संकल्प शर्मा की रचनाएँ

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हवा देखी है तुमने?

खलिश की इन्तहा देखी है तुमने?
निगाहों की खता देखी है तुमने?

मेरे सीने का खालीपन पता है?
मेरे दिल की खला देखी है तुमने?

तुम्हें कैसे दिखाऊं अपनी आहें?
कहो तो! क्या हवा देखी है तुमने?

तुम्हें मालूम कैसे ख़त्म होगा?
सफर की इब्तेदा देखी है तुमने?

मेरे जी मैं जो है यूँ ही नहीं है,
कसक यूँ बेवजह देखी है तुमने?

मैं बेबस था यही मेरी खता थी,
खता की ये सज़ा देखी है तुमने?

फिराक ऐ यार जो सहते हैं उनके,
लबों पे इल्तेज़ा देखी हैं तुमने?

नज़र रखते हो हर हरकत पे मेरी,
मेरे लब पे दुआ देखी है तुमने?

बहुत मग़रूर हैं ये हसरतें भी,
कभी इनकी अदा देखी है तुमने?

अंतहीन इंतज़ार

कभी सोचती हो?
वो रिश्ता.
जिसका पर्याय,
आज तक ‘अधूरा’ है.
कभी सोचती हो?
वो दर्द.
जो अनवरत है,
फिर भी कितना पूरा है.
वो दिवा स्वप्न,
जो जिंदा हैं.
भले ही
उनमें से कुछ,
अब तक शर्मिंदा हैं.
क्या सोचती हो?
उस अधूरी सी,
हंसी के बारे में भी.
बताओ ना..!!!
या फिर,
कुछ उखड़े उखड़े से,
दो चेहरों के बीच,
वो पसरा सन्नाटा.
याद आता है?
कभी सोचती हो?
उसके बारे में भी.
जिसका प्रायश्चित है,
ये अंतहीन इंतज़ार..

अंतहीन इंतज़ार

कभी सोचती हो?
वो रिश्ता.
जिसका पर्याय,
आज तक ‘अधूरा’ है.
कभी सोचती हो?
वो दर्द.
जो अनवरत है,
फिर भी कितना पूरा है.
वो दिवा स्वप्न,
जो जिंदा हैं.
भले ही
उनमें से कुछ,
अब तक शर्मिंदा हैं.
क्या सोचती हो?
उस अधूरी सी,
हंसी के बारे में भी.
बताओ ना..!!!
या फिर,
कुछ उखड़े उखड़े से,
दो चेहरों के बीच,
वो पसरा सन्नाटा.
याद आता है?
कभी सोचती हो?
उसके बारे में भी.
जिसका प्रायश्चित है,
ये अंतहीन इंतज़ार..

अलविदा… 

सुनो ,
वो वक़्त अब आ ही गया है ,
जिसे ना चाहती थी तुम ,
और ना मैंने चाहा था .
सुनो ,
वो वक़्त अब आ ही गया है .
मुझे मालूम है ,
ये वक़्त बिलकुल भी आसाँ नहीं होगा ,
बहुत मुश्किल से गुजरेगा ,
मुझे ये भी पता है ,
ऐसे वक़्त की खातिर
बनी हैं ,
कितनी ही रवायतें ,
आओ ना ,
एक नयी रवायत ,
हम भी बना लेते हैं ,
फिर उसे
हम भी निभा लेते हैं ,
आओ ना ,
देख लें एक दूसरे को हम
जी भर के
हमेशा से ज़रा सा और ज्यादा
और फिर ऐसा करते हैं ,
के या तो तुम
चूमने दो मुझको
तुम्हारी पलकें
इतनी शिद्दत से
के वो छपने लगें
मेरे होंठों पे
या फिर
चूम लो तुम
मेरी पलकें
इतनी शिद्दत से
के जलने लगें
तुम्हारे होंठ..
सुनो ,
ये वक़्त ए रुखसत है ,
और हमें रस्ते बदलने हैं

