श्याम सुशील की रचनाएँ

दुख ज़मीन है

दुख
ज़मीन है
एक बीज-सा जिसमें
कुनमुनाता है
सुख

लहर है दुख
अनंत सागर की
एक मछली-सा जिसमें
डूबता-उतराता है
जीवन

अंधेरे में
प्रकाश की
टोह लेता हुआ
न थकने वाला
हाथ है–

यहाँ रहना है तो.

ज़मीन की तलाश
तोड़ डालेगी तुम्हें

यहाँ रहना है तो
पत्थरों में–
फसल उगाना सीखो !

वरना भूल चुका होता बहुत कुछ 

थोड़ी-सी मिट्टी
थोड़ी-सी हवा
थोड़ी-सी धूप
थोड़ा-सा पानी लेकर
मैं आया था यहाँ

आज सोचता हूँ
अच्छा हुआ खाली हाथ
नहीं आया
वरना भूल चुका होता
बहुत कुछ ।

हमारी ज़िन्दगी

बाबा नागार्जुन और त्रिलोचन के प्रति

आपका जीना
हमारी ज़िन्दगी है

आप युग-युग तक जीएँ
जिससे
जी सकें हम :
मधु हलाहल
पी सकें हम
ज़िन्दगी का !

अइया के गुजर जाने के बाद

अइया के गुजरते ही
अकेले पड़ गए बाबा
घर ने निरा अकेल।

पांच-पांच बेटों केबाप
बाबा इतना अकेल
पहले तो कभी नहीं हुए
जब तक थीं अइया-

बाबा कहते
‘घर का भीतरला पोढ़ हो तो
बाहर की दुनिया से जूझते
जीनहीं घबराता।’

अइया संभालती थी
घर का भीतरला मोर्चा:
सबसे तगड़ा मोर्चा
पांच-पांच बेटों की बहुओं का मोर्चा
संभालती थी अइया
जब तक रही-
अब कुछभी अच्छा नहीं लगता!
क्या मजाल
घर की दीवार की
एक भी ईंट पर पड़ जाए
किसी की कुमति की खरोंच भी।

अइया के सिधारते ही
टूटी बहुओं की नाथ
बेटे संभाल नहीं पाए-
‘तिरिया चरित्तर’,
बाबा समझाते भी बेटो को
तो पाते गाली और घुड़क
घर से निकाल दिए जाने की।

इस तरह
शुरू हुई हिलनी दीवारें
घर की नींव-
देखते-देखते
भरी-पूरी बखरी के
हुई कई टुकड़े।

बुढ़ापे में
अपनी भडरी
खुद लगानी पड़ी बाबा को
अइया के गुजर जाने के बाद।

विमाता के लिए दो कविताएँ 

1.
एक दिन
जब हमारा जीवन
हो गया था बिना छप्पर-थूनी
तुम आयी थी
हमारी नन्ही सी दुनिया में
घोंसला बनकर

तुम आयी थी तब
हम पक्षियों ने
नहीं जाना था उड़ना।

टुकुर टुकुर ताकते थे हम तुम्हें
अपने भीतर के समूचे भय के साथ

-कि तुमने हमें छुआ:
हम उड़ने के काबिल हुए
-तुमने हमें सहलाया
हम लायक हुए
हर विपदा से जूझने के।

-तुमने हमें शाबाश कहा:
हमारी पीठ
और पोढ़ हुई।

इस तरह
हम असहाय पक्षियों का जीवन
तुमने अपना हाड़-मांस गलाकर
आबाद किया…
मां
क्या पता था एक दिन
हमें ही तुम्हारा घोंसला उजाड़कर
कहीं उड़ जाना होगा!

2.

हम फिर लौटेंगे

बनाना तुम सरसों और बथुए का साग
मकई कीरोटी साथ में
चटनी आंवले की

खिचें चले आयेंगे हम।

खानाबदोश जीवन ही ऐसा है
क्या कहें कहां-कहां भटेगेंगे
सीने में दर्द लिए दुनिय का
टूट-बिखर जायेंगे।

आयेंगे
अपने थके दिनों की ऊब को
तुम्हारे स्नेह की माटी में
दफनाने को

हम आयेंगे।

मकान

दिन भर को
ढोकर
जब वापस लौटता हूं

घर हलचल नहीं करता
देखकर-
एक उसांस
छोड़ता है

जिसे जहरीले तमाचों सा
तड़ातड़ पड़ता हुआ
झेलता हूं।

चेहरा
नीला पड़ जाताहै…

और फिर
मकान के मलबे को
ओढ़कर
मरा-सा
सो जाता हूं।

सुबह अखबार की सुर्खियों में
सब कुछ होता है
मगर यही नहीं होता कि-

एक मकान ने
रात भर
आदमी को
किस तरह मारा…

अपने जन्मदिन पर 

आज मैं
बड़े तड़के उठा
मुंह अंधेरे
चला आया
सड़क पर

चहकती चिड़ियों ने
स्वागत किया मेरा
झूमते पेड़ों ने
कहा-
‘जन्मदिन मुबारक!’

