श्यामनन्दन किशोर की रचनाएँ

मैं मधुर भी, तिक्त भी हूँ 

मैं मधुर भी, तिक्त भी हूँ।

थपकियों से आज झंझा
के भले ही दीप मेरा
बुझ रहा है, और पथ में,
जा रहा छाये अँधेरा।

पर न है परवाह कुछ भी,
और कुछ भी ग़म नहीं है
ज्योति दीपक को, तिमिर को,
पथ की पहचान दी है।

मैं लुटा सर्वस्व-संचित
पूर्ण भी हूँ, रिक्त भी हूँ
मैं मधुर भी, तिक्त भी हूँ।।

अग्नि-कण को फूँक कर,
ज्वाला बुझाई जा रही है
अश्रु दे दॄग में, जलन,
उर की मिटाई जा रही है।

इस सुलभ वरदान को मैं,
क्यों नहीं अभिशाप समझूँ?
मैं न क्यों इस सजल घन से,
है बरसता ताप समझूँ?
मैं मरूँ क्या, मैं जिऊँ क्या,
शुष्क भी हूँ, सिक्त भी हूँ
मैं मधुर भी, तिक्त भी हूँ।।

मैं तुम्हारे प्राण के यदि,
अंक में तो क्या हुआ रे?
है मनोरम कमल बसता
पंक में तो क्या हुआ रे?
मैं तुम्हारे जाल में पड़
बद्ध भी हूँ, मुक्त भी हूँ
मैं मधुर भी, तिक्त भी हूँ।।

चीख उठा भगवान 

चीख उठा मन्दिर की कारा से बन्दी भगवान-
पूजित होने दो पत्थर की जगह नया इन्सान,

जगत का होने दो कल्याण।

मुक्त करो, अभियुक्त न हूँ, इन काली दीवारों से
और न अब गुमराह करो तुम श्रद्धा से, प्यारों से
ओ मंदिर-मस्जिद के तक्षक, ठेकेदार धरम के
करो स्वर्ग की पापभूमि पर मिट्टी का आह्वान,

जगत का होने दो कल्याण।

मुझ पर नये सिंगार, न ढँक पाती जब मनु की लाज
मुझको भोग हज़ार, क्षुधा से मरता रहा समाज
बन्द करो, अब सहा न जाता मुझसे अत्याचार
बन्द करो, अब पत्थर पर तुम फूलों का बलिदान,

जगत का होने दो कल्याण।

मंदिर का आंगन है जमघट लोभी का, वंचक का
महा अस्त्र है धर्म बन गया अन्यायी, शोषक का
कब तक बेच कफन मानव का, मूर्ति सजाओगे तुम,
कब तक चाँदी के टुकड़ों पर बेचोगे ईमान?

जगत का होने दो कल्याण।

एक नया इन्सान भेद की कारा जो तोड़ेगा-
जो मिट्टी की शुचि काया में ही देवेत्व भरेगा
ओ मेरे गुमनाम विधाता, ओ मानव संतान
शिल्पकार अब बंद करो तुम प्रतिमा का निर्माण,

जगत का होने दो कल्याण।

क्षुद्र की महिमा

शुद्ध सोना क्यों बनाया प्रभु मुझे तुमने,
कुछ मिलावट चाहिए गलहार होने के लिए।

जो मिला तुममें, भला क्या
भिन्नता का स्वाद जाने,
जो नियम में बँध गया,
वह क्या भला अपवाद जाने!

जो रहा समकक्ष करुणा की मिली कब छाँह उसको,
कुछ गिरावट चाहिए उद्धार होने के लिए!

जो अजन्मा हैं, उन्हें इस
इन्द्रधनुषी विश्व से सम्बन्ध क्या!
जो न पीड़ा झेल पाएँ स्वयं,
दूसरों के लिए उनको द्वन्द्व क्या!

एक स्रष्टा शून्य को शृंगार सकता है,
मोह कुछ तो चाहिए साकार होने के लिए!

क्या निदाध नहीं प्रवासी बादलों से
खींच सावन-धार लाता है!
निर्झरों के पत्थरों पर गीत लिक्खे
क्या नहीं फेनिल, मधुर संघर्ष गाता है!

हैं अभाव जहाँ, वहीं हैं भाव दुर्लभ
कुछ विकर्षण चाहिए ही प्यार होने के लिए!

(23.9.1974)

कहीं गरजे कहीं बरसे

बहुत दिन तक बड़ी उम्मीद से देखा तुम्हें जलधर,
मगर क्या बात है ऐसी, कहीं गरजे कहीं बरसे।

जवानी पूछती मुझसे बुढ़ापे की कसम देकर,
कहो क्यों पूजते पत्थर रहे तुम देवता कहकर।

कहीं तो शोख सागर है, मचलता भूल मर्यादा,
कहीं कोई अभागिन चातकी दो बूँद को तरसे।

किसी निष्ठुर हृदय की याद आती जब निशानी की,
मुझे तब याद आती है कहानी आग-पानी की।

किसी उस्ताद तीरन्दाज़ के पाले पड़ा जीवन,
निशाने साधता दो-दो पुराने एक ही शर से।

नहीं जो मंदिरों में है, वही केवल पुजारी है,
सभी को बाँटता जो है, कहीं वह भी भिखारी है।

प्रतीक्षा में जगा जो भोर तक तारा, मिटा-डूबा
जगाता पर अरूण सोए कमल-दल को किरण-कर से।

अन्तरंग 

ये तिरस्कार, ये पुरस्कार
दोनों ही माता के दुलार।

दोनों मिलते हैं अकस्मात
दोनों लाते हैं अश्रुपात
दोनों में साँसों का चढ़ाव
दोनों में साँसों का उतार।

ये तिरस्कार मरू की ज्वाला
जो रचती मेघ-खण्ड-माला
ये तिरस्कार तीव्रानुभूति
रचती ज्वलन्त साहित्यकार।

ये पुरस्कार कण्टकाकीर्ण
साधना बनाते ज़रा-जीर्ण
दो चार बढ़ाते आलोचक
दो चार बनाते समाचार।

ये तिरस्कार ये पुरस्कार
दोनों ही माता की पुकार
दोनों में झंकृत होता है
माँ की वीणा का तार-तार।

कफन फाड़कर मुर्दा बोला

चमड़ी मिली खुदा के घर से
दमड़ी नहीं समाज दे सका
गजभर भी न वसन ढँकने को
निर्दय उभरी लाज दे सका

मुखड़ा सटक गया घुटनों में
अटक कंठ में प्राण रह गये
सिकुड़ गया तन जैसे मन में
सिकुड़े सब अरमान रह गये

मिली आग लेकिन न भाग्य-सा
जलने को जुट पाया इंधन
दाँतों के मिस प्रकट हो गया
मेरा कठिन शिशिर का क्रन्दन

किन्तु अचानक लगा कि यह,
संसार बड़ा दिलदार हो गया
जीने पर दुत्कार मिली थी
मरने पर उपकार हो गया

श्वेत माँग-सी विधवा की,
चदरी कोई इन्सान दे गया
और दूसरा बिन माँगे ही
ढेर लकड़ियाँ दान दे गया

वस्त्र मिल गया, ठंड मिट गयी,
धन्य हुआ मानव का चोला
कफन फाड़कर मुर्दा बोला।

कहते मरे रहीम न लेकिन,
पेट-पीठ मिल एक हो सके
नहीं अश्रु से आज तलक हम,
अमिट क्षुधा का दाग धो सके

खाने को कुछ मिला नहीं सो,
खाने को ग़म मिले हज़ारों
श्री-सम्पन्न नगर ग्रामों में
भूखे-बेदम मिले हज़ारों

दाने-दाने पर पाने वाले
का सुनता नाम लिखा है
किन्तु देखता हूँ इन पर,
ऊँचा से ऊँचा दाम लिखा है

दास मलूका से पूछो क्या,
‘सबके दाता राम’ लिखा है?
या कि गरीबों की खातिर,
भूखों मरना अंजाम लिखा है?

किन्तु अचानक लगा कि यह,
संसार बड़ा दिलदार हो गया
जीने पर दुत्कार मिली थी
मरने पर उपकार हो गया।

जुटा-जुटा कर रेजगारियाँ,
भोज मनाने बन्धु चल पड़े
जहाँ न कल थी बूँद दीखती,
वहाँ उमड़ते सिन्धु चल पड़े

निर्धन के घर हाथ सुखाते,
नहीं किसी का अन्तर डोला
कफ़न फाड़कर मुर्दा बोला।

घरवालों से, आस-पास से,
मैंने केवल दो कण माँगा
किन्तु मिला कुछ नहीं और
मैं बे-पानी ही मरा अभागा

जीते-जी तो नल के जल से,
भी अभिषेक किया न किसी ने
रहा अपेक्षित, सदा निरादृत
कुछ भी ध्यान दिया न किसी ने

बाप तरसता रहा कि बेटा,
श्रद्धा से दो घूँट पिला दे
स्नेह-लता जो सूख रही है
ज़रा प्यार से उसे जिला दे

कहाँ श्रवण? युग के दशरथ ने,
एक-एक को मार गिराया
मन-मृग भोला रहा भटकता,
निकली सब कुछ लू की माया

किन्तु अचानक लगा कि यह,
घर-बार बड़ा दिलदार हो गया
जीने पर दुत्कार मिली थी,
मरने पर उपकार हो गया

आश्चर्य वे बेटे देते,
पूर्व-पुरूष को नियमित तर्पण
नमक-तेल रोटी क्या देना,
कर न सके जो आत्म-समर्पण!

जाऊँ कहाँ, न जगह नरक में,
और स्वर्ग के द्वार न खोला!
कफ़न फाड़कर मुर्दा बोला।

तुम

तुम खुले नयन के सपने हो!

जब सो जातीं बरसात लिये ये आँखें,
जब शिथिल वेदना की हो जातीं पाँखें,
तब मेरी ही कल्पना मनोरम रूप तुम्हार धर कर
आती रँग जाता कनक-रंग में अम्बर!

सोते-जगते भूलती नहीं छवि जिसकी,
तुम वही प्राण के प्रिय मेरे अपने हो!

तुम आते, मेरे प्राण विकल हो जाते!
तुम जाते, मेरे गान सजल हो आते!
तुम आते-जाते, घर सूना का सूना!
तुम रहते, फिर भी दुख दूना का दूना!

है जिसका पता न कब गरजे, कब बरसे,
तुम वही मेघ सावन के सजल घने हो!

(1949)

याचना

तुम मुझे स्वर दो, तुम्हारे मर्म को मैं गान दूँगा!

पा मधुर यौवन मदिर मधु-
मास ने तरु-तृण सजाया!
कोकिला ने हूक भर, दिश
को मुखर, मंजुल बनाया!
तुम रचो मृदुरूप, प्रिय उस रूप को मैं प्राण दूँगा!

दीप निशि भर मुग्ध, पागल
प्राण को छलता रहेगा!
पर शलभ उस लौ-लपट में
मूक ही जलता रहेगा!
तुम मुझे दो यातना, मैं प्रेम की पहिचान दूँगा!

निशि विरह की कालिमा
में अश्रु के मोती बहाती,
अरुणिमा जिसको किरण-
कर से उठा निज को सजाती!
तुम मुझे तम दो, तुम्हें मैं सुखद स्वर्ण विहान दूँगा!

(17.8.48)

प्रतिदान

प्यार करता हूँ, कि तुमसे पा सकूँ मैं पीर!
पीर, जिसके घात से
बजते हृदय के तार!
तार, जिससे फूटती है
गीत की झंकार!
सींचने को मैं जलन का बाग
इसलिए ही माँगता दो बूँद दृग में नीर!
जीत उसकी है, कि जल
करभी रहा जो मौन!
व्यर्थ सुख की आस से
जीवन गँवाये कौन?
जान पाऊँ मैं कसक की अमिट-कीमत को,
इसलिए लो माँगता कोमल हृदय पर तीर!
जानता है चाँद से कुछ
मिल न सकता प्यार!
इसलिए ही चुग रहा
युग से चकोर अंगार!
प्यास अपनी रेत पर जाकर मिटाने की,
जानता है दर्द की मीठी दवा अक्सीर!

(6.6.46)

कैसे हाल लिखूँ अपना रे 

कैसे हाल लिखूँ अपना रे!
तब सपनों से भरी नींद थी
अब खुद नींद हुई सपना रे!

हलचल में मन सो जाता है
पर सूने में घबड़ाता है
दिन में सूरज एक जलाता
किन्तु रात में अगणित तारे!

पत्थर जल पर तर जाता है
दंश सर्प का झड़ जाता है
किन्तु डँसा तो गया अमृत से
उसके विष को कौन उतारे!

जाकर दूर, पास तुम आई
मधुर दूर से ज्यों शहनाई
परदेशी दिन-रैन बन गया
और प्राण परदेश बना रे!

जग क्या पाया, सो क्या खोया
रो-रो हँसा, कि हँस-हँस रोया
बहुत देर तक जगना-सोना
दीनों करते दृग रतनारे!

(16.6.46)

मैं 

मैं पावस की सन्ध्या कातर!
उमस में मेरी विह्वलता।

विद्युत में मन मेरा जलता।
किन्तु नयन के कोरों से है

उमड़ रहा करुणा का सागर!
विकल जवानी बेसुध प्यासी।

प्राणों में है घोर उदासी।
गरज-गरज कर रहा मुखर क्यों

आज वेदना मेरी अम्बर?
चीर असीम तिमिर की कारा,
एक दीप मृदु हारा-हारा
क्रूर हवा के झोंकों से बच
पंथ रहा मेरा ज्योतितकर!
कौन सुदूर नदी के तट पर

बैठ फूँकता वंशी में स्वर
सुन जिसको हो रहा शिथिल तन
और हृदय आता मेरा भर!