उस अजनबी लड़की के लिए

मैं पिछले कुछ दिनों से
सुन रहा हूँ ,
तुम्हारी सरगोशी,
और अब
सच ये है के
तुम ही को सोचता हूँ .मैं
खिंच गयी हो तुम
मन में
एक लकीर
कच्चे कोलतार की सड़क पे
पड़े पहिये के न मिट्ने वाले निशान के जैसी
हाँ-हाँ मुझे स्वीकार है
मैं तुमसे प्रेम करता हूँ
और मुझे ये भी स्वीकार है
के तुम्हें पाने और ना पाने के बीच
बहुत सी दूरियां हैं,और कारण हैं
मसलन ,
तुम्हें जानता भी नहीं
तुमसे मिला भी नहीं
देखा भी कहाँ है तुमको
अलावा
उस एक धुंधली सी तस्वीर के
जो है मेरे ख्यालों में
और वैसे भी
तुम्हारे मेरे दर्मियां फ़ासला भी है
मीलों का,
प्रेम करना और उसे पाना
दो भिन्न-भिन्न बातें हैं
इस जनम में तो तुम्हें शायद पा ना सकूँ
और कई जनम लेने होंगे तुम्हें पाने को ………..
जनम तो शायद दुबारा हो भी जाएं
मगर प्रेम …
क्या
दुबारा हो सकेगा
तो क्या ये ख्वाब ये संकल्प अधूरा ही रहेगा
जनमों जनमों तक..???

एक उदास गुलमोहर

कल शाम हम मिले थे जहां ,
गुलमोहर के पास .
वही गुलमोहर जिसके तले ,
अक्सर मिला करते थे हम .
मैं अब फिर से खड़ा हूँ ,
उसी दरख़्त के करीब ही ,
जहाँ तुने उठा के
अपनी पलकें ,
इस तरह छुड़ाया
कल हाथ अपना ,
जैसे ‘पेन ’ झटक देते हैं
चलते चलते रुक जाए अगर

ना जाने क्यूँ
मुझे उस पल लगा
के वो गुलमोहर
उदास है शायद ….

और अब देखता हूँ तो
वोही गुलमोहर …
एक ही रात में
कितना सुर्ख हो गया है …

लगता है सारी रात
सुलगता ही रहा है
तेरे ख्यालों की बरसात में
जलता ही रहा है ..
मुझे डर है ये कहीं
ख़ुदकुशी ना कर डाले …

ज़ख्म दिल का नहीं भरा शायद

जख़्म दिल का नहीं भरा शायद,
दर्द सा कुछ अभी उठा शायद।

कहते-कहते वो रुक गया ऐसे,
अजनबी मैं उसे लगा शायद।

उसने यूँ ही निगाहें बदली हैं,
सच उसे भी नहीं पता शायद।

कल वो मुझको करेगा याद ऐसे,
नाम था एक अजीब सा शायद।

बिन कहे साथ छोड़ कर जाना,
याद होगा वो वाकया शायद।

जब वो लौटेगा तब ही मानेंगे,
है कहीं ना कहीं ख़ुदा शायद।

साथ वो लम्हे ले गया सारे,
और एक लफ्ज़ रह गया शायद।

और एक इम्तिहान बाकी है 

और इक इम्तिहान बाक़ी है,
इसलिए थोडी जान बाक़ी है।

सर से हर बोझ हट गया मेरे,
सिर्फ़ इक आसमान बाक़ी है।

मैं खतावार हूँ तिरा लेकिन,
तेरे दिल का बयान बाक़ी है।

मेरे हाथों में अब लकीरें नहीं,
तेरे लब का निशान बाक़ी है।

न रहा मैं तो कोई ग़म कैसा,
अब भी तो ये जहान बाक़ी है।

ज़ख्म तो कब के भर गये संकल्प,
ज़ख्मों की दास्तान बाक़ी है।

पतझड़ का जब मौसम बीता

पतझड़ का जब मौसम बीता
तुमको याद किया मैंने,
दिन गज़रा जब रीता-रीता,
तुमको याद किया मैंने।

