संजय कुमार शांडिल्य की रचनाएँ

मुझे नीली स्याही लगी एक दवात छोड़कर जाने दो

हत्यायों और हादसों के अभ्यस्त क़स्बे के बीच
पुरातात्विक खुदाई में
टेराकोटा ईंटों से बना
एक पुराना विहार झाँकने लगता है
कुछ दिन की जगमग उत्साहों के बाद क़स्बे में
उदासीन लोग हलवाई की दुकानों पर
जलेबियाँ खाने के लिए इकट्ठा होते हैं
तृष्णा, माया, बन्धन, मुक्ति के प्रश्न और उनके
उत्तर
हर बरसात में थोड़ा-थोड़ा बिलाते हुए
किसी खपड़े में, किसी झिकटी में
फावड़े के साथ बाहर निकलते हैं
आपने इन चीज़ों को जहाँ रख दिया है
वह भी एक पृथ्वी-गर्भ है
नीली स्याही लगी हुई वह तीन हज़ार साल पुरानी दवात
अपनी इबारतों को नहीं पुकार सकती है
किन बेचैनियों में एक नफ़ीस छिला हुआ सरकण्डा उसमें डूबा है
आज इसे कोई नहीं जानता
लोग रामायण और महाभारत याद-रखते बाँचते
समय का कितना यथार्थ बचा पाते हैं?
कोई लड़कर अपने समय की हिंसा से,
प्यार करता है
अपनी प्रेयसी को अस्थियों से बनी चूड़ियाँ भेंट देता है
नंग -धड़ंग त्रिशूल-धारी अनागरिक के हाथों अपने मृत होने से पूर्व
होए, होए पुकारता हुआ
अपनी प्रियतमा को
आँख बंद होने से पूर्व जिसकी एक झलक
मुक्ति है
यह कथा किसी त्रिपिटक में लिखी हुई नहीं है
वह भुर्जपत्र सबसे पहले सड़ा विध्वंस के बाद की पहली बारिश में
होए-होए हो सकता है उस समय की भाषा में
हृदय को विगलित करती करुणा की सबसे
अप्रतिम पुकार हों
जिसे चारागाह में जुगाली करती गाएँ भी समझती हों
जो भाषा शिष्ट हो कर बची हुई है उसमें करुणा के सबसे कम शब्द बचे हैं
हिंसा के ढूँढ़ लो तो हज़ार मिल जाएँगे
कुछ तो मैं लिखता हूँ और मुझे लिखना होगा
जब रामायण और महाभारत सृजन में होंगे
त्रिपिटक रचना में
उस मृदुभाण्ड की वह छोटी सी दवात जिससे चिपकी हुई नीली स्याही आज भी झाँकती है
पृथ्वी गर्भ से
मर्म की विस्मृत, असंरक्षित वह पुकार कहीं
दर्ज नहीं है
शायद उसका रचा काव्य नहीं हो, शब्दों का घोंसला हो
कोई तो गाने वाली चिड़िया वहाँ रहती होगी
महाकवियों! मैं इस जलती हुई पृथ्वी पर रहा हूँ
मैंने प्रेम किया है, सरकण्डे छीले हैं
मैंने अपनी भाषा में दुनिया की सबसे गहनतम करुणा में
किसी का नाम पुकारा है
मुझे नीली स्याही लगी एक दवात छोड़कर जाने दो।

जो नमक का है ज्वार भाटों का है 

तुम उस समुद्र को जानती हो जो नमक का है
ज्वार-भाटों का है
वडवानल का है
तुम उसमें रहती हो
तुम उस कुएँ को जानती हो
जिसमें नमक के और मुसाफ़िर
रहते हैं
जिससे सिर्फ़ आवाज़ें लौटती है
समुद्र भी एक बड़ा कुआँ है
फ़र्क सिर्फ़ नमक का है
तुम समुद्र में हो
मैं हूँ कुएँ में
सुनो इस आग़ की आवाज़ सुनो
पानी की वासना के नीचे
कुएँ और समुद्र से आती है
आग़ की आवाज़

जहाँ पृथ्वी निर्वसना है
बस इस कुएँ और उस समुद्र में
सिर्फ़ नमक का फ़र्क है
जो नमक का है ज्वार-भाटों का है I

गुलमोहर से लगातार फूल झड़ते हैं 

लोग तो इस गुलमोहर का भी बुरा मानते हैं
बिखेर देता है हरियाली छोड़ने के क्षण में
सिकुड़ा हुआ लाल फूल
तुम हँसकर पूछती हो कि तुम्हारा हँसना बुरा तो नहीं है ।
जैसे इस अँधेरे में एक-एक कर
डूबने लगेंगे रात के सितारे

एक बड़े गोते में सूरज एक दूसरे आकाश में निकलेगा
और पृथ्वी पर सुबहें नहीं होंगी ।
हँसने से अच्छा कोई व्यायाम नहीं है यह सामान्य वाक्य कहकर मैं परे देखता हूँ
सचमुच तुम्हारी हँसी के बिना यह दुनिया कितनी बेडौल हो गई है
मुझे एक सामूहिक ठहाके में वह पार्क अकबकाया और बदहवास दिखाई पड़ता है
जिसे शाम को खिलखिलाते हुए बच्चे थिर करते हैं ।
फ़ैसलों का परिणाम जिस पर पड़ता हो उसे
फ़ैसले लेने का हक़ होना चाहिए
तुम लगातार हँसती हो और गुलमोहर से लगातार फूल झड़ते हैं ।

गाँव की लड़कियाँ

मैं कहूँ कि गाँव की लङकियों के सिर पर
चाँद के पास कम केश होते हैं
आप पूछोगे आपको कैसे पता है

गगरे में दाल का पानी ढोती हैं गाँव की लङकियाँ
सिर्फ उस दिन को छोङकर जब घर में मेहमान आते हैं लगभग बारहों महीने
विवाह तय होने के हफ्ते दो हफ्ते पहले तक

दबंगों की बेहिस छेड़ को ज़माने से ज़्यादा अपने भाइयों से छुपाती हैं गाँव की लङकियाँ
आप पूछोगे आपको कैसे पता है

गाँव की लङकियाँ अपने सपनों में कोई राजकुमार नहीं देखती हैं
वह समझती हैं जीवन और कहानियों का पानी और आग जितना फ़र्क

मैं कहूँ कि गाँव की लङकियाँ किसी से भी ब्याह कर एक दुनिया बसा लेती हैं
अमुमन वैसे कि ठीक-ठीक वही हो उनके ख़्वाबों की दुनिया
आप पूछोगे आपको कैसे पता है

गाँव की लङकियँ खूब रंगीन रिबन से अपनी चोटी बनाती हैं
और उन्हें मेले से चूड़ी और रिबन के अलावा कुछ और नहीं ख़रीदना होता है

गाँव की लङकियाँ गाँव की लङकियाँ होती हैं
खूब गहरी
हवा में भी रौशनी में भी मिट्टी के बाहर भी
उनकी जड़ें हैं उनके वजूद से झाँकती हुई

इन घनी लङकियों को बारिश और धूप से आप नहीं डरा सकते हैं
आप पूछोगे कि आप को कैसे पता है?