आज मुझे
दुनिया बड़ी भली लगी।

आज मैं
यूं ही
बस यूं ही
घूमा किया
नंगे पांव
धूल और
पीली पड़ी दूब पर,
महसूसता
तलुओं में
किन्हीं खुरदुरी हथेलियों का सा
गुनगना स्पर्श!

आज मुझे
वह बदनसीब औरत
बहुत याद आयी
जिसकी आंखों से
मैंने-
पहली ही पहली बार
देखा था
संसार।

महानगर-1 

जमीन की तलाश
तोड़ डालेगी तुम्हें

यहां रहना है तो
पत्थरों में

फसल उगाना सीखो!

महानगर-2

थोड़ी सी मिट्टी
थोड़ी सी हवा
थोड़ी सी आग
और थोड़ा सा पानी
थोड़ा आकाश लिए
आया था यहां मैं

आज सोचता हूं
अच्छा हुआ खाली हाथ
नहीं आया,
वरना भूल चुका होता
बहुत कुछ।

दुख

दुख
जमीन है
एक बीज साजिसमें
कुनमुनाता है
सुख

लहर है दुख
अनंत सागर की
एक मछली-सा जिसमें
डूबता-उतरता है
जीवन

अंधेरे में
प्रकाश की
टोह लेता हुआ
न थकने वाला
हाथ है-
दुख।

हमारी जिन्दगी 

(बाबा नागार्जुन और त्रिलोचन के प्रति)

आपका जीना
हमारी जिन्दगी के
आप युग-युग तक जिएं
जिससे
जी सकें हम:
मधु-हलाहल
पी सके हम
जिन्दगी का!

पत्र त्रिलोचन के नाम

श्रद्वेय त्रिलोचन जी, कैसे हैं और कहां हैं
आप इन दिनों? जैसे भी है और जहां है
जूझ रहे ही होंगे जीवन, घर, समाज से
हर विपदा से। संघर्षों के मूल ब्याज से
मुख को मोड़े बढ़े चले ही जाते होंगे
दुख के घोड़े पर सवार हो गाते होंगे
अपनी रव में। याद आपकी आ जाती है-
मेरी थकी चेतना जब-जब घिर जाती है
अंधियारे में, नयी रोशनी पा जाती है
जीवन का उल्लास हृदय में भर जाती है

और आपका नाम सदा आंखों में आंजे
ऊबड़-खाबड़ पथ पर बढ़ता हूं मैं आगे।

आज तुम्हारी याद बहुत ही आई मुझको

आज तुम्हारी याद बहुत ही आई मुझको
आज न जाने मन क्यों बहुत उदास रहा
थका-थका टूटा सा। लेकिन पासरहा
ध्यान तुम्हाराः देता रहा तसल्ली मुझको

कि मैं नहीं अकेला हूं इस महाभंवर में
और बहुत हैं साथ मेरे जो डूब रहे हैं
चट्टानों को तोड़ रहे हैं, टूट रहे हैं
लेकिन फिर भी डटे हुए हैं महासमर में

विपदाओं से कौन बचा है जीवन-रण में?

जो उतरा है उसे झेलना ही है, झेले
हंसकर सीना तान के या फिर रोकर ठेले
इससे अलग कहां है मुक्ति इस-उस क्षण में

तुमने कहा, लो देखो मैं अब भी हंसता हूं
इस जीवन पर, जिसकी चोटें सहकर भी मैं कब झुकता हूं।

डर

अल्ला से नहीं
ईश्वर से नहीं
मंदिर से नहीं
मस्जिद से नहीं
डरे हुए लोगों से
बहुत डर लगता

आओ मेरी बच्ची

(ढाई साल की बेटी के लिए)