जब दिल पर दस्तक होती थी,
ऐसा लगता था तुम आए,
फिर दिल को समझा देते थे,
धुंधली सी यादों के साए।

तन्हाई से जब की बातें,
तुमको याद किया मैंने,
और कटी जब तनहा रातें,
तुमको याद किया मैंने।

और कहें अब कैसे तुमसे,
अपने पागल दिल की हालत।
जिसने इसको कभी न समझा,
बस उसकी करता है चाहत।

जब दिल के अन्दर कुछ टूटा,
तुमको याद किया मैंने।
अपनों से जब अपना छूटा ,
तुमको याद किया मैंने।

आने वाला हर एक मौसम,
जाने वाला हर एक मौसम,
जाने क्या लेकर आएगा,
देकर जाएगा कितने ग़म।

फूलों को जब देखा गुमसुम,
तुमको याद किया मैंने।
याद आए मुझको हर लम्हा तुम,
तुमको याद किया मैंने।

सीने में बसर करता है ख़ुशबू सा कोई शख़्स 

सीने में बसर करता है ख़ुशबू सा कोई शख़्स,
फूलों सा कभी और कभी चाकू सा कोई शख़्स।

पहले तो सुलगता है वो लोबान के जैसे,
फिर मुझमें बिखर जाता है ख़ुशबू सा कोई शख़्स।

मुद्दत से मिरी आँखें उसी को हैं संभाले,
बहता नहीं अटका हुआ आँसू सा कोई शख़्स।

ख़्वाबों के दरीचों में वो यादों की हवा से,
लहराता है उलझे हुए गेसू सा कोई शख़्स।

बरगद का शजर देखा तो इक हूक सी उट्ठी ,
जब बिछड़ा था मुझसे मिरे बाजू सा कोई शख़्स।

ग़ज़लों की बदौलत ही तो वो मुझमें बसा है
सरमाया ऐ हस्ती है वो उर्दू सा कोई शख़्स।

नाकामी के घनघोर अंधेरों मे भी संकल्प
मिल जाता है उम्मीद के जुगनू सा कोई शख़्स।

मिलके बिछड़ के ख़त्म यूँ रिश्ता नहीं होता

मिलके बिछड़ के ख़त्म यूँ रिश्ता नहीं होता,
ये इश्क है इसमें कोई तनहा नहीं होता।

वो चार दिन की मुलाकात सालती है मुझे,
तू चार दिन के लिए तो मिला नहीं होता।

बस एक बार मोहब्बत के रंग देखे थे,
फ़िर उसके बाद मेरे दिल को हौसला नहीं होता।

मिलता है मेरा ज़ख़्म तेरे दर्द से वरना,
तू हाल पे मेरे कभी रोया नहीं होता।

सहरा ऐ तमन्ना का सफ़र ख़त्म हो कैसे,
कागज़ पे चढ़के पार ये दरिया नहीं होता।

तुमसे जो मिला है मेरा ताउम्र रहेगा,
इस मर्ज़ का अब मुझसे मुदावा नहीं होता।

किसकी तसल्ली पर अब रोकूँ अश्कों के सैलाब मिरे

किसकी तसल्ली पर अब रोकूँ अश्कों के सैलाब मिरे,
देख के दीवानों सी हालत हँसते हैं अहबाब[1] मिरे

जब से गया वो बालकनी के फ़ूल भी सूखे -सूखे हैं
और उतरना भूल गया है खिड़की में महताब[2] मिरे

आस के दामन से लिपटे हम कब तक तेरी राह तकें,
या तो दीद[3] की सूरत दे या बिखरा दे सब ख्वाब मिरे

पूछ रहा है यूँ तू मुझसे राज़ मेरी बर्बादी के,
तुझ को ग़मगीं[4] भी कर सकते हैं वो सब असबाब[5]

