श्रीधर करुणानिधि की रचनाएँ

वे ही तय करते हैं

अब वे ही तय करते हैं हमारी खातिर
हमारे न चाहते हुए भी
तय करते हैं कि
कितनी हो हमारी टाँगों के हिस्से धरती
बाहों को आकाश
और आँखों को बादल

तय करते हैं वे कि
हमारी फ़सलों को कितनी चाहिए नमी
बीज, खाद
और सूरज

वे ही तो तय करते हैं
हवाओं का रुख़

अब तो फलों के पकने का
मौसम भी तय करते हैं वे
तय करते हैं कि
कितना खिलना है फूलों को
मासूम दिखने की खातिर

नदी

एक बहती नदी में
क्या है जो बहता है ….
एक बहती नदी में ही
क्या है जो अक्सर कुछ कहता है
हमारी नज़रों में भले ही न आए
उसकी दुबली होती देह से निकलकर
कुछ है जो हमारे साथ रहता है …

एक बहती नदी भी ठूँठ हो सकती है
चलते-चलते अचानक
ठहर सकती है घड़ी की तरह
एक बहती नदी भी बुझ सकती है दीए की तरह
एक बहती नदी भी डूब सकती है बालू के जंगल में…

हमें पुकारते-पुकारते थक भी तो सकती है
एक बहती नदी …।

चिट्ठी

चिट्ठी के बारे में कुछ कहना
उस पूरी दुनिया में डूबकर बीचों-बीच गुज़रने की तरह है
जिसका कोई ओर हो न छोर …

कोई असफल प्यार हो ज्यों
और उसके ज़ख़्म का दर्द हो
जो सालता हो अन्दर ही अन्दर

माओं का धीरज हो
और पुत्रों के लिए उनकी आकाँक्षा
जो गलाता ही रहता हो हरदम …

नई नवेलियों की डबडबाई आँखें हों
और पतियों के लिए उनका उलाहना
जो जलाता ही रहता हो हरपल …

फिर ज्यों शब्द हों और अर्थ भी हों उनके अपने-अपने
इन सबके दर्द भी हों अपने-अपने

अन्त में
शरणार्थी की तरह
आशा-निराशा दुख-दर्द को
अपनी विश्वास भरी पोटली में लेकर
चली जाती थी चिट्ठी अपने गन्तव्य …

अब भी जबकि हैं शब्द
और अर्थ भी हैं उनके अपने-अपने
अब भी ऐसा नहीं है कि न दर्द रहे न सपने
पर लोग जाने क्यों नहीं पूछते कि
नहीं आती अब चिट्ठियाँ …
अजी ! क्यों नहीं आती हैं अब चिट्ठियाँ …।

कहानी और चान्द

कहानी सुना करते थे हम
बुआ की गोद में सिर रखकर…
पूर्णिमाँ के दिन जब चान्द
माँ की रोटी की तरह गोल हो जाता
तब रात के समय भी कहते हम…
“बुआ खोजो न जू”
और खोजतीं बुआ
हमारे काले घने बालों में
ढूँढ़ते हम भी …
दूर आसमान से झड़ती
दुधियाई रोशनी में
चकित आँखों से …
कि तभी …
दूध से लबालब भरे कटोरे-से चान्द में
झुर्रियों के साथ उभर आता एक चेहरा …

सुनाती थी बुआ … कि
हमारे गाँव के उस सबसे पुराने
आम के वृक्ष से पूछो या नहर के उस पार
बीच परपट पर उगे
उस भूतहे इमली के पेड़ से
सभी बताएँगे …
“गाँव की बूढ़ियों को क्या
नींद आ सकती थी बिना झगड़े
दिए बिना गालियाँ !
क्या पच सकता था उनका खाना …!
रोज़ की रोज़
थोक की थोक
शिकायत उगलतीं बहुओं की
कुँए के पाट पर बैठकर”

आसमान में बाँहें फैलाए
इस कँटीले-झबरैल जिलेबी के गाछ से भी
पूछ सकते हो
इठलाएगा वो
खुशामद करवाएगा….
तब कहेगा गम्भीर कथावाचक-सा
“हाँ, पर अपने पोतों को
कालिख की बिन्दी लगाए बिना
कहाँ जाने देती थीं बाहर…
उनकी बीमारी पर
दे आती थीं डाइनों को
सूप के सूप गालियाँ
किसिम-किसिम की धमकियाँ …