(10.9.46)

दुख को मैं तो साध रहा हूँ 

दुख को मैं तो साध रहा हूँ!
आँसू से अपने यौवन को
हलचल धीमे बाँध रहा हूँ!

टूट चुके हैं सपने सारे।
छूट चुके हैं अपने प्यारे।
पर दुख-दर्द भुला लेने को
ढोता उनकी याद रहा हूँ!

जगने कब समझा-पहिचाना
पतझर में कोकिल का गाना?
एकाकी सूनेपन से ही
कर जीवन आबाद रहा हूँ!

मरु में सागर लहराने को,
प्रतिध्वनि से जी बहलाने को,
जान-बूझकर पाषाणी से
मैं करता फरियाद रहा हूँ!

(1949)

ऐसा निर्मम प्राण न देखा

ऐसा निर्मम प्राण न देखा!
जिससे प्रतिध्वनि भी न निकलती,
प्रिय, वह तो पाषाण न देखा!

तुम केवल लय-ताल चाहते।
गाकर मन की पीर थाहते।

जो गायक को गीत बना दे,
वैसा स्वर-सन्धान न देखा!

मेरी प्रीत मिलन का सपना।
मेरी जीत जलन का तपना।

जिससे शूल फूल बन जाये,
रे, वह तो वरदान न देखा!

जीवन-गगन 

निर्धूम गगन-सा मैं जलता!
जब सो जातीं जग की आँखें;
मन आँसू बन चुपके ढलता!

सबने इसको मधुज्योति कहा,
लेकिन किसने समझा छाला?
है दाग दर्द का सीने पर,
जग कहता, ‘तारों की माला’

होती है जिसकी प्रकट जलन
बनकर बिजली की चंचलता!
निर्धूम गगन-सा मैं जलता!

मेरी आहें बनकर बदली
अन्तस्तल पर छातीं हरदम,
जिनके रन्ध्रों से फूट पड़े,
ये दुर्दिन के कोमल सरगम;

जिसकी करुणा में मूक भरी
मेरे जीवन की आर्द्र कथा!
निर्धूम गगन-सा मैं जलता!

हरगिज न प्रकट होता जल बन
मेरी आँखों का सावन-घन,
यदि जल-जलकर बेकल न हुआ
होता भूतल का मृदु यौवन!
औरों के दुख में ही फूटा
करती है मेरी दुर्बलता!
निर्धूम गगन-सा मैं जलता!

(17.9.1947)

तुम्हारे नयनों की बरसात

तुम्हारे नयनों की बरसात।
रिम-झिम, पल-छिन, बरस रही जो,
बे-मौसम दिन-रात।
उठती आकुल आह धुआँ बन,
घिरता प्राणों का गगनांगन।
प्रिय की सुधि बन चमकी बिजली
सिहरे पुलकिन गात।

जीवन का सिर कितना पंकिल,
जिसमें चुपके से जाता खिल,
करुणा-सा शुचि, दुख-सा सुन्दर
यौवन का जल-जात!

तिमिर विरह का विकल शून्य क्षण।
क्रन्दन, जैसे नभ का गर्जन।
दो उसाँस से चलती रह-रह
थर-थर कम्पित वात।

(11.5.48)

अश्रु के पट पर कहानी मौन मेरी 

अश्रु के पट पर कहानी मौन मेरी।
दर्द की हद से कि वाणी मौन मेरी।

आह में तो जल चुकी मेरी हँसी है।
और जीभर रो न पाता, बेबसी है।
विरह की निर्मम चिताओं पर निरन्तर
सुलग कर भी है जवानी मौन मेरी।

नयन मिलने को व्यथित, स्वप्निल सजल है।
चरण बढ़ने को थकित पल-पल विकल है।
किन्तु, चारों ओर तम है, विजनवन है,
और मंजिल की निशानी मौन मेरी।

तुम मेरे सपनों को छूकर

तुम मेरे सपनों को छूकर
साकार बना दो, तो जानूँ!

आँसू से अपने यौवन का
निष्ठुर शृंगार सजाता हूँ।

मैं अपनी पीर भुलाने को
जगती को गीत सुनाता हूँ।

पाषाणी भी हिल जाती है
जब मेरा स्वर लहराता है;

पर मेरे दिल का घाव कठिन
पहिचान न कोई पाता है।

दुख के इस सागर में निर्मम
मुझको न किनारा मिल पाया।

अब तलक-तुनुक तिनकों का भी
कब हाय सहारा मिल पाया!

तुम लहरों को ही नौका की
पतवार बना दो, तो जानूँ।

जवानी और जमाना

जवानी-जिनके-जिनके पास,
जमाना – उनसे-उनसे दूर।

जवानी-मस्ती, हँसती जलन।
जवानी-दो प्राणों का मिलन।
जवानी-हास, जवानी-रुदन।
जवानी-तन-मन का संतुलन।

जमाना-विधुर हृदय सुनसान,
जवानी का अश्रय सिन्दूर।

जवानी-पढ़ती नहीं कुरान।
जवानी-पढ़ती कभी न वेद।
जवानी-मलयानिल की लहर
मिटाती-शूल-फूल का भेद।

जमाना-रहा बाँटता ज्ञान,
जवानी-देती रही सुरूर!

जवानी-जलता हुआ चिराग।
जवानी-उड़ता हुआ पराग।
महल-कुटिये पर एक समान
जवानी-पूनो की मुस्कान।

जमाना-सादा जुटाता रहा,
जवानी-लुटने को मजबूर

जवानी-लहरों की झकझोर।
जवानी-चढ़ी उमर का भोर।
बदलती रहती धार-कछार,
जवानी-है गंगा की बाढ़।

जमाना-शिथिल नसों का खून।
जवानी-ताकत है भरपूर।

जवानी- जीवन का जलजात।
जवानी- दो नयनों की बात।
जवानी- है पीड़ा का मीत।
दिवानी मीरा का संगीत।

जवानी-तन से मन से मोम,
जमाना- सादा-सदा से क्रूर।
जवानी जिनके-जिनके पास
जमाना उनसे-उनसे दूर।

जवानी- जिनके-जिनके पास
जमाना- उनका-उनका दास।

जवानी- लिये कफन का हार।
जवानी- तलवारों की धार।
जवानी- पत्थर का अंगार।

जमाना के पन्नों पर रोज
जवानी लिखती है इतिहास।

जवानी- बरसाती तूफान।
जवानी- महाप्रलय का गान।
जवानी- अपना देकर खाद
जमाना करती है आबाद।

जमाना लहराता है सदा
जवानी का लेकर मधुमास!

जवानी- नयी उमंग, उबाल।
जवानी- खूँ की चुनरी लाल।
जवानी- जीवन की दुपहरी।
जवानी- मँझधारों की तरी।

जमाना का डगमग-सा पाँव,
जवानी भरती है विश्वास।

जवानी-मिट्टी का ईमान।
जवानी-राणा का अभिमान।
जवानी-सहज, कठिन बलिदान।
जवानी-शंकर का विषपान।

जमाना को तिल-तिल जल मौन
जवानी देती रही प्रकाश।
जवानी- करती शान्ति-प्रदान।
जवानी- करती क्रान्ति-विधान,
देखकर युग का तिमिर-वितान।
जवानी- लाती नया विहान।

जमाना करने को निर्माण,
जवानी करती रही विनाश।
जवानी-जिनके-जिनके पास,
जमाना- उनसे-उनसे दूर,
जमाना- उनका-उनका दास।

युग और गाँधी

तुम, रहे, मृतक मानवता
में बन जीवन!
तुम, गये, काल की आँखों
का पानी बन!

बापू, तुम आये भूपर
स्वर्ग बसाने?
या, दानवता पर
स्वयं भेंट चढ़ जाने?

हे, अन्धे युग के मलिन
मर्म के दीपक!
हे, ममता के शृंगार,
सत्य के रूपक!

तुम, नीलकंठ, पी घृणा-
द्वेष – हालाहल!
तुम, दलित जनों की
कठिन मुक्ति के सम्बल!

तुम, मानवता के तुंग
शिखर शुचि, सुन्दर,
निकले जिससे शत-शत
करुणा के निर्झर!

फोड़ते युगों के जड़
प्रस्तर अति दृढ़तर,
बह रहे बनाते कोटि
शुष्क उर उर्वर!

तुम, प्रकट हुए आर्त्तों
की मृदु वाणी से!
तुम, बने आह-दुख
के माटी-पानी से!

तुम, कलाकार, तुम
नवयुग के निर्माता!
हो गया धन्य रच
तुमको स्वयं विधाता!

‘मोहन’, वियोग में
लुटी ‘शान्ति’ की ‘राधा’!
तुम, राम-राज्य के
सपनों की मर्यादा!

(10.11.48)

जब तलक तुम पास, यौवन दास मेरा

जब तलक तुम पास, यौवन दास मेरा!
राम जाने क्या पिलाया जाम तुमने
जो रखा मदहोश आठों याम तुमने!
तुम पवन-सा व्याप्त होकर चूमने दो!
बाँह में अपनी लहर-सा झूमने दो!
हे धरा मेरी रंगीली चिर निवेली
हे सितारों से जवाँ आकाश मेरा!

प्राण, संगति में तुम्हारी बन गया है
सिमट पूरा वर्ष ही मधुमास मेरा!

तुम जरा बोली, सुधा में ज्वार लाई
तुम हँसीं नंदन विपिन में लाज छाई!
तुम मिलीं जब से, कहीं ऊपर गगन के
स्वर्ग सुख का उठ गया विश्वास मेरा।

तृप्ति के उत्तप्त भर की प्यास हूँ मैं,
छोड़ जग आया तुम्हारे पास हूँ मैं
है तुम्हारी गोद में हरद्वार, काशी
है तुम्हारी बाँह में संन्यास मेरा!

(14.5.51)

सुलगी-सुलगी-सी दुपहरिया

सुलगी-सुलगी-सी दुपहरिया, बुझी-बुझी-सी शाम!
और धुँआती रात, प्रात का होगा क्या अंजाम!

गाहे-गाहे याद तुम्हारी आ जाती है, मीत!
अनचाहे भी गाना पड़ता, आह, तुम्हारा गीत!

मुझको देख उदास द्वार का खिला गुलमुहर कहता-
कवि तो मेरी तरह विहँसकर गीतों में है दहता!

जैसे-जैसे दिन है जलता, यह गुलमुहर निखरता चलता-
पीड़ाओं के दामन में ही देखो मेरा गीत मचलता!

अमलतास में झुमके लटके देख तुम्हें ही प्राण,
सहज लचीली डाल, तुम्हारा हो जाता है ध्यान!

गहन हल्दिया रंग तुम्हारा, अमलतास को कितना प्यारा-
खड़ा धूप में सँवरा-सँवरा करता किसे इशारा!

दुःख दर्दों के गलियारे में प्यारे बने अतीत-
वर्तमान के अँधियारे में तारे बने अतीत!

और रात की याद मालती उकसा देती है,
जब हँस उजली कली पवन का चुम्बन लेती है।

वही मालती हुई दिवस में लाल लाज के मारे-
जैसे कवि के व्रण कर देते गीतों को रतनारे!

क्या जाने क्यों लाज प्यार का साज छेड़ देती है-
नया जमाना, दुनिया बदली, मगर नहीं यह रीत!

नयी दुल्हन की चुनरी की अँचरी-सी तुम हँसती हो,
हरदम रहती पास, दूर चाहे जितनी बसती हो!

जब-जब पीड़ा मुझे डंक बेतरह चुभोती है,
लगता, आ चुपचाप सिरहाने कोई रोती है!

बहुत सुखों के बीच याद कुछ मेरी आती होगी,
लाशों को भी ढो लेती ज्यों गंगाधार पुनीत!

किसको इतना समय कि, पगले, घाव दिखाओगे तुम,
किसको इतना समय कि अपने गीत सुनाओगे तुम।

मुखड़ा को दुखड़ा का दर्पण मत बन जाने दो,
कटे हार की फसल सुहानी, बने याद जब जीत!

सपन पुराना खुले नयन में कभी-कभी आ जाता,
जैसे पुरवैया का झोंका आँचल को सरकाता!

दिवस-निशा का उजला-काला, समय-विहग दो पंखों वाला
जाने कहाँ उड़ा जाता है बिना रुके मतवाला!

जो है उसका कौन भरोसा, क्या भविष्य का लेखा-जोखा,
उमर सुहानी उतनी समझो जितनी जाये बीत!

राही और मंजिल

उषा में ही क्यों तुम निरुपाय,
हार कर थक बैठे चुप हाय?

मुसाफिर, चलना ही है तुम्हें अभी तो रातें बाकी हैं!

देखकर तुम काँटों के ताज,
फूल से हो नाहक नाराज।
जानते तुम इतना भी नहीं-
प्यार को है पीड़ा पर नाज!

उँगलियों की थोड़ी-सी चुभन बना देती तुमको बेज़ार,
अश्रु मधुऋतु में ही झड़ रहे, अभी बरसातें बाकी हैं।
-अभी तो रातें बाकी हैं!

बताता है नयनों का नीर,
चुभे हैं कहीं हृदय में तीर।
मगर, क्यों इतने में कह रहे
कि दुनिया सपनों की तस्वीर?

जरा-सा कम्पन पाते ही, किया तारों ने हाहाकार,
अभी तो मन की वीणा पर निष्ठुर कुछ घातें बाकी हैं!
-अभी तो रातें बाकी हैं।

अगर जाना है तुमको पार
बहुत है तिनके का आधार;
और, मत सोचो मेरे मीत,
कहेगा क्या तट से संसार!

