संजय अलंग की रचनाएँ

सलवा जुडूम के दरवाज़े से (1)

जंगल के बीच निर्वात तो नहीं था
सघनता के मध्य
समय दूर तक बिखरा था
और उसी से सामना था

उम्मीद की फसल जरूर उगाते
पर वह थी ही नहीं
न तब न अब
परछाइयों का टूटना असंभव है
मानव का भी

अपनी जमीन से हटे नहीं
पर हम वही करते रहे हैं
जो कैदी करते हैं
धूल के मध्य आदम याद आता है
मैं नहीं

सलवा जुडूम के दरवाज़े से (2) 

काल कोठरी के भयावह अंधेरे में
जीत के क्षण नहीं
रोशनी नहीं

घटाटोप कालिमा शाश्वत है
घेरे में भी और घेरे के बाहर भी
रात लंबी है
दरवाज़ा कोई नहीं

सुबह के लिए तैयारी भी नहीं है
खाने का आश्वासन नहीं दे पाता

जीने का आश्वासन
करेला नीम भी चढ़ता है और
सम्मान उछल-कूद भी चाहता है
कॅ।फी पीते हुए सल्फी क्यों याद आती है
उड़ते सफेद कबूतर
बंदूकों और सुरंगों के बीच फड़फड़ाते हैं

बाड़ के पीछे पेशाब करते सैनिक
निगरानी को चौकस हैं
अब चर्च के घंटे और

मन्दिर की घंटी
टुनटुना भी नहीं रही
ऐसे में ऋतु और रविवार चाहना भी क्या
आवाज़ मात्र क्रंदन है
प्रेम और शांति की हवा भी रोती लगती है

सलवा जुडूम के दरवाज़े से (3)

सपने हमारे जैसे नहीं हो रहे हैं
बम का छर्रा ही उत्कंठता है, विचार नहीं
बन्दूक शाश्वत है
कभी राजा पर कभी प्रजा पर
किसी के भी हाथ में हो
कहीं भी चले
मरेगा तो आदमी ही

साल, सागौन, तेन्दू भी नींदविहीन हैं
असल है, यदि यही ज़िन्दगी
तो क्यों रोती है प्रार्थना
चट्टानों से टकराकर

आँखों में विस्फोट की चिंगारी दिखती नहीं
विस्फोट सुनता नहीं
बहरापन अब बम से भी नहीं जाता
भूल जाना मरना भी
शाश्वत भरोसे को तोड़ रहा है

अनुपस्थित है हर चीज चारो ओर
बचा नहीं पा रही कविता भी
विचार को, विश्वास को, आसमान को
हदें, भूख, लालच, बन्दूक से बह रहें हैं
घेरा नहीं घेराबन्दी में
प्रेम और शांति जंज़ीर से ज़कड़ी
जुडूम के कैंप में बैठी
भात खा रहीं हैं शरणार्थियों के साथ

गुलेल

पेडों पर उछलते कूदते, आमा डगाली खेलते
निगाहें तलाशती रहती
व्ही आकार अंगूठे मोटाई की गोल टहनी
मिलते ही आल्हाद छा जाता
छूट जाते सभी खेल

सावधानी से उसे काटते, छीलते, तराशते
निखारते आकार और देते सुगढ़ता उसे

तलाशते रबर की पुरानी ट्यूब
खंगालते कबाड़, खाक छनते साइकिल दुकानों की
करीने से काटते दो पट्टियाँ ट्यूब से
बराबर आकार की लंबी
निकालते ढ़ेर सारी पतली बंधनी

मोची से बनवाते चमौटी
देखते घिसे और तराशे जाते चमड़े को
निहारते दोनों किनारों पर छेदों का कतरा जाना

आँखों में बेचैनी छटपटाती
मस्तिष्क़ में उत्तेजना

व्ही आकार डंठल पर लंबी पट्टी बैठाते, जमाते
बांधते संभाल-संभाल खींचकर बंधनी

रबर पिरो दोनो सिरों पर बैठाते चमौटी
खींच कर परखते तनाव

आकाश की ओर अनजाने निशाने पर तानते
एक आँख बंद निशाना साध खुली आँख तक खींच लाते

उछलते गोटी हवा में, दन से

इठलाते विजेताओं सा गले में डाल

क्राफ्ट मेले से, सौहार्द के लिए
खरीदते हुए गुलेल, याद आया मुझे

ईश्वर का दुःख

मौन नहीं है वह
न ही तूती नक्कार खाने की
मन्दिर के घंटों की गूँज के बीच
अंतर्नाद बन गई है, उसकी वाणी

इसे पुजारी ही ईश्वर तक पहुँचाएगा
चढ़ी मिठाईयों से कुछ मीठापन
उसके लिए भी लाएगा
तब सम्प्रेषणता का इतिहास लिखा जाएगा

अर्पित वाणी मात्र लगे प्रलाप
उसे नहीं हो यह संताप
इसलिए बताया जाएगा

मन्दिर के बाहर आदमी की
गंदी, लीचड़, बदबूदार, भीख मांगती कृशकाया पर
मिठाईयों, फूलों और पुजारियों से
दबे होने की व्यस्तता के बावजूद
ईश्वर को बहुत दुःख है

झुमका बाँध

अल्हड़ गदराई युवती सा बहता
अलमस्त बरसाती नाला है-झुमका

लगा बनने उस पर बाँध
स्थाई सन्नाटे में पसरे
मेरे कस्बे में शोर मच गया
कस्बे से से झुंड के झुंड उसे देखने जाने लगे
इंजीनियर, ठेकेदारों की फ़ौज़ आने लगी

कस्बे का व्यापार बढ़ निकला
बातों का भी
नए-नए लोग आए
लोगों को शगल मिला
बेरोज़गारों को काम
व्यापारियों को दाम

कस्बा फैलने लगा
नगर बनने लगा
शराब आई
चाकू आया
गुंडे आए

लोग फुटबाल भूले
रामलीला भूली
क्रिकेट आया, कालेज़ आया

विडियो पार्लर खुले
कस्बा सम्पन्न दिखने लगा
कुछ वर्ष चहल-पहल रही

बाँध पूर्ण हुआ
इंजीनियर गए, ठेकेदार गए
पैसा गया, फुटबाल गई

शराब रह गई
ढ़ाबे रह गए
बेरोज़गारी रह गई

झुमका पर राजा का नाम चढ़ा
कस्बा चीज़ों का आदी हो गया
सरकार काम देने की नहीं

राम की मृत्यु ?