गाँव के इस सबसे पुराने
कुएँ से पूछो तो शरमाएगा
याद करेगा अपनी शादी के दिन
अपनी जवानी के दिन
गीत गाती औरतें …
सिन्दूर के पाँच टीके
बस, हो गई शादी !
अब पनिहारिनें भर सकती हैं
शादी के लिए जाते दूल्हे का पानी …
सचमुच सैकड़ों शादियों के साक्षी हैं इसके चबूतरे
दुलहिनों की बाबरी धड़कनों को क़ैद किए हुए …

टूट-टूट कर मिट्टी में मिल जाएँ, भले
कुएँ के चौरस पाट
लकड़हारा भी नहीं छोड़े आम के बूढ़े गाछ
मर-खप भी जाएँ पहले के सारे कथावाचक
पर रोटियाँ तो बनेगी तीसों दिन
नौसिखिए रसोइए की तरह
कई दिनों की मेहनत के बाद
एक दिन उगेगा उसी रोटी-सा चान्द भी
फिर चान्द की बुढ़िया चुपके से
उतर आएगी कहानियों में
जबतक शेष रहेगीं पीढ़ियाँ
शेष रहेगी कहानी और शेष रहेगा
उसमें दुबका पड़ा चान्द भी ….

इन्हीं संकेतों से

जब नष्ट हो जाएँगे
सारे शब्दकोश
और चुक जाएँगी
सारी की सारी भाषाएँ
तब भी पुकार के लिए
बची रहेगी गुंजाइश
इक्के-दुक्के शब्द जैसे संकेतों के सहारे

तुम्हारे हिलते हाथों को
मुड़कर ज़रूर देखेगा
वो उड़ कर जाता पनडुब्बा
हो सकता है
लौट आएँ वे प्रवासी पंछी
इस उदास झील में …

अपने अकेलेपन में संकेतों के सहारे ही
कोशिश करो तो
लौट सकता है प्यार
कोपलों की शक्ल में
सूखे पेड़ों की शाखों पर …

रूठ कर गईं चीज़ें
एक-एक कर आ सकती हैं वापस
अगर संकेतों में ही सही
तुम पुकार सको ।

आज 

वही हुआ
जिसका सबको डर था
एक छोटी-सी चिड़िया लौटी

तो देखा उसका घोंसला ग़ायब था
वह रोती रही रोती रही
चुप हुई तो देखा सामने रात पड़ी थी
एक घनघोर अन्धेरी रात !

आज गाँव के कारीगर की साइकिल खो गई
उसके सारे औज़ार उसी पर बन्धे थे
उसे रोना आया, पर वह रोया नहीं
उसे काम पर जाना था, पर वह गया नहीं
अब उसके आगे भूख पड़ी थी
और वह बदल रही थी एक भयानक आग की लपट में
ठीक उसके बीबी-बच्चे के सामने …
वह पास के जंगल गया
और उदास बैठा रहा, बैठा रहा
कि देखा जंगल ही ग़ायब है
उसके मोटे-मोटे पेड़
जिससे निकलती थीं बेशक़ीमती लकड़ियाँ
सब ग़ायब !

आज स्कूल जाते बच्चे की पेंसिल खो गई
पहले वह बहुत ख़ुश हुआ
उसकी सपनों सी आँखों में
उधम मचा रहे थे कई खेल
पर अचानक याद आते ही
वह ढूँढ़ने लगा इधर-उधर
गड्ढों में, धूल-भरी सड़क पर
हर जगह, जहाँ उसने सोचा
हर जगह, जहाँ दूसरों ने कहा
फिर वह ख़ूब रोया, ख़ूब रोया
चुप हुआ तो देखा आँखों के आगे ढाबे थे
चाय की दुकानें थीं
जूठे कप-प्याले थे बिखरे हुए…
उसने देखा उसके शरीर से बचपन ग़ायब है