जरा-सी चली मलय की झोंक, तुम्हारी डगमग डोली नाव;
अभी तो कहता है आकाश, प्रलय की रातें बाकी हैं!
-बहुत-सी बातें बाकी हैं!

(5.5.53)

कहीं गरजे, कहीं बरसे

बहुत दिन तक बड़ी उम्मीद से देखा तुम्हें जलधर,
मगर क्या बात है ऐसी, कहीं गरजे, कहीं बरसे।

जवानी पूछती मुझसे बुढ़ापे की कसम देकर
कहो, क्यों पूजते पत्थर रहे तुम देवता कहकर!

कहीं तो शोख सागर है मचलता भूल मर्यादा,
कहीं कोई अभागिन चातकी दो बूँद को तरसे!

किसी निष्ठुर हृदय की याद आती जब निशानी की,
मुझे तब याद आती है कहानी आग-पानी की।

किसी उस्ताद तीरन्दाज के पाले पड़ा जीवन,
निशाने साधता दो-दो पुराने एक ही शर से।

नहीं जो मन्दिरों में है, वही केवल पुजारी है,
सभी को बाँटता जो है, कहीं वह भी भिखारी है।

प्रतीक्षा में जगा जो भोर तक तारा, मिटा-डूबा
जगाता पर अरुण सोए कमलदल को किरण-कर से!

डोली उठा सुहागिन की

डोली उठा सुहागिन की यों बोले चार कहार विचार-
रोयेंगे जो रह जायेंगे, जानेवाला जायेगा,
फिर से लौट न पायेगा!

जगत जुआ का खेल पुराना,
पर बाजी का भेद नया।
हार गया जो सबकुछ जीता-
जीता, जो सब हार गया।

यह दुनिया ऐसी महफिल है जहाँ अँधेरे में रौशन
तड़पेंगे जो सुनने आये, गानेवाला जायेगा,
फिर से लौट न पायेगा!

दो दिन के झूठे ममतावश
घर में परदेशी बालम।
पाँच तार की वीणा पर है
झूम रहा सारा आलम।

ऊँचे चाल-चलन की साड़ी, घूँघट की कुलवन्ती नारी
रह जाएगी, पर निर्लज कहलानेवाला जायेगा,
फिर से लौट न पायेगा!

जब तक रहता पास पथिक,
भूलों पर रखते लोग नजर।
पर जब जाता, भूलों पर भी
उसकी आता प्यार उमड़!

रतना की निंदिया खुलती-जब तुलसीदास चले जाते,
रह जायेंगे पथ-दर्शक, भरमानेवाला जायेगा,
फिर से लौट न पायेगा।

दूर गगन की छोड़ अटरिया
जो बूँदें आतीं भू पर,
पाकर उन्हें उमड़ आता है
प्यासी नदियों का अन्तर!

वे बूँदें ही किरणों के रथ पर चढ़कर यों कह जातीं,
रह जायेंगे पानेवाले, लानेवाला जायेगा,
फिर से लौट न पायेगा।

तुम जाओगे, कम न यहाँ का
हो पाएगा रमन-चमन
तुम्हें भुला देंगे सब जैसे
भोर तलक हर रोज सपन।

मोम बना हिमवानों को पश्चिम में सूरज कह जाता-
रह जायेगी रस-धारा, पिघलानेवाला जायेगा,
फिर से लौट न जायेगा।

छूटे तीर लक्ष्य के मर्मी
लौट नहीं घर आते हैं,
नन्हें फूल डाल से झड़कर
तनिक नहीं पछताते हैं।

एक मुसाफिरखाने में दस दिन से ज्यादे कौन रखे,
जानेवाला, आ जल्दी, अब आनेवाला आयेगा।

(2.1.54)

आशाओं-अभिलाषाओं का चंचल झलमल बात रे 

आशाओं-अभिलाषाओं का चंचल, झलमल वात रे!
मन क्यों मेरा डोल रहा है ज्यों शीशम का पात रे!

दूर नगर है, कठिन डगर है,
धूप-छाँह की माया!
है मालूम न किस इंगित पर
फिर भी बढ़ता आया!

कैसे पहुँचूँ नियत समय पर पास तुम्हारे साँवरे!
पिच्छल करती मंजिल का पथ नयनों की बरसात रे!

प्राणों के पाहुन तन की
वंशी पर सरगम साध रहे हैं,
साँसों के दो निठुर पहरुए
जीवन की कस बाँध रहे हैं।

क्यों उद्विग्न रहा करता मन, हाय समझ यह बात भी-
विरह-पंक में खिलता महमह मधुर मिलन बरसात रे!

सूख सरोवर जाते, लेकिन
एक बूँद की प्यास न जाती!
आँसू की रिमझिम फुहियों से
यौवन की लतिका मुस्काती!

बन्दनवार सजे सपनां के, चौमुख दिए हुलास के,
इच्छा की फुलझड़ियों से शोभित उठती बारात रे!

(12.2.54)

कि मैं सम्राट निर्धन हूँ 

नहीं हूँ चाँदनी का तन, नहीं हूँ दामिनी का मन,
किसी मृगलोचनी की आँख का घनश्याम उन्मन हूँ,
कि मैं सम्राट निर्धन हूँ!

बहुत आसान है, पाषाण बनकर देव बन जान
कठिन है, मोम-सा गल आदमी को पंथ दिखलान
नहीं वह गीत हूँ जो कागजों पर जड़ लिखा
सुहागिन कोकिला के कंठ का अविराम नंदन हूँ
कि मैं सम्राट…!

मिलन की दो घड़ी बनती जमाने की कथा भीषण,
विरह के वर्ष भी बनते न जग की आँख के दो कण।
नहीं मैं युग कठिन दुख का, नहीं मैं दिन मिलन-सुख का,
किसी की याद से लिपटे हुए बर्बाद दो क्षण हूँ!
कि मैं सम्राट निर्धन हूँ!

किसी मासूम की आहें किसी के गीत बन जातीं,
किसी की कान्त दुर्बलता किसी की प्रीत बन जाती।
पपीहे की पुकारों से न डोला मन कभी पी का,
किसी बेचैन राधा का निठुर निश्चिन्त मोहन हूँ!
कि मैं सम्राट निर्धन हूँ!

(21.3.54)

प्रतीक-गीत

दर्द के तार पर गा रहा गीत मैं।
देखता है समय के नयन से विजन-
क्यों लुटाकर सुरभि है न रोता सुमन।
सृष्टि को दृष्टि दी लाभ की है नयी-
हार में ही सदा पा रहा जीत मैं।

तारकों के फफोले भुलाकर गगन,
है उषा के अधर पर विहँसता मगन!
वेदना प्रेरणा दे रही, इसलिए,
मानता हूँ मरण को सदा मीत मैं।

शून्य मंदिर, फटी मोह की यामिनी,
और प्रतिमा पुजारिन ठगी-सी बनी!
प्रेम की एक सीमा मिलन में सदा;
पर विरह का प्रणय कल्पनातीत मैं!

हँस रही पूर्णिमा क्यों लिये दाग है?
दीप से क्यों दिवा को न अनुराग है?
फूल की लालसा शूल पर चल रही,
प्रीत-पथ की न कोई नयी रीत मैं!
दर्द के तार पर गा रहा गीत मैं।

(14.4.53)

कोई मुझे पुकार रहा है

”कोई मुझे पुकार रहा है!
जाना होगा! जाना होगा!!

पपीहरा के पिया-पिया से,
जड़-चेतन के हिया-हिया से,

भेज कौन संदेश रहा है,
मुझको ध्यान लगाना होगा!
जाना होगा! जाना होगा!

तरु-तरु के मोहक मर्मर से,
पल्लव-टहनी के मृदुकर से,

कोई मुझे बुलावा देता,
निश्चय पैर बढ़ाना होगा!
जाना होगा! जाना होगा!

ले आँखों में सावन के घन,
प्राणों में बिजली की तड़पन

कोई मुझे दुलार रहा है,
जाकर नेह निभाना होगा!
जाना होगा! जाना होगा!

संघर्षों से मैं मुँह मोड़े,
सबसे नाता-रिश्ता तोड़े,
बन्धन से ही भाग रहा था,
अब तो नीड़ बसाना होगा!
जाना होगा! जाना होगा!!

तुम मिली जैसे विजन को सुमन की मुस्कान

तुम मिली, जैसे विजन को सुमन की मुस्कान!
शून्य मंदिर में अचानक
यह विकल पदचाप!
सच पुजारी का हुआ क्या
स्वप्न अपने आप?

चिर विरह की यामिनी में, तुम मिलन अनजान!
आज मरु में बह पड़ी क्यों
भूलकर रसधार?
मुखर पतझड़ में हुआ
कैसे भ्रमर-गुंजार?

तुम मिली जैसे मरण को साँस का प्रतिदान!
आज से तो जिन्दगी यह
रह न पायी भार!
अब न गूँथेगी जवानी
आँसुओं का हार!
डूबते का एक तिनका ही सबल जलयान!

(12.5.54)

अब न रहा जीवन-घट रीता

अब न रहा जीवन-घट रीता।

सरित प्यार का हर सीकर है।
रस-अथाह मेरा अन्तर है।

जलन-तपन की ऋतु लो बीती,
प्यास-भरा वह दुर्दिन बीता!

भला न लगता जग को हँसना।
और, किसी दो दिल का बसना।

पर मैंने तो दुर्बलता से
ही दुनिया के मन को जीता!

(12.5.54)

तुम हँसती, झड़ती शेफाली

तुम हँसती, झड़ती शेफाली!

चुपके मिलन-यामिनी में खिल,
श्वास-सुरभि से पल-पल हिल-हिल

लद जाती कामना-कली से
जीवन की हर डाली-डाली!
तुम हँसती, झड़ती शेफाली!

तुम मिलती, मिलता जीवन है
हँसता प्राणों का उपवन है।

धुल जाती है हास-रश्मि से
कठिन निराशा की अँधियाली!
तुम हँसती, झड़ती शेफाली!

यह न चाह, जो पल-पल घटती।
जलन चातकों की कब मिटती?

पी-पी कर नयनों से छवि यह,
मैंने अपनी प्यास बढ़ा ली!
तुम हँसती, झड़ती शेफाली!

मेघ-भरी पलकों में अपनी 

मेघ-भरी पलकों में अपनी
किसने बन्द किया पूनम को?
अपने नन्हें-से प्राणों में
कैसे साध लिया सरगम को?

है बाड़व की ज्वाला-जीवन;
कैसी मोहन है यह माया-
मरु के राही को भी मिलती
अपने तन की संगी छाया।

कैसे बँध जाती है धारा,
दो तट के दुर्बल संयम में?

सघन गगन में हँसती बिजली,
जलते प्रखर अमा में तारे;
कठिन शिखर पर गिरि के चढ़ती,
जाने, किसके लता सहारे।

कैसे आशाओं की किरणें,
मिल जातीं जीवन के तम में?

भेद नहीं विश्वास समझता-
मोम और पत्थर के भीतर।
निर्झर और बँधे कूपों में
तीखी प्यास न पाती अन्तर।

कैसे खो देता अपने को,
कोई तुनुक किसी निर्मम में?

(1.8.54)

क्या रहस्य है तुम उदास हो 

क्या रहस्य है, तुम उदास हो?

आये कितने संकट के क्षण।
सहे सभी तुमने निर्भय बन।

पर चुप कब बैठी तुम बोलो
इस प्रकार, इतनी निराश हो?
क्या रहस्य है, तुम उदास हो?

कहो न मैं क्या कर दिखलाऊँ?
कैसे इस दिल को समझाऊँ?

जब पूनम-हासिनी ले रही
रह-रह लम्बी-सी उसाँस हो।
क्या रहस्य है, तुम उदास हो?

क्या माँगे मरुथल का राही?
(तट पर भी कब मिटी तबाही!)

जब सागर के अन्तस्तल में-
ही धू-धू जल रही प्यास हो।
क्या रहस्य है, तुम उदास हो?

(5.9.54)

देख रहा नयनों का दर्पण

देख रहा नयनों का दर्पण।

भले तुम्हारे बन्द अधर हैं,
फिर भी आकुल प्यार मुखर है।

झुकी पलक भी कह देती है,
मन का चिर गोपन सम्भाषण।
देख रहा नयनों का दर्पण।

कैसे कहूँ दुराव तुम्हें प्रिय!
लगता सदा अभाव तुम्हें प्रिय!

तुम चुप हो, चुप रहो;
कह रही सब कुछ है प्राणों की धड़कण
देख रहा नयनों का दर्पण।

अजब नयन के शीशे झलमल!
बिम्बित होते मन भी चंचल!

यौवन का मधुमास बन रहा
हाय, आज आँखों का सावन!
देख रहा नयनों का दर्पण।

(5.9.54)

इन नयनों के नीर, सँभालो

इन नयनों के नीर, सँभालो!

क्या है लाभ व्यथा कहने से?
भावुकता-सरि में बहने से?

छलक न जाये आँसू बनकर
द्रवित हृदय की पीर, सँभालो!
इन नयनों के नीर, सँभालो!

सुख के बजते तार न पूरे।
सभी मिलन-संगीत अधूरे।

दुर्दिन के ही आघातों से
जीवन का मंजीर, बजा लो!
इन नयनों को नीर, सँभालो!

रहती घन में विद्युत-रेखा।
बिना ज्योति के तिमिर न देखा!

क्षीण डोर से आशा की तुम
अपने मन की धीर, बँधा लो।
इन नयनों के नीर, सँभालो!