मैंने लिक्खे नहीं ये पल ख़ुद से

मैंने लिक्खे नहीं ये पल ख़ुद से,
हो गई बस यूँ ही ग़ज़ल ख़ुद से।

तुझको दिल से निकालने के लिए,
लड़ता रहता हूँ आजकल ख़ुद से।

तेरी यादें तो बस बहाने हैं,
मेरा झगडा है दर-असल ख़ुद से।

इस से पहले के साजिशें होतीं,
ढह गया सपनों का महल ख़ुद से।

जब से वो हमसफ़र हुए हैं मेरे,
मंजिलें हो गयीं सहल ख़ुद से।

जिस दम खुशियों से मिलने सब ग़म जाते हैं

जिस दम खुशियों से मिलने सब ग़म जाते हैं,
एक ऐसे मंज़र को देखने हम जाते हैं।

कितने दिलकश नाम हैं फ़िर भी ना जाने क्यूँ,
उसके नाम पे आकर सारे थम जाते हैं।

रोज़ नसीम ऐ सहर[1] उसे लेने आती है,
घर पहुँचाने शाम को सब मौसम जाते हैं।

कुछ सदमे ऐसे भी गज़रते हैं जब अपनी,
आँखें पथराती हैं आँसू जम जाते हैं।

लफ्ज- लफ्ज़ जो ज़ख़्म लगे गहरा होता है,
जिसकी रफ़ू में रायगाँ[2] सब मरहम जाते हैं।

अब मेरे नाम की खुशी है कहीं

अब मेरे नाम की ख़ुशी है कहीं,
मैं कहीं मेरी ज़िन्दगी है कहीं।

बात करने से ज़ख़्म जलते हैं,
आग सीने में यूँ दबी है कहीं।

नब्ज़ चलती है साँस चलती है,
ज़िन्दगी फ़िर भी तू थमी है कहीं।

जिसकी हसरत फ़रिश्ते करते हैं,
सुनते हैं ऐसा आदमी है कहीं।

जिस घड़ी का था इंतज़ार मुझे,
वो घड़ी पीछे रह गई है कहीं

इक दिया मेरे घर मे जलता है
और संकल्प रौशनी है कहीं

क्या बात हुई क्यूँ ये परेशान बहुत है 

क्या बात हुई क्यूँ ये परेशान बहुत है,
दिल अपनी ख़ताओं पे पशेमान बहुत है।

मैं जानता हूँ जितना बड़ा दिल है तुम्हारा,
लेकिन मेरे रहने को ये मकान बहुत है।

मैं भूलने न पाऊँगा किस हाल भी तुम्हें,
वैसे तुम्हें ये काम तो आसान बहुत है।

क्या आरजू करूँ मैं किसी देवता की अब,
मिल जाए फ़कत एक ही इन्सान बहुत है।

यारो ख़ुदा के वास्ते उसको सज़ा न दो।
कातिल ही सही मेरा पर नादान बहुत है।

ना छीनो मेरे माजी का सरमाया तो मुझसे,
जीने के लिए मुझको ये सामान बहुत है।

ख़लिश की इन्तहा देखी है तुमने?

ख़लिश की इन्तहा देखी है तुमने?
निगाहों की ख़ता देखी है तुमने?

मेरे सीने का खालीपन पता है?
मेरे दिल की खला देखी है तुमने?

तुम्हें कैसे दिखाऊँ अपनी आहें?
कहो तो! क्या हवा देखी है तुमने?

तुम्हें मालूम कैसे ख़त्म होगा?
सफ़र की इब्तेदा देखी है तुमने?

मेरे जी में जो है यूँ ही नहीं है,
कसक यूँ बेवज़ह देखी है तुमने?

मैं बेबस था यही मेरी ख़ता थी,
ख़ता की ये सज़ा देखी है तुमने?

फिराक ऐ यार जो सहते हैं उनके,
लबों पे इल्तेज़ा देखी हैं तुमने?