आज किसान के खलिहान से अनाज का बोझा खो गया
पहले वह उसे ढूँढ़ लिया करता था अपने खेतों में
लेकिन उसे अब वहाँ ढूँढ़ना बेकार था
वह रो नहीं सकता था
इसलिए रोया भी नहीं
उसने सोचा
और अचानक बहुत डर गया वह
देखा उसकी आँखों से सपने ग़ायब हैं

लेकिन अभी-अभी एक नई बात हो गई
जो पहले कभी नहीं हुई …
जब सब अपनी-अपनी जगह से बाहर निकले
जो एक रास्ता था वो ही ग़ायब था
कोई भी समझ नहीं पाया कि
इस पर हंसा जाए कि रोया जाए
लेकिन अब डर सबकी आँखों में था

जादू

“सब जा रहे हैं अपने अन्त की ओर
और देखना एक दिन ख़त्म हो जाएगी हमारे हिस्से की धरती
हमारे हिस्से का यह चान्द
यह जगर-मगर करते तारे
ढरके दूध की तरह यह आकाशगंगा
हमारी इस धरती के सारे पहाड़, जंगल और नदियाँ।”
“क्या तुम्हें नज़र नहीं आता डर सबकी आँखों में !
ख़ुद तुम्हारी आँखें भी कर देती हैं बयान”

“सोचो नहीं
देखो !
देखो, जहाँ तक देख सकते हो
छूओ, जिसे तुम छू सकते हो
ख़ुद ब ख़ुद सिहरन होगी तुम्हारी देह में
ख़ुद ब ख़ुद सुनोगे तुम अन्त का गान
जो बज रहा है मादक धुन की तरह
हवा, मौसम, रंग और बादल में
चिड़ियों की चहक
कलियों की शोखी और लाल-लाल ताज़ा पत्तों में
अगर सुन सको एक मासूम बच्चे की तरह
अगर बन सको उनकी तरह मासूम

बातें करो नदी से
पहाड़ के कन्धे पर धरो अपने हाथ
उनसे उनकी भाषा में बातें करो

किसान की आँखों में झाँको
देखो उनके हल-बैल, उनके उजड़े खेत
कुम्हार के टूटे चाक
बढ़ई के बेकार पड़े बसूले को …

महसूस करो मातमी सन्नाटे
बरगद के नीचे नोच-नोच कर गिराए गए
घोंसलों पर रोती चिड़िया का दर्द
दुबली होकर सूखती गाँव की धार के सर्द चेहरे
ख़त्म होती जीवन की लय का भयगान
और सदियों से संचित कथाएँ और गीत”

“क्या तुम्हें नहीं लगता कि
हमारी रगों में
हौले-हौले फैलता जा रहा है
एक ख़ूबसूरत मीठा ज़हर
और हम नीम बेहोशी में खोए कर रहे हैं वही
जैसा कहता जाता है वह जादूगर…।“

“क्या तुम्हें नहीं लगता कि
अपने मायाजाल में
वह होशियार जादूगर समेट लेगा
मिट्टी पसीने से बनी और मेहनत से
सजी-सँवरी हुई यह हसीन दुनिया !

जिनके नहीं होने से 

जिनके नहीं होने से
कुछ नहीं हुआ था
और लगभग हर माँ के मुँह से
दबी-सी चीख़ निकलने के बाद
सब कुछ हो गया था
बिल्कुल सामान्य ….

माथे पर शिकन के बदले
पसर गई थी एक निश्चिन्तता
हर किसी के ….
कि चलो जो हुआ अच्छा हुआ ….
जैसे कोई बड़ी बात नहीं
कि जैसे यह तो होना ही था
जैसे कि छोड़ो इन बातों को
अपना काम देखो ….

रसोई से निकलने लगा था धुआँ
रोटी भी पकने लगी थी
ठीक उसी दिन से हर घर में
और हर अकुलाते पेट को
मिल गई थी तृप्ति
मुँह को मिल गई थी डकार की फुरसत

खस्सी के लिए आज भी
झुक गया था
पीपल का बड़ा सा पेड़
और अपने पोते के लिए
घोड़ा बन गया था दादा ….