(1.1.55)

अपने आँसू लौटा लो

आँसू को तुम तोल सकोगी?

अपनी पलकों पर क्या मेरे
आँसू को तुम तोल सकोगी?

नापा गया किरण के कर से
धीर समुन्दर का कब पानी?
बता सकी कब जलन बादलों
की बिजली की क्षणिक जवानी?

मेरी अकथ व्यथा को क्या तुम
तुतले स्वर से बाल सकोगी?

क्या पहचाने निशा उषा-
अधरों पर बलिदानों की लाली?

बाँध सकी कब ज्योति-धार को
अपने बन्धन में अँधियाली?

अपने अज्ञानों से मेरा
क्या रहस्य तुम खोल सकोगी?

जो न भुला दे सुध-बुध तन की
वह जादू से भरा गीत क्या?
मैं न मानता प्रीत, कि जिसमें
हृदय सजग हो हार-जीत का।
अपनी चेतनता से मेरी
दुर्बलता ले मोल सकोगी?

यह संसार विधाता तुमने कितनी बार.

यह संसार विधाता तुमने कितनी बार…

यह संसार विधाता तुमने कितनी बार बसाया होगा;
पर न तुम्हारी आँखों में करुणा का जल लहराया होगा!

विद्युत् के धागों से सीते
तुम नभ का गीला अम्बर हो!
दाता, तुम माया की वंशी
में भरते जीवन का स्वर हो!

यों ही नवल प्रकृति का उपवन कितनी बार बसाया होगा;
पर न तुम्हारा मन पतझड़ की डालों ने उलझाया होगा।

स्रष्टा, क्या निर्माण कि अपनी
रचना से अनमेल रहे तुम!
दोष भला क्या मिट्टी की
प्रतिमा का, जिससे खेल रहे तुम?

माना तुमने बहुत दर्द इन नादानों से पाया होगा;
तुम्हें ध्यान निज नादानी का, पर बेदर्द न आया होगा।

(21.1.55)

आज अकेला हूँ गाने दो

आज अकेला हूँ, गाने दो।

मुझसे दूर कली सुकुमारी!
मुझसे दूर शूल की क्यारी।

सुख-दुख दोनों से उठ ऊपर
मुझको शान्ति तनिक पाने दो!
आज अकेला हूँ, गाने दो!

बुरे अगर छूटें, तो छूटें।
भले अगर रूठें, तो रूठें।

इस जीवन के सूनेपन को
स्वर-सिहरन से भर जाने दो!
आज अकेला हूँ, गाने दो!

प्याला से पीड़ा जाती है।
तारों पर मीरा गाती है।

मुझे न रोको, मुझे न टोको
आज स्वयं को बिसराने दो!
आज अकेला हूँ, गाने दो!

बहुत दिन तक

बहुत दिन तक बड़ी उम्मीद से देखा, तुम्हें जलधर!
मगर क्या बात है ऐसी, कहीं गरजे, कीं बरसे!

जवानी पूछती मुझसे
बुढ़ापे की कसम देकर,
‘कहो क्यों पूजते पत्थर
रहे तुम देवता कहकर?’

कहीं तो शोख सागर है मचलता भूल मर्यादा,
कहीं कोई अभागिन चातकी दो बूँद को तरसे!
कहीं गरजे, कहीं बरसे!

किसी निष्ठुर हृदय की याद
आती जब निशानी की,
मुझे तब याद आती है,
कहानी आग-पानी की!

किसी उस्ताद तीरन्दाज के पाले पड़ा जीवन,
निशाने साधना दो-दो, पुराने एक ही शर से!
कहीं गरजे, कहीं बरसे!

नहीं जो मन्दिरों में है,
वही केवल पुजारी है।
सभी को बाँटता है जो,
कहीं वह भिखारी है।

प्रतीक्षा में जगा जो भोर तक तारा, मिट-डूबा;
जगाता पर अरुण सोये कमल-दल को किरण-कर से!
कहीं गरजे, कहीं बरसे!

यह निर्मम संध्या

यह निर्मम संध्या की बेला!

धीरे-धीरे चन्द्र-किरण पर
उतरी दिन की थकन चरण धर।

ऐसे करुण अतिथि का मैं भी
कैसे कर सकता अवहेला?
यह निर्मम संध्या की बेला!

नीड़ों में सो गये विहग-दल,
तजकर मधुर स्वप्न का आँचल!

मैं ही क्यों सूनी पलकों से
देख रहा तारों का मेला?
यह निर्मम संध्या की बेला!

नरम-नरम चुप अश्रु बहाती,
बुझी मोमबाती भी जाती।

इस दुनिया में क्या जलने को
मैं ही बचता शेष अकेला?
यह निर्मम संध्या की बेला!

मैं बजता हूँ .

मैं बजता हूँ किन्तु निकलती तुमसे है झंकार!
बीन बजाना भूल गया मैं,
जब से मन ही तार बन गया।
छोड़ी तट की आशा, जब से
जीवन ही मझधार बन गया।

मैं गाता हूँ, किन्तु गीत के तुम केवल आधार!

नित मजार पर गगन दिवस के,
देता अगणित कुसुम चढ़ा रे!
पर रजनी-रानी के बनते
शशि, बिन्दी, ये हार सितारे!

मैं सजता हूँ, किन्तु देखता जग तुम में शृंगार!

डगमग पग ये, थका बटोही,
पंथ अश्रु-बूँदों से पंकिल!
मिलन तुम्हारा ही तो मेरे
एक मात्र जीवन की मंजिल!

मैं खेता हूँ नाव, मगर तुम हो मेरा उस पार!

(5.5.54)

तुम न आओगी .

तुम न आओगी, तुम्हारी याद आती ही रहेगी!

टिक सके अरमान के हैं
महल बे-बुनियाद किसके?
कठिन घड़ियों में विरह की
घर हुआ आबाद किसके?

पर तुम्हारी सुधि तुम्हें नित पास लाती ही रहेगी!

तुम गयी उपहार मेरे
प्राण को पतझार देकर।
औ’ सुकोमल पलक-दल पर
आँसुओं का भार देकर।

पर जवानी मिलन के सपने सजाती ही रहेगी!

एक-सा यह तिमिर छाये
जा रहा मन पर, गगन पर।
किन्तु, मेरी आँख शत-शत
स्नेह की मधु बूँद भरकर-

नित तुम्हारी राह में दीपक जलाती ही रहेगी!
तुम न आओगी, तुम्हारी याद आती ही रहेगी!

(15.5.54)

मुझको देखो 

मुझको देखो, या देखो
दीपावलियों
को!

मैं नहीं रूप पर, सौरभ पर मरने वाला।
मेरा न प्रेम-पथ काँटों से डरने वाला।
दुनिया नादान, कहो न मुझे तुम रस-लोभी!
मुझको देखो, या देखो साधक

अलियों
को!

जग की निष्ठुरता की भी याद नहीं करता।
मैं ईश्वर से भी हूँ फरियाद नहीं करता।
पत्थर पर बलि देने वाले मालाओं की,
मुझको देखो, या देखो गुमसुम

कलियों
को!

बुदबुद से आकुल ही लहरें गुलजार सदा।
तारों से करती रही अमा शृंगार सदा।
सागर, अम्बर को नहीं देखता जग, केवल
देखा करता मेरी मस्ती,

रँगरलियों
को!

(27.5.54)

प्यार की बीन पर

प्यार की बीन पर पीर की रागिणी,
जो बजाने लगे, सो बजाते रहे!
अश्रु के मोतियों से जवानी मगन,
जो सजाने लगे, सो सजाते रहे!

तुम न जाने बिना हा, कहाँ पार है;
जिन्दगी की कठिन धार, मझधार में-
कागजों की बना नाव अरमान को,
मुद बहाने लगे, सो बहाते रहे!

जो कि अंतिम मिलन में विधुर-भाल पर
चुम्बनों-सी प्रिया के खिंची रह गयी,
प्राण, उस आमरण याद की रेख को,
जो मिटाने लगे, सो मिटाते रहे!

जो बुलाये बिना आ गया हो अतिथि,
नेह को डोर में हा, बँधा आप ही,
आगमन की कथा वह करुण कंठ से
जो सुनाने लगे, सो सुनाते रहे!

बेवफाई तुम्हारी वफा बन गयी,
खार गुल का पहरुआ बना जिस तरह!
मोम के तन कि मन से शिला के पिया,
जो लुभाने लगे, सो लुभाते रहे!

भारती के नाम कवि का पत्र

(न माँ के सामने संकोच का कुछ प्रश्न उठता है,
ज़रा बेचैन मन को खोलकर ओ लेखनी, धर दे!
अटल पाषाण को भी सुगबुगा जो द्रवित कर देता,
मचलते अनुभवों के सजल कण को शब्द-निर्झर दे!)

अभय माँ शारदे, वर दे, न मन को गीत कातर दे,
बुझे हैं जो दिये स्वर के, उन्हें तू ज्योतिमय कर दे!

बँधे निर्माण काँटों में,
कलाविद फूल पर लेटे।
यहाँ संहार में गुमराह हैं
विज्ञान के बेटे!

जहाँ धन के खुले बाज़ार में नीलाम है विद्या,
वहाँ कुछ तो हया से तू झुकी नारी, झुके नर दे!

मनुज पथभ्रान्त धरती पर
रुधिर के बीज है बोता,
यहाँ वक की चरण-रज को
विवेकी हंस है धोता।

विकल ईमान की जो द्रौपदी डर रो रही बेबस,
उसे तू लाज ढँकने को, वसन दे, या कफ़न भर दे!

समर से भागते हैं पार्थ
सुनकर कर्ममय गीता,
अशोकों से भरे वन में
सशोका शान्ति की सीता।

यहाँ क्यों प्रश्न-चिह्नों से खड़े मन्दिर, खड़ी मस्जिद?
अरी वाणी, प्रकट होकर हुआ क्या हाय, उत्तर दे!

विभा की फूटती लौ को
तुनुक घन रोक लेंगे क्या?
महज़ दो-चार ये तिनके
प्रभंजन रोक लेंगे क्या?

क्षितिज को और विस्तृत कर, अरुण मुख और विवृत कर,
नये युग के झिझकते सूर्य को अम्बर बृहत्तर दे!
अभय माँ शारदे, वर दे, न मन को गीत कातर दे!
बुझे हैं जो दिये स्वर के, उन्हें तू ज्योतिमय कर दे!

(1962)

बोला संत कबीर

रच रहा हूँ छन्द मैं आग्नेय
निज रुधिर-मसि से, मृणाली से।
काव्य का यह विवश अग्रासन
पा रहा हूँ का-व्याली से।

कर रहा संसृति-उदधि में क्रूर,
आत्मा का मैं विकल मन्थन।
पी हलाहल कवि रहा मेरा,
हो रहा जग पर अमृत-स्यन्दन।

बाँटते हैं मुक्ति, देते दृष्टि
लोग कहते, वेद और पुराण;
हैं लिखे अनमोल पन्नों पर
लोग कहते, ज्ञान औ’ विज्ञान।

सुना करता, देववाणी में कहीं
है अमर साहित्य का सर्वस्व;
मानकर भगवान जिसके सृजक को
पूजता है आरहा यह विश्व।

बुद्धि छोटी पर बड़ी यह बात-
हृदय को किस भाँति समझाऊँ?
आदमी हूँ, देवता की पंक्ति में,
मन न करता, बैठ रँग जाऊँ।

क्षुधा-कातर मनुजता को हाय,
लाभ है क्या कल्पतरु से भला!
है न अनुभव से बड़ी अभिव्यक्ति,
है सरलता से न ऊँची कला!

संतुलन कर मैं नयन का श्रवण से,
देखता आकाश, धरती अतल!
बोलता जब रह न सकता मौन,
ले महज़ अनुभूतियों का बल!

ढूँढ़ता अपने हृदय के बीच
देवता को मैं गगन के रहा।
आत्मा के यज्ञ में निर्धूम,
चढ़ा समिधा क्षणिक तन का रहा।

मौलवी की श्वेत दाढ़ी में, अरे,
छिप न पाता है हृदय काला।
पंडितों के मलिन मन की गाँठ को
क्या करेगी काठ की माला!

चल रहे हैं चाल बगुले हंस की,
धर्म साधन बन गया व्यभिचार का!
प्राण के हैं तत्त्व की चिन्ता नहीं,
मोह कितना बढ़ गया आकार का!

मन्दिरों औ’ मस्जिदों की आग में,
भून नर को नर चबाता है!
भाइयों के खून से रँग हाथ निज,
पत्थरों को सिर नवाता है।

कर्म के उत्कर्ष का है मोल क्या
जाति का आधार ही जब मान्य है!
धन्य देश कि जातिवालों से अधिक
जातियों का ही यहाँ प्राधान्य है!

मुग्ध पंकज के न ये गुण-रूप पर,
मलिन-पंकिल मूल पर ही ध्यान है;
देह की मिट्टी सनी जिस नीर से-
प्राण-श्री का वही एक प्रमाण है।

जानकर पौरुष दिया गुरु का,
तोड़ता हूँ धर्म की कारा!
योग के हिमवान से लो भक्ति की,
मैं बहाता हूँ प्रखर धारा।

नष्ट पीहर हो भले ही जाय, पर
रहेगा पीघर सुघर मेरा।
मैं मिटूँगा, पर रहेगा विश्व में-
गूँजता नित अमर स्वर मेरा।

धरती माता है, माता है

दिन-दिन भर हल-बैल चलाकर
तुमने जिसकी छाती तोड़ी,
रत्न-सुगर्भा जान लूटने-
चला कुदाली, परती कोड़ी,
तुमने अपनी प्यास बुझाने,
जिसकी सारी देह निचोड़ी,
हो कितने बेशर्म, अगर हो
उसकी तुम्हें न ममता थोड़ी!

