हैं हाथ
ये लाल होंठों को रगड़ देती है
सफेद रूमाल में उतार देती हैं तुम्हारी जूठन
ये चौखट के बाहर जाने के रास्ते तलाशती हैं
पर रुकी रह जाती हैं…अपने बच्चों के लिए

ये देर तक धोती हैं
अपने सपने…अपने ख्याल…अपनी उमंगें
इतनी कि सफेद पड़ जाए रंग
ये असली रंग की औरतें
नकली चेहरे के पीछे छुपा लेती हैं तुम्हारी असलियत
ये औरतें
अपनी आत्मा पर लगी तमाम खरोंचों को भी छुपा ले जाती हैं
और तुम कहते हो…
कमाल की औरतें हैं…
इतनी देर तक नहाती हैं!

कमाल की औरतें २

औरतें भागती, गाडिय़ों से तेज़ भागती हैं
तेज़ी से पीछे की ओर भाग रहे पेड़
इनके छूट रहे सपने हैं
धुंधलाते-से…पास बुलाते-से…
सर झुका पीछे चले जाते-से…

ये हाथ नहीं बढाती पकडऩे के लिए
आंखों में भर लेती हैं
जितने समा सकें उतने

भागती-हिलती-कांपती-सी चलती गाड़ी हो
या कैसी भी परिस्थितियां हों जीवन की
ये निकाल लेती हैं दूध की बोतल
खंखालती हैं
दो चम्मच दूध और
आधा चम्मच चीनी का परिमा‡ण याद रखती हैं
गरम-ठंडा पानी मिलाकर
बना लेती हैं दूध
दूध पिलाते ब‘चे को गोद से चिपका
ये देख लेती हैं बाहर भागते-से पेड़
इनकी आंखों के कोर भीग जाते हैं
फिर सूख भी जाते हैं झट से

ये सजग सी झटक देती हैं
डोलची पर चढ़ा कीड़ा
भगाती हैं भिनभिनाती मक्खी
मंडराता मच्छर
तुम्हारी उस नींद वाली मुस्कान के लिए
ये खड़ी रहती हैं एक पैर पर

तुम्हारी आंख झपकते ही
ये धो आती हैं हाथ-मुंह
मांज आती हैं दांत
खंखाल आती हैं दूध की बोतल
निपटा आती हैं अपने दैनिक कार्य
इन जरा-से क्षणों में
ये अपनी आंख और अपना आंचल
तुम्हारे पास ही छोड़ आती हैं

ये अंधेरे बैग में अपना जादुई हाथ डाल
निकाल लेती हैं दवाई की पुडिय़ा
तुम्हारा झुनझुना
पति के जरूरी कागज़
या˜त्रा की टिकिट
जिसमें इनका नाम सबसे नीचे दर्ज़ है

अंधेरी रात में
जब निश्चि‹त सो रहे हो तुम
इनकी गोद का ब‘चा
मुस्काता सा चूस रहा है अपना अंगूठा
ये आंख फाड़ कर बाहर के अंधेरे को टटोलती हैं
जरा सी हथेली बाहर कर
बारिश को पकड़ती हैं
भागते पेड़ों पर टंगे अपने सपनों को
झूल जाता देखती हैं

ये चिहुकती हैं बड़बड़ाती हैं
अपने खुले बालों को कस कर बांधती हैं
तेज़ भाग रही गाड़ी की बर्थ नम्बर तरेपन की औरत
सारी रात सुखाती रही ब‘चे की लंगोट नैपकिन
खिड़कियों पर बांध बांध कर
भागते रहे हरे पेड़
लटक कर झूल गए सपनों की चीख
बची रही आंखों में
भीगते आंचल का कोर
सूख कर भी नहीं सूखता
और तुम कहते हो
कमाल की औरतें हैं…
ना सोती हैं
ना सोने देती हैं
रात भर ना जाने €क्या-€क्या खटपटाती हैं!

कमाल की औरतें ३ 

ये तहों में रखती हैं अपनी कहानियां
कभी झटक देती हैं धूप की ओर
अपने बिखरे को बुहार देती हैं

ये बार-बार मलती हैं आंखें
जब सहती हैं आग की दाह
ये चिमटे के बीच पकड़ सकती हैं
धरती की गोलाई
धरती कांपती है थर-थर

ये फूल तोड़ती हुई मायूस होती हैं
पूजा करती हुई दिखाती हैं तेज़ी
बड़बड़ाती हैं दुर्गा चालीसा
ठीक उसी समय ये सीधी करती हैं सलवटें
पति की झ€क सफेद कमीज़ की

इनकी पूजा के साथ
निपटाए गये होते हैं खूब सारे काम
ये नमक का ख्याल बराबर रखती हैं
बच्चों के बैग में रखती हैं ड्राइंग की कॉपी
तो बड़ी हसरत से छू लेती हैं उसमें
बने मोर के पंखों को
ये छोटे बेटे के पीछे पंख-सी भागती हैं
कि छूटती है बस स्कूल की
‘तुम हमेशा टिफिन बनाने में देर कर देती हो मम्मा’
इनके हाथों में लगा नमक
इनकी आंखों में पड़ जाता है

ये बार-बार ठीक करती हैं
घड़ी का अलार्म
ये आधी चादर ओढ़ कर सोई औरतें
पूरी रात बेचैन कसमसाती हैं सांस रोके
इनकी हथेलियों में पिसती है एक सुबह
आंखों में लडख़ड़ाती है एक रात

ये उठती हैं तो दीवार से टिक जाती हैं
संभलती हैं, चलती हैं, पहुंचती हैं गैस तक
खटाक की आवाज़ के साथ
जल जाती हैं

और तुम कहते हो-
कमाल की औरतें हैं…
चाय बनाने में इतनी देर लगाती हैं!