राम! तुम तब भी नहीं मरे थे
जब तुमने वनवासी आदिवासी
शबरी से खाए थे जूठे बेर
तब भी नहीं, राम
जब सबल और सप्रयास
त्यागा था तुमने और
किया था निष्कासित
गर्भवती निज पत्नी सीता को
झूठे आरोप में

राम! तुम तब भी नहीं मरे थे
जब अंत्यज बाल्मीक ने
लिखी रामायण और
पिरोया तुम्हे कथा में
तब भी नहीं, राम
जब नए मत के सृजन पश्चात
जातक में, बौद्धों ने
माना था बोद्धिसत्व तुम्हे

राम! तुम तब भी नहीं मरे थे
जब विधर्मी अल-बदायुनी ने
कर दिया तुम्हारे आख्यान रामायण का
अन्य विधर्मी और विदेशी भाषा में अनुवाद
तब भी नहीं, राम
जब विदेशी हिन्देशियाईयों (इंडोनेशियाई) ने
लिखी रामायण ककविन और
कह डाला उसे, कथा अपनी

राम! तुम तब भी नहीं मरे थे
जब गैर-धर्म के प्रचारक फादर बुल्के ने
किया तुम पर शोध गहन
तब भी नहीं, राम
जब अभिनय कर तुम्हारा
उतारा गया सतरंगी फिल्म पर

राम!
जब तुम्हारे स्वयं के कार्य और
कथित शूद्रों, विदेशियों, अधर्मियों के कार्य
मार नहीं पाए तुम्हे
तो क्या राम, अब तुम
अपनों के द्वारा मारे जा रहे हो?

या राम
तुम तब ही मर गए थे
जब तुमने मानव रूप में
नदी में डूब
की थी आत्महत्या?

क्या मानव होकर
भू-लोक पर जन्म लेना
इतना त्रासद है राम?

तुम अब भी हो राम
या पा गए निर्वाण?

माध्यम

जुड़ता हूँ मैं सूर्य से
उसकी सुनहरी रश्मियों के द्वारा
इसके लिए मुझे हनुमान
नहीं होना पड़ता

जुड़ता हूँ मैं चाँद से
उसकी चाँदनी के द्वारा
इसके लिए मुझे राहू-केतु
नहीं होना पड़ता

जुड़ता हूँ मैं सागर से
गंगा-जमुना के द्वारा
इसके लिए मुझे आगत्स्य
नहीं होना पड़ता

जुड़ता हूँ मैं पुष्प से
उसकी भीनी खुशबू के द्वारा
इसके लिए मुझे माली
नहीं होना पड़ता

जुड़ता हूँ मैं संसार से
मनुष्य होने के कारण
इसके लिए मुझे
ईश्वर नहीं होना पड़ता

माध्यम

जुड़ता हूँ मैं सूर्य से
उसकी सुनहरी रश्मियों के द्वारा
इसके लिए मुझे हनुमान
नहीं होना पड़ता

जुड़ता हूँ मैं चाँद से
उसकी चाँदनी के द्वारा
इसके लिए मुझे राहू-केतु
नहीं होना पड़ता

जुड़ता हूँ मैं सागर से
गंगा-जमुना के द्वारा
इसके लिए मुझे आगत्स्य
नहीं होना पड़ता

जुड़ता हूँ मैं पुष्प से
उसकी भीनी खुशबू के द्वारा
इसके लिए मुझे माली
नहीं होना पड़ता

जुड़ता हूँ मैं संसार से
मनुष्य होने के कारण
इसके लिए मुझे
ईश्वर नहीं होना पड़ता

परिवर्त्तन चक्र 

कहानियों में होता है ऐसा
या कभी खुलती है, तीसरी आँख उसकी
कभी घूमता है, चक्र उसका
कभी आता है प्रलय और
होता है पुर्ननिर्माण सृष्टि का
या चलती रहती है सृष्टि यूँ ही

राजा ही बनता रहता है भगवान
ईश्वर अनिवार्यतः लेता है जन्म
अयोध्या,मथुरा,लुम्बनी,कुण्डलग्राम के राजग़ृह में
जन्म नहीं होता उसका कभी
होरी के घर में

क्या चलेगा चक्र
खुलेगी तीसरी आँख
क्या वे भी पायेंगे माखन
या यूँ ही खाते रहेंगे चने

तू कभी उनके उत्थान और रक्षा को पैदा होगा
या सदैव धर्म की
तू कभी चाहेगा उत्थान उनका
या मात्र सेवा
क्या ‘वे’ भी ‘ये’ बनेंगें

तू स्थापित कर या न कर
बराबरी निश्चित है
तभी तो रामायण हो या संविधान
लिख और बना रहे हैं, वे ही
और चला रहे हैं चक्र
खोल रहे हैं आँख तीसरी

उनकी आँख मात्र कामदेव को देखकर नहीं खुलती
चक्र मात्र खेल हेतु नहीं चलता
वरन कलम से सृष्टि पुर्ननिर्मित्त होती है

बस अब देख तू

लड़की

चाँद पर एक लड़की है
तुमने देखा?
मैंने देखा है
उससे बातें की
उसे पत्र लिखा
उत्तर आया
तुम तो पृथ्वी के हो
उसे ही तो छोड़कर
हम अलग हुए थे

अनसुना सुनने को मैं

सब छूटेगा यहाँ
कुछ साथ न जाएगा
होगा साथ सदा,
मुस्कुराहट के प्रकाश का

गहरे गव्हरों में होगा ग़म और दुःख जब
अनसुना सुनने को होऊँगा मैं
उस काल में
जहाँ फेंक दिया जाता है दुःख
अख़बार की तरह पढ़कर
सुनता हूँ क्यों मैं अनसुना
होना क्यों चाहता हूँ दुःख के लिए आवाज़

कोई नहीं चाहता किसी को
अनसुना और अनसुना हो जाता है

छोटी बच्ची की प्यास
फेंक दी जाती है, इच्छाओं द्वारा
पिघलती आँख भी
तुम्हे नहीं खोल पाती