सब दुख सहा, न कुछ भी कहा, कि मिट्टी फसल उगाती सोना!
तुम रौंदो चरणों से वह तो देगी फल-फूलों का दोना!
आज हिमालय की चोटी पर बैठ हमारा कवि गाता है-
एक बार तो लो पुकार तुम, धरती माता है, माता है!

धरती एक किताब कि जिसमें
फल-फूलों के छन्द मनोहर!
हर मौसम गुलज़ार कि जिसमें
फल-फूलों की कान्त धरोहर!
भू की व्यक्त उमंग यही हैं!
भू गे सातों रंग यही हैं!
पुष्पबाण वाले, मतवाले
भू के रसिक अनंग यही हैं!

मानव की चोटों पर शबनम की आँखों से आता रोना।
फल-फूलों के मिस मुस्काकर प्रकृति कर रही जादू-टोना!
आज हिमालय की चोटी पर बैठ हमारा कवि गाता है-
एक बार तो लो पुकार तुम, धरती माता है, माता है!

नये देश की ओ माँ-बहनो!
क्यों सोने की बेड़ी पहनो?
रंग-बिरंगे फूलों का तुम
धारो शोभित-सुरभित गहना!
नैसर्गिक शृंगार पुरुष के
पास प्रकृति को ला देता है!
स्वर्ण-मोह से घिरे हृदय की
अग्नि-परीक्षा ले लेता है।

त्याग दीप है जो करता ज्योतित अन्तर का कोना-कोना!
नये देश के लिए चाहिए सबको खून-पसीना बोना!
आज हिमालय की चोटी पर बैठ हमारा कवि गाता है-
एक बार तो लो पुकार तुम, धरती माता है, माता है!

(17.7.61)

एक चुनौती

तुमने मुझे चुनौती दी है-
नहीं प्रार्थना मेरी पिघला सकती पत्थर!
अचल प्रेम के दीवाने की
शक्ति न परमित मान!
उसकी शक्ति अजेय, कंठ में
जिसके विह्वल गान।

मरु में लहरा देता जीवन नश्वर जलधर!
फिर न प्रार्थना क्यों पिघला सकती है पत्थर!

मन का दृढ़ विश्वास
बना देता जड़ को गतिमान!
यदि पूजूँ मैं मिट्टी को
वह बन जाए भगवान!

सदा पात्र पर ही देने वाले की क्षमता निर्भर!
फिर न प्रार्थना क्यों पिघला सकती है पत्थर!
कातर मन के उफनाने का
बल है बड़ा अनोखा!
पतली धार उमगती जब,
क्या तट का लेखा-जोखा!

चरण नहीं, रज ही छूती है उड़कर अम्बर!
फिर न प्रार्थना क्यों पिघला सकती है पत्थर!

तुलसी की रतना

लोक-लाज की बलि-वेदी पर चढ़ी हुई असहाय!
अपनी ही बेड़ी में जकड़ी, म्लानमुखी निरुपाय!
वाणी में प्रेरणा और फिर रतना का प्रारब्ध!
निकल पड़े भावों से उच्छल अन्तर्वेधी शब्द!

अन्तर्वेधी शब्द कि जैसे अमृत उफन आया हो!
अन्तर्वेधी शब्द कि ज्यों प्रबला विद्या माया हो!
अन्तर्वेधी शब्द प्यार से, अपनापन के नाते!
पत्नी की मंत्रणा कि पावन जीवन-धन के नाते!

पूर्णचन्द्र को देख कि जैसे सरिता उमग गयी हो!
पवन-परस पा जैसे कोई ज्वाला सुलग गयी हो!
मुरली पर छेड़ा कि किसी ने जैसे भैरव राग!
चन्दन से लिपटा हो जैसे आकर कोई नाग!

सहज खिंचे आना सुवास पर मृदु स्वभाव है अलि का!
तुलसी को विश्वास नहीं था चुभ जायेगी कलिका!
प्रकृत हुई रतना तुलसी की देख मुखाकृति गहरी,
जैसे मुक्ताएँ माला की झटका खाकर बिखरीं!

प्रिय को देख विषण्ण प्रिया का मन अधीर हो डोला!
पलभर में ही वाष्प बन गया जैसे कोई शोला!
किंकर्त्तव्यविमूढ़ न हतप्रभ भाव शब्द बन उमड़ा!
जाने कैसे बन्द हो गया अधर-द्वार का पिंजड़ा!

निश्चेतन हो गयीं भुजाएँ ललक अंक भरने में!
जड़ीभूत हो गयी कि बढ़कर पूज्य पाँव पड़ने में!
पलकें गिरना भूल गयीं ये नयन निरर्थक हुए।
कल तक के सौन्दर्य-चित्र ये आज विकर्षक हुए।

धरती खिसकी पाँव तले की, सिर पर गिरा गगन आ।
उमड़े आँखों में जैसे सावन-भादों के घन आ!
रतना से बिछुड़ा तुलसी का कैसा बाकी जीवन?-
सीपी में जैसे स्वाती के छलक गिरे हों दो कण!

कफ़न फाड़कर मुर्दा बोला 

चमड़ी मिली खुदा के घर से,
दमड़ी नहीं समाज दे सका।
गजभर भी न वसन ढँकने को
निर्दय उभरी लाज दे सका।

मुखड़ा सटक गया घुटनों में
अटक कंठ में प्राण रह गये।
सिकुड़ गया तन जैसे मन में
सिकुड़े सब अरमान रह गये।

मिली आग लेकिन न भाग्य-सा
जलने को जुट पाया इन्धन!
दाँतों के मिस प्रकट हो गया
मेरा कठिन शिशिर का क्रन्दन!

किन्तु अचानक लगा कि यह
संसार बड़ा दिलदार हो गया।
जीने पर दुत्कार मिली थी,
मरने पर उपकार हो गया।

श्वेत माँग-सी विधवा की
चदरी कोई इन्सान दे गया,
और दूसरा बिन माँगे ही
ढेर लकड़ियाँ दान दे गया।
वस्त्र मिल गया, ठंड मिट गयी
धन्य हुआ मानव का चोला!
कफ़न फाड़कर मुर्दा बोला।

कहते मरे रहीम न लेकिन
पेट-पीठ मिल एक हो सके!
नहीं अश्रु से आज तलक हम
अमिट क्षुधा का दाग धो सके!

खाने को कुछ मिला नहीं सो
खाने को गम मिले हजारों!
श्री-सम्पन्न नगर-ग्रामों में
भूखों बेदम मिले हजारों!

दाने-दाने पर खाने वाले
का सुनता नाम लिखा है,
किन्तु देखता हूँ इन पर
ऊँचा से ऊँचा दाम लिखा है।

दास मालूका से पूछो क्या
‘सबके दाता राम’ लिखा है?
या कि गरीबों की ख़ातिर
भूखों मरना अन्जाम लिखा है?

किन्तु अचानक लगा कि यह
संसार बड़ा दिलदार हो गया।
जीने पर दुत्कार मिली थी,
मरने पर उपकार हो गया।

जुटा-जुटाकर रेजगारियाँ
भोज मनाने बन्धु चल पड़े!
जहाँ न कल थी बूँद दीखती,
वहाँ उमड़ने सिन्धु चल पड़े!

निर्धन के घर हाथ सुखाते
नहीं किसी का अन्तर डोला।
कफ़न फाड़कर मुर्दा बोला।

घरवालों स, आस-पास से,
मैंने केवल दो कण माँगा!
किन्तु मिला कुछ नहीं और
मैं बेपानी ही मरा अभागा।

जीते-जी तो नल के जल से
भी अभिषेक किया न किसी ने।
रहा उपेक्षित, सदा निरादृत,
कुछ भी ध्यान दिया न किसी ने।

बाप तरसता रहा कि बेटा
श्रद्धा से दो घूँट पिला दे!
स्नेह-लता जो सूख रही है,
जरा प्यार से उसे जिला दे!

कहाँ श्रवण? युग के दशरथ ने
एक-एक को मार गिराया,
मन-मृग भोला रहा भटकता,
निकली सब कुछ लू की माया!

किन्तु अचानक लगा कि यह
घर-बार बड़ा दिलदार हो गया।
जीने पर दुत्कार मिली थी,
मरने पर उपकार हो गया!

आश्चर्य वे बेटे देते
पूर्व पुरुष को नियमित तर्पण,
नोन-तेल रोटी क्या देना,
कर न सके जो आत्म-समर्पण!

जाऊँ कहाँ, न जगह नरक में
और स्वर्ग ने द्वार न खोला!
कफ़न फाड़कर मुर्दा बोला।

कमल, बंदूक और सूरजमुखी

अन्धकार!
सघन
भीकाकार
दुःख का, प्रतीक्षा का
लिये भार
जा रहा! जा रहा!!

आ रहा, आ रहा,
आशा-पिपासा ले,
विहगों के मृदुल सुर में
नयी-नयी भाषा ले,
ज्योति का बसेरा रे;
सवेरा रे, सवेरा रे!

ऊषा के
अधरों से
मधुमय अनुराग भरा!

”इतना ही
बहुत हुआ।
आखिर वे
आये तो!
मेरी इस किस्मत ने
कृपा-भाव पाये ते!“
”धन्य हुआ! धन्य हुआ!!“

धीरे से, हौले से
नयनों को खोल,
उठा!
कमल सरल बोल,
उठा!
(क्या?)
कि ”कितना मनमोहक है
किरणों का हार!
कितना आकर्षक है
बच्चे का प्यार!
व्यर्थ नहीं जाती है
आँसू की धार!“

सरवर में
चमक रही
रवि की
परछाँही!

लहरों में
दीख रही
आकुल
गलबाँही!

झुलस रहा है
जहान!
हाँफ रहा।
आसमान!
पलों में सिमट रही
छाया भी परीशान!

उगल ज्वाला
लाल-लाल
आँखों से
रवि ने जब
त्रस्त किया
धरती को,
नन्दन को,
परती को,

देखा तब-
नन्हे से
पौधे में
एक कली,
लाल-लाल
भली-भली
चुपके से
विहँस उठी!

लपटों से
फूल खिले!
आँधी से
दीप जले!-
आश्चर्य! आश्चर्य!!
रवि भी
अवाक् रहा!
ऊपर बन्धूक मगर
निर्निमेष
ताक रहा!

सूरज को
मौन देख
पहले तो
मुस्काया,
फिर कुछ गम्भीर हुआ,
धीरे से बोल उठा-
(क्या?)
कि ”प्यार की निशानी को
सकता है कौन
जला?
जीवन के दुपहर में
लगता है प्यार
भला!
बनता मझधारों में
तिनका भी
कूल एक!
रखता अस्तित्व क्या न
दुपहर का
फूल एक!

दिन भर का
थका-थका,
चलता है
रुका-रुका;
अनुभव ले बुरा-बुरा
भला-भला।
जला-जला
सुखी-सुखी।
इतने में दीख पड़ी
झुकती
सूरजमुखी!
सूरजमुखी?
कौन यह?
मौन यह?

प्रातः से
सायं तक
पीछे ही लगी रही!
गुमसुम ही बनी रही!
दीपक की
छाया-सी,
किंवा, यह
माया-सी?

ढलते उस दिनकर ने
बार-बार
प्यार से,
कुतूहल से,
देखा उस
मौन को,
अपने उस
कौन को,
आँखें झुकाये,
हाय,
नतमस्तक, म्लानमुख

चुपके खड़ी है जो
युवती वियोगिनी-सी;
पति जिसका
जीर्ण-शीर्ण
जा रहा
विदेश कहीं!

(1.9.52)

नेता

आइए!
आप हैं नेताजी?
कलियुग में
द्वापर-त्रेताजी?

आइए!!
आपका ही था
कब से
इन्तजार।

स्वागत में
कब से खड़ी-खड़ी
कुछ सोच रही
यह लाख-लाख
दर्शन-पिपासुओं की
कतार!

आइए!!!
आए हैं
सिर के बल चल?
करुणा-निधान!
या देख
भक्त की कोमलता,
हैं पलक-पाँवड़े बिछा
राह जो देख रहे?
चाहे जैसे भी आये हों;
बैठिए जरा!
हम समझ रहे हैं
आप बहुत हैं
श्रान्त-क्लान्त?

आपका भला
परिचय क्या दूँ?
मैं एक अनाड़ी हूँ ऐसा,
अब तक न समझ पाया,
हैं आखिर कौन आप?

नेताजी? -यह तो
खाया-खेला और बढ़ा
साथ ही,
लेकिन क्या
यह जान सका-
हैं किस विचार के आप?
‘वाद’ वह कैसा है?
(आइए कान में धीरे से
कुछ तो कहिए तो)

ओ,
समझ गया, हैं आप
मुक्त इन वादों से!
वादों का व्यर्थ विवाद
हृदय भरमाता है!

खाते हैं केवल आम,
न गिनते पेड़ों को;
इस मीन-मेष से
क्या कुछ
हो जाता है!
अवसरवादी सब लोग कहें
पर इससे क्या?
मैं नहीं कभी
चकमे में आ सकता

इनके!
ये लोग बड़े ईर्ष्यालु,
भुलावा देते हैं!

नेताजी हैं आदर्श!
आइए,
स्वागत है!
(परिचय इतना ही दे देता
इन मूढ़ों को!)

तुम उचक-उचक
क्या देख रहे?
क्यों उत्सुक हो?