मॉल में लड़कियाँ

आधी फ़ीसदी की छूट के बावजूद
मुझे यह मेरी दुनिया नहीं लगती

पोस्टर थे जो कह रहे थे स्वतंत्रता
कितना ऊपर उठ सकती थी
कॉकेशियन नस्ल के लोग
मुस्कुराते हुए साथ-साथ थे

वे चाहते थे कि हम अपनी
पहुँच बढ़ाएँ इसलिए वे
दूरियाँ घटा रहे थे

हमारी समस्या थी हमारे लोग
जिनके लिए जूते फ़कत पाँच-सात सौ
फ्राक हज़ार-बारह सौ
और बाहर का खाना
महीने-दो महीने में मसाले-दोसे
भर का मसला था

जो प्यार इन नई झक्क सफ़ेद
इमारतों से आता हमारे लिए
वह फरेब था
इसका पता हमें चलता
तब तक देर हो चुकी होती थी

बाहर धकलने वाले शीशे
के दरवाज़े थे
जिनको खोलते हुए
हाथ सहमते थे
कि इन्हें आगे की ओर
खींचे या पीछे धक्का दें

नियोन में जो चीज़ों के
भाव चमकते थे
वे खाने की टेबुल पर
मेनू में बदल जाते थे

मैं उड़ना चाहती थी
कॉकेशियन उस हम-उम्र
युवती की तरह
यह ख़्वाब मैंने मॉल की
स्वचालित सीढ़ियों को
चढ़ते हुए देखा
एक भरे पर्स के उस प्रौढ़
के साथ
जिसे उड़ती हुई
युवतियाँ पसन्द थी

प्रेम जितना दिखता
वह वहीं छूट जाता था
इस शहर का मौसम
तेज़ी से बदल रहा था
पृथ्वी और सूरज के
सम्बन्ध से अलग

मैं इसी दुनिया में रहना चाहती हूँ
मेरा पुरूष साथी परिपक्वता से हँसता है
तुम यहाँ आ तो सकती हो
यहाँ रह नहीं सकती

ललचाने भर दुनिया की सारी जगहें
खुली अलमारियों में रखी थी
हम उड़ना चाहते थे मगर उड़ नहीं
सकते थे

एक लम्पट-सी ख़ुशी चारों तरफ़
उड़ रही थी
एक उदास-सा फरेब मेरे
साथ-साथ चल रहा था

न यह मेरे भरोसे की दुनिया थी
न मेरी दुनिया मेरी पसन्द की

यह आधी फ़ीसदी की छूट न थी
सौ फ़ीसदी की लूट थी

बारह हज़ार के जूते
पाँच हज़ार की कमीज़
और वह कॉकेशियन हम उम्र
युवक जो वहाँ नहीं था

फरेब इसमें था कि यह दुनिया
मेरी हो सकती है
यह हर क़दम पर यहाँ लिखा था
और ऐसे कि इसपर भरोसा जगता था ।

सदियों हुए प्यार किए

सदियों से प्यार को राख करती ज्वालामुखी फूटती है सुबह-शाम
ये रोटियाँ जो मेरी थाली में हैं ये सदियों पहले
की पकी रोटियाँ हैं
मेरा विश्वास करो इसे पोम्पेइ में बनाया था
किसी औरत ने जो अपने मर्द से प्यार करतीं थी
अभी रोटियाँ सिंकी ही थी चूल्हे पर
कि ज्वालामुखी ने उस थाली को पिघला दिया
जिसमें वह रोटियाँ परोसती और
अपना प्यार ।
भूख की जली हुई देह का श्राप टहल आता है
हज़ारों किलोमीटर
प्यार जो जल गया ज्वालामुखी में
उसकी राख आज भी गिरती है इस चाँदनी रात में ।
चूल्हे से सुबह-शाम फूटते है ज्वालामुखी
ख़त्म हो गया प्यार का आबाद शहर
चूल्हे के राख में लिपटी हुई तुम्हारी देह
मेरी भी और एक बरबाद हुई सभ्यता ।
मैं एक पत्थर हुआ गीत हूँ सदियों से
तुम्हारे पत्थर हुए होठों में फँसा हुआ ।
सदियों से एक सभ्यता की जली हुई लाश है
चाँद की रौशनी में यह शहर मॄत और भस्म ।
मैं तुम्हें और तुम मुझे
बिना प्रेम किए जीवित हैं हम सदियों से ।

पृथ्वी के छोर 

यह पृथ्वी का एक छोर है :
गाँव पहाड़ की तलहटी है
जहाँ एन्डीज़ मिल रहा है
सपाट मैदानों से
पेरू की किसी लोकभाषा में
कचरा बटोरने का गीत है
घोड़े की बग्घी में
पुरूष जब विलासिता के
कार्टून चुनने निकलेगें
हाथों को काम करता देख
होंठ उन्हें अपने आप गाएँगे ।
स्त्रियाँ पास ही शहरी इलाकों में
बच्चे सँभालने निकलेगी
बच्चे ईश्वर सँभालता है
उसी लोकभाषा में यह भी
एक गीत है पृथ्वी के उसी छोर पर ।
यह पृथ्वी का दूसरा छोर है
मेरे पड़ोस में :
मूँज के पौधों में सरकण्डे होने से पहले
सपाट मैदानों के भी अपने पहाड़ हैं
जिनकी तलहटियों से
कुछ स्त्रियाँ खर निकालने निकलेंगी
कुछ रह जाएँगी गोबर पाथने।
अभी सरोद की तरह बजेगी पृथ्वी
मूँज धूप में सूखेगा
झूमर और कजरी के गीत साथ-साथ
झरेंगे
लकड़ियाँ और पत्ते पास के
जंगल से इकट्ठा कर
पुरूष घर लौटेगा ।
यहाँ की लोकभाषा में भात
बनने का भी एक लोकगीत है ।
फिर किसी सस्ती सी आँच पर
प्रेम वहाँ भी पकेगा और यहाँ भी
एक साथ रात की देह गिरेगी
ओस की तरह
श्रम से दुनिया को भरती हुईं
सुबहें उगेगी
खाली जगहों में
लकीरों की तरह
हम दुनिया के छोर पर
काम करते हुए लोग
सुबह की इन लकीरों को
कविताओं में पढ़ेंगे ।