आओ मेरी बच्ची
दौड़कर आओ/चढ़ जाओ मेरे कंधेपर
घोड़ा बनाकर मुझे
बैठो मेरी पीठ पर।

आओ मेरी बच्ची
रोते हुए आओ मेरे पास
अपने घुटनों और कुहनी पर
लगी हुई चोटों को दिखाओ मुझे
तुम्हारी चोटों पर मरहम रखूंगा मेरी बच्ची
अपनी जीभ से चाटकर भरूंगा तुम्हारें घावों को।

आओ मेरी बच्ची
हंसते हुए आओ मेरे पास-
मेरे तमाम दुखों को रूई का फाहा बनकर
उड़ा दो हवा में

मेरी तमाम चिंताओं को
अपनी निश्छल हंसी के गुब्बारे में भरकर
उड़ा दो आसमां में

आओ मेरी बच्ची
अपने खिलौनों की दुनिया में ले चलो मुझे।

आओ, यही वक्त है दो-चार साल का
जब तुम मुझे बना सकती हो घोड़ा
और बैठ सकती हो मेरे कन्धे पर चिड़िया बनकर
यही वक्त है दो-चार साल का
जब तुम मुझे लौटा सकती हो मेरा बचपन
मेरे आंसुओं का अर्थ बिना जाने पोंछ सकती हो
और मुझे हंसने पर कर सकती हो विवश।
यही उम्र है जब तुम मुझसे चिपटकर रो सकती हो
अपनी तमाम इच्छाओं को पूरा कराने की कर सकती हो जिद
यही उम्र है मेरी बच्ची
तुम्हारे रूठने और जिद करने की…

चार वर्ष बाद
तब तुम बड़ी होने लगोगी लगातार
तब तुम्हारे हंसने और रोने का अर्थ बदलने लगेगा।
तब शायद यह सोचकर कि पापा तुम्हारी इच्छाओं को
कैसे करेंगे पूरा

तुम अपने मन की बात अपने भीतर ही दबाने लगोगी
तब शायद मैं तुम्हें सीने से चिपटाकर
रो भी नहीं पाऊंगा…

आओ मेरी बच्ची
यही वक्त है
अपनी इच्छाओं की पोटली खोल सकती हो
अभी मेरे सामने
बाद की कौन जाने!

आएंगे अच्छे दिन

आएंगे अच्छे दिन
लिखेंगे हम भी अच्छी कविताएं
एक भली दुनिया के गीत हम गाएंगे!

अभी हम दुर्दिन के अंधेरे में घिरे हैं
धरती की कोख में पड़े हुए बीज हम उगने को आतुर हैं
कह नहीं सकते लड़ाई यह कब तक चले
मगर विश्वास है ऊभ-चूभ उभरेंगे
सांसत के दिनों से उभरेंगे
एक दिन नाचेंगे हम भी
क्रूर काल के फन पर
वंशी बजायेंगे…

लाएंगे हम ही
अच्छे दिन लाएंगे…

रंग हवा का 

चोट मुझे लगती है, मम्मी
तुमको क्यों होता है दुख,
अच्छे नंबर जब लाता हूँ
पापा क्यों हो जाते खुश!

फूलों में खुशबू होती है
मगर हमें क्यों नहीं दीखती,
रंग हवा का क्या होता है
कहाँ-कहाँ वह उड़ती फिरती।

गुस्सा कहाँ छिपा रहता है
हँसी कहाँ से आ जाती है,
चंदा को मामा क्यों कहते
धरती माँ क्यों कहलाती है।

सूरज में क्यों इतनी गरमी
चंदा में क्यों शीतलता है,
मम्मी, जब तुम हँसती हो तो
मुझको क्यों अच्छा लगता है?

-साभार: नंदन, सितंबर, 1998, 36

पापा की चिट्ठी

चिट्ठी आई, चिट्ठी आई,
पापा जी की चिट्ठी आई!

दिल्ली से चल करके आई,
बिना पंख उड़ करके आई,
ट्रेन से आई, प्लेन से आई,
बस से, बाइसिकल से आई,
जाने कहाँ-कहाँ से होकर-
आज हमारे घर तक आई!
चिट्ठी आई, चिट्ठी आई,
पापा जी की चिट्ठी आई!

यह लो मम्मी झटपट खोलो,
चिट्ठी पढ़कर मुझे सुनाओ,
क्या लिक्खा है पापा जी ने,
कब घर आएँगे, बतलाओ!
बहुत दिनों के बाद याद-
पापा को उनकी बिट्टी आई!
चिट्ठी आई, चिट्ठी आई,
पापा जी की चिट्ठी आई!

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