हो शान्त!
बैठकर सुनो
मधुर इनकी शिक्षा
इनका भाषण!

हैं वीर्यवान्!
बहलाते मन
करके शिकार!

हैं दयावान्!
करते हैं हरदम
फलाहार!
है साम्यवाद का बना
हृदय!
रखते समाजवादी
विचार!

ये नहीं पाप से
हैं परिचित!
ये नहीं पुण्य के
हैं आदी!

आओ! पहचानो!
युग के नये
मसीहा को
जो सूरत कपड़ों से
कट्टर
गाँधीवादी!

युगबोध 

सूरज को क्या हो गया है,
अँधेरे का लिहाफ मुख से हटाता ही नहीं है।
समय के आम्र-वृक्षों की मंजरियों में मादकता ही नहीं रही
या बेसुरा होने के भय से कोकिल गाता ही नहीं है।
अन्धेर है अन्धेर! काँच के राज्य में हीरा हवलदार है!
आज श्वानों के हाथों में शेर गिरफ्तार है।

हाय रे देश, तुम्हें क्या हो गया है!
तुम हो गये हो लाचार
ऐसा क्या खो गया है!
कल तक के युग-चारण आज गाते हैं लोरियाँ!
दिनदहाड़े ईमान कोलीलती जा रही हैं तिजोरियाँ!

राह दिखाने को व्याकुल हमारे रहनुमा
खुद ही भटक गये हैं!
पहले कदम को ही मानकर मंजिल
अटक गये हैं!

हद हो गयी! डर से सहमती हैं आँधियाँ,
डर रहे हैंतूफान
कि कहीं एक तिनका न कर देउनका अपमान।

विद्यापीठों में ऊँघते हुए विद्वान
अक्सर काट लेते हैं मूर्खों के भी कान!
किसी सुहागिन की पुरानी चूड़ियों की तरह
ताख पर उठाकर रख देते हैं ईमान!
नाम विश्वविद्यालय! सिमट आया है प्रमण्डलों-मण्डलों में
ज्ञान के अनन्त प्रकाश को
बाँधना चाहते हैं लोग कुछ दलों में।
विद्या-मंदिर को घेरे रहते हैं
राजनीति के ठेकेदार
जैसे देवालयों (पर झपट लेने को प्रसाद)
मँडराती रहती हैं चीलें बेशुमार!
कहीं-कहीं दीखता है आदमी, चारों ओर दीखती है जाति, केवल जाति!
ऑक्सीजन पर चलती हुई इन्सानियत जी रही है किसी-किसी भाँति!

जाति के सींग दिखला-दिखलाकर
डरवातेहैं एक-दूसरे इन्सान!
जैसे मकई के मोचों से बना दाढ़ी-मूँछें
एक-दूसरे को डरवाते हैं बच्चेशैतान!
कब तक जातिवाद की चक्कियों में पिसती चली जाएगी मनुष्यता।
कब तक नहीं पूजा जाएगा ऊँच-नीच, वर्ग-भेदों से उठ
मनुष्य के भीतर का देवता!
कब तक काठ के उल्लुओं पर बलिदान होती रहेगी कमलों की माला!
कब तक पीती रहेगी प्रतिभा की मीरा, अन्यायियों के हाथ से गरल
का प्याला!

जो नेता जितना छोटा है उतनी ही लम्बी है उसकी तकरीर!
जैसे स्टेशनों के समीप छोटे-छोटे बाजीगरों के समीप लगी
रहती है भारी भीड़!
बड़ा आदमी अक्सर वह कहा जाता है जिसकी छोटी होती हैं आँखें!
मगर बड़े होते हैं कान!
जो औरों से सुनकर ही किसी के व्यक्तित्व का कर लेते हैं अनुमान!
साहित्य की दुनिया में उसकी उतनी ही अकड़उतनी ही ऐंठ है,
जिसकी जितनी कम पैठ है!
कवि बनने से अधिक किसी कविता-धारा का
प्रवर्तक बनने का फैशन है,
जैसे एक-एक संस्था
एक-एक अधिवेशन है!
कविता का शीर्षक ही कविता का दर्शन है!
मूल कविता से लम्बा होता हैभूमिका का भाग!
जैसे किसी चुहिया को निगल रहा हो भारी-भरकम नाग
कराहते हैं छन्द, शब्द माँगते हैं पनाह!
लिखते हैं चार, दो करते हैं वाह-वाह!

मगर कब तक रहेगा यह अन्धेरा?
कब तक रहेगा यह अन्धेरा?
सोचता हूँ, सोच-सोचकर घबड़ा जाता हूँ!
मेरे भीतर का विश्वास मुझे और अधिक डरा जाता है;
जैसे रात का पहरुआ चीख-चीखकर
सूनापन को और अधिक भयावह बना देता है!
मेरा आत्मविश्वास निराशा के सागर में द्वाीप बन जाता है।
मेरा अभाव मुझमें नये-नयेसुरों में गाता है।

इस धरती पर आज भी शेष हैं न्याय के देवता!
जिनके लिए न कोई अपना है, न पराया!
व्यापी है जिसको न जगती की माया!
धरती के इन्सान ही होते हैं भगवान,
लेकिन उन्हें पाते हैं विरले ही भाग्यवान।
और यह सत्य है कि दिल में बसा लेने से
भगवान भगवान नहीं रह जाते हैं,
जैसे घर में बहुत दिन ठहर जाने से
मेहमान मेहमान नहीं रह जाते हैं!

मुझे विश्वास है कि सूरज का जब जगेगा तेज,
आप ही जल जाएगी अँधेरे की रजाई!
बजने लगेगी दिशा-दिशा में किरणों की शहनाई!
कोई ज्ञानी नहीं लेगा मूर्खों का चरणोदक
हंस हंस रहेगा, वक वक!
(इसीलिए),
कलम को रक्त पिलाये चल मेरे मन!
दर्द, घुटन, अभाव सबके लिए खोल दे छन्दों का दामन!
जिसका आज रूठ गया है
उसका कल हो जाएगा अपना!
कभी तो सच होगा पुरुषार्थ का सपना!
कोई न कोई पारखी कोयलों के बीच सेचुन लेगा हीरा,
कोई तो उठा लेगा अन्याय की समाप्ति का बीड़ा!
कभी न कभी होगी ही अग्नि-परीक्षा,
सत्य की सीता निकलेगी ही बेदाग!
एक न एक दिन चाँदनी बन जाएगी आग।

गैलीलियो का आत्म-निवेदन

कौन कहता है पानी का बुलबुला यह दुनिया है,
समय की रेत पर लिखा कुछ भी नहीं रह पाता है।
मैं तो देखता हूँ, काल का पंछी काले-उजले
डैनों से उड़ा यही अस्फुट स्वर में गाता है-
”सच्ची साधना का पुत्र, आत्मबल तो
विश्व क्या सारे ब्रह्माण्ड का जेता है!
अरे समय का दबाव तो कोयला को भी
मिटाने के बदले हीरा बना देता है।

विश्वास हो यदि अपने में
सपने यथार्थ में ढल जाते हैं
श्रम की आँच में इतना बल है, ‘इतना’ कि
लोहे भी पानी की तरह गल जाते हैं।“
”गैलीलियो! गैलीलियो!“ अरे किसने मुझे पुकारा?
चार सौ सीढ़ियाँ लगे याद के कोठे से नीचे किसने मुझे उतरा?
इटली, हाय मेरी प्यारी मातृभूमि इटली के,
एकान्तवास तक कैसे पहुँच गया विश्व की जय का नारा?

धर्म ने फिर से मेरे ‘पापों’ को विचारा है,
जैसे कि इतिहास को आज के काजल से सँवारा है।
मैं एक में खलनायक, एक में नायक,
मानो एक ही नाटक का खेल यह दुबारा है।
मेरा पाप-ज्ञान के अंजन से सत्य के दर्शन!
मेरा पाप-धूल में पल नक्षत्रों का कर्षण!
धरती का धुरी पर सिद्ध करना नर्त्तन!
ये ही, कुछ ऐसे ही हैं मेरे इन्द्रधनुषी पाप,
जिनके कारण मुझे मिला एकान्तता का अभिशाप।
जब मुझे भोले पादरियों ने सजा दी,
मैंने सूली पर चढ़े ईसा को किया था प्रणाम!
हँसकर कहा था मैंने ”सत्य की घोषणा के लिए प्रभो,
मुझे दिया इतना छोटा, खुद ले लिया इतना बड़ा इनाम।“

साधना से शाप भी वरदान बन जाता है,
कवि का दुखड़ा ज्यों गान बन जाता है।
एक निरपराध का दंड प्रतिभाशालियों के लिए
सच पूछिये तो आन बन जाता है।
अरे एकान्त तो शान्ति का प्रहरी है,
निर्जन में होती रहीं साधनाएँ गहरी हैं।

छूट गये लोग लेकिन मातृभूमि छूटी नहीं,
इटली मनभावन मुझे गोद में लिये रही।
नाच-नाच धरती रिझाती रही मुझको,
सूर्य नक्षत्र ने बातें अनमोल कहीं!

उसी एकान्त ने खोल दिये नये क्षितिज,
ज्ञान विज्ञान से मेरे लिए और कुछ!
गह लिये अक्षरों ने काग़ज़ के पन्नों पर,
धरती से आकाश तक के अनुभव-भरे दौर कुछ!
मैं तो ऋणी हूँ सदा सज़ा देने वालों का,
होता है ऋणी जैसे बीज सदा मिट्टी का-
मिट्टी यदि बीज को करे नहीं नज़रबन्द,
कैसे नये पौधे का जन्म हो सकता है?

फिर से विचार आप करने हैं जा रहे,
‘सत्यमेव जयते’ का वाक्य स्वयंसिद्ध है।
मैं हूँ कृतज्ञ आप इतना तो मान गये,
धर्म में प्रवेश ज्ञान का नहीं निषिद्ध है।
क्रांति भरे सत्य के उफनते विचारों में,
धर्म का चिरन्तन स्वरूप सँवर जाता है।
जैसे जल में मिले अदृश्य नगण्य कणों को,
हिलकोरने से ठोस रूप उनका उभरकर निखर जाता है।
जैसे विचारों के दूध को मथे बिना
धर्म का मिलता नहीं है नवनीत
विप्लवी विचारों की लहरों से, धारों से
टकराकर टूटकर साथ ही शिलाएँ जातीं शालिग्राम बन पुनीत।

मेरी मुक्ति के लिए चिन्ता ही व्यर्थ है,
सत्य का अन्वेषक सदा स्वयं ही समर्थ है।
कलाकार, विज्ञानी अमरता के अभिलाषी नहीं होते हैं,
स्वर्ग में जाकर सुख की नींद नहीं सोते हैं।

बार-बार जन्म लेते हैं, बिना पाल की
मनुष्यता की नाव को निष्ठा से खेते हैं।
मैं गैलीलियो, न मरा हूँ न मरूँगा,
मुझे क्या क्षमादान दोगे, मैं नहीं हूँ दीन!
मैं ही था न्यूटन, मैं ही था आइन्न्सटीन!
और अभी कितनेरूप धरकर मुझे जाना है-
अज्ञान में डूबती दुनिया को सँभालना-बचाना है।
कलाकार-विज्ञानी के लिए न होता है स्वर्ग, न नरक,
वह तो जनरव का वासी, उसको प्यारी उसकी धूल-भरी सड़क।

ज्ञान का सूर्य अन्धविश्वासों की घटा अनजाने देता है चीर,
जैसे, अनदेखे पहुँच जाता है लक्ष्य पर शब्दबेधी तीर।

मील के पत्थर की आत्मकथा

रे किसी अनगढ़ विधाता की कला का एक तुच्छ प्रसाद हूँ मैं!
यों किसी उन्नत शिखर, विभ्राट गिरि की एक हल्की याद हूँ मैं!
मिल जिसे जिह्वा न पायी सृष्टि की ऐसी पहेली, कथा हूँ मैं!
हरे! रह गुमनाम खुद बनता हजारों का सुनिश्चित पता हूँ मैं!

एक दीवट हूँ लिये सिर पर प्रभा का पुंज मैं बेलौस जलता।
है न खलता अन्धकार मुझे न तिल-तिल तप्त शापित स्नेह ढलता।
रे किसी के लक्ष्य के सन्धान की उम्मीद हूँ, अरमान हूँ मैं!
एक मंजिल तक पहुँचने का सहज भी, सुदृढ़ भी, सोपान हूँ मैं!

देखता कि वसन्त जाता फूल के ले बाण कोमल और तीखे!
पत्थरों के भी अधर से फूटते हैं गीत दूर्वादल सरीखे!
किन्तु मेरे भाग्य के वीरान में उगता न कोई स्नेह-अंकुर!
हाँ, जलाता है मुझेजी-भर निदाध समझ जनम भर का तृषातुर!

भेंट जब पावस चढ़ाता गोद में मरुभूमि की शतरंग शाद्वल!
मैं वियोगी, स्वप्न के प्रिय-मिलन-सा, तब भी सरस दो-चार ही पल!

रात में डर आदमी की छाँह भी जब छोड़ उसको भाग जाती!
मैं खड़ा रहता उठाये सिर बना विश्वास की दुर्जेय थाती!

मील का पत्थर नहीं, रे साधना का ज्यों ज्वलित इतिहास ही साकार हूँ मैं!
जो किसी के चरण छूकर मुक्ति पा ले, उस शिला का भी नहीं अधिकार हूँ मैं!
हूँ नहीं वह जो किसी नृप की प्रिया की याद को कर देउजागर नदी-तट पर!
मैं हजारों ताज औ’ बेताजवालों को समर्पित एक-सी सेवा निरन्तर!