कमाल की औरतें ४

जब नदी के पास नहीं बचेगा पानी
चूल्हे में बुझी होगी बीते दिनों की आग
हवा के गर्भ में अंतिम सांसें लेगी पुरुआ पछुआ
नानी के होंठ तक आकर कहानी
रास्ता भूल जाएगी

पिता के कंधे पर बैठ
मेले का आकाश नहीं छू पाएंगीं नन्ही हथेलियां
मां की पुकार पर पत्ते झरने लग जायेंगे
बेटियों की तस्वीर से लापता हो चुकी होगी खिलखिलाहट
पाजेब में ƒघूँघरू खो देना चाहेंगे
अपने छमकने का अस्तित्व
आंधियों में शैतान बच्चों की टोली
नहीं बटोरेगी टिकोरा अपनी बंद आंखों से

जब कुछ नहीं बचना चाहेगा
जब सब ख़त्म होने को होगा
समय
धरती के सीने पर कर रहा होगा
अपने जाते कदमों से हस्ताक्षर

रात की डिबिया में बंद
इ‹तजार में पगी उन आंखों का यकीन
सम‹दर को धरती की कहानी सुनाएगा
सम‹दर मीठा हो जायेगा
हवा लौट आएगी
चूल्हा जलने लगेगा
एक लड़की बनाएगी एक चिडिय़ा की तस्वीर
आसमान नीला रंग जायेगा
एक प्रेम
ठूंठ पेड़ों पर घोंसला बनाएगा
शाखें गुलजार हो जायेंगी

नदी पर कसी जा रही है पालों वाली नाव
किनारे गीत गा रहे हैं
मिट्टी पानी में मिल आकार ले रही है
हम Œप्यार कर रहे हैं
हम धरती, पेड़, नदी, आकाश, बादल हैं
हम बगिया पछुआ पुरुआ बयार हैं
नानी की कहानी के मीठे पात्र हैं हम
कहानी के अंत में
‘सब सुख से राजपाट करने लगे’ पर यकीन करते हैं हम
Œप्यार करते हैं

हममें बची हुई धरती
सांस ले रही है।

कमाल की औरतें ५

हथेलियों को जोड़कर
आधे चांद पर वारी-वारी जाती किशोर लड़कियां
सु‹दर राजकुमार को मुट्ठियों में बांध
चूम लेती हैं
एक दिन इनकी गोल सफेद हथेली पर
एक गोल मेहंदी का जलता सूरज
इनकी आंखें चुधिया देता है
कि असीम Œप्यार पाएंगी ये राजकुमारियां
रंग के चटक होने की कहानियां झूठी नहीं होतीं

अपने नन्हे पैरों के छापे से लक्ष्मी बनी ये
ƒघर की दहलीज के अंदर…
अपने सपनों के बाहर आ जाती हैं
साटन के कपड़े सी मसकती सोच पर
ये बिछाती हैं कोशिशों की नई धुली चादर
बार-बार अपने हाथ के अधूरे चांद को देख
आंखें मूंद लेती हैं
आईने में अपने अतीत की खिलखिलाहट को
लगाती हैं नजर का टीका
इनके सुरीले गानों में गूंजता है
इनके अकेलेपन का सन्नाटा
बचपन के ƒघूँघरू में अवसाद ƒघर बना लेता है

ये घर से
ƒघर तक के सफर में
चांद हथेली राजकुमार खिलखिलाहट की व्यवस्था के बीच
ये उतार दी गई हैं एक लम्बी सुरंग में
जहां जुगनू सी उम्मीद है
इनके लक्ष्मी वाले नन्हे पैर
बिना निशां छोड़े निकल जाना चाहते हैं
इनकी सोची बनाई हुई दुनिया की राह पर
ये सफेद परियों के लिबास में
बेतहाशा भाग रही हैं
सफेद किताबी पन्ने में राजकुमार भाला तलवार है
काली ऊंची दीवारों के पीछे से
एक आवाज़ टूट कर चीख रही है

हथेली में चांद है मेरे कि मेरी मेहंदी का रंग
चटक लाल।

शाम की निराशा 

शाम सहमी सी उतर
रही है
उसके गहराते ही
उड़ जायेंगे परिंदे
अपने अपने घोसलों को
दिन ने भर दिए होंगे
उनके जरा से गोदाम
जिस पर करेंगे उसके
बच्चे गुजारा
या बड़े गोदामों में
सड़ गए होंगे दाने
या पानी ना भर गया हो
या फेंक ना दिए गए हों
रेल की पटरी पर
नहीं चुग पाई है
चिड़िया आज भी
रंग दानों का काला पड़ गया
और मर चुका है
आँख का पानी
शाम गुनाहगार सी
उतर रही है
रात घोसलों से
भूखे बच्चों की
आवाजें बहुत आती हैं

तरक्की /

मुझे तरक्की का
प्रलोभन देकर
अपने गरिमामय ओहदे से
मुझे अपनी कुत्सित सोच
से
कितनी ईमानदारी से
वाकिफ कराते हो
मुझे तरक्की देने वाले
मेरी नजर में
तुम कितना नीचे गिर जाते हो…
क्या अपनी नजर में भी?