आना होगा आगे, काले काजल को हटा
कष्ट की साँस में भी खोलनी होंगी आँखें
विद्वता पर न छोड़ें उड़ान की पाँखें

अच्छा आदमी सब ओर बस जाएगा

पैसा आएगा तो उड़ेगा ही
ऐसा कैसा पैसा जो आए और
अपने पर ही न ख़र्च हो

जब अच्छा आदमी ज़मीन लेगा तो
खूब पैसा देगा
पैसा आएगा तो यहाँ-वहाँ जाएगा

ज़मीन तो अच्छा आदमी ही लेगा
कानून बनाएगा
नहीं, अच्छा कानून बनाएगा
क़ायदे का ही काम होगा
पैसा देगा, काम भी

जमीन जाएगी, जाए
पेड़, पहाड़, नदी, ज़ानवर
नाच-गाने, किताब, बोली
तान-बान, इज्ज़त, आबरू
शासन, संस्कृति
साथ जाएँ तो, जाएँ

पैसा तो आएगा
दाम भी, काम भी
अच्छी कालोनी में छोटा घर
न जंगल का डर
न गोरू का काम
बस दाम ही दाम

अच्छा आदमी कानून तो बनाएगा
यह ही स्वतंत्रता का रास्ता, यह समझाएगा
वो बड़े वाले देश में भी
कानून ही कानून आए
न्याय की गुहार में दाम भी पाए
पूरी जगह अच्छे आदमी ही छाए
कभी आर्य, कभी ब्राह्मण, कभी अमेरिकी कहलाए
कौन इण्डियन, कौन दस्यु, कौन दैत्य,
कौन गोंड़, कौन भील, कौन फिलीस्तीनी,
कौन ईराकी- मैं की जाँणां मैं कौंण?

पैसा आएगा तो जाएगा
विकास भी लाएगा
भर-भर मुट्ठी फूल उड़ाएगा
छम-छम करती नचनिया पाएगा
जमीन तो स्थिर है उसे ही ले जाएगा
कर्मशील दस्यु ही चल संपत्ति है
उसे ही हटाएगा

कितने अच्छे सुन्दर न्यायपूर्ण कानून लाएगा
पुस्तक, आस्था, हाथ देकर
श्रद्धा से आँखे बन्द कराएगा
फिर गद्दी पर भी वह ही जाएगा
अच्छा आदमी अच्छा ही कहलाएगा

वह सदा ही हटता है
नई जगह खोजता है
यही विकास विस्तार है

एक जगह टिकाव तो रुकना है
तुम्हे भी बढ़ना सिखाएगा
अच्छा आदमी तुम्हे भी हटाएगा
अपने में सम्मलित होने की बात चलाएगा
बड़ा वाला एक गाँव बनाएगा
बाकी किस काम के
एक गाँव, एक धर्म, एक संस्कृति को जमा जाएगा

अच्छा आदमी और कानून लाएगा
समझौते से मध्य रास्ता निकलवाएगा
अच्छा आदमी धीरे-धीरे पूरा बसता जाएगा
सब जानेंगें कैसे हुआ
भेद भी खोलेंगें
पर कोई कुछ नहीं कर पाएगा

अच्छा आदमी सब ओर बस जाएगा

हर की पौड़ी से (1)

प्रवाह तीव्र उत्कण्ठ,
आतुर बिखेरने को सब कुछ
समेटा नहीं अपने में कुछ

किनारे तिलक लगाता पंडा
घाट पर बैठा पुजारी
अंजुली में बटोरने का करता प्रयास
आता हाथ अस्थियों से निकला सिक्का
साथ चुम्बक लगा बटोरता लड़का
सैनिक सा सचेत
समर्पण मुद्रा सा प्रवाह
निर्लिप्त गंगा, पर परित्यक्त नहीं

हर की पौड़ी से (2) 

चप्पल उतारवाते लोग
रसीद लिए दान मांगते
इंकार सुनते, गेरूए होते
धूसर रंग कल-कल बहता

तर्पण, दीये, पिंड, गेंदें के फूल
ट्यूब, आत्मा, नज़र, पाप
धूसर के साथ गड़मड़ हो रहे

हर की पौड़ी से (3) 

पानी रुकता नहीं पसीना भी घुल रहा है
बू कहीं नहीं
पुलिस की टुकड़ी नहीं कहीं

प्रेत नहीं घुमा रहा बाण
हिलती नहीं झोपड़ी
पूड़ी तब भी तली जा रही
चील उड़ रही है

आँगन अब नहीं है
पुल है, घाट है, भीड़ है, बीड़ी है

हिरनी आग से भयभीत नहीं है
आरती, प्रज्जवलन शीर्ष पर है

हर की पौड़ी से (4)

पवन, धाराप्रवाहित है
बढ़ रही लाठी टेकती बुढ़िया
बच्चे बैग लटकाए यूनिफ़ार्म डाले जा रहे हैं
घोंसलों से पक्षी उतर रहे हैं
चाय की केतली भाप छोड़ रही है
चलने को आतुर है, छाती से चिपका लाड़ला
सुकुमार रूपसी असहज है
छिपता नहीं बदन

हर की पौड़ी से (5) 

बहती कहीं पसीने की धारा
तो कहीं गेंदा बन सिमटती गंगा में
सिक्के को लगातार बटोरते जा रहे हैं
क़लम छिटक गई है

गली का शोर जगा नहीं पा रहा है
टिमटिमा रहे है अक्स, पर मौन
कलरव भी नहीं
कान सुन्न दिमाग़ क्लान्त
आवाज़ तो है, पर आवाज़ नहीं
पानी तो है, पर पानी नहं
धार तो है, पर धारा नहीं

बड़ी अभी भी सुलग रही है
पीछा है, आहटों का

भगता जैसे झूमना घातक होगा
दूर निकल गई चाहते, रोकते

उस पार, दूर पेड़ से
टूटकर पत्ता गिरा छप से
आवाज़ कोई सुन न सका

रायपुर से

लिखना है ख़त मुझे
उसे ही लिखूं
बिना फुटपाथ की रोड पर
कूड़े के ढेरों के बीच
बजबजाती नालियों से
पार्किंग विहीन सड़कें
ग़र्द, ग़ुबार, धूल, धूप
अव्यवस्था में व्यवस्था खोजता ट्रैफिक
नवीनता को तलाशता
और बेतरतीब होता जाता