अहल्या का विलाप

मैं तो सिकुड़ लाज के मारे
खुद गड़ गयी कि जड़ निष्प्राण!
फिर क्यों तुम बदनाम हुए प्रिय,
देकर शाप बना पाषाण!

मैंने कोई पुण्य न जाना,
मैंने कोई पाप न जाना।
माँगा कोईवर न किसी से,
जग-जीवन का शाप न जाना।

पाता कोई व्रत न कभी था,
कभी न देखी नगरी काशी!
कभी न तन गंगा में धोया,
कभी न की पूजा अविनाशी!

मेरे तो तुम ही जप-तप हो;
तुम्हीं पुजापा, तुम्हीं प्रसाद!
मेरे तोतुम ही मन्दिर हो,
मेरे तो तुम ही भगवान!

कैसे आज सूर्य को अपनी
किरणों का विश्वास उठ गया?
कैसे अडिग पथिक को अपने
चरणों से विश्वास उठ गया?
कैसे आज केतकी-वन को
सौरभ से विश्वास उठ गया?
कैसे आज हिमालय का
इस धरती से अधिवास उठ गया?

टूटे दर्पण-से जुट पाते
कभी उठे विश्वास नहीं;
नहीं जानती थी डँस लेंगे
मुझको मेरे ही वरदान!

मैं तो सिकुड़ लाज के मारे,
खुद गड़ गयी कि जड़ निष्प्राण!
फिर क्यों तुम बदनाम हुए प्रिय,
देकर शाप बना पाषाण!

मेरी बाँह छुड़ाकर खुद तुम
सुन कुक्कुट की बाँग चल दिये!
रहा बाँधता आँचल मेरा,
रहे रोकते स्नेहिल दीये!

औ’ कुछ पल में ही तुम लौटे,
सोचा, मेरे दिल की धड़कन
सुनकर घर की ओर स्वतः ही
मुड़े तुम्हारे विकल श्रीचरण!

फिर क्या? प्रेम-गर्विता मैं तो
उमड़ी अंग-अंग रसराती,
फिर तो बड़े वेग निर्झरिणी
सागर में खो गयी अजान!

मैं तो सिकुड़ लाज के मारे,
खुद गड़ गयी कि जड़ निष्प्राण!
फिर क्यों तुम बदनाम हुए प्रिय,
देकर शाप बना पाषाण!

प्रेम-पुलक में अमृत-कलश के
विष को मैं कब जान सकी!
छद्म वेश मेंआने वाला
शाप नहीं पहचान सकी!

पर मेरा क्या दोष? छली
जो गयी मूढ़ अनजाने में?
भला यज्ञ करते क्या सुख
मिल सकता हाथ जलाने में?

तुमको छोड़ समझ सकता
है विपदा मेरी कौन?
कौन सँभाल सकेगा मेरे
अन्तर का तूफान!

मैं तो सिकुड़ लाज के मारे,
खुद गड़ गयी कि जड़ निष्प्राण!
फिर क्यों तुम बदनाम हुए प्रिय,
देकर शाप बना पाषाण!

हे मुनिवर, हे नाथ, पाप
तन का या मन का वासी?
चर्मचक्षु से मर्मचक्षु क्या
अधिक न आत्म-प्रकाशी?

पूत प्रेम का रंग मिटा
करता क्या तन-घर्षण से?
क्या हो सकता हृदय एक
धोखे से पाणि-ग्रहण से?

मैं तो सिकुड़ लाज के मारे,
खुद गड़ गयी कि जड़ निष्प्राण!
फिर क्यों तुम बदनाम हुए प्रिय,
देकर शाप बना पाषाण!

कुंती का एकालाप 

माँगी विद्या-बुद्धि, दिया प्रभु तुमने मुझको ज्ञान
यश माँगा, तो दिया विश्व भर का दुर्लभ सम्मान!

धन जो माँगा, दी कुबेर की झोली तुमने खोल,
जन जो माँगा, दिये एक से एक पुत्र अनमोल।

किन्तु बिना माँगे ही तुमने वस्तु मुझे दी एक,
‘क्षुद्र हृदय’-अट सके न जिसमें यश, धन, जन कि विवेक।

ज्ञान बन गया आँच, न बन पाया वह निःस्व प्रकाश,
यश न बन सका पवन, बना दुर्जेय अहं का पाश।

धन न बना रवि-किरण, बना भोक्ता मेरे यौवन का,
जन की लक्ष्मण-रेख बन गया कारागार भवन का।

दाता, लौटा लो माँगा जो कुछ है हमने अगणित,
फिर तो अपने आप न रह पाएगा दान अयाचित।

(एक लम्बी कविता का अंश)

वह अवधूत 

प्रेम की गीता पुनीता भाष्य से है परे, ज्ञानातीत है वह।
जो सुखद, रसमय लगे, फिर भी न स्वर-लिपि में बँधे, मृदुगीत है वह।
प्रेम सागर का नदी में विलय है, वह आत्मा का समर्पण!
प्रेम श्रद्धा है, विनय है, अहं का सर्वांशतः वह है विसर्जन!

भक्ति की थी भूमि पर फैली लता जो प्यार की, उसकी कथा है!
जीत से भी जो बढ़ी महिमा निराली हार की, उसकी कथा है!
एक निर्धन की विजय, अधिकार की, उसकी कथा है!
आदमी पर प्रीति जगदाधार की, उसकी कथा है!

आज से दस साल पहले, गाँव से कुछ दूर निर्जन नदी-तट पर!
एक निःसंतान भूपति के महल का था पचासों वर्ष का अभिशप्त खँडहर!
थे स्वयंभू वृक्ष दो अश्वत्थ के, तिरछे मिले फैले भयंकर!
भूत-प्रेतों की कथाएँ विजन दिन में भी बनाये रहा करती थीं निरंतर!

वहीं वर्षों से कहीं से एक कृश अवधूत आकर जम गये थे!
थे पुराने, सर्वपरिचित पर रहस्यों से भरे लगते नये थे!
नहीं केवल मस्तकानन, देह सारी ऊन जैसे बाल से गहरी पटी थी,
एक टेढ़ी लकुटिया, बस एक कमली, और वह भी बीस जगहों से फटी थी।

कृष्ण उथला-सा कमंडलु था पुराना एक सहचर मात्र वासन।
शीत, वर्षा, धूप में थी उस विषय वट-वृक्ष की जड़ एक आसन।
गाँव में जाते नहीं थे, हाथ फैलाते नहीं थे कभी।
वे न थे धूनी रमाते, भजन भी गाते नहीं थे कभी।
ईंट-कंकट को उठाकर नदी में थे फेंकते रहते निरंतर
शून्य में थे लक्ष्य करते बुदबुदाते, बात करते ज्यों अस्फुट स्वर!!
जब कभी खुश हो किसी को एक लक्कड़ मार देते थे सहज ही!
तो समझ लो दुःख से तत्क्षण उसे वे तार देते थे सहज ही!

एक साल अकाल का आसार सारे गाँव में फैला भयंकर!
होम करने लगा धरनी का, निरन्तर क्रुद्ध दिनकर!
शशक-सा भी मेघखण्ड नहीं विचरता था कहीं विस्तृत गगन पर!
जेठ में ही पहुँच जैसे वर्ष का दम घुट गया हो, पस्त होकर!

त्राहि-त्राहि मची हुई थी, कुलबुला कर सो गया जन-अंक में मल्हार!
तमतमाया दिन! पवन ज्यों झोंकता था धरित्री का भाड़!
एक दिन ग्रामीण होकर क्लान्त, भीत, निराश औ’ निरुपाय!
पास उस अवधूत के पहुँचे, लगे कहने ”लुटे हम, हाय!“

…जीविका का है ये साधन खेत, निर्धन हम कृषक नादान!
रक्त औ’ प्रस्वेद देकर ही न केवल रोप सकते हम अभागे धान!
पेट का दोज़ख़ नहीं परिवार का फिर भर सकेंगे बेच भी ईमान!
इसलिए कोई उपाय करें कि बाबा, मिल सके थोड़ा हमें जल-दान!

प्रार्थना सुन लगे रोने और कहने ”मैं गरीब फ़कीर,
कौन समझे बेबसी मेरी कि जाने कौन मेरी पीर!
आजकल मेरी खुदा से बन नहीं पाती, बहुत नाराज हैं वे!
क्या कहूँ सुनते नहीं सीधी तरह से आरजू, मिन्नत, सही आवाज़ हैं वे!
क्या कहूँ सुनते नहीं सीधी तरह से आरजू, मिन्नत, सही आवाज़ हैं वे!

”माँगता जो कुछ, उसे वे उलट देते हैं, हमारी प्रार्थना बर्बाद होती है!
ईंट मिलती है सरासर ईंट, माँगता जब मन किसी के लिए मोती है!
और मेरी जो जरूरत हो, उसे वे रौंद चकनाचूर करते हैं!
वे हमारा सुख सुख मिटाते हैं, न भूले भी कभी दुख दूर करते हैं।“

”यदि नहीं विश्वास मेरी बात का तुमको, ज़रा-सा आज़मा लो!
और ओ तुम इस कमंडल में नदी का जल भरा भरकर मँगा लो!“
…इस तरह कम्बल भिगोकर सूखने को रख दिया तपती धरा पर!
और बोले, ”जो खुदा, तू सूखने दे फटी गुदड़ी आज जी-भर!“

…और हतप्रभ हो गये सब लोग, पीपल हड़बड़ाये, धड़धड़ाये शून्य में घनश्याम!
छलछलाये रस, जल्द फिर चार दिन तक बरसते ही रह गये अविराम!
दूसरे ही दिन सवेरे किन्तु, दीख पाया वह नहीं अवधूत!
क्या पता झगड़ा सुलटाने के लिए ही स्वर्ग पहुँचा हो खुदा का दूत!

मेरे सौ-सौ गान बहुत कम

मेरे सौ-सौ गान बहुत कम, कर तुमको साकार सकें जो!

साँसों के गहरे बन्धन को ढोने का जीवन अभ्यासी!
अपने ही तन में हो जाता जाने केसे मन वनवासी!

एक घड़ी का प्यार मिले तो व्यर्थ कई जनमों के फेरे,
मेरे सौ-सौ मान बहुत कम, पा कुछ भी मनुहार सकें तो!

कवि का जीवन एक पिपासा, गीत अधूरे, अधर पराए,
दुख में छोड़ चले जाने को आँखों के मोती उकताए!

मरु के राही को रेती की एक बूँद गंगासागर है-
मेरे सौ अरमान बहुत कम, पा पल का अधिकार सकें जो!

आओ, हम समझौता कर लें, तुम जीतो, मैं हार न पाऊँ,
तुम अपना पथ ज्योतित कर लो, मैं पथ में अंगार न पाऊँ!

मधुऋतु में जाने-अनजाने अपने हो जाते बेगाने,
मेरे सौ बलिदान बहुत कम पा पतझर में प्यार सकें जो!

जिसके भय से डरकर भागे बड़े-बड़े साधक-संन्यासी,
उस दुविधा के ही त्रिशूल पर मेरे मन की नगरी काशी!

वह तो पौरुष का अभिमानी, दोनों तट से छूट गया जो,
मेरे सौ जलयान बहुत कम, पा ऐसी मझधार सकें जो!

जो अपने से आप डरेगा, उसका कौन सहारा होगा,
जो अपने को भूल गया हो, उसका क्या धु्रवतारा होगा!

जो रंगों से धुल जाती हो, ऐसी छवि का कौन चितेरा,
मेरे जप-तप-ध्यान बहुत कम, कर इनका उद्धार सकें जो!

वह दिन भी आएगा, संगिनि, मैं न रहूँगा, तुम न रहोगी,
मेरे अनगिन अपराधों को, मैं न सुनूँगा, तुम न कहोगी!

चुप सहने की आदत मेरी कहीं तुम्हें गुमराह न कर दे,
प्रभु का यह एहसान नहीं कम, मेरे मौन पुकार सकें जो!

जिन्दगी तो सफर है मगर रात का 

स्वप्न आओ, सुहागिन करो नींद को,
जिन्दगी तो सफर है मगर रात का!

जो सुबह हो गई तो अँधेरा कहाँ,
मुँह छिपाये घरों में बसेरा कहाँ,
आँख ही खुल गई जो समयसे अगर-
गाँठ के मोतियों का लुटेरा कहाँ?

हर चरण का निमंत्रण लुभाता हुआ,
प्रीत तो पंथ है किन्तु बरसात का!

सब किसी को विपद ढेर का ढेर है!
अश्रु का मुस्कुराना कि अन्धेर है!
आज महफिल में दुनिया की जो सुन रहे
जिन्दगी है गज़ल दर्द तो शेर है।

बीन बजती नहीं है सहज भाव से
साधना सुर मधुर, किन्तु आघात का!

आज ही तो हुए पूर्ण शृंगार हैं,
आँख से चुप उमड़ते हुए प्यार हैं।
एक डोली सजायी रखी सामने,
पास कन्धे भिड़ाये खड़े चार हैं।
बहन-भाई बधाई भले ही न दें,
साज तो सज गया एक बारात का!

मानता हूँ, सफर आज पूरा हुआ,
फ़र्ज ही रास्ते का अधूरा हुआ,
एक आशीष ही बाँटता रह गया,
धर्म से माँगने मैं गया कब दुआ!

प्रिय-मिलन की रही बेकली इस तरह
ध्यान ही कुछ गया रह न सौगात का!

यह शिशिर की साँझ 

यह शिशिर की साँझ, आयी याद तेरी
है उमर-भर की कमाई याद तेरी!