तब हम किसी से पूछ नहीं सकते थे 

तब हम ख़ूब चटख लाल और तड़के हुए पीले रंगों की कमीज़ें पहनते
दुख सेमल के फूलों से हलके और उजले गिरते थे
बेआवाज़
हमारे लगाव मेमने की तरह मासूम और नफ़रतें सिंह की तरह हिंस्र

प्यार हमने तभी किए जब प्यार के बारे में ज्ञान किताबी नहीं था ।

वह साँवली सी लड़की जिसपर पहली बार दिल आया अब दादी बन अपने पोते की मासूम मुस्कुराहट पर फ़िदा होती होगी
मैं जब आठवीं में था वह बी०ए० में पढ़ती थी और जैसे आम में मंजर आते हैं वैसे मुस्कुराती थी
मुस्कुराहट का कोई सिलेबस तो तयशुदा होता नहीं
हम आज भी उस मुस्कुराहट का बेसदा और निर्गंध अनुवाद पढ़ना चाहते हैं ।

वे प्यार की सड़कें जिसपर हम मोरों की तरह नाचे फिर किसी क़स्बे, गाँव या महानगर में नहीं ढले
तब मोहब्बतें कलगी की तरह उगी रहती ऐन ललाट के ऊपर
हम बेख़ौफ़ ज़माने की आँखों में उसका लाल रंग
गड़ाए हुए डगरते
हाय वह दूध में मिले हुए हल्दी-सी गोराई पहने बैजनी समीज और हरे दुपट्टे वाली परियाँ
हमने तब अपने प्यार को अधिकतर यतीम रखा
जिसका बेइन्तहा दर्द कलेजे के किसी गोशे में
सैकड़ों सुइयों की तरह चुभता हैं ।

वासनाओं के इल्म तब ज़िन्दगी के अनजाने इलाके थे
मोहब्बतें खरगोश के कानों में हवाओं की संगीतमय सरगोशियाँ
वे फ़िल्में जिन्हें देखकर हम रोए रात भर और जिन नायिकाओं से जुड़े दिल के सबसे महीन उजालों में
मुट्ठियाँ भींचते हुए कि जो पर्दे के बाहर चिन रहा होता नायक हम उन दीवारों को आग लगा देते गरचे वो नहीं होता पर्दे पर ।

तब पगडण्डी वही थी जो सरसों के फैले हुए खेतों तक पहुँचने के लिए होती
प्यार तो मैंने तभी किया जब हम प्यार कर सकते थे
लेकिन वे ही मौसम याद हैं जिसमें मुस्कुराहटें
आमों में मंजर की तरह उतरते थे
हम सिनोरिटा का अर्थ जानना चाहते थे और तब किसी से पूछ नहीं सकते थे ।

कोई मुझे भी खोद कर निकालेगा 

कोई मुझे भी खोद कर निकालेगा
नुकीले कुदाल से
और धूल झाड़ने वाले ब्रुश से
साफ़ करेगा मुझ पर
तह हुई सदियाँ
वह चुम्बन जिसे तुमने
विदा के वक़्त मेरे कन्धे पर
अपने होठों के
लाल रंग से लिखा
विदा समय का वह कम्पन
कभी पढ़ेगा वह पुरातत्ववेत्ता
वह समय कभी पुनर्रचित होगा
जिसमें जुड़े रहना मुश्किल था
आसान था बिखर जाना
मेरे हाथ और पाँवों की अस्थियाँ
बटोर कर
कितना मुश्किल होगा
मुझे देख पाना
जैसे तुम देखती हो मुझे
इस झिलमिल से उजाले में
इस घिरते हुए अँधेरे में
वह हवा जिसके विरानेपन में
हमारे फेफड़े कर्मरत हैं
और उन झड़बेरियों के काँटे
जिनसे पगडण्डियों की हरियाली है
जैसे तुम देखती हो मुझे
अपने वज़ूद भर रोज़ लड़ते हुए
और हमारे बुरे वक़्त में
दूसरी ओर घूमे हुए
अपनों की शक़्लें हैं
इन सदियों की धूल
कभी साफ़ हो सकेगी
मेरी ये ऑंखें खुली रहेंगी
अनन्त काल तक
उन अनुमानों के लिए
जिनमें कई झूठ होंगें
उनमें एक चमकता हुआ
सच भी रह सकता है।

अब्दुल मियाँ 

अब्दुल मियाँ के इस देश की
अर्थव्यवस्था
दुनिया की तीसरी होगी
२०३५ तक
कोई शताब्दी के बीस वर्ष
उछाल देता है हवा में
अब्दुल मियाँ के घर में
अगर कैलेण्डर हुआ
तो उसमें उसका भविष्य
एक पखवाड़ा है
दरहकीकत अब्दुल मियाँ
दिन भर के दुआ-सलाम में
जितने लफ़्ज खर्च करता है
उतने रूपये अपनी
गिरहस्थी पर नहीं करता
कोई शताब्दी के बीस वर्ष
के ख़्वाब रखता है
उसकी आँखों में
अब्दुल मियाँ सरौते से
सुपारी-सा काटता है
चौबीस घण्टे
अब्दुल मियाँ तम्बाकू की
डिबिया में भरता है
अपने दिन-रात
इस दुनिया के मानचित्र में
अब्दुल मियाँ का कारोबार
एक फैला हुआ जूट का
बोरा है
वही अमेरिका उसका
वही उसका चीन-जापान
कोई अब्दुल मियाँ की
इस दुनिया को
एक बोरे में भरना चाहता है
वह जानना चाहता है
आने वाले बीस सालों की
दुनिया के बारे में
अब्दुल मियाँ मुझ से पूछ कर
अपने कल के लिए
डरना चाहता है।