सब लिखना है
सड़क पर पार्क कर गाड़ी

लिखूं सब
मार्क हो, फाईल होगा या
व्यवस्था को जन्म देगा
मेरे से ही पहल हो
इच्छा दब न पाए

क्राँति तो नहीं ही चाहता
अन्यथा, पड़ोसी की ओर झांकता
मैं क्यों रिस्क लेता
वे विचारें उनका काम
मेरा दायरा बना रहे
सब अपने-अपने दायरे बनाएँ
छोटे-छोटे राष्ट्र राज्य

प्रतिक्रिया, टोकना गन्दी बात है क्या?
फिर यूँ होता तो क्या होता का प्रश्न क्यूँ

खत में चीख भी आए
सुनाने वाली, बहरों को
इस बार बम नहीं
फाँसी तब देंगें क्या
पुष्प की अभिलाषा का क्या होगा
अच्छा हो, यह भी देशभक्ति कहलाए
इसी पर आक्रमण होगा

अन्य हेतु तो बने ही नहीं
अलंकरण, दिप-दिप करें, चमकें
चहबच्चों से बचा तो कूद कर निकलना होगा
शोर के पीछे आवाज़ तो होगी ही
आवाज़ के साथ मौन भी पढ़ा जाएगा
सम्पूर्ण से कम कुछ नहीं हो
ख़त आज ही होगा पूरा

रायपुर से 

लिखना है ख़त मुझे
उसे ही लिखूं
बिना फुटपाथ की रोड पर
कूड़े के ढेरों के बीच
बजबजाती नालियों से
पार्किंग विहीन सड़कें
ग़र्द, ग़ुबार, धूल, धूप
अव्यवस्था में व्यवस्था खोजता ट्रैफिक
नवीनता को तलाशता
और बेतरतीब होता जाता

सब लिखना है
सड़क पर पार्क कर गाड़ी

लिखूं सब
मार्क हो, फाईल होगा या
व्यवस्था को जन्म देगा
मेरे से ही पहल हो
इच्छा दब न पाए

क्राँति तो नहीं ही चाहता
अन्यथा, पड़ोसी की ओर झांकता
मैं क्यों रिस्क लेता
वे विचारें उनका काम
मेरा दायरा बना रहे
सब अपने-अपने दायरे बनाएँ
छोटे-छोटे राष्ट्र राज्य

प्रतिक्रिया, टोकना गन्दी बात है क्या?
फिर यूँ होता तो क्या होता का प्रश्न क्यूँ

खत में चीख भी आए
सुनाने वाली, बहरों को
इस बार बम नहीं
फाँसी तब देंगें क्या
पुष्प की अभिलाषा का क्या होगा
अच्छा हो, यह भी देशभक्ति कहलाए
इसी पर आक्रमण होगा

अन्य हेतु तो बने ही नहीं
अलंकरण, दिप-दिप करें, चमकें
चहबच्चों से बचा तो कूद कर निकलना होगा
शोर के पीछे आवाज़ तो होगी ही
आवाज़ के साथ मौन भी पढ़ा जाएगा
सम्पूर्ण से कम कुछ नहीं हो
ख़त आज ही होगा पूरा

नव-वर्ष

उत्कर्ष असीम आया है
हर्ष नवीन लाया है
वर्ष नवीन आया है

स्पंदनों में आमोद है
धरा में प्रमोद है
जीवन में आनंद है

प्रसन्न हैं खग विहंग
फैली अल्हाद की तरंग
छायी चहुँ ओर उमंग

अतुल है आस
कुँठा का हो सन्यास
विपुल हो विकास

तुण्ड है धवल
मन है चपल
वर्ष है नवल

पश्चमी दृष्टि

वह इराक में रहता है
फिर भी मुस्कुराता है,
हँसता है,
खिलखिलाता है,
खेलता है,
दौड़ता है

मैं अमेरिका में रह कर
मुस्कुरता हूँ,
खिलखिलाता हूँ,
खेलता हूँ,
दौड़ता हूँ

यूफ्रेटस-टिगरिस के वासियों
तुम्हारे कृत्य भी कोई कृत्य हैं

आओ मेसोपोटामियाईयों
मेरे साथ बैठो
मिसाइलें उड़ाओ,
बम गिराओ,
बालात्कार करो,
डालर बाँटो,

दुनिया लूटो,
चर्च जाओ,
उसे प्यार बताओ
तब आओ मेरे साथ
बराबर हो
फिर हम साथ बैठेंगें

मुस्करायेंगें
हँसेगें
खेलेंगें
दौड़ेंगें
इराकी तुम पीछे क्यों रहते हो
धोखा दो,
धौंस जमाओ,
चाकू चलाओ

आओ हम मित्रता करें
आगे बढ़ें
चर्च जाएँ
हँसे, खेलें
तुम्हारा पैट्रोल बाँटें
दुनिया देखे
तुम्हारा तेल
हमारा खेल

साथ पग बढ़ाएँ
जंगल काट डाले हैं अब रेत पर
मुस्कराहटें बिछाएँ

आमीन!

प्यास 

(तन्जानिया-अफ्रीका के एक गाँव में गरीबी उन्मूलन कार्यक्रम देख कर)

तुम को देखकर
आती है, दौड़
प्यासी, वह बच्ची
बुझाने को प्यास
पानी माँगती प्यासी बच्ची

उन छोटे हाथों से
पहुँच जो नहीं है उसकी मुंडेर तक
न ही ताकत इतनी
कि खींच सके वो पानी, कुँए से

तुम सक्षम हो
देने को, पानी उसे
पर झिड़क देते हो तुम उसको
पसन्द नहीं तुम्हें
ताक़त का अपनी यूँ जाया होना

खोयी-खोयी नज़रें
बच्ची की उठी हैं
देखती हैं तुमको, तुम्हारे दर्प को

प्यास बुझी तो तुम्हारी पर
पीछे वो छोटी, अनबूझ, अनथक प्यास

नाम दे लेते हो तुम इसे

तुमने
सपेरे का खेल देखा
उसके डरावने साँप देखे
न देखा उस सपेरे को
जो खेल रहा था मौत से
या खेल रही थी मौत उससे