कहीं कुछ हुआ था तो यही
कि घर में बकरी ने
दो मरी हुई पाठियाँ जनी थीं
और सौभाग्यवती गाय की आँखों से
निकलते आँसू को
आँखों की ख़राबी समझ रहा था
हर कोई ….

कहीं कुछ हुआ था तो यही
कि धरती की कोख का बीज
ख़त्म कर दिया गया था
उगने के पहले…..
और बाँझ होने के डर से त्रस्त हो
वह रो रही थी
पर हर कोई समझ रहा था उन्हें
ओस की चन्द बून्दें ….

तेरे हिस्से का पहाड़ अब उनका

तेरे आबनूसी शरीर की लकड़ियाँ
बेशक़ीमती हैं
तेरे घर के इर्द-गिर्द टिब्बे-टीले-पहाड़
खज़ानों की तरह
इतने बरस तक जंगल हरे रहे
तुम्हारे गीतों को सुन
पहाड़ ऊँचे रहे तुम्हारे सीने को देख
हटो कि पहाड़ अब कट रहे हैं
हटो कि पेड़ अर्राकर गिर रहे हैं
तेरी धरती के नीचे
है बहुत ईंधन
है बहुत सोना
गवारा नहीं उन्हें अब एक पल भी खोना ….

नंगे पेड़ों का अभिनय

कहने को कुछ भी कहो
अपने अन्त के लिए तैयार बैठे मौसम से
हज़ारों जिरह के बाद ही
अपने पत्तों को गिराकर नंगे खड़े हैं पेड़ ….

इस अनोखे हादसे के बाद
कई बच्चों ने नंगे होकर उतारी है
पेड़ों की नक़ल …

इस रंगमंच पर
अपने अन्त के पहले मौसम ने
जिन पेड़ों से कहा
उतारने को अपने वस्त्र
उन्होंने बच्चे बनने की कोशिश की
और तभी आ सकी अभिनय में इतनी जान …

कहने को कुछ भी कहो
कोशिश तो हमने भी कुछ कम नहीं की है
पेड़ बनने की बच्चों की तरह
या बच्चे बनने की पेड़ की तरह …।

बड़ी घुमक्कड़ है रात 

साँझ होते ही
रात के कान में जूँ रेंगती है
उठकर आँख मलते हुए हो जाती है तैयार
उसे अब छोड़ जाना है अपने पीछे
बस केवल अन्धकार
कई पहचानी-अनपहचानी परछाइयाँ
जिसका इसके सिवा कुछ अर्थ नहीं
कि वे निकलती हैं चोर-दरवाज़े से
आती हैं पीछे-पीछे साँस रोककर
और फिर घुप-अन्धेरे में उतर जाती हैं
चुपके से …

सचमुच रात ही निकलती है परछाइयाँ बनकर
बारह का घण्टा बजने के बाद
कभी-कभी सब्र का बान्ध तोड़कर
निकल जाती हैं पहले भी
सड़कों-पगडण्डियों को फलाँगते हुए
फ़सलों को चरते हुए
फाँद जाती है बड़े से पोखरे में
जाल डालने के लिए
या कबूतर के खोप में घुस जाती है रात
बड़े मज़े से पकाकर खस्सी का गोश्त
हड्डियों का ढेर लगा देती है सुबह तक
गाँव या शहर के
किसी भी घर
घुस जाती है रात
दरवाजा तोड़कर ….
और भाग जाती है
छोटी सी दुनिया गायब कर

पौ फटने के पहले
अगले दिन का प्रोग्राम बनाकर
बड़े मज़े से सो जाती है रात
अगले दिन परछाईं बनकर घूमने के लिए

अब दिन में भी घूमने लगी है
सचमुच बड़ी घुमक्कड़ है ये रात ….।

विकल्पहीन

“हम कहाँ जाएँ ?”
दूर-दूर तक फैले समन्दर को देखकर
सोचते हैं जहाज़ की छत पर बैठे हुए पँछी
कहते हैं पोटली बान्धकर स्टेशन पर बैठे
गाँव के मज़दूर ….