कोई मरहम-पट्टी नहीं

कुछ बहुत अच्छी तलवारें बाज़ार में हैं
उन्हें इस दुश्मनों से भरे समय में
कोई ख़रीदता होगा
आवारा कुत्तों के लिए लाठियाँ
और विषधरों के लिए
साँप मारने की बर्छियाँ
हाथ जो हथियार चला सकते हैं
और वह साहस
कटे हुए सिर के बाल पकड़ कर
चौराहे पर नाचती है पाशविकता
इसे लोग पीढ़ी दर पीढ़ी हासिल
करते हैं
यह किस बाज़ार में मिलता है?
मैं लाठियाँ, तलवारें और बर्छियों के बिना
भी जीवित रहूँगा
हज़ारों लोग जीवित रहते हैं
हज़ारों लोग मारे जाते हैं
अपनी ही लाठियों’, तलवारों’ और बर्छियों से
देह में लगे घाव के साथ
निकलता रहूँ बस
कोई मरहम-पट्टी नहीं।

हम जहाँ तक पहुँचते हैं, वहाँ तक हमारी दुनिया है

कोई दूर जाता हुआ कहे जा रहा था कि हम
जहाँ तक पहुँचते हैं वहाँ तक हमारी दुनिया है
इस तरह वह रोटी तक समेट रहा था हमें
और नमक तक
ताकि वह समुद्र तक हमारी पहुँच काट दे
वह नदियों के रेशे-रेशे को लिबास की तरह बाँट रहा था
उड़ता हुआ कपास हमारी पहुँच से दूर चला गया
हम पाँव भर ज़मीन सिर भर आसमान और कण्ठ भर शब्द हो गए
उसने कहा पृथ्वी और मंगल के बीच क्या है
शब्दों के सिवा
धीरे-धीरे हमारी मातृभाषा में खाली जगहें थीं ध्वनियों की
हमारी पुकार सिर्फ़ सन्नाटे तक पहुँचती थी और अँधेरे में खो जाती थी
हम कहीं नहीं पहुँचने के लिए अपने पाँवों के खिलाफ़ चल रहे हैं
सारे रास्तों में यात्रा सिर्फ़ उसकी है
उसे जहाँ भी पहुँचना है सिर्फ़ वही पहुँच रहा है
ये मेरे हाथ उसके हाथ हैं, मेरी आँखें उसकी आँखें हैं
यह मेरा रक्त है जो उसके जिस्म में दौड़ रहा है
वही है जो करोड़ों मुँह से बोल रहा है खूब गाढ़े पर्दे के उस पार
मैं उस तक पहुँचने से पहले कोयला हो जाऊँगा
वह अपनी कोटि-कोटि जिह्वाओं से मुझ पर अपना विष बरसा रहा है
शब्दों के बीच की जगहों में थोड़ा अर्थ रखे जाता हूँ
समझ पाओ तो कहने का संघर्ष सफल न समझो तो
यह कि अर्थवान ध्वनियाँ समय के अजदहे खा गए।

अभी सिर्फ़ एक आँख जगी है

आज कल मुझे उस बर्फ़ के पहाड़ की
टूट कर गिरने की हवा बहा ले जाती है
जिसके ऊपर एक ग्लेशियर फिसलता है
नीचे हज़ारों फ़ीट घाटी में लुढ़कने से पहले
उसका गिरना उसके साथ बहता है
बस दिखता है कभी-कभी
गोशा-गोशा इस मेरी देह में
कच्ची बर्फ़ लगी है
एक बड़े राष्ट्रीय आरे से काटा
जा रहा हूँ
मेरी सिर्फ़ एक आँख बची हुई है
स्वयं को काटे जाते हुए
देखने के लिए।
चारों तरफ सिर्फ़ रक्त-माँस के टीले हैं
जीवन के मृदुभाण्ड से भरा
ख़ूब भयानक जंगल है चारों तरफ़
सिर्फ़ उदासियाँ रह सकती हैं
इतने विरानेपन में
यहीं श्रम से हल्की मेरी देह
लुढ़की है नींद की मृत्यु में
बस हृदय की माँसपेशियों में
गर्म रक्त की आवाजाही ही
हरकत है
और ऐन दिल के ऊपर
फन फैलाए बैठा है विषधर।
हम दूर निकल आए हैं
इस अलक्षित जीवनखण्ड की रेकी में
किसी युद्धरत देश में
बाशिन्दों से भरे
सिर्फ़ एक पल पूर्व के किसी शहर में
पहुँचने की सारी जगहें
जैसे मानचित्र में ग़लत अंकित हों
और शत्रुओं के भू-क्षेत्र में
बम की तरह पौ फटे
उस रोज़ धमाके से निकल आए
सूरज।
कितनी अजीब बात है कि इस शहर में
मेरी आत्मा ही मेरा बख्तर है
अठारह किलो का
मेरे विचार मेरा हेलमेट आठ किलो का
और मेरी साँसें वही आठ किलो
भारी असलहे।
एक खूब भरी हुई नदी में मैं उतर रहा हूँ
और अचेत हूँ
इस नदी की पृथ्वी से टकरा कर
बस एक क्षण पहले लौटी है मेरी चेतना
चारों तरफ़ रेत ही रेत है
चारों तरफ़ साँप ही साँप है
चारों तरफ़ बर्फ़ ही बर्फ़ है
चारों तरफ़ पानी ही पानी है
सिर्फ़ मेरी एक आँख जगी है
स्वयं को जीवित देखने के लिए।