देखा तुमने कठपुतली वाले के खेल
देखीं उसकी सुन्दर कठपुतलियाँ
देखा नहीं कठपुतली साधक को
अद्वितीय थी, तन्मयता जिसकी
सबकुचा सधा था सटीक, उंगलियों में

उसके क़रतबी ज़ानवर देखे
नहीं देखा मदारी को
जो घूम रहा है
ज़ानवर बना ज़ानवर के साथ

तुमने नट का खेल देखा
कारनामें देखे उसके , हैरतअंग़ेज़
दाँतों तले अँगुलियाँ भी दबाईं
पर नहीं देखा नट को

आओ, देखो खूब
साँप, कठपुतली, ज़ानवर, क़ारनामें

देखना चाहते हो क्या तुम कभी
सपेरे को, कठपुतली साधक को, मदारी को, नट को
देख पाते हो तुम इन्हे भी कभी

जब देख पाते तुम इन्हें तो
दिखता तुम्हें उनका पेट भी
वह पेट जो
साँप, कठपुतली, ज़ानवर और आदमी नचाता है
क़ारनामें दिखवाता है
नाम दे लेते हो तुम इसे-कला

आदमी

मैं पण्य नहीं
बाज़ार में बहूमूल्य
तराजू नहीं मैं कि
आऊँ काम तौलने के
नहीं मैं बटखरा भी कि
बटाऊँ हाथ व्यवस्था में
मैं भोज्य नहीं हूँ कि
खाया जाऊँ
मैं मय भी नहीं
कि पिया जाऊँ
बना फिर भी दिया उसने मुझे
और रखा नाम आदमी

मुझे काम करता आदमी अच्छा लगता है

कोई स्टेशन में बैग पर प्रतीक्षा में बैठा
डाल उँगली नाक में, निकालता है कुछ
घुमाता दो उँगलियों के बीच और बनाता गोल-गोल उसे
कभी उसे अनदेखे निशाने की ओर
उछाल देता सधे हाथों से
कभी बैग के किनारे पर पोंछ चिपका देता
किनारे सीढ़ियों के दहाने बैठा आदमी
इस असीम आनन्ददायक कृत्य को निहारता
स्टेशन पर तम्बाखू की पीक थूकता जाता

कोई नुक्कड के पान ठेले की बेंच पर बैठा
जिसे भी जानता-पहचानता उसकी निंदा-चुगली करता
सर्व सुलभ आनन्द में डूबा रहता
उलटता-पलटता, ज़िन्दग़ी सी घिसीटता
कभी बैंच पर उकडू बैठ
आती-जाती लड़कियों को ताड़ता
बेवज़ह हँसता,ऊँची आवाज़ में बात करता
कोई ऍसे कामों से तंग आ जाता
तो चाकू चलाता,लूटता,बालात्कार को लपकता या
लड़ता मुकदमा बँटवारे का

खाली मन में शैतान क्यों न घर करता
तब भी खाली का खाली ही रहता
यह खालीपन भी उन्नती की सर्वोच्च चाहत पर ही रूकना चाहता
मित्रों, रिश्तेदारों, पड़ोसियों से अधिक
प्रतिष्ठा और अमीरी की उड़ान भरना चाहता
ऍसे में क़फ़न के लिए जुटे पैसों से
पूड़ी-सब्ज़ी खाने की क्यों न मन करता
जब है यहाँ यह ही पूर्ण सृजन कि
जुगाड़ लिया जाए किसी तरह भोजन
तब कैसे होगा बन्द जीमना घीसू का
क़फ़न के पैसों पर

स्वभाव और परम्परा में नही आता ऍसा रक़्त
जो सोचे आक्रमण और क्राँति
करेला अब नीम भी चढ़ा
इसमें अब निट्ठलापन भी है साथी

न्युनतम राष्ट्रभक्ति और सेवा सम्भव हो जाए यदि
हर व्यक्ति कमाए और अपनी कमाई से ही खाए
स्वयं उत्कृष्ट सर्वोच्च संसाधन हो जाए
तब डालर कर्जा बाँटने वाला ही निट्ठला हो जाए
निराला की पत्थर तोड़ने वाली उच्च राष्ट्रभक्त कहलाए

इस विचार से जो हो जाएँ सहमत सब तो
काम करता आदमी अच्छा लगने लग जाए

मुझे काम करता आदमी अच्छा लगता है, कहकर
कहीं निट्ठलेपन की ही तो नहीं उड़ रही, बेपर
इस काफ़िले में कहीं सब न शामिल हो जाएँ
ठाठ से नाक में उँगली डाल कर बैठ जाएँ

गेज़ नदी

भरपूर बारिश में
जब रास्ते रूक जाते
सड़कें भी भर जातीं
पायांचे मुड़ जाते
खेत लबालब होते
धान रोपे जाने लगते
रोपाई गीत सुनाई पड़ते

साँझ को सूप-पत्ते की छातानुमा टोपी लिए और
कीचड़-काँदों से लथ-पथ
महिलाओं की कतार
बगुलों के झुंड़ की तरह
घर लौटती दिखती
तब गेज़ पूरे उफान पर आती
और सार्थक होता गेज नाम होना
झाग या फेन का ही तो पर्याय है गेजा

गेज़ का उफान देखने उमड़ता कस्बा
छाता उठाए पैदल, साईकल पर
पड़ते निकल सब, गेज़ की ओर
शताब्दी पुराना पुल भर जाता, लोगों से
जितना उफान, उतनी भीड़
उतनी ही छुट्टी, उतना ही उत्साह

यह उत्साह खेतों के भरे रहने का
पानी बने रहने का

खूब खेल होते बारिश में
अल्हाद में डूबते लोग
उत्सव धूम-धाम से होते
गणेश पूजा,दुर्गा पूजा,दशहरा,दीपावली,काली पूजा
ईश्वर के धन्यवाद हेतु

गेज़ का पूर आना
खुशहाली का पूरना होता
पानी का बने रहना होता

सुनता हूँ मैं कि अब
टूट ही जाती है, अक्सर
गेज़ की धार

रंग खोजती होली

मितान !
इस बार होली आएगी कैसे?
उसे कैलेण्डर में खूनी लाल या
जली काली तारीख़ें ही मिलीं हैं

वह अब भी
बच्चे के हाथ में रंग की
सोच रही है

मैं सोचता हूँ
उसे, ख़ौफ हटाकर
शरारत दे ही दूँ

तुम भी दोगे क्या? या
उसे अब लौटा ही दें?