चंदामामा

आओगे तो आज भी
क्या लाओगे कुछ
मुनिया
के भूखे पेट क लिए
एक बार नहीं सोचा कि
वो मुंह में जाने वाला
कौर
जो रोज उसकी माँ
तुम्हारी ओर देख कर
मुनियाँ के मुंह में डालती है
कितना खाली होता है
लगातार तुम्हारी ओर देखते
देखते मुनिया सो जाती है मीठी नींद
आओ आना है तो चंदा मामा
पर माँ के विश्वास को
कब तक झूठा ठहराओगे
कभी तो लेके आ जाओ चांदी का कटोरा
जो दूध भात से भरा हो…

सहभागी 

मैं रही सहभागी
तुम्हारी जिंदगी के
सभी उतार चढ़ावों में
और तुम भागीदार बने
उन साजिशों के
जब मेरा ख़रीदा बेचा जाना
तय किया तुमने…

सब अकेले हो गए बस

कुछ नहीं ठहरा
सिवा इस वक्त के
तू गया बातें गईं
वो गुनगुनाती धूप में
जब साथ हों कुछ देर को
कहते से हम
सुनते से तुम
वो रास्ते ही गुम हुए
ओस सी वो बूंद थी
जो झिलमिलाती थी कभी
मुझको मिली एक रात वो
बस आँख भर कहने लगी
अब ख्वाब ही आते नहीं
यूं गए तुम नींद मेरी ले गए
वक्त से कितनी शिकायत मैं करूं
सुबह सवेरे शाम, है ठहरा हुआ
ये गुजरते ही नहीं जब से गए तुम…
मोड़ का वो पेड़ भी रूठा हुआ
मुड़ गए तुम जिस जगह से राह अपनी
पतझड़ों का दौर है अब
और मौसम भूल कर भी
छू नहीं पाए हैं इसको
यूं गए तुम
सब अकेले हो गए हैं…

अब मुझे तय करने दो

तुमने हमेशा तय कीं
मेरी सीमाएं
मेरा होना नहीं होना भी

तुमने तय कीं
मेरे अंदर बाहर की
जिंदगी

मेरे तौर तरीके
बातचीत
मेरे दोस्त, मेरा परिवार भी
तय कर दिया तुमने

अब मुझे तय
करने दो

कि तुम्हें क्या

तय करना चाहिए, क्या नहीं…

परिधि के बाहर

तुम्हारी बनाई इस खूबसूरत
बावड़ी में
मेरी दिशाओं के सभी
कोने
किनारों से टकरा कर
आहत हो रहे हैं

एक बार मैं समंदर छूना चाहती हूँ…

बनारस हो जाती हूँ /

एक शब्द विछोह

पहली बार मन रोया था
जब अपने प्रायमरी स्कूल को
अलविदा कहा
पिछले डेस्क पर छूट गया
पुराना बस्ता
गुम गो गया वो अंडे के आकार
वाला स्टील का टिफिन
जिसमे अम्मा ठूस के रखा करती थी पूरी अचार
तमाम रंगबिरंगी पेंसिल का खोना पाना
महकने वाले रबर में सबकी हिस्सेदारी

उस आखिरी दिन डैनी सर ने
मेरे गाल को थपथपा के चूम लिया
वापस दिए मेरे घुंघरू यह कह कर
कि डांस सिखती रहना
अतीत के खुबसूरत यादों के
दरवाजे पर टंगा है घुंघरू
जब भी यादें अन्दर आती है
सब छम छम सा हो जाता है

बड़े और समझदार होने के क्रम में
हम लगातार बिछड़ते रहे
स्कूल कॉलेज दोस्त
फिर वो आँगन भाई का साथ
पिता की विराट छाती से चिपक कर
वो सबसे दुलारे पल

और आखिर में हमेशा के लिए
बिछड़ गई अम्मा
बेगाना हो गया शहर
राजघाट के पुल से गुजरती ट्रेन
डूबती गंगा… शीतला माता के
माथे का बड़ा टिका सारे घाट मुहल्ला
विश्वनाथ मंदिर का गुम्बद सब बिछड़ गया

अब रचती हूँ यादों की महकती मेहंदी अपने हाथो में
चूमती हूँ अपना शहर…
और बनारस हो जाती हूँ …

निर्णायक 

वे निर्णायक की भूमिका में थे
अपनी सफ़ेद पगड़ियों को
अपने सर पर धरे
अपना काला निर्णय
हवा में उछाला