“कहाँ जाएँ हम ?”
मरी हुई फ़सल और बंध्या धरती देखकर
कहते हैं सोनाय मुर्मू, धनेसर महतो और कई खेतिहर किसान
उजड़े आशियाँ को देखकर सोचती है
आसमान में पँख तौलती हुई
बेहद ख़ूबसूरत पँखों वाली चिड़ैया…

“कहाँ जाएँ हम ?”
एक बेरहम वाक्य
किसी अकाल के बाद की महामारी
किसी देश के बँटवारे के बाद का
शरणार्थी-शिविर
जल-प्रलय के बाद बचे लोगों की भूख
कितने ही ज़ालिमों से भरे
किसी जेल का टार्चर-वार्ड
सैकड़ों ‘आबूगरीब’
कई इराक

“हम जाएँ तो कहाँ ?”
एक दर्द भरी आवाज़
किसी माँ का
अपना जवान बेटा खोने का ग़म
बमबर्षक जहाज़ों से गिराए गए बमों से
नन्ही सी मासूम लड़की के कोमल हाथ खोने का गम
ताज़ा फूलों के गुलदस्ते का क्षत-विक्षत शव

छिनती ज़मीन
नष्ट कर दिए गए जंगल
बहुद्देशीय परियोजनाओं के लिए
बनाई गई झीलों में डूबते सपनों के घर
भटकती भीड़ थके हारों की

एक दर्द भरी सिहरन
सिसकती आवाज़ें
शिकायत कर-कर के थकी हुई ज़ुबानें
असहाय बेबस चेहरों में छिपा दर्द
सबकी आहें
झूलती बाहें
काँपतीं टागें

हर तरफ अपनी बात कहते लोग
चीख़ते-चिल्लाते लोग कि
“कोई तो बोले आख़िर कहाँ जाएँ हम सब”

क्या है कोई जगह ?
जहाँ बचाई जा सके ज़िन्दगी
महज सांसों की आवाजाही से भरी सुन्दर ज़िन्दगी
और उस सुन्दर ज़िन्दगी की एक मासूम पहचान
ख़्वाब
कोरे काग़ज़ से झूठे ही सही

क्या है कोई जबाव
कि इतनी बेरहमी से
विकल्पहीन क्यों होती जा रही है
विकल्पों से भरी दिखती यह दुनिया !

नीली आँखों के सपने

तुम्हारी आसमानी नीली आँखों में
पलते हैं सपने ….
साकार होने की चाहत लिए
गर्भ में सोए शिशु की तरह
चलाते हैं हाथ-पाँव
अपने ही भीतर …

वो ख़ुद की क़ैद से
आना चाहते हैं बाहर
देहरी लाँघकर ….
तितलियों के चटख रंगों से
बुनना चाहते हैं
अपना विस्तार ….
धमा-चौकड़ी मचाकर
बगीचे-बगीचे जंगल-जंगल
सूँघना चाहते हैं
बनैले फूलों की ख़ुशबू
दो-दो हाथ करना चाहते हैं
हवाओं के साथ

वो भरते हैं उड़ान
बन्दिशें भूलकर
फाँद जाते हैं घनघोर अन्धेरी रात में ही
बन्द मकान की खिड़कियों से
आकाश के बीहड़ में ….

और फिर परकटी चिड़ियों की
फरफराहट बनकर
सींखचों में क़ैद हो जाने की नियति ओढ़े
ख़ामोश हो जाते हैं सदा के लिए ….

अन्धेरी दुनिया को
रोशन करने के बहुत-बहुत पहले
दम तोड़ जाते हैं तुम्हारे सपने ….

चान्द से रिश्ता

अपनी छत से जब भी देखो
लगता है
लटका है चान्द
घर से सटे ठूँठ गाछ से
गोल कोंहड़े-सा

कभी लगता है
एक बड़ा तरबूज़
लेटा हुआ है बलुआही ज़मीन वाले खेतों में बेख़ौफ़
या एक बास्केटबाल
उछला है कुछ देर के लिए
और टँगा रह गया है आसमान के नीले जाल में