मेघ

देख सावन को आल्हादित
जेठ में सूखे सतपुड़ा पर्वत्त

उड़ना चाहते स्वयं मेघ बन कर
कब तक रहें खड़े तनकर

तैयार हैं बहने को हो तरल
अठखेलियाँ बैनगंगा सी करने को विकल

मेघ देख हुआ नव सृजन का संचार
पिघलकर कोंपले फेंकने को तैयार

कटते पेड़ उजड़ते जंगल
दूर करते जंगल में मंगल

हो सचेत दिखा कर्मठ वेग
पर्वत्त बने रहें सावन का मेघ

अन्यथा कहता रहेगा देख-देख
जंगल पर्वत्त हो जायेंगे वैशाख का मेघ

बस्तर का कुई विद्रोह’1859 

बस्तर में वन रक्षा के लिए हुआ था- कुई विद्रोह
मिली संज्ञा इसे, विद्रोह की ही
कथित सभ्यता के लिए बना मील का पत्थर
प्रेरणा पाई ऊँचे सभ्य लोगों ने, इससे
अब बदले तरीके,विधि बदली और अन्दर तक घुसे
अब नहीं करते हरिदास-भगवानदास जैसी क्रूर ठेकेदारी
सभ्य रहो,मज़दूरी दो,विकास दिखाओ
पैसा फेंको,तमाशा देखो
अभी तो पूरा वन,पूरा खनिज,पूरे आदिवासी श्रमिक पड़े है-खोदने को,दोहन को

भेजी,कोतापल्ली,फोतकेल के आदिवासी रोकते नहीं
अब साल वृक्ष को कटने से
रोका तो सेना सामने आई ही थी
हुआ था, कुई विद्रोह
अब खनिज को क्यों रोकेंगें?
अब तो बड़ी सुसज्जित सेना है साथ

खनिज महत्वपूर्ण है कि, आदिवासी
महँगे से महँगा खनिज है वो तो
देवता क्यों माने आदमी पहाड़ और वन को
उसे उपकरण की तरह तो शासक ही करता है उपयोग
तुम क्यो?

लाभ खनिज से, खनन आदिवासी से
विरोधी जुग्गा,जुम्मा,राजू,दोरा,पामभोई सब तो खो गए
हैं तो उद्योगपति,मंत्री,सरकार और बन्दूकें
इनका घालमेल ही सब कुछ कराएगा
प्रत्येक बार की नई पोटली में भी
यह तंत्र ही आएगा
सरकार तो सदा वही, जो सभ्य इच्छा को कानून कह इठलाएगी
जिसमें नहीं होगा कुईयों का नारा-
एक साल,एक सिर

सभ्य आदमी ही सब ओर आएगा-जाएगा
कोई प्रतिरोध तो विद्रोह ही कहलाएगा और
पुस्तक में ही रह जाएगा
वन हो, खनिज हो, जन हो
उसका दोहन पूर्ण हो जाएगा
एक और धरती, एक और समुदाय
मुख्य धारा में, मिल जाएगा

परिवर्त्तन

सुमि !
इस बार आओ
दिखाऊँगा मैं तुम्हें
कि बगिया में अब हमारी
फूल खिलें हैं
संगीनें अब यहाँ नहीं उगती

हमारे आँगन वाले पेड़ पर
अब चिड़ियों के चहचाहट है
उस पर पड़ोस के बच्चे
अब पत्थर नहीं मारते

हमारे सामने वाले निक्कड़ पर
बच्चे अब, पिट्ठुल खेलते हैं
वहाँ अब धर्म, जातियों, भाषा, क्षेत्र, नस्ल का
रक्त नहीं बिखरता

आओ सुमि !
इस बार मैं तुम्हें दिखाऊँगा
कि हम ठोकर खाकर भी
सम्हल सकते हैं

हम फूल उगा सकते हैं
हम बसेरे बसा सकते हैं
हम खेल सकते हैं

हम मात्र नक्शा नहीं
एक राष्ट्र बना सकते हैं

इतिहास बोध

मेरे इतिहास में सभी लोग सम्मलित हो जाते हैं
इस इतिहास में युद्ध, धर्म, नफ़रत, गोली नहीं है
हाँ इसमें मर्सडीज़, तनिष्क़, कैवियारा भी नहीं है
पर यह अकेले राजा का इतिहास भी नहीं है
वह राजा, जिसका इतिहास सब लिख रहे हैं
उसके इतिहास में न मैं हूँ न तुम
बन और बिगड़ हम ही रहें हैं और
नाम बार-बार राजा का आ रहा है

इसमें न तो पगडंडी है, न बेर, न जंगल, न पानी, न औरतें
अवधि, वर्ष, काल, तलवार, युद्ध, सत्ता, इमारतें
और न जाने क्या-क्या तो भरा पड़ा है
न संवाद, न खेल, न तान, न मादर, न करमा, न बेटी

इतिहास में भी निर्मम अंक ही अंक और आँकड़े ही आँकड़े भरे हैं
साल, हत्या, युद्ध, विजयें गिनी जा रही हैं
कहीं-कहीं तो कब्रे भी
चमड़ी छिले तन और मन के साथ

ताज़िया

मेरे कस्बे में ताज़िया
सम्पूर्ण कस्बे की
सामूहिकता को समावेशित करता

वह कस्बा
जहाँ सैफूद्दीन मा’साब झूम कर मानस गाते
पाँचो वक़्त नमाज़ को भी जाते

पूरा कस्बा उमड़ पड़ता
देखता ताज़ियों की शोभा और भव्यता
हबीब को हैरत अंगेज़ तलवार चलाते देख दाद देता
सटीक निशाने से आलू को दो टूक होते देख वाह-वाह करता
बच्चे ताज़ियों के नीचे से गुज़र कर
पास होने की मुराद पूरी होने की करते कामना
बड़े अन्य मुद्दों की