इज्जतदार भीड़ ने
लड़की और लड़के को
जमीन में घसीटा
और गाँव की
सीमा पर पटक दिया

सारी रात गाँव के दिये
मद्धिम जले
गाय रंभाती रही
कुछ न खाया

सबने अपनी सफ़ेद पगड़ी खोल दी
एक उदास कफन में सोती रही धरती

रेंगता रहा प्रेम गाँव की सीमा पर

नफरत

मैं नफ़रत करती हूँ
बरसों बाद वापस
आती तुम्हारी आवाज में उगे है तमाम काटें

मिलने की बात पर बरगद का वो
सबसे पुराना पेड़ जल कर खाक
हो गया सा जान पड़ता है

उस मोड़ पर जहाँ से मुड़े थे तुम
एक गहरा कुआँ अचानक से दिखता है मुझे
जिसके अन्दर बरसों से पड़ी मैं
तुम्हारा नाम ले ले कर खामोश हो गई थी

बिनाकुछ कहे तुम एक ऐसी दुनिया में
थे जहाँ मेरी उदासी के कोई गीत
तुमने कभी नही सुने

बड़ी मुश्किल से जीना सिखा है
नफ़रत करना भी

कोई हक नही
मेरा प्यार पाने का

हाँ नफरत करती हूँ इतना
जितना टूट कर किया था प्यार कभी
तुम्हारे दिए जख्मों की टीस
अभी ताजा है

इस टीस में पुरानी यादों की
बची हुई नरम हरी कोपलें है
मैंने इन्हें गहरे रोपा है

कह सकोगे?

मैं अनुभवों को पैना कर रही हूँ
मैं दुर्गम रास्तो पे खाली पैर चल रही हूँ
चुभते है कुछ नियम काँटों से
दरारों को पाटने की कोशिश कर रही हूँ

तुम्हारे हिस्से का सह रही हूँ
अपने हिस्से का नही कह रही
मैं तुम्हारी चाहरदीवारी में
तुम्हारे लिए ही रह रही हूँ

आपातकालीन स्थितियों में
मैं बाहर जाया करती हूँ
सहज ही अपने को भूल कर
तुम्हारे अहंकारो की
परवरिश कर रही हूँ

सोचती हूँ
जिस दर्प से थामा था हाथ मेरा
उसी दर्प से एक बार मेरी आँखों में देखकर
कह सकोगे… मैं तुम्हें रानी बनाकर रखूँगा…

इन्तजार 

एक शब्द इन्तजार

एक लम्बा सूखा रास्ता
एक गहरे गढ्डे में सूखी पड़ी नदी

यादों की परते खुरचती
नमी तक पहुंचती आवाज

मंदिर में बेजान जलता दिया
कांपती जिंदगी की लौ

तकिये में मौन पड़ी हिचकी
दस्तक पर हहराता कलेजा

यकीं पर बरसो से एक ठंडी
पड़ी आग

इन्तजार एक शब्द नही
एक रुदन है

सूखे चेहरे पर खारे आँसूओं
का थका सा समन्दर…

याद

भूल कर भी नही कहा तुमने
कि याद करते हुए
लिखते हो तुम
कोई उदास कविता

न ही कह पाई मैं कि जब भी
याद आते हो
एक टीस सी होती है
खुरचती हूँ आँगन की
मिटटी उकेरती हूँ
एक जोड़ी आँख
और डर कर मूँद लेती हूँ पलके

समय लाता है हर रोज
मेरे बिस्तर पर एक
अँधेरी रात… सलवटों से सवाल

तुम्हारी बहुत पहले दी
उन लाल प्लास्टिक की
चूड़ियों की परिधि में
घूमती है मेरी कलाई
और अतीत खनक जाता है…

कजरी

ससुराल से पहली बार
आई कजरी गुम सुम सी है
कम हंसती है
अकेले कोने में बैठ कर
काढ़ती है तकिया के खोल
पर हरा सुग्गा

सहमी सी रहती है
आने जाने वालों से नही मिलती

देर तक बेलती रहती है रोटी
इतनी की फट जाये

माई बाप अगली विदाई की
तैयारी में लगे हैं
छोटी बहन जीजा को लेकर
जरा छेड़ती है

आस पड़ोस वालों में किसी “नई खबर”
की सुगबुगाहट

ससुराल से वापस आई लड़कियां
बस लाती है तथाकथित नई खबरें
ये मान लेते हैं सब

कोई जानना नही चाहता… कजरी छुपा लेती है
वो दाग जो दुखता है हर घडी

बाप जूटा रहा है विदाई का सामान

कजरी के मेजपोस पर हरा सुग्गा
एक काले पिंजरे में बंद है

सुई चुभती है
कजरी की उँगलियों से निकलने वाला
रंग सुग्गा के चोच जितना गहरा है

बिछड़ना

बिछड़ने से
सिर्फ तुम दूर नही हो जाते

कुछ रास्ते अपने आप को
भूल जाते हैं
तालाब का गुलाबी कमल
मुझसे आँखें फेर लेता है

हवा में बह रही
तुम्हारी आवाज
टकरा टकरा जाती है
मुझसे

कम्बखत बेखुदी तो देखो
ये जानते हुए भी की नही हो तुम
बढाती हूँ अपना हाथ तुम्हारी तरफ
आज कहाँ चोट लगा लिया?
ये भी सुनती हूँ