गिलहरी के नन्हें हाथों में मटर का एक दाना
कुम्हार के पास उलटा रखा गोल पेंदी का घड़ा
लोहार के पास रखा लोहे का बड़ा गोला
घर में साफ़ कर उलटा रखा चमचमाता नया तसला
हर गोल वस्तु
जो किसी न किसी रूप में हमारे आस-पास रहती है
होकर बेहद क़रीब
दरअसल वो चान्द ही होती है
और सबसे ख़ूबसूरत नीला चान्द ही तो है हमारी पृथ्वी
सुबह-सुबह नदी से नहाकर निकला सूरज
एक ख़ूबसूरत लाल चान्द

छिट-पुट तारे-सजे आसमान के नीचे
रोशनी जले घरों में
चान्द ही होता है हमारे पास
लम्बी पुरवैया वाली रातों में
उड़ रहे होते हैं हम
चान्द के चमचमाते पंख पहनकर

क्या कोई निर्जीव चान्द टँगा रह सकता है
हमारे घर के आस-पास या बिल्कुल सामने !
रह सकता है इतने क़रीब हमारी ज़रूरत बनकर
कि जब हम परिन्दे तौलते हुए अपने पँख
खो जाएँ आसमान की ऊँचाइयों में
या हम अपनी ही दुनिया में हो जाएँ मशगूल
अपने आस-पास से बेख़बर
तो वह जगाए हमें या दे कोई संकेत

जितने क़रीब होते हैं हम चान्द के
उतनी ही अपनी होती है हमारी आस-पास की दुनिया …

अपने-अपने हिण्डोले में

कहते हैं कि वह आ रहा है
तब जाना क्यों दिख रहा है हर ओर
क्यों लौट रहा है अपार जनसमुदाय
निराशा और हताशा की धूल उड़ता हुआ
जो जाने कब से खड़ा था
उसकी अगवानी में
अपने मैले-कुचैले कपड़ों में
साफ़ बेदाग दिल के साथ…

औरतें भी थीं उस भीड़ में
अपने दुधमुँहे बच्चों के साथ
फूफी, काकी, दादी सब खड़ी थीं
इस विशाल हुजूम में
सभी भागी-भागी आईं थीं जैसे-तैसे
अधनंगे अधछूटे कपड़ों में
कामकाज के औज़ार हाथों में थामे

अभी तो नल से गिरने वाला पानी
हाण्डों में भरा भी नहीं गया था
हर्जा कर आए थे सब अपना काम-काज
और खड़े थे बेचैन
अपना लाल-लाल धड़कता हुआ दिल
हाथों में रखकर
किसी ने जब कहा कि
‘वह आ गया है’ तो
पैर उचका-उचका के देखने लगी भीड़
लोगों ने बच्चों को कन्धों पर उठा लिया…

वह उतरा
सतरंगे हिण्डोले से
‘बहार भी उसके साथ है’ लोग चिल्लाए
‘अब देखना हर तरफ बिखरेंगे रँग ही रँग’
कुछ और लोग चिल्लाए
उसने देखा भी नहीं
हाथों में रखे लाल-लाल धड़कते दिल को

घुस गया वह सुन्दर महल में बहार के साथ
एक कठोर किलेबन्दी में चली गई बहार
फिर कहाँ खिले ग़ुल इन सबकी बस्ती में

सब लौट रहे हैं उदास
और खोज रहे हैं निराशा में ही
अपनी-अपनी बहार
अपने-अपने बसन्त ।

खजूर की चिरायँध गन्ध

बता सकते हो मुझे !
उस खजूर के पेड़ों वाले शहर का क्या हुआ
जिसके बीचों-बीच बोरों में
खजूर के बदले बम रखा गया था
और हर दिन
चिथड़ों में बदलता गया था आदमी
खजूर के मीठे जायके के साथ

मुझे जानना है
उस कत्थई बुरके वाली लड़की के बारे में
जिसका अब्बू सुनहली घड़ी लिए
उसका अब भी करता है इन्तज़ार
यह जानते हुए कि
हवा में यहाँ-वहाँ भटकती चिरायँध गन्ध में
शामिल हो सकती है किसी ज़िन्दा शरीर के
भूनने की दुर्गन्ध

मुझे बताओ कि
अपने ज़ख़्मों सहित
खजूर के गुड़-सी मीठी नीन्द सोते
बच्चे का क्या हुआ
जिसकी एक खरोंच पर
घर की दीवारें भी आहें भरती थीं