चौक पर कस्बा थम जाता
उमड़ पड़ता शामिल होने को
तब तक न तो हुई थी कोई यात्रा
न ही गिरा था कोई ढ़ाँचा

सुपारीलाल की रामलीला

शरद आते ही प्रतीक्षा शुरू हो जाती
मेरे कस्बे में उत्सुकता छा जाती
लोग एक-दूसरे से पूछने लगते
कब आ रही है सुपारीलाल की रामलीला

पूस की चढ़ती ठंड के साथ मण्डली आती
लोग मंच बनते देखते
खिंचते परदों को निहारते
सीमा बनती देखते

कस्बे में हिरण कुलाँचे भरने लगता
सुपारीलाल का हाल पूछा जाता
मण्डली के लोगों को चीन्हा जाता
उन्हे खिलाने को बेताबी मचती

साँझ होते ही
युसुफ, तीरथ, ककउआ
सभी चल पड़ते रामलीला को
टाट के बोरे बगल में दबाए
खीसे में मूँगफली भरे
गर्म कपड़ों से लदे-फंदे

फुटबाल और फ़ुटबाल के लिए देवेन्द्र के जोश के बाद
कस्बे को खुश और उद्वेलित
सुपारीलाल की राम लीला ही करती

रामलीला की भीड़ कस्बे की सम्पन्नता दर्शाती
बीती अच्छी बारिश और दीपावली की याद दिलाती
सारा कस्बा दौड़ पड़ता
भरा रहना सुपारीलाल की रामलीला का
कस्बे का भी भरा-पूरा रहना था

सतपुड़ा 

उत्कंठ भाल हरित खड़ा । सामने वो सतपुड़ा ॥

वितीपाती ठेठ से लड़ा । विदग्ध विख्यात यह बड़ा॥

मकरन्द भरा रहे अकड़ा । सुरभित सुफलित है बड़ा॥

तुरंगम नर्मदा,बैनगंगा से बढ़ा । जैसे बासंती पाँख पर चढ़ा॥

सर्व सुख भरा पड़ा । जब भी देख सतपुड़ा।।

सुरम्य परिमल यह टुकड़ा । शिफा से नहीं बिगड़ा॥

असचेत रहा तू खड़ा । बिगड़ विनष्ट होगा सतपुड़ा॥

बड़प्पन

नादानी छोड़ दी मैने
बचपना जो छोड़ दिया मैनें
मैने पतंग उड़ाना छोड़ दिया
मैने कहानियाँ सुननी बन्द कर दीं

छिपना छोड़ दिया मैनें
डर कर, माँ के आँचल में
मैनें बारिश में भींगना छोड़ दिया
चढ़ना छोड़ दिया मैनें
पेड़ो पर भी
बगीचे से अमरूद चुराने
बन्द होने ही थे
नहीं खेलता मैं अब
रेसटीप भी
मैनें नदी में नहाना भी छोड़ दिया

तुम समझ गए होगे
कि मैं भी तुम्हारी तरह
बड़ा और अक़्लमन्द हो गया हूँ

जी गया जो कविता को

अंग थी जीवन का जिसके- कविता
पूर्ण कालिक दिनचर्या भी
और ढ़ंग जीने का
जीने की दिनचर्या कहलाती है- संस्कृति
इसमें कहीं कविता ही होगी

ऊँट सेठ कविता को जीता
जब भी बोलता, तो मात्र कविता
सटीक तुक के साथ
लिखते हैं कवि कविता
वह तो उसे जी जाता
कविता में समा जाता
उसे पूर्ण कर जाता

ऊँट सेठ तो मर गया
पर नहीं मरती कविता
लिखा नहीं कभी उसे इसने
पर सदा धड़कन बनी रही उसकी
कविता और मात्र कविता
गेयता के साथ
सटीक पद्य के साथ

अब भी कोई मार नहीं पा रहा है कविता
गेयता मारी, पद्य मारा
कविता तो जीवित है
तलाशती ऊँट सेठ को

क्या मुझे बस्तर पर रोना चाहिए ?

क्या मुझे बस्तर पर रोना चाहिए?
क्योंकि वनवासीयों के पास जमीन और वन नहीं रहे
क्योंकि वे अभी भी नंगे रह रहे हैं
क्योंकि उन्हे भागने से रोकने को जुड़ूम में बन्द कर दिया गया है
क्योंकि उन्हे मारने को लोग आ गए हैं
क्योकि बम, सुरंगे, बन्दूक उनके मुँह में ठूंस दी गई हैं
क्योंकि जिन्दा लोगों से जीवन निकाल दिया गया है
क्योंकि स्थानीय बल पंगु हो पलायन कर गए है
छोड़ कर शिविरों में भात खाते वनवासियों को
जहाँ बाहर से आए मरते सैनिक मूत रहे हैं
क्योंकि लोग जंगली हैं
क्योंकि धर्म प्रचारक भी धर्म भूल गए हैं
क्योंकि ऊपर से झाँक कर
उन पर रोना ही सुख है
पर वे तो हँस रहे हैं
तब भी क्या मुझे रोना चाहिए?

शव 

शव पिता का हो तो
याद का मात्र जलता दिया ही नहीं रह जाता
माँ का हो तो पूरा घर गमगीन रहता है
पर दुर्गन्ध, डर अभी भी कहीं बिलबिलाते हों तो
कहते हैं बम फटा था

और शव तो कब के हटा लिए गए
उसमें न तो पिता है, न माँ
अरे हाँ उसमें तो भाई, बहन, पति, पत्नी, प्रिय कोई नहीं है
शव तो फेंके भी जा सकते हैं, बिना बिलबिलाए भी

पुलिस समझ नहीं पा रही कि,
सपनों और इच्छाओं को कहाँ फेंके
अब तो दंतेवाड़ा, बेरूत, बग़दाद, गोधरा
सभी जग़ह गड़ढे पटे पड़े हैं
स्वच्छता का दामोदार भी सरकार पर है
फिर वो विश्व व्यव्स्था की हो या स्थानीय
नालियाँ कीचड़ और प्लास्टिक से अटी पड़ी हैं
हाँ उसमें शव भी हैं, कहीं
पर वे तो गड़ढ़े पाटने के काम आए थे
गड़ढ़े तो कब के भरावा दिए गए
अब झूठ कहीं नहीं हैं
न ही केंचुल
अब शव कहीं दिखते नहीं
इच्छाओं को ताबूत में रैप किया जा रहा है
जम्हूरियत, नौकरी, पेंशन, धन्धे, डालर, मुआवजा, बदलाव
रैपर पर पता नहीं क्या-क्या प्रिंट है
शवों को तो हटना ही होगा

तुम ही क्यों ? 