मंदिर के मोड़ पर
तुम मुझे फूल लिए दिखते हो
सावन में एक हरा दुपट्टा तुमने
मुझे ओढाया था

मेरे रास्ते अब मंदिर नही पड़ता
वो रास्ता भी छीन गया है अब
समन्दर की कोई लहर नही छू पाती मुझे
पूरा चाँद भी अधूरा दिखता है मुझे
होली का अबीर फीका कर गए हो

तुम्हारे बिछड़ने से मैं दूर रहीं हूँ
इन खुबसूरत लम्हों से
मैं बिछड़ गई अपने आप से

मेरे अंगूठे को जोर से दबाने की टिस
देखो हुई अभी अभी

बिछड़ना बस एक भ्रम होता है क्या?

तुम्हारा जाना /

जब शब्दों में
चीखने लगी वेदना

रोम रोम प्रवाहित होता रहा
तुम्हारे साथ बिताया सफ़र
करुणा से भरी तुम्हारी आवाज
तोड़ने लगी दम

हमारे दिलों में टूटने लगे
अनगिनत शीशे
चुभने लगी आँखें
इस बार आँसू के रंग अलग थे
किसी ने किसी के नही पोछे

सबने जिया तुम्हारे जाने का दर्द

तुम्हारे गुनगुनाते भजनों मन्त्रों की
छुपी आवाजों से
कराहती रही मंदिर की
बेआवाज घंटी

तुम्हारी टूटती साँसों को
बचाने आये सभी देवी देवता
हार कर समां गए तुम्हारे भीतर
एक झटके ही बड़ा हो गया
तुम्हारा छोटा बेटा

हमारे घर में तुम्हारी ममता महकती थी
मीठा दूध महकता था

घर की नींव पर तुमने कुछ फूल दबाये थे
वो अपने साथ ले गई क्या?

बेरंग उदास दीवारों की महक
बड़ी भयावह होती है अम्मा…

बच्चा चाचा

बच्चा चाचा निर्गुण गाते थे
इतना कमाल की लोग सुनते रह जाते
कई बार गाँव के चौपाल पर
लोग उनसे निहोरा करते
और वो वही चौकी पर बैठ
आँखें बंद किये गाते
खो जाते और गाना खतम होते
ही तेज कदमों से
अपने घर की तरफ
चले जाते

कई बार हमारे घर के
बैठक में चाचा लोग उन्हें
गाने के लिए घेर लेते
वो गाना शुरू करते
तो घर की औरतें दीवारों से सट
कर बैठ जाती
अक्सर आँसू पोछती

पर मेरी आँखों ने जो
देखा वो सिर्फ गाना नही था
जब भी बच्चा चाचा गाते
उनकी आँखों में एक सुना रास्ता
उभरता… उनकी मुठ्टीयों
में अतीत पिस रहा होता
गमछे से बार बार अपने
सूखे गालों को पोछते

गाना खत्म होते ही
कातर हों जाते
अपना दर्द छुपाते अपनी
मडई में में जाकर पुराना
बैंजो निकाल कर एक तेज
धुन छेडते तो कभी
पुआल में आग लगा
उठने वाले गुबार को देखते
कड़वाहट घोंट जाते

कुदाल फावड़ा उठा
खेत के पथरीले हिस्से
पर कोड़ते एक खाली गढ्ढा
रोपते एक मुरझाया पौधा

और खुले आसमान के नीचे
बिखेर देते एक निर्गुण

चार कहार मिली डोलिया उठावें…

हमारा गणतन्त्र

चिरई गाँव के प्राथमिक पाठशाला
में बच्चे सफाई में जुटे हैं
ईटा पे गेरू लगा कर सब साफ़ सुफ़
कल गणतन्त्र दिवस पर सभी को
एक लड्डू एक समोसा देने वाले हैं

सबसे परेशां मिसिर गुरु जी है
रंगारंग कार्यक्रम की जिम्मेवारी है उनपर
अब कोई लड़की इस साल भारत माता
बनने को तैयार नही
अब उन्हीं को केंद्र में रख कर
सारी बात सारा शपथ तो लेना है

लड़कियों ने निर्णय ले लिया है
हर साल का मजाक है
कभी भारत माता को टुटा हुआ दिखाना है
कभी झुका हुआ कभी चोट खाया कभी रक्तरंजित
कभी तार तार अस्मिता
इस बार एक सावली लड़की
को भारत माता बनाते तो फीलिंग उभर कर आता
पर इस बार लड़कियों की फीलिंग जाग गई है
सूखी नदी दरकते पहाड़ फटे कपडे पहन कर भ्रस्टाचार
गरीब का रोल अब हम नही करेंगे
हर साल आपका लिखा एक जैसा भाषण भी नही बोलेंगे