अनगिनत सपनों के जलने की दुर्गन्ध
और उम्मीदों की अधजली लाशों से पटे पड़े
और सबकी पहचानों में ग़ुमनाम
उस शहर की कहानी का क्या अन्त हुआ
बता सकते हो तुम भी ।

खोना 

उसे कभी भी सड़क पर
किसी गाड़ी के पहिये सा
चलता हुआ पाया जा सकता था
कभी भी उसे गाती चिड़ियों, लहलहाती फ़सलों
और मचलती नदी में ढलते देखा जा सकता था

उसके लिए भूख कोई बड़ा सवाल नहीं थी
लहराती फ़सलों में से किसी भी बाली के दाने
सरसों और सूरजमुखी के फूलों से चुराकर ले गए
रस से भरपूर मधुमक्खी के छत्ते से
शहद की मीठी बून्दें
पानी से लबालब भरे हुए पोखर से
नहाकर निकली किसी मस्त भैस का दूध
खेतों के उस पार की अमराई के सबसे मीठे
आम का रस
कुछ भी उसकी पहुँच के बाहर नहीं था

नीन्द उसके लिए कोई समस्या नहीं थी
उमस से भरी दोपहरी में भी खलिहान में
धान के पुआल पर लेटते हुए
काम करने के बाद सुस्ताते समय
या भिनसरे भैंस की पीठ पर
वह फोंफ काटकर सो सकता था

हंसना उसे ख़ूब आता था
कली से अचानक खिल पड़े फूल की तरह
मकई के भुट्टे की तरह दाँत निकालकर

इधर जाने क्यों वह रहने लगा था बहुत उदास
उसकी नीन्द के क़िस्से भी भूलने लगे थे लोग
भूख उसके लिए समस्या नहीं थी
ऐसा अब नहीं कहा जा सकता
उसके लाल होठों से हंसी फिसलकर गिर गई
और सड़क की धूल में ग़ुम हो गई…
उसने बहुत खोजा इधर-उधर यहाँ-वहाँ ।

पता चला है कि
सूना होते ही किसी ने उठा ली उसकी हंसी
उसकी भूख भी पड़ी थी वहीं
किसी ने उसे नहीं उठाया

समस्या यह नहीं है कि
जिस किसी ने उसकी हंसी उठा ली है
वह वापस नहीं कर रहा
बल्कि इस घटना के बाद से
खेत घूमते, हल चलाते, मेड़ों को सिंचाई
के समय बान्धते वक़्त
या फ़सल की दौनी करते वक़्त
कई लोगों की हंसी फिसलकर गिर गई
और फिर ग़ुम हो गई ।

चान्द, चिड़िया और भूख

एक सच है भूख
जितनी दुनिया सच है
और एक यह भी
कि एक छोटी सी चिड़िया
अपनी चोंच से गढ़ती है यह दुनिया
तब यह मानते हुए
कि हर दिन दुनिया नई हो जाती है
अपने कल से
भूख भी नई और बड़ी

यह दुनिया
चूल्हे पर चढ़े तवे से
जाना चाहती है जितनी दूर
यह भूख उतनी बड़ी होती जाती है

आदिम जौ-गेंहूँ के खेतों से शुरू होकर
जब एक यात्रा पहुँचती है एक बड़ी मण्डी तक
तब चान्द दावा करता है चिड़िया से बड़ा होने का
और भूख तब भी बड़ी दिखती है

चिड़िया कहती है
कि उसकी चोंच के बीच अन्न का एक दाना
चान्द से बड़ा है
और चान्द !
वह तो सच में बड़ा दिखता है दाने से

लीजिए, अब चिड़िया की चोंच से बनी दुनिया
रोटी के तवे पर सिंका-फूला चान्द
और बढ़ती हुई भूख सब को गड्ड-मड्ड कर देते हैं
तब भी एक सच यह है
कि चान्द भी रोटी की तरह फूलता है
चिड़िया भी चान्द की तरह हंसती है
अन्न का दाना चिड़िया की तरह फुदकता है
और दुनिया में भूख तब भी बढ़ रही है
चान्द होने की …।

Share