कहते हैं मरने में समय नहीं लगता
तब भी तिल-तिल कर मारा जाता है
तब मृत्यु गर्व हो या शर्म

अब यह भी कहा जा रहा है
नहीं मरना, गरीब की तरह
न ही कला के लिए

हड्डियों के बाकी रहते
उसमें भी कतर-ब्योंत तो होगी ही
आत्मा भी वितरित की जाएगी
उसमें तुम्हारी तस्वीर नहीं होगी
न ही तुम्हारी मिट्टी

हताश नहीं हो
साथ तब भी है
राजा का, युद्ध का, गबन का, रोग का

तब भी प्रश्न उठ रहे है
तुम ही क्यों?

साड़ा चिड़ियाँ दा चम्बा वे, असाँ ते इक दिन उड़ जाना है 

(कन्या भ्रूण हत्या और लिंग अनुपात कमी पर)

इस बार तुम फिर कम हो गईं
तुम्हारे सुनहरे पर, कमसीनियत, देवी होना
कुछ काम नहीं आया

अच्छा है, यह तो सब ओर आवाज़ है
अब न दहेज, न झुकना, न घृणा
कितनी ही मुक्तियाँ साथ हैं

बौर को भी शाख के साथ तोड़ कर रख दिया
श्वेत सूखे पहनावे का गणवेष है
धूसर सूखी पत्तियों में घबराहट है
चीख दर्ज की जा रही है
सुन कोई नहीं रहा

अलग धुन का राग है पर
समझ सब को आ रहा है
बचपन, ऊपर और नीचे से, दूर है
ओस पर जेठ की मार है
इसे ही बता रहे, प्यार हैं

सफलता लगातार ज़ारी है
आधी दुनिया को आधा करने की तैयारी है
सफलता जो मधुर नहीं पर गिनी जा रही है

अब छाती पर मोती नहीं, पत्थर है
माथे पर सिन्दूर नहीं कालिमा है
गौरया हेतु टहनियाँ शेष नहीं हैं

माहौल सिसक कर गा रहा है
साड़ा चिड़ियाँ दा चम्बा वे
असाँ ते इक दिन उड़ जाना वे
सुन कोई नहीं रहा

अंर्त्तनाद 

अधनंगा ज़िन्दगी को घसीटता
किनारे पड़ा जीव
शायद मानव
दैयनीय, लुंज-पुंज, असहाय
देखता न कोई उसे
अपने से फुरसत कहाँ किसे
न अपनी गली की
न गाँव की
न देश की
चिंता है कहाँ किसे
न समझाने को कोई, न बताने को

इन मानवों औ’ गलियों से ही भारत

ए सुन और उठ
इनकी बहुमूल्यता तू जान
आख़िर कब तक
यूँ निकालते रहेंगें हम
स्वतंत्रता दिवस पर मात्र विशेषांक

ऊँचे दरख्तों के साए में प्यार

प्यार स्वयं कदम्ब के पेड़ों की गणना पर है
वह बच्चा ऊँचे पेड़ों की छाँह में ड़ूब गया है
प्यार तो शास्वत है और सर्वाधिक समसामायिक भी
जंगल में अब भी गुनगुनी धूप विस्तार पा रही है
हालाँकि पेड़ और ऊँचे होते जा रहे हैं
कश्मीर से बस्तर तक यही बयार है
सुबह की धूप के टुकड़े की कमीज बना पहनना चाह रहा है
पर धूप कहाँ है?

सभी पक्षी बन्द कर देते चहकना
गाती जब मैना
सुनने को मीठा गाना
अभी भी निरवता ही है
अब भूल ही गया है चहकना
उस बन्द करने और इस भूलने में अंतर
कोई महसूस ही नहीं कर पा रहा है
जबकि बताते हैं,
उनके पास महसूसने को अंग रहे हैं
बच्चा ऊँचे दरख्तों के मध्य उन्हें भी खोज रहा है

प्यार को प्यार और बढ़ाता रहा होगा
साथ रहने से और भी परवान चढ़ता था
क्या कैम्प और शिविर में साथ रहने से भी?
अब उत्तर क्या होगा
दरख्त उसे भी अपने में समेटे रहेंगें

मीठी सुबह की गुनगुनी धूप के वस्त्र
काँटों से उलझते, बदन छिलते
तो मुस्कुराहट ही आती
अब यही वस्त्र
पेशाब में भींग कर बदबू मार रहे हैं
बर्बादी घोटुल से शिकारों तक
शरीर ढ़कने को तरस रही है
अल्हड़ गोंड़-गोंड़िन के जंगल में भाग जाने पर
खोजने वाला ही नहीं रहा
माड़ (पहाड़) को पूजने वाला
और अबूझ ही बना रहे

राजा रानी न तो जुताई करते हैं
न ही रथ पर बैठते है
चाह अवश्य
समुन्दर से मत्सयगन्धा की है
राजा-रानी यह जरूर कह रहे हैं कि
प्यार क्या शापित हो चला है?
जो भेजा जा रहा है घोटुल में आनन्द मारने
शिकारों को ड़ुबोने

आधी रात का निधन
नागफनी से ही जन्म लेता है
चिनार, गुलाब, महुआ, सल्फी
रौंद दिए गए हैं
पिघलती संगीनें और बूट भी प्यार ही माँग रहे है
संगीनों और बूटों को दफनाया साथ ही जाना है
माँ ने मारने की आज्ञा दी है

बस प्यार दरख्तों के मध्य कोई खोज नहीं पा रहा है
बच्चा अभी भी प्रयासरत है
रानी संगीन के नोक पर खड़ी
नृत्य को साध रही है
राजा छीजन और चीथड़ों के मध्य भी रसीली बोटी पा गया है
प्यार माँ के साथ ही झूम रहा है
बच्चा उससे चिपका हुआ है
बाकी तो गोली खा रहे हैं

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