शैलेश मटियानी की रचनाएँ

राष्ट्र-ध्वजा का प्रश्न

प्रश्न पूछती
फिरती सबसे
राष्ट्र-ध्वजा इस देश की-
‘तुमको ममता
मेरी ज़्यादा है,
या अपनी देह की?

क्या उत्तर दोगे
तुम अपनी
आने वाली पीढ़ी को-
अपने
जीने की ख़ातिर यदि
मेरी इज़्ज़त बेच दी ?’

नया इतिहास

अभय होकर
बहे गंगा,
हमें विश्वास देना है
हिमालय को
शहादत से
धुला आकाश देना है !

हमारी
शांतिप्रियता का
नहीं है अर्थ कायरता-
हमें फिर
ख़ून से लिखकर
नया इतिहास देना है !

लेखनी धर्म 

शांति से
रक्षा न हो,
तो युद्ध में
अनुरक्ति दे

लेखनी का
धर्म है,
युग-सत्य को
अभिव्यक्ति दे !

छंद-भाषा-भावना
माध्यम बने
उद्घोष का

संकटों से
प्राण-पण से
जूझने की शक्ति दे !

संकल्प

गीत को
उगते हुए
सूरज-सरीखे छंद दो
शौर्य को फिर
शत्रु की
हुंकार का अनुबंध दो ।

प्राण रहते
तो न देंगे
भूमि तिल-भर देश की
फिर
भुजाओं को नए
संकल्प-रक्षाबंध दो !

खंडित सपन 

खंडित हुआ
ख़ुद ही सपन,
तो नयन आधार क्या दें
नक्षत्र टूटा स्वयं,
तो फिर गगन आधार क्या दे

जब स्वयं माता तुम्हारी ही
डस गई ज्यों सर्प-सी
तब कौन
तपते भाल पर
चंदन–तिलक-सा प्यार दो !

दर्द

होंठ हँसते हैं,
मगर मन तो दहा जाता है
सत्य को इस तरह
सपनों से कहा जाता है ।

खुद ही सहने की जब
सामर्थ्य नहीं रह जाती
दर्द उस रोज़ ही
अपनों से कहा जाता है !

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