जैसे लिखते हो, लिखते रहो

मैं सिर्फ़ अजीब तरह की कविताएँ लिखता हूँ
शब्द मुझसे मुस्कुरा कर कहते हैं
ऐसी बेतरतीबी से क्यों रखा मुझे
लेकिन मैं आराम से हूँ और थोड़ी जगह है
साँस लेने भर यहाँ
मैं कहता हूँ कि हम एक-दूसरे के कन्धे क्यों छीलें
हमें जगह देने अन्तरिक्ष नहीं आएगा।
वाक्य अक्सर मैं पूरे लिखना पसन्द करता हूँ
हैं या थे पर आराम करती हैं क्रियाएँ
संज्ञा-सर्वनाम झपकियाँ ले लेते हैं
अधिक से अधिक कोई क्या कहेगा — थोड़ी शब्द-स्फीति है
तब तक अपनी हथेली पर तम्बाकू मल लेंगें
विचार
फिर आराम से निकलेंगे हवा-पानी धूप में।
अर्थ की लाल आँखें पीछे आती हैं हाँपते-काँपते
उन्हें अपना काम करना है, कर लेंगे
गोमास्ता-लठियाल भी तो चखें थोड़ा हवा-पानी-धूप
मैं अक्सर चाहता हूँ कि उनकी छतरियाँ उलट जाएँ
खेतों से बिदके बैल उनकी तरफ झपटें
यह माँजो, वह खोदो, वहाँ पाटो, यहाँ जोतो
इतनी गुलामी के लिए लाचार नहीं हैं कविताएँ
ज़मीन है तो रहा करे, मजूरी तो हमारी है
ऊसर-बंजर, रेत सब हरा हो जाएगा ऐसी तरावट है पसीने की
और जैसे मेरी भट्टी में सुलगता है लोहा
बात कोयले की नहीं है
यह देखो उठा है फावड़ा मिट्टी को भुरभुरा करने
इस मिट्टी से बर्रे अपना घर बना सकते हैं
शब्द मुझसे मुस्कुरा कर कहते हैं — जैसे लिखते हो, लिखते रहो।

हिलती हुई पृथ्वी

कुछ थोड़े से लोग हमेशा टापुओं पर रहते हैं
तो मैं रोज़ोशब खुले समुद्र में रहता हूँ

मुझे हरबार लहरें दूर, बहुत दूर
लाकर पटक देती हैं
इतनी दूर कि मेरे देश का नौ क्षेत्र
मुझे दिखाई नहीं देता

एक बड़े झंझावात में इस दुनिया की छत
उड़ रही होती है
और हिमालय और आल्पस जैसे पहाड़
भसकते हुए अपने मलबे के साथ
मेरी ओर लुढ़कते हैं

कुछ थोड़े से लोग तब पबों में जाम टकराते
हुए मेरी इस बेबसी पर हँसते हैं
मुझे इस मृत्यु की नींद में उनके ठहाके
सुनाई पड़ते हैं

मैं जब एक दूब की तरह सिर उठाता हूँ
अपने ऊपर के आसमान से मेरा सिर लगता है

कुछ थोड़े से लोग अन्तरिक्ष से खेलते हैं
और मेरी पृथ्वी रोज़ हिलती है ।

हम मृत्यु को प्रेमिकाओं से अधिक जानते हैं

कोई मृत्यु के अगणित भयों के साथ
एक जीवन जी जाता है

अन्त तो प्रारम्भ से ही रहता है
मृत्यु बहती है साथ-साथ
ईश्वर की
चलती रहती हैं गोलियाँ

ईश्वर के दरख़्त से
लटकती रहती हैं गर्दनें
ईश्वर के कुएँ में
टूट जाती है रीढ़ की हड्डी

ईश्वर कारें चलाकर
रौंदता है
और ट्रैक्टर के पहिए से
कुचल डालता है

ईश्वर फेंक आता है
हमारी लाशें गंडक की दियर में
हम मृत्यु से नहीं
इस पृथ्वी पर अनन्त
काल से ईश्वर से डर रहे हैं

मृत्यु तो साथ चलती हुई
सब्ज़ी ख़रीद आती है
मृत्यु साईकिल चला कर
घरों में दूध की बोतलें
डाल आती है

मृत्यु कर आती है विदेश-यात्राएँ
अन्तरिक्ष में जाकर पृथ्वी
पर लौट आती है मृत्यु
सिर पर झुलती है
बिजली के तारों में

हम मृत्यु को प्रेमिकाओं से
अधिक जानते हैं
हमें ईश्वर मारता है
हम उसका पता नहीं जानते
हमने उसकी शक़्ल नहीं देखी है

वह सात पर्दो में रहता है
और गोलियाँ बरसाता है ।

परिन्दे उड़ने की सही दिशा जानते हैं .

उत्तर से दक्षिण की ओर उड़ रहे परिन्दे
उड़ने की सही दिशा जानते होंगे

हम-आप बिलखते-चिलकते रह जाते हैं
इस धूप में, इस असमय बारिश में
इस बेलगाम रफ़्तार में चित्र-लिखित

इस ध्वंस के बाद की सिसकती मायूसी में
धरती के इस या उस करवट में
समुद्र के फेनिल उद्वेलन में
हर विषाद में, हर यातना में
इस लहराते हुए समय की चिरन्तन चेतना के
संगुफन में
इस प्रलय के घनान्धकार में
जो अनान्दोलित हैं हमी हैं

उत्तर से मृत्यु की एक लहर आती है
और दक्षिण जीवन की दिशा है

जिन्हें एक पक्ष चुनना है — सुविधा का श्वेत पक्ष
फिर किसी और पेड़ पर
मिट्टी और रेशों से
नया घोंसला बनाते हैं
उनकी नींद में सपने हरे रहते हैं

इस विलाप के समय की अनथक
अनिद्रा में
हमारा चुना हुआ उजाड़ है
हमें यहीं रहना है
सँवलाए हुए सपनों को
सुबह-शाम जल देते ।

मेरी कविताओं में मैं

मैं जहाँ पैदा हुआ वह मेरे पिता की आजीविका का शहर था
मेरे बच्चे मेरी आजीविका के शहर में पैदा हुए
गाँव में पैदा हुए मेरे दादाजी, वे वहाँ बिना आजीविका के
जब तक रहे जीवित रहे

मेरी परदादी तकली पर कपास बाँटती थी गाँव में
मेरे परदादा कपास उगाते थे गाँव में
मेरा गाँव आज तक मुझे मेरे परदादा के
नाम से जानता है

वह लोहार जो कभी खुर्पियाँ बनाता था
वह मेरे पुरखों का पड़ोसी है

आज वह काले घोड़े के नाल की अँगूठियाँ बनाता है
मैं अपने समय के शनि और मंगल से
डरा हुआ उसके पास बैठता हूँ