नहीं गुरु जी कल हम सब नही आयेंगे
अम्मा तो कहती रही भारत माता को
खूब चटक पिली साडी में खूब गहना पहनाकर
ये बड़ा टिका लगाकर सब रंगबिरंगा नाच करते थे
हरियाली खुशहाली का गीत गाते थे

हमे भी खूब नाचना है पाउडर लाली लगा कर

उस तीन रंग के नीचे रंग रंग हो जाना है गुरु जी…

जब मिलते हो तुम

जब नहीं सोचती हूँ तुम्हे
तब मैं कुछ नही सोचती
पैर के नखों से कुरेदती हू
जमीं का पथरिलापन
तब तक जब तक
अंगूठे दर्द से बिलबिला ना उठे

जब मैं नहीं मिलती तुमसे
तब मैं किसी से नही मिलती
जरा से बादलों को खीचकर
ढक देती हूँ आईना
तुम धुंधले हो जाते हो

और जब मिलते हो तुम
मैं आसमानी ख्वाबो में लिपटी
पूरी दुनिया को बदला हुआ
देखती हूँ की जैसे पेड कुछ बड़े और हरे हो गए

पोखर का पानी साफ़ है
बिना मौसम ही खिले हैं खूब सारे
कमल दहकते रंग के
मेरी आँखों में खूब सारी
जिंदगी छलक रही है
मेरे हाथों में मेहदी का
रंग और महक

ऊपर आसमान में उड़ते
दो पतंग एक दूसरे से
गले मिलते हुए

जब मैं तुमसे मिलती हूँ
तब मैं मिलती हूं
अपने आप से…

स्त्रियाँ

स्त्रियाँ का कोई वर्ग नही होता
धर्म नही जात नही होता
सब मिलकर बस वो स्त्री होती है

कुछ प्रकार होते है

कुछ ऐसी जिनकी चमचमाती
गाड़ियों के पीछे काले शीशे होते हैं
उनके तलवे नर्म मुलायम होते हैं
उनके नीचे जमीं नही होती
वो लड़खड़ाती चलती हैं

कुछ ऐसी जो गाली खाती है
मार खाती है और अपने आप को
अपने बच्चों के लिए बचाती है

एक ऐसी जो अपने को दाव पर लगा कर
पति के सपनों को पंख देती है

और एक ऐसी जो सपने नही देखती
एक वो जो जलती भुनती अपने
मुस्कराहट को सामान्य बनाए रखती है

कुछ स्त्रियाँ मरी हुई एक देह होती हैं
मशीनी दिनचर्या की धुरी पर
घुरघुराती काम निपटाती

ये सभी प्रकार की स्त्रियाँ
मरती हैं एक सी मौत

जब इनका सौदा किया जाता है
जब इन्हें रौदा जाता है
जब इनके गर्भ में इन्हीं का कतल होता है
इनके आसुओं का रंग लाल होता है

दर्द के थक्के जमे होते है इनकी देह में…

बसंत

मुरझाये मसले फूलों के साथ पंडित जी
गाँव के तुरहा टोला में
बाँटते रहते है बसंत

अम्मा खटिया की सुतरी कसती हुई
गाती थी… निरमोहिया याद तू आये
हवा में तैरता था बसंत
फिर वही तुलसी के चौरे में
उग आता था एक दिन

प्रेम से भरी चिठ्ठी
पढते हुये
दीदी ऊपर वाले छत पर
हवाओं में कस कर पकड़ रखती थी
जिसमे लिखी होती थी बासंती बातें
उसके लम्बे इन्तजार में
बसंत उसकी आँखों में तैरता

मैं खोमचे वाली बुढिया के लिए
लिखती एक पत्र जिसमे
अपनी झुर्रियों पड़े शरीर से कमाए
रुपये मनीआडर करते हुए
अपनी पतझड़ सी जिंदगी से
चुरा कर कुछ बसंत वो भेज दिया करती

बरसों बाद घर आये अपने
बिछड़े बेटे के दाल में घी
बनकर तैरता बसंत

बसंत बस पेड़ों पर नही आता
खेतों में लहलहाता ही नही

हमारी ये पहली होली है ना?

प्रेमी के ऐसा कहने से रंग जाती है प्रेमिका
तेज होती धड़कने आँखों के समन्दर में
डूब जाता है बसंत…

गाँव की गुडिया 

उसकी आँखों से
एक गरम नदी निकलती है

एक ठंढी साँझ का
उदास सूरज
डूबता है उसकी
गहरी आँखों में

बेअसर दस्तकों से
नही कांपते दरवाजे

गीतों के धुन पर
नहीं लरजते होठ

सुना है एक रंगीन
शहर में भेज दी गई

गाँव की गुडिया
अपनी परछाइयों में छूती है
गाँव का पीपल

जीने की कोशिश में
मुस्कराती है

और मर जाती है
अगले ही पल …

बूँद और रिश्ते

कल बारिश में भींगते हुए
कितनी ही बूंदों को
मैंने झटक दिया

सब गिर कर टूट गई

आज गालों को हाथ लगाया
कुछ सहमीं सी गर्म बूंदें मिलीं

कैसे कैसे रूप बदल कर चली आती है
बूँद बारिश रिश्ते और ख्याल

टूटते हैं पर हमसे छूटते नहीं…

कल फिर

डोरियों से उतार लाई मैं
आज की थकान
अब मोड़तोड़ कर रखने होंगे कपड़े

कल फिर इन पर
सूखने टंग जायेगी
एक और सुबह…

भींगना

आज एक बच्चे ने भगवान को
भींगने से बचाया
और उनके नाम पर कमाया पाँच रुपया
अपनी जेब में छुपाया