नज़र रखते हो हर हरकत पे मेरी,
मेरे लब पे दुआ देखी है तुमने?

बहुत मग़रूर हैं ये हसरतें भी,
कभी इनकी अदा देखी है तुमने?

क्यूँ इस तरह भड़के मेरे जज़्बात तो सोचूँ

क्यूँ इस तरह भड़के मेरे जज़्बात तो सोचूँ,
पल भर में जो बदले हैं वो हालात तो सोचूँ।

जो याद है वो बात भी बोलूँगा मैं मगर,
जो याद नहीं पहले मैं वो बात तो सोचूँ।

कहने को तो दिल में मेरे अरमान बहुत हैं,
लेकिन जो मुझे कहनी है वो बात तो सोचूँ।

अपने भी खड़े हैं मेरे दुश्मन भी खड़े हैं,
किस से मिलेगी आज मुझे मात तो सोचूँ।

तुम सोचने को कहते हो रोटी से अलग बात,
सुधरें जो पहले घर के ये हालात, तो सोचूँ।

राह ओ मंज़िल

गुलशन ऐ ख़्वाब के गुलदान में,
मैं कुछ दिन और खिलना चाहता हूँ।
मेरी हमदम अभी ना मिलना मुझे,
भले मैं तुझसे मिलना चाहता हूँ।

सुना है मंज़िलों को जीत लेने की ख़्वाहिश में,
राही हर एक मुश्किल तोड़ देता है।
राहें दुश्वार चाहे जितनी हों,
रुख उनका मंज़िलों पे मोड़ देता है।

और मजिल पे जाके राही का,
साथ राहों से छूट जाता है।
एक रिश्ता जो है मतलब के लिए,
पूरा होने पे टूट जाता है।

मेरी मज़िल है तू फ़कत तू ही,
और मैं ऐसे तुझको पा रहा हूँ।
नज़्म ओ अश_आर मेरे राहें मेरी,
मैं इनपे चलके तुझ तक आ रहा हूँ।

मेरी मंज़िल क़रीब है लेकिन,
मैं राहों में ही रहना चाहता हूँ।
बहुत कुछ लिख चुका हूँ तेरे लिए,
अभी कुछ और लिखना चाहता हूँ।

मेरी हमदम अभी ना मिलना मुझे,
भले मैं तुझसे मिलना चाहता हूँ…

चाक ऐ दिल की करें हिमायत क्या

चाक ऐ दिल की करें हिमायत क्या,
दिलजलों की भी है अदालत क्या।

ज़िन्दगी के तो अपने मसले हैं,
ज़िन्दगी से करें शिकायत क्या।

अब उलझता हूँ तेरी यादों से,
हो गई देख मेरी हालत क्या।

एक तेरे ज़िक्र भर से साँसों मैं,
छिड़ गई आज ये बग़ावत क्या।

किस्सा ऐ दर्द सुनो, सुन के कहो,
तुमको भी दर्द से है राहत क्या।

खुशमिज़ाजी से भर गया है जी,
ग़म की लौटाओगे अमानत क्या।

कितने नादान हो जानते भी नहीं,
दिल लगाना है एक आफ़त क्या।

हादसा होना था सो हो ही गया,
अब करें इसपे हम सियासत क्या।

सरकशों में ना पूछिए ये सवाल,
सर बचेंगे यहाँ सलामत क्या।

फ़िर किसी दिन बताएँगे तुमको,
दिल्लगी क्या है और चाहत क्या।

मैंने झेले हैं फासिले तेरे,
अब सितम ढहाएगी क़यामत क्या।

ज़ुर्म ऐ उल्फ़त कबूल है मुझको,
तुम करोगे मेरी वकालत क्या।

हर घड़ी तुम ही याद आते हो,
याद आने की है ये आदत क्या।

ख़स्ता दिल की तो वो नहीं सुनता,
ख़स्ता दिल की नहीं इबादत क्या।

इकरार

मुझे इकरार करना है,
कि अब तुम मेरे ख़्वाबों में,
ख़्यालों में नहीं आते
मेरी तन्हाइयों में,
दर्द मैं ज़ख़्मों में,
छालों में नहीं आते
मगर इतना तो है कि तुम…
मुझे हर सुबह,
कभी शबनम,
कभी गुंचा,
कभी ख़ुशबू,
कभी चिडिया…
हर एक शय में,
हर एक एहसास में,
छूकर गुज़रते हो,
मेरा हर दिन तुम्हारा नाम लेकर ही
सफ़र आगाज़ करता है…