न वह गाँव मुझमें रहता है
और न मैं उस गाँव में रहता हूँ
आज मेरे ख़ून में जितना अन्न है उतना ही ज़हर है
मैं जहाँ रहता हूँ वह मेरी आजीविका का शहर है
मैं क्या उगाता हूँ, क्या बनाता हूँ
वह जो खुर्पियाँ बनाता है और कपास उगाता है
जानना चाहता है

मेरे आस-पास कोई कुछ नहीं बताता
कि वह जो पैसे कमाता है, क्या बनाता है
कपास जैसा हल्का, खुर्पियों जैसा ठोस
इस शहर में किसकी आजीविका क्या है
कोई नहीं जानता है

इस शहर में न कोई मुझे न ही मेरे
बच्चों को पहचानता है
मेरी कविताओं में मुझे मत ढूँढ़ो
कविताएँ मैं पुरानी दीवारों पर
मकड़ियों को जाले बनाते देख के लिखता हूँ |

फाँक

गाँव ऊँचे और निचले में नहीं बँटा था
ऊपर से नीचे दो फाड़ था

यह तो गजब था ख़ुदा के नाम पर
जादू ईश्वर के करिश्मे का

एक हिस्से के भूखे-नंगे लोग
दूसरे हिस्से के भूखे-नंगे लोगों
के ख़िलाफ़ थे

यह पता नहीं चलता था
कि महलो-दोमहलो में
ख़ुदा का गजब
और ईश्वर का करिश्मा
कितना कायम था

कभी-कभी खिड़कियाँ खोलकर
वहाँ से इन दिनों लोग
बाहर झाँक लेते थे
दूसरे हिस्से में दरार और
चौड़ी हो जाती थी

फाँक जो पहले से बड़ी थी
इन दिनों कुछ और बढ़ी थी ।

 

जिस रात मैं कविता लिखता हूँ

हिलते-डुलते लोग दिखते हैं आन्दोलित
मैं इस डबरे में उन्हें थिर
करना चाहता हूँ
इस काली रात जब जिस्म ख़ुद
एक परछाई है

शब्दों के बाहर के पतझड़ में सारी ठोस चीज़ें
हलकी होकर उड़ती हैं
जिस रात मैं कविता लिखता हूँ

मेरी नींद पछुआ में चूल्हे की राख की तरह
फैल जाती है
जैसे फैल जाती है मसान में
अस्थियों को बीनकर सुरक्षित
रख लेने के बाद

तो क्या मैं कविताएँ शब्दों में पृथ्वी की लय
सुरक्षित रखने के लिए लिखता हूँ?

घर की दीवार उड़ती है और घर नग्न हो जाता है
मैं शब्दों में बारिश और ओले से बचने की
कोशिश करता हूँ
सारे ख़ून के रिश्ते
इस समय के निर्बाध
सूनेपन में
गंगा में फूले हुए शव
की तरह बहते हैं

पानी के फूल की तरह सपने
आँखों की कोर तक ठोस रहते हैं
उनको पकड़ना चाहता हूँ
उनके ढलक कर भाप होने से पहले

यह मेरी कमीज़ उड़ रही है खील और बताशों जैसे
और मेरा दोपहर का भोजन
और मेरी पढ़ी-लिखी बातें
उसी क्रूर और भारी आवाज़ में
जैसे हवा में लोबान का धुआँ

हम उड़ रहे हैं साथी वायुण्डलविहीन इस अन्तरिक्ष में
जैसे प्रेत उड़ते हैं भूख और ठण्ड को काटते
जवान होती पिता की बहनों की उम्र-सी झरती
अन्तहीन कथाओं में

जैसे ख़ूब तेज़ हवा में टूटी हुई कमानी
पकड़ती है छतरी का कैनवास
मैं बार-बार अपनी कथरी पकड़ता हूँ
जिसपर कटती है पारे-सी गर्म रात

दिन के छकड़े पर ढोया हुआ भारी जीवन
रात हलका होकर खुली आँखों में गड़ता है
शब्दों के बाहर गुड़ के छोए-सी
भारी नींद पसरी रहती है

मैं जिस रात कविता लिखता हूँ, उस रात बस
कविता लिखता हूँ ।

इस महादेश में मौसम भी एक बीमारी है

याक की तरह सर्दी खुर बजा रही है
जिनके जिस्म ओढ़े नहीं जा सकते
वो मिट्टी ओढ़ रहे हैं

ग्लैशियर-सी रात फिसलती हुई बह रही है
हिंसा है इन रातों की नींद हिंसा है

दुख आँच देकर जल रहा है दान का अलाव
साँसों से हथेलियाँ गर्मा रही है रूह
पत्तों पर ठोस हवा ठहरी है
सूखी हुई लकड़ियाँ सब हरी हैं

यह रात जैसे हड़ताल में अस्पताल
इस महादेश में मौसम भी एक बीमारी है
देह तानकर ओढ़ रहे हैं लोग
इस ठण्डे की आग लगे यह रोग ।

मैं इस नीम रात यह जानता हूँ

कोई भी सड़क बादलों की नहीं होती है
धरती से उठती हुई
स्वर्ग तक जाती हुई
मैं इस नीम रात यह जानता हूँ
मैं पृथ्वी का पहला स्वप्नजीवी नहीं हूँ

स्वप्न एक कवच है
पहाड़ से फेंको
या आग में जलाओ
यह बचा रहता है
नींद कछुए की तरह
एक मुलायम-सा जीव है
स्वप्न के बाहर
कभी-कभी ही झाँकता है
जब तक स्वप्न बचा रहता है
नींद बची रहती है
मैं इस नीम रात यह जानता हूँ
मैं पृथ्वी का पहला दरवेश नहीं हूँ।

ऋषियों ने मुझे बाघम्बर फेंककर मारा
देवता मुझसे कुपित रहे
मैंने उस शाप में पत्थर होने से
इन्कार कर दिया
जिसमें मुझे सच बोलने से
चुप रहना था
मैं अब बोलता जाता हूँ और बदलता जाता हूँ
एक नहीं बहने वाली नदी में
मेरे भीतर अब भी इन्कार की रेत उङती है
मैं इस नीम रात यह जानता हूँ
मेरे सच बोलने से युद्ध का नियम नहीं
बदलने वाला
मैं पृथ्वी का पहला धर्मराज नहीं हूँ।