अपनी फटी बनियान के अंदर
डाल ली भगवान की फोटो

और तेज बारिश में
भीगता रहा नन्हां फरिश्ता
भगवान उसकी छाती में
महफूज सिसकता रहा

आज दोनों ही भीगे
किसी ने किसी को नही बचाया

मेरे दुलार पाने के आखिरी दिन

तुमने सारे रिवाज निभा दिए
और कर दिया मुझे अपनी जिंदगी से
दूर और दूर…
तुम्हें याद है ना भाई?

जब मंडप को घर के बड़ों ने छवाया
और मेरे जीवन में एक पुख्ता
छत की नींव डाली
तुम वही मेरे पास बैठे देख रहे थे सब
जब अम्मा ने अपने भाई से ली थी
इमली घोटाई की साड़ी
और जीवन में साथ का भरोसा..
तुम सामने से देख रहे थे
या खोये थे कही और?

कन्यादान की रस्म में
जब औरतें गा रही थी वो गीत
(अरे अरे भैया हमार भैया हों धरिया जनी तोड़ी ह हो )
तुम जानते थे भाई
कलश का पानी खतम होते ही
मैं किसी और की हो जाउंगी
तुम कितनी देर-देर तक
बचा-बचा कर गिरा रहे थे पानी
पर नही बचा पाए ना मुझे पराया होने से

तुम अपनी समर्थता में भी
कितने निरीह लगे थे मुझे

और आखिर में तुमने निभा दी वह रस्म भी
जब विदा के वक्त तुमने अपनी अंजलि से
पिलाया था मुझे पानी
जिसमे मिले थे मेरे तुम्हारे आँसू
मुझे रीतियों ने बताया
वो था मेरे दुलार पाने का आखिरी दिन

तुम तो समृद्ध थे ना
पर कितने लाचार लगे

पीछे मुड के देखा था मैंने
कैसे रो रहे थे तुम
ढेर पड़े पिताजी को पकड कर

मैं ओझल हूँ
पर मुझे पता है
मेरे बाद अम्मा ने बटोरा होगा
अपने आँचल में घर भराई का चावल
और तुम मेरी मेज पर सजा रहे होगे मेरी ही किताब
फ्रेम में लगी मेरी फोटो मुस्करा रही होगी
और तुम भाई???

तुम्हारी बेसुधी 

आती है तुम्हारे होने की गंध
रात के तीसरे पहर में

मेरी देह पर
उगते हैं तुम्हारे नाख़ून

टीसते जख्म को सुलाती हूं
पलकों के किवाड जोर से लगाती हूं

रौदें सपनों को
सहला जाती है भोर की ओस

मैंने पहन लिया है नया सवेरा
तुम रोज जैसे बेसुध हो अबतक…

चलो 

चलो, सोने से पहले जागते हैं
चाँद के चरखे पर
मुहब्बत का सूत कातते हैं…

मुँह उठाये पहाड़ों को
पहना आते हैं बरफ़ की सफ़ेद टोपी
नदियों की शोखी को
किनारों से बाँध आते हैं

हवा में बिखेर देते हैं
तमाम सवाल मलाल
सडकों को तेज दौड़ाते हैं

रोजी रोटी कपडे की
फिक्र को उघने देते है

कुछ देर अपने मन को भी
जीने देते हैं

उधड़े सपनों को
सीने देते हैं…

मेरा होना 

मैं साथ हूँ उसके
मुझे होना ही चाहिए
ये तय किया सबने मिलकर

मैंने सहा
जो मुझे नही लगा भला कभी
पर उसका हक था
मैं हासिल थी

रातों की देह पर जमने लगी
सावली परतों को उधेडती
उजालों की नज्म को
अपने अंदर बेसुरा होते सुनती

घर को संभालना था
अपने डगमगाते इरादों से
वो भी किया

उसके लिजलिजे इरादों की बली चढ़ी
व्रत उपवास करती हैं सुहागिने
मैंने भी किया

थोपने को रिवाज बना लिया
जो ना करवाना था
वो भी करवा लिया
पाप पुण्य के चक्र में
इस जनम उस जनम के खौफ ने