तेरी बातें तेरे अल्फाज़ 

.अब अक्सर…
तेरी बातें तेरे अल्फाज़,
यूँ मुट्ठी में दबाए फिरता हूँ।
जैसे बच्चे के हाथों में
पूरे हफ़्ते की ’जेबखर्ची’ के सिक्के।
जितना कसके पकड़ता हूँ.. कमबख़्त!
फिसलते जाते हैं यूँ ही।
जैसे फिसले थे तेरे सुर्ख लबों से उस दिन,
वो जाँफरोज़ अल्फाज़ …
वो नग्मगीन बात…

वही बातें वही अल्फाज़
जिन्हें थामे रखा था
एक मुद्दत से…

बह गए हाथ से
और छोड़ गए चन्द लकीरें

कभी फुर्सत मिले तो
फिर से एक दिन,
तुम चली आना….
इन हाथों की लकीरों से,
तुम्हें कुछ याद आएगा,
इन हाथों की लकीरों को,
ज़रा सा ग़ौर से सुनना ….

सुना है आजकल…
ये लकीरें बात करती हैं…।

त्रिवेणियाँ

डेली सोप
बने बिगड़े, मने रूठे, मिले और फिर से बिछड़ गए,
अंजाम मगर हम दोनों का अब तक कुछ भी पता नहीं

किसी ने जैसे रिश्तों पर एक पूरा ‘डेली सोप’ लिखा हो

अनुराग
तुम्हारा अध-झुकी पलकों से मुझको देखना,
एक एक निगाह से जैसे नया ख़याल बाँधा हो

हर औराक़ मुझे मुकम्मल सी एक किताब लगा

जन्नत
बिन मिटे किसने देखी है जन्नत,
ये दरिया डूब के ही पार हुआ

इसका ‘नेचर’ कुछ कुछ तुमसा है

तमाशा
तेरी आमद की ख़ुशी से दिल संभला भी नहीं ,
तेरे जाने का ग़म कितनी शब् रुलाएगा .

एक तमाशे के बाद ये दूजा तमाशा देख लें .

तमाशाई
“मैं न कहता था हर अदा में बेवफाई है ”,
मुझमें एक शख्स ने बोला ये मुस्कुराते हुए .

हम खुद ही तमाशा ओ तमाशाई बन गए .

याद
ईद का चाँद है के याद तेरी ,
एक नासूर बन गया है मुआ .

रात भर चुभा है सीने में .

जयपुर
कितना फैला हुआ लगता है ‘पहाड़ी’ से शहर ,
कहीं कहीं रस्सियों सी गहरी काली सड़कें .

एक सिरा पकड़ो तो ज़रा ! ‘‘इसकी गिरहें कस दें ’’

दर्जबंदी
धुंधले से हो रहे हैं तेरी यादों के हुजूम ,
ये कौन है जो यूँ दर्जबंदी करता है ?

इन दराजों से अब उम्मीदें भी नहीं दिखतीं .

अश्क़
यूँ हरारत से बर्फ की तरह पिघली है तेरी याद ,
बूँद बूँद आँखों से टपकी है रात भर ,

दफ्तर से आज फिरसे शायद छुट्टी लेनी पड़े .

मरासिम
तुम जिन्हें छोड़ के बेबस सा कर गए थे कभी,
दिसम्बर की हवाओं ने सताए वो मरासिम.

ज़रा सी आंच दिखाओ तो जी उठें शायद.

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