यह नीम रात भी तो पहली नीम रात नहीं है
ऋषियों के बाघम्बर
देवताओं के क्रोध
और सहस्र वर्षों का शाप
स्वप्नों से बाहर मेरी नींद

पृथ्वी पर होने में पहला कुछ नहीं होता है
और आख़िरी भी नहीं
मैं इस नीम रात यह जानता हूँ।

बर्फ़ की दीवारें हैं

बर्फ़ की दीवारें हैं
बर्फ़ जमी हुई ईंटें

बर्फ़ की खिड़कियाँ
बर्फ़ के किवाड़

मौसम कोई भी हो
कुछ भी पसीजता नहीं

ध्रुवों सा ठोस
बर्फ़ एक घर है

जहाँ ठण्डे लोग
रहते हैं।

ख़बर

मेरे हिस्से का
काग़ज़ गूँथा
क़लम बनी
स्याही घुली।

धरती छिटकी
आसमान तना
सागर लहराया।

मेरे हिस्से का
बारूद सुलगा
लोहा पिघला
लहू गरमाया

मुझे ख़बर
नहीं हुई।

सैलानियों की कविता

पानियों और पर्वतों पर लोग
समन्दर और रेगिस्तानों में लोग
पानियों को झाँक रहे हैं
पर्वतों को ताक रहे हैं
समन्दर को निरख रहे हैं
रेगिस्तान से प्यार कर रहे हैं
यह तुम समझ सकते हो।

एक रेगिस्तानी साँप है
उसे नहीं लगता है
कुछ पानियों की मछलियाँ है
ऐसा नहीं सोचती है
समुद्र अपने विचारों में
इसे ग़लत समझता है
पर्वतों को तो सच
साफ़-साफ़ दिखता है
क्योंकि वो सबसे ऊँचा है।

मछलियों को मड़ुए की
लोइयाँ मछुआरे डालते हैं
सैलानी तो तस्वीरें खींचता है
साँपों को चूहे तो
वही रंगों नहाई लड़की खिलाएगी
जो रेगिस्तान की धुन पर
कालबेलिया नाचती है
समन्दर तो अपनी लहरें
उसे ही भेजेगा
जो गजरौला पहने समुद्री हवाओं पर
मछलियाँ सेकती है।

सैलानी तो अपने शरीर बच्चों को
सलीके सिखाता हुआ झिड़केगा
और उनपर नज़र रखता थक जाएगा।

इस यात्रा में वह पाँव, जीभ और पेट
लेकर आया है
उसे मड़ुए की लोइयाँ निगलती
मछलियाँ नहीं दिखेंगी
यह कामायनी तो मछुआरे बाँचेगे
उसे साँप का सुनहरा लोचदार
नॄत्य नहीं दिखेगा
यह नाट्यशास्त्र तो कालबेलिया सीखती
बंजारन पढ़ेगी
बाघों के पंजो की छाप की चित्रकलाएँ
उसके लिए नहीं हैं
उसे तो बिना डरे कमर पर
सिर नीचे साधे
लकड़ियों का बोझ तौलती
वह पहाड़न निरखेगी
डूकरने की आवाज़ जिसके
ख़ूब अँधेरे गाँव में साँझ
ढलते सुनाई पङती है
तो वह जान जाती है
किस जगह बाघ छोङकर
जाएगा अपना पंजा
हम सिर्फ़ थकान लेकर लौटेंगे
पानियों से, पहाड़ों से
समन्दर से, रेगिस्तानों से

हमें लिखी गई कविताओं के
बारे में कुछ भी पता नहीं चलेगा
हम बाघों की तरह प्यार करेंगे
अपनी नस्लों से
हम इस यात्रा से सिर्फ़
मॄत्यु लेकर लौटने वाले हैं।

तानाशाह हमारी नींद से डरता है

तानाशाह के
खंखारने से नहीं डरते
उसके गुण गाने वाले
सबसे बुरे दिनों की कहानियाँ
सुनाते हैं
और थक जाते हैं।

हमारा जीवन
दिन भर एक यातना-शिविर है
हम दिन भर के श्रम से
जब थक जाते हैं
एक क्रांतिकारी नींद
हमें आगोश में ले लेती है।

हमारी निर्भीक नींद में
तानाशाह का कोई खलल नहीं।

हमें प्यार है पत्नी से
हमारे बच्चे हैं जिनकी
ज़रूरत है रोटियाँ

फिर भी हमारी नींद
अच्छे दिनों का ख्वाब
ढोती है
और बिना डरे
पूरा होती है।

दूसरे दिन साईकिल की घण्टियाँ
ऐलान करती गुज़रती है सड़कों से
एक पूरी नींद के बाद
फिर पूरे दिन का श्रम
तानाशाह हमारी नींद से डरता है।

सुबह

खिले हुए उड़हूल के फूलों पर
इसी आसमान के नीचे
ठहरे हुए हैं ओस के कतरे
ये तुम्हें नहीं दिखेंगे
जूतों में ठहरे
श्रम के घण्टे
जहाँ पाँव उतरा है
खदानों से पहले।

सीली हुई किवाड़ों में
जैसे उतरे हैं
कुकुरमुत्ते।

रात के बाद रक्तिम
हुआ है क्षितिज
तुम्हारी आँख खुलने से
बहुत पहले
जलकुम्भियों में हरियाली
का उत्सव है।

हमारे घर सोने के लिए
ही नहीं
तुम्हारी मर्जी के ख़िलाफ़
उन्हें हमने प्यार के लिए
भी इस्तेमाल किया
सिलवटें ठीक करने के बाद
हमने बखिए की तरह
उधेड़ी हैं दीवारें।

जब हम उतरने वाले हैं
खदान के अँधेरे में
एक मैदान खुला होगा वहाँ
कोलाहल के काले पंखों
और छोटे सिर वाले परिन्दे
ढूँढने आए होंगे आबोदाना
पीली-पीली घासों में
रोज़ से अधिक डरे हुए
मनुष्य जैसे
सुबह सबसे पहले
वहीं उगाता है सूरज
धूएँ की पतली लकीरों में।

विषधर

साँप केंचुल छोड़ चुका है
और जोड़े में है
मौसम से विदा होने को है बरसात।

हलवाहे श्रम की थकान मिटा रहे हैं
गा कर बची रह गई है
कजरी अभी गुनगुनाहट में।

हरियाली से फूल उठा है खेत
पॄथ्वी के गर्भिणी होने के संकेत
दो कोस दूर महल जैसे घर में
ट्रैक्टरों की ट्रालियाँ
धो-पोंछ रहा है बिचौलिया।