मैंने बेच दिया अपना होना
तुमने खरीद लिया…

कमाल हैं लड़कियां दीवारों के पीछे छुपी महलों को सुई धागों में बाँध लेती है

हमें कौन सा विषय पढ़ना चाहिए
का फैसला हमारे घर के आँगन में बैठ
घर वालो ने कर दिया
हमे तीन विषय में ढाला गया
समाज शास्त्र
हम पढ़ते रहे कैसे कैसे समाज बदला
युगों कालों समय के साथ
किताबों के पन्ने भरे थे
हम उसी समाज में अपनी सुरक्षा में
नंगे हाथ खड़े थे
तुम नियमों के हथियार से हमें
अपने अनुसार तरास रहे थे
हम किताब का समाज शास्त्र पढ़ रहे थे
दूसरा गृह विज्ञान था
मेरा अपना ही घर मेरी चाहत से अनजान था
मैंने दर्शन शास्त्र के ऊपर से अपनी ऊँगली मोड़ ली थी
और गृह विज्ञान की हो गई थी
घर रहन सहन पाक कला के पन्ने ही नही पलटे गए
बाकायदा गेहूं के पिसे जाने से गरम तवे तक का
सफ़र तय किया
पहली बार आग की भाषा समझी
नमक से नजरें मिलाई
मीठे डब्बों में वन्द किये अपने तमाम करतब
तुम्हारी जुबान पर मुस्कराई
मैंने गृह विज्ञान की सारी रस्में निभाई
तुमने सबसे आसान विषय चुना हिंदी
तुम्हे पता ही नही था
तुमने कौन से सपने की डोर मेरी हाथ में थमाई
मैं पहली बार मुस्कराई
रेत को डोरियों पर सुखाने का सुख तुम जान भी नही सकते
हम रश्मि रथी लेकर सोने लगे
हम सरोज स्मृति में आँखे भिंगोने लगे
हम बिहारी की नायिका बन गढ़ते कितने रूप
हम कालिदास के पागल प्रेम में बादल बनने लगे
परियों की कहानियां हमसे ही होकर गुजरी
हमारी गुम हुई चप्पल को लेकर चल पड़ा होगा
वो सुदर्शन राजकुमार
एक पैर की हकीकत वाली चप्पल पर आज भी खड़े हैं
सपनों की खातिर सपनों से लड़े हैं
आँगन के ठीक बीच बैठकर तुम आज भी तय कर रहे हो हमारे विषय
हम उनमे से ही कोई धागा उठा कर रंग बुन लेते हैं
हम खिड़की को आसमान ख्वाब को इतराता चाँद
और इन्तजार को सुदर्शन राजकुमार की बेचैनी में छोड़ आये हैं
अभी अभी हमने अग्रेजी और दर्शन शाश्त्र पर ऊँगली रखी देखना ये भी पढ़ जायेंगे कभी
की हम जानते हैं मुशिकल से चुभती रात हो जब
फूलों वाली चादर बिछाने का हुनर
चादरों पर मोर सावन बादल टांक आते हैं
तुम जब भी तय करते हो विषय
हम आँगन में चुपके से झाँक आते हैं…

समय निर्दयी है और उदासी बेहद निजी

इंतज़ार को नही पता तारीखें बदल रही तेजी से…..….
जब डोंगियों में भरी जा रही होगी रेत
पेड़ों को नंगा कर रहे होंगे लोग
जगह जगह से सूखी नदियों को बाँधा जा रहा होगा
जब आसमान औंधे मुंह गिरा होगा एक गढढे मे
तितलियों के पंखो से रंग उड़ गये होंगे
चिड़िया चोंच खोले अदृश्य दाना पानी का आवाहन कर रही होगी
आखिरी सांस की बात पर किसी का दिल ना पसीजेगा
ऐसे समय में प्रेम करने वाली स्त्री के हाथ से छिन ली जाएँगी गुलाबी चिठ्ठियां
उसकी आँख में धडकते इन्तजार का स्वर मर जायेगा
बुझे आईने में दम तोडती औरत बस एक सवाल छोड़ जाएगी
सारी विपरीत स्थितियों में उसने एक बार अपने हिस्से का प्यार ही तो माँगा था
बहुत बड़े पहाड़ के नीचे सांस लेती एक प्रेम कहानी
जिसे कभी किसी ने नही लिखा ना सुना ना कहा
सब डोंगियों में रेत भर रहे हैं…

कितना दुखद है

कितना दुखद है
पांच फूल
पांच फल
पांच रंग
पांच चिड़िया
का नाम पूछो
तो बच्चा रोटी बोले
शहरो के नाम पर
टेढ़ी पीठ पर गाँव का बंजर ढोने लगे
बच्चा सो रहा हो
पर बाप चेहरा देख रोने लगे
एक नन्ही हथेली हमारे कार का शीशा धोने लगे
पसरी हथेली पर सिक्के भर भूख हम छोड़ जाएँ
कितना दुखद है न
ये बच्चे अचानक गायब हो जायँ
कोई आँख भर आंसू भी न भरे
जिन्हें जिंदगी भी न मिली
उनका अंतिम संस्कार भी कोई क्यों करे
कितना दुखद हैं
बड़ी झालरों की दूकान के बाहर
जलती धूप में
नन्ही सी लड़की मिट्टी के दीये लिए जले
दुःख तो इतने कि आँख भी न मिला पाऊं
तो बस मन को भरमाते हैं
प्रेम लिखते ही पूरब सोने सा चमक उठा
परिन्दे आकाश नांप रहे
मैं जानती हूँ झूठी मुस्कराहट की चुभन
अपने ही भरम पर
भरी आँख में बून्द बून्द झालर काँप रहे…

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