यह शिशिर की साँझ, पूनो है रही जम,
यह शिशिर की साँझ, सरगम है रहा थम
दूर सूने में कहीं जा यह क्षितिज-
सिहर धरती के अधर पर है रहा नम।

ज्यों नदी के पार शहनाई बजी हो,
है पड़ी मुझको सुनायी याद तेरी!

याद तेरी, ग्रीष्म की बरसात-जैसी।
याद तेरी, विरह की सौगात-जैसी।

घोर पावस में बरसकर फट गयी ज्यों,
याद तेरी, उस दुधैली रात जैसी।

निखरती जो खरा-कुन्दन-सी
भाग्य-ज्वाला में तपायी याद तेरी!

तार टूटे, है मगर झंकार बाकी
शिल्प बिखरा, है मगर आकार बाकी!
याद तेरी चिर वियोगिन ज्यों सुहागिन का करुण
है आखिरी शृंगार बाकी!

शीत की पुरवा, तिमिर की ओट में
कुनमना कर कसमसाई याद तेरी!

चेकोस्लोवाकिया का प्रवास गीत

दिन का क्या? कट ही जाता है!
पर रात कटे? आसान नहीं!

कुछ भीड़ मिली, कुछ लोग मिले,
कैसे-कैसे संयोग मिले!

सब देव दिखायी पड़ते हैं
मिलता कोई इन्सान नहीं!

मन में कितने जज़बात भरे,
इस रात न कोई बात करे!

देता अजनबी बना मुझको,
ऐसा देखा सुनसान नहीं!

छत ही आकाश बना मेरा।
मन ही उच्छ्वास बना मेरा।

कुछ यश, कुछ धन, सम्मान मिले!
ये तो सुख के सामान नहीं!

(29.12.73)

 

विराट् नृत्य

गगन नाचता, पवन नाचता, यों सारा संसार नाचता
मैं कवि हूँ, मेरे गीतों में घुँघरू बाँध प्यार नाचता।

सबको नाच नचाने वाला
खुद भी करता है ता थैया।
पैरों पर नाचे वृन्दावन
सिर पर नाचे कुँवर कन्हैया।

होठों पर इनकार ठुमकता, आँखों में इकरार नाचता।

नाचे खुदा कि बन्दा नाचे
नाचे सूरज, चन्दा नाचे
नाचे मुक्त साधु-संन्यासी
औ चौरासी फन्दा नाचे।

एक बार मन-मोर नाचता, पोर-पोर सौ बार नाचता।

अष्टकमल पर डोल रहे हैं
ध्यान लगाये गहन कबीरा,
पिये प्रेम की हाला कब से
बेसुध नाच रही है मीरा

घरवैया थिर बैठेकैसे, जब है आँगन-द्वरा नाचता।

वह भी क्या कवि, नहीं नचाती
शब्द-शब्द को जिसकी तड़पन
वह भी क्या छवि जिस पर होता
नहीं, मुग्ध नयनों का नर्त्तन।

एक नर्त्तकी के चितवन पर मुकुटों का अधिकार नाचता।

तुम क्यों बैठे हो मन मारे।
तुम्हें नाचना होगा प्यारे।
मोह तुम्हें थिरकायेगा ही
बाजी तुम जीते या हारे।

पथिक नाचता, पंथ नाचता- यों सारा आधार नाचता।
लुटने वाला नाच रहा है, साथ-साथ बटमार नाचता।

(1.3.74)

स्वतन्त्रता की रजत-जयन्ती और एक शहीद की माँ

बचपन कि जवानी कि बुढ़ापा यारों,
कोई तो बता दे कि शहादत की उमर क्या है?

जो कि पीने के वास्ते ही हुए हैं पैदा-
उनकी खातिर यह अमृत, यह जहर क्या है?

जो कि मरने के लिए सिर्फ यहाँ जीते हैं,
उनके लिए मुकुट क्या, कफ़न क्या है?

जो कि दो घड़ी को बहके-बहके चले जाते हैं,
उनको ये वीरान क्या, चमन क्या है?

जो कि देने के लिए सिर्फ यहाँ आये हैं,
उनके लिए ये तूफान, ये कहर क्या है?

जो कि सब कुछ लुटा चुपके चले जाते हैं,
उनके लिए कोई किस्सा, कोई बहर क्या है?

कीमत है शहादत की बड़ी या छोटी,
यह तो खुदगर्ज जमाना ही बता सकता है।

गुरवत में मजेदार कितनी आजादी,
हल्दीघाटी का यह राणा ही बता सकता है।

मजा है क्या बेमोल सिर कटाने का,
वह कोई देश का दीवाना बता सकता है।

फाँसी पर झूल के भी क्या हँसने का मजा,
यह तो भगतसिंह का अफसाना बता सकता है।

ऐसे तो हर औरत ही बनी जनने को,
सृष्टि की टकसाल कहाँ रुकती है?

बेटे के जनम के मानी क्या?
यह कोई शहीद की माता ही बता सकती है।“

यह कल बोली मुझसे शहीद करीम की माँ
शहीद करीम जो कि गाँव के रिश्ते में मेरा चाचा था,

क्योंकि वह जमाना था, जमाना जब
हिन्दू ताजिए में कंधे लगाते थे,
होली में मुसलमान दाढ़ी रँगाते थे,
राम करते थे हसन-हुसेन, रहीम आल्हा गाते थे।

एक ही इज्जत सबकी थी
वह भी मधु लपेटी थी।
एक की बहू, बेटी सबकी बहू-बेटी थी।
खड़ी है सामने मेरे शहीद करीम की माँ
तुम कहोगे, एक मुसलमान की माँ।
सफेद वस्त्र पहने, उसी की तरह पाक
सच है, वह पूरे हिन्दुस्तान की माँ

जिसको थोड़ा भी होता है विवेक
वे जानते हैं कि सब माँओं की होती है जाति एक।
हिन्दू-मुसलमान, सिक्ख-ईसाई, गोरे-काले
माँ को केवल माँ समझने वाले,

भारतमाता का मान करते हैं।
वे ही देश की खातिर
समय पर मरते हैं।

शहीद की माँ का चेहरा एक दर्पण है,
जिसमें झाँकता सारे देश का तन-मन है।

साफ-साफ देखता हूँ ढाई दशकों का इतिहास
स्वतन्त्रता की रजत जयन्ती का फीका उल्लास।
यह उल्लास जैसे किसी बुढ़िया की गुड़गुड़ी के चिलम की आग,
जो दम लेने से जाती हो जाग।
मुँह हटा लेने से हो जाती है निस्तेज,
जैसे असहयोग-आन्दोलनों से हमारे पंगु हो गये थे अंग्रेज।

ढाई दशाब्दी स्वतन्त्रता की संघर्षों-भरी है,
जो कि निश्चय ही उन्नतियों की सीढ़ियाँ चढ़ी हैं।
अपनी आन-बान-शान के लिए,
अपने देश के सम्मान के लिए,
दुश्मनों से फौलादी फौजे़ हमारी लड़ी हैं।

लड़े हैं हम अमीरी से, गरीबी से।
बाढ़ और सूखे की बदनसीबी से।

लेकिन न अपने-आप से लड़े हैं हम।
स्वार्थ के घेरे में ज्यों-के-त्यों खड़े हैं हम।

गुलगुले गद्दों पर फिसल रही है नेतागिरी।
मुखौटे लगाकर अधिकांश नेता दिखा रहे हैं जनता को बाजीगरी।
और अफसर?
कहते नहीं थकते-येस सर, येस सर!
सरकार की नीतियों में रात-दिन टूटते-ढलते हैं।
तो न्याय के तराजू पर उछलकर चढ़ जाता है नेता का पुछल्ला।
अनकही नहीं करने पर, करता है, पटना-दिल्ली में हल्ला।
स्थानान्तरण का भय दिखाकर खा जाता है रिलीफ का गल्ला।
मन्त्री भी क्या करे, कहाँ-कहाँ मरे।
पहले तो टिकट के लिए दौड़ा-दौड़ा फिरा।
फिर वोट की मुसीबतों में घिरा।
गुण्डों-मुस्टण्डों को दिये पैसे-
लगा दो मुहर मेरे नाम पर जैसे-तैसे।
फिर मन्त्री बनने के लिए क्या-क्या न किया।
दिल दिया, ईमान दिया, मान दिया।
फिर खींचती रही सोंधी गन्ध पोर्ट-फोलियों की
तीन तरह की गन्ध होती है मालपुए की विभागों के-
तेल की, डालडा की, घी की।

ढाई दशाब्दियों की आजादी और हम शिक्षक?
कुछ तो किताब पढ़-पढ़ मरे।
कुछ राजनीति की डोर पकड़ ऊपर चढ़े।
कुछ ने पढ़ाने के अलावा किए सब काम।
दम मारने में, बम मारने में या भाषण झाड़ने में किया नाम।

और परीक्षा-भवन?
छात्रों ने बना दिये दंगल।
शौचालयों में मल-स्थान पर उगे पुस्तकों के जंगल।
इंजीनियरों ने मिट्टी में बालू फेंटी,
डॉक्टरों ने देखकर प्राइवेट ट्यूटर को बीमार
जाँच कर श्रद्धा से, पेन्सीलिन की जगह दी इन्सूलिन की सुई,
घटना जो होनी थी, हुई।
छात्रावासों में कलमधर की जगह लट्ठधर आए।
फूलों पर तितलियों की जगह विषधर आए।
ढाई दशाब्दियों की यह स्वतन्त्रता,
मिलावट की कला में निष्णात।
बस एक ही चीज शुद्ध रही, तेजपात।

आयकर वाले उन्हें नोचते हैं जो शुद्ध वेतन-भोगी हैं।
पूँजीपतियों के लिए वे आँख मूँदे योगी हैं।
‘डाल दो बाबा की झोली में जो डालनी हो
यदि उन्हें अपनी टोपी नहीं उछालनी हो।’

ढाई दशाब्दियों की यह वेला-प्रसन्न हूँ कि देशवासी महान् से महत्तर हो रहे हैं।
दुखी हूँ कि आज भी अर्द्ध-नग्न, निर्वसन क्षुधार्त्त- जन रो रहे हैं।
दुखी हूँ कि भूल गये हैं लोग उन्हें जिनके रक्त से देश का अरुणोदय हुआ।
गुलाम मरे, स्वतन्त्र जन्म-खण्ड प्रलय हुआ।
मानता हूँ, देशभक्तों की बनाई जा रही है सूची,
सिंहों के बनाये जा रहे हैं लेहरें।
उन्हें ताम्र-पत्र और पुरस्कार दिये जा रहे हैं,
मान गया शासक नहीं हैं बहरे।

अरे कुछ ऐसा करें सब लोग कि शहीद की माँ
बनने की ललक सुहाग-रात में हर स्त्री में समा जाए,
हर एक जवानी कफ़न की माला पहने गरब से इठलाए।

भाव की सरिता में चला बहता मैं।
पता नहीं कि और क्या-क्या कहता मैं!

देखा कि चुपके वह शहीद करीम की माँ
मजार पर बेटे के जा झुकी ऐसे-
जैसे कि नन्हें बालक को चूमने को माता झुकी हो,
जैसे कि पूनम का चाँद किसी समुद्र के कोर पर झुक गया हो।
एक माँ का बेटे की कब्र पर झुकना,
जैसे अतीत चलने लगा हो,
भविष्य रुक गया हो।\

खिड़कियाँ दो खोल

खिड़कियाँ दो खोल,
आने दो उन्हें, जो कुलबुलाते हैं।

द्वार तक आकर, विकल तुमको जगाते हैं।
मुँह छिपाने से अँधेरा मिट न पायेगा,
बन्द चाहे कान जितनी बार कर लो,
है अगर ऋतुराज, कोकिल गीत गायेगा।

समय की आवाज ही आकाश-भाषित है
मत करो उनकी उपेक्षा, कंठ जिनके अभी फूटे हैं,
प्राण के तूणीर से जिनके, शब्द बनकर मंत्र छूटे हैं,
तुम लगाओ गले, जो तुमको बुलाते हैं

खिड़कियाँ दो खोल,
आने दो उन्हें, जो कुलबुलाते हैं।

जो गये, वे प्रेरणा के स्रोत, यह मैं मानता हूँ,
जो नये, वे शक्ति ओत-प्रोत, यह भी जानता हूँ।
पूर्वजों के नाम की ये तख्तियाँ भारी-
नयी पीढ़ी की अगर गर्दन झुकाती हैं, सहेगा कौन उनको?
कहेगा कौन इनको सुमरनी कंकाल की ले लो?
कहेगा कौन किरणों को, लहर से तुम नहीं खेलो?

स्वप्न उनका लिखेंगी चिनगारियाँ ही,
लोरियाँ तूफान ही जिनको सुनाते हैं।
खिड़कियाँ दो खोल,
आने दो उन्हें, जो कुलबुलाते हैं।

सिर्फ शीर्षकहीन होने से नहीं तुम,
रद्दियों के टोकरे में गीत को डालो।
सिर्फ भाषा-दोष से मत तुम किसी की
दर्द-धोयी प्रार्थना टालो।

अनकहे को आज वाणी दो कि प्यारे,
अनसुने को कान दो।
स्वप्न में जो घुट रहे हैं छटपटा,
तुम उन्हें भी रूप दो, निर्माण दो।

है न भाषा सिर्फ अभिलाषा
एक मरु ही है नहीं प्यासा
चीखकर जिसने जगाया जग गये तुम।
अब उन्हें भी गुनो, जो संकेत से तुमको सुनाते हैं।

खिड़कियाँ दो खोल,
आने दो उन्हें, जो कुलबुलाते हैं।

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