आढ़तिए गोदामों की सफ़ाई
शुरू करवा चुके हैं
जनसेवा का टिकट कटवा कर
घर लौट रहे हैं रघु चा।
प्यार से पार कर रहे
मोहल्ले से घर का रास्ता।

चाँद के सरकण्डे से
यही सुन्दर पनहारिन
झाड़ती है गाँव की गलियँ
मन ही मन फ़िदा होते हैं
माटी के रंग के दुपट्टे पर।

बन्दूकों की गोलियों के धमाके
फ़सल पकने की प्रतीक्षा में
साँझ अभी गिरी है
छप्परों से पूँछकट्टी बिछौतियाँ
इन्हीं हरी झाङियों में कहीं
आबादी बढ़ाने का ज़रूरी
व्यापार पूरा कर
एक दूसरे की देहों से
पलट रहे होंगे विषधर
चूहे बिल बना चुके हैं अन्तिम बार।

हज़ार दरवेश

वह अपने लम्बे बालों को छाँट लेती है
पॄथ्वी से दूरी बना लेने का यह उसका तरीका है।
उसे अपने रोजनामचे में शामिल करना है
आकाश के सितारों से मुठभेड़ की कथाएँ
वह इस ब्रह्माण्ड के बाहर कहीं रहेगी
अपना घर बनाकर।

उसकी दीवारों पर लिखेगी अपनी मर्जी की
प्रेम-कविताएँ
और ऐसे पढ़ेगी जैसे वे पॄथ्वी पर पढ़ी जा रही हों।
मुश्किल है प्रेम को कविताओं की तरह लिखना
चाहे हों दुनिया में जितने भी छापेख़ाने
बिना प्रेम करने की आज़ादी के स्त्रियाँ कैसे
लिख सकती हैं प्रेम-कविताएँ
क्यों जन्मों की उदासीनता तैरती है उसकी
आँखों में ।
ऐक्वेरियम की मछलियों की आँखें देखी है तुमने
पढ़ी हैं अपने समय की स्त्रियों की लिखी
डायरियाँ
जिसे उन्होंने दास्तानें पहने हुए हाथों से लिखा
कभी नहीं पढ़े जाने के लिए चाँद की रोशनी में
प्रेम-कविताएँ नहीं लिखी गई हैं उनमें
प्रेम रचा गया है उनमें ब्रह्मा के पॄथ्वी की तरह ।

इन अक्षरों को पढ़ना दुनिया के सबसे बङे साहस से गुज़रना है
कविताओं में प्रेम एक फुनगी है विरल और कमज़ोर एक विशाल अश्वत्थ की
बहुत गहरे आईसबर्ग की नोक है प्रेम-कविताओं में
तुम नहीं जानते हो और कोई नहीं जानता होगा
प्रेम की सबसे बङी क्रान्तियाँ अभी अँधेरे में हैं
दमन इतना भयानक कि हस्तलिखित महान
डायरियाँ हज़ारों सालों की ख़ुदाई में नहीं मिली हैं
कभी जिन्हें दास्ताने पहने हाथों ने लिखा था
इसी पॄथ्वी पर चाँद की रोशनी में।

वह कितनी पुरानी किन्तु विश्वसनीय दिखाई पड़ती है यह सब बताते हुए
एकाध अक्षर चमकते हैं कभी-कभी उन राखों में
जो जलाए गए उन स्त्री देहों के साथ
दुनिया के हर देश में जहाँ प्रेम लिखना धर्म विरुद्ध था, प्रेम करना भी
और प्रेम माँगना सबसे ज़्यादा।

वह कहती है कि उसने पढ़ा है जीवन की यातनाओं के स्वीकार से भरे एक अपवाद स्वरूप क्षणांश में
दुनिया की सबसे पुरानी औरत की मुस्कुराहट
ये अक्षर कोयले थे न जाने कितने हज़ार वर्ष पूर्व हीरे की तरह चमकते हैं आज भी उसकी
आँखों में
आज की रात भी दुनिया के सबसे प्राचीन अँधेरे में।

उसने कहा तुम इस क्षण में महानतम हो
पॄथ्वी पर
लो औरत के प्रेम की वे कविताएँ पढ़ो
जिसमें सबसे ऊँचे वॄक्षों की सबसे गहरी जड़ों का अँधेरा है
तुम इन साँवले उजालों को छू लो और उन हज़ार दरवेशों में हो जाओ
जो धरती के बनने से लेकर आज तक हुए हैं ।

दादाजी का सन्दूक

मेरे पिता को याद हैं
चमड़े के बेल्ट से बँधी
ये घण्टियाँ
जब
दूर से सुनाई पड़ती
दादा जी पानी मिलाते
नांद में
जान जाते
गोला बैल
लौटते हुए
खेतों से
झटक रहा माथा ।
पिता को याद है
तब दादी
अन्तरिक्ष को
दिखाती होती
दीया।

आज भी
बैल की
पीठ की तरह
चिकनी हैं घण्टियाँ।

नदी पानी पहनकर
नयी दुल्हनिया लगती
बरसात में
ख़ाली घड़े में
समाती पानी की आवाज़
जगाती धनहर
खेतों की माटी।

पिता को याद है
खेतों को
नाम से पुकारते
दादा जी।

पिता को याद नहीं
ठीक-ठीक
कौन से
नाम थे
खेतों के।

पिता को याद नहीं
किस बरसात में
मिट्टी के घड़ों-सी
भरी नदी।
किस बरस मरा
गोला बैल।

सुबह अब
खेतों की मिट्टी पर
मिलते हैं
भालू के पंजों
के निशान।
एक म्यूजियम
से कम नहीं है
दादा जी का सन्दूक।

मैं नहीं जानता
आने वाले दिन
कैसे कटेंगे
पॄथ्वी के
मुझे कितना
याद रहेगा
छोटी-छोटी
पीतल की घण्टियाँ
पहन जब
दूर खेतों से लौटता
अपना माथा झटकता
गोला बैल
नांद का
पानी बदलते
दादा जी

तब दादी
दिखलाती थी
अन्तरिक्ष को दीया।

 

 

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