संजय तिवारी की रचनाएँ

कैसे लिखूँ तेरे आवन के गीत

पतझड़ के गीत, सावन के गीत
कैसे लिखूँ तेरे आवन के गीत।
उपवन के गीत, अभिनव के गीत
कैसे लिखूँ तेरे जीवन के गीत।

अपनों से सपनों में, अपनों के अंतर के
आकस्मिक अभिमत और आनंदित अंतर के
सपनों में साजन के संग सही प्रीत
कैसे लिखूँ तेरे जीवन के गीत।

आओगे तुम तो बहारें भी आएँगी
आने से तेरे फिर बदली ये छाएगी
देखा था हमने जो सपनों में मीत।
कैसे लिखूँ तेरे आवन के गीत।

पावनता आँगन की मन की आ जाएगी
ड्यौढ़ी की चौखट से बिरहिन ये गायेगी,
परिवर्तित परिणय, पाषाण हुई प्रीत,
कैसे लिखूँ तेरे जीवन के गीत।

दम्भ भरी मादकता, मौसम की, या मधु की,
रम्भ हुई छाती से धार अमिय की विधु की,
एक बूँद प्यार सहित ही दे दो मीत।
कैसे लिखूँ तेरे जीवन के गीत।

अंतर की पीड़ा को अंतर्मन ही जाने,
ऊपर संवेदन, सहजता को ही पाने,
इस खातिर प्रियतम, तुम दो नयी रीत।
कैसे लिखूँ तेरे जीवन के गीत।

जेठ तपा मधुमास

संदर्भों के होठ सिले हैं
व्याख्या हुई उदास
किस प्रसंग की बात कर रहा
जेठ तपा मधुमास
आँगन की बौराई बिल्ली
तुलसी घेर रही
चींटी बाँध बनाकर गाये
बाढ़ तुम्हारी आस
ऐसी पुरुवा बही रात भर
बादल सुलग गये
पछुआ ने सूरज से पूछा
कहां रहोगे आज
दूब जली, मेंहदी झुलसाई
दुल्हन सेज सजी
कैसा सावन आने वाला
जिससे लगती लाज
राग गड़ रही, गीत चुभ रहे
सगुन धुआँ के गाँव
आँझ पराती आँसू-आँसू
आँख लगे नाराज
आना अबके लगन लगे है
अगन मनन की ओर
रूंध गयी देहरी गगन की
ऐसी है आवाज
चाँद सितारे नाच न पावें
नदी न गाये गीत
झरनों ने संगीत हड़प ली
पर्वत पी गये साज
संदर्भों के होठ सिले हैं
व्याख्या हुई उदास
किस प्रसंग की बात कर रहा
जेठ तपा मधुमास

जीते रहे, जलते रहे

घट वही, पनघट वही, आहट वही, चाहत वही
साँसे वही, आहे वही, चाहें वही, आदत वही
उन्मुक्ति सम, आसक्ति कम, यादें वही,मन्नत वही
अल्हड़ नदी जब बह चली, धड़कन वही, जन्नत वही।

वह संदली से देह धुन या गंध पावन सी लगी
वह कौतुकी थिरकन बनी, वह मेघ सावन सी लगी
वह गेसुओं की लट तुम्हारी, झूमती नागिन दिखी
गज सी गमन की हंसिनी की राह आवन सी दिखी।

मह मह महकती खुश्बुओ की शाम की खुशबू रही
जो चाह की मंजिल रही, जो प्यार का साहिल सही
जो वेग पाकर बह चली, धारा तरल गंगा बनी
खुशबू वही तो जिंदगी, हर सांस में बसती रही।

हाँ जिंदगी ही है नदी,बहती रहे, बढती रहे
गति में अगम, गम में गती, चढ़ती रहे, चलती रहे
साहिल अनन्तर,सम चलें, चलते रहे, पर बिन मिले
जीवन यही, आकार बन, जीते रहे, जलते रहे।

प्रलय गा रहा प्यार की देवी अब तेरी ही आशा है 

मन करता है मैं तेरे उन सपनों का श्रृंगार बनूँ
या अधरों के गीत का सरगम वीना के तार बनूँ
तेरे ही नयनों के उज्जवल धवल सिंधु का ये सागर
किसी रूप में तेरे ही मन आंगन का संसार बनूँ।

बहुत चितेरे उपवन के कोने से चित्र बना लेते
बहुत सपेरे सपनों में बस धुन से तुझे मना लेते
मैं क्यों रूप की मदिरा पी मदिरालय का झुठलाता हूँ
बाहुपाश स्पंदन से स्वर के लहर सहलाता हूँ

क्या आदित्य गगन के फेरे करते बैठ गया
रूप सलोना स्वप्रिल बन क्या मन में मेरे पैठ गया
हुई सिंधु सरगम की छन-छन कल-कल सरिता सी बहती
मेरे हृदय की अमिट लालसा तेरी गाथा ही कहती

आज स्वप्न में देखा हमने तुम आये मेरे घर हो
कहां बिठाऊं किसे सुनाऊं कैसा जाने व स्वर हो
रहा सोच मनदग्ध शिवालय की घंटी घनघनाती है
तेरी महिमा रूप समन्वय के ही गुण वह गाती है

स्वतंत्रता की मधुर छुवन से कोमल सा स्वर टूट गया
एक बधा था एक खुला था कोई कानन लूट गया
अभी हुआ बस प्रात भुवन का ऐ स्मृतियों की प्रतिमा
तेरा अमिट अबाध अकंटक विचरण सत्य ही ये आत्मा

मेरी मानों बात विलय की मुझ से संधि स्वीकार करो
यूं लडऩा जीवन का क्रम है क्षणभंगुर ही प्यार करो
प्यासी यह धरती है, प्यासा गगन प्यार का प्यासा है
प्यास प्यार की प्रलय काल की यह संसार ही प्यासा है

प्यास हमारी बुझे भी कैसे सिंधु संभाले तुम बैठे
प्यास यार की बढ़ती जाती क्यों अविचल बन तुम बैठे
करूं वंदना क्रंदित स्वर में अखिल विश्व ही प्यासा है
प्रलय गा रहा प्यार की देवी अब तेरी ही आशा है।

गणतन्त्री संकल्पों का परिणाम

किस प्रवाह के चिंतन से भारत का भाग्य जगेगा?
किस गाथा के वंदन से सबका आभार लगेगा?
किस इतिहास को साक्षी कर हम राष्ट्र गीत जाएंगे?
किस योद्धा के आलिंगन में युद्ध जीत पाएंगे?
किसे भुलाकर आजादी अपनों से हुई विरत है?
संविधान में सपनों का संग्राम प्रतीक्षारत है।

सरोकार सावन की रिमझिम जब फुहार बन जाते
संस्कार से जीवन के सौरभ सारे मुस्काते
नदियाँ, झील, समंदर, पंछी सब हिलमिल कर गाते
मानव से मानव के रिश्ते पुष्प पल्लवित पाते
नहीं हुआ यह, आँखों में ही सपने क्षत – विक्षत हैं
शौर्य – समर की गाथा लेकर शाम प्रतीक्षारत है।

भारत के भावी की खातिर जिनके रहे समर्पण
कुछ सुहाग थे, कुछ राखी थी, कुछ गोदी का अर्पण
हसते हसते चूमे थे जिनकी खातिर वे फांसी
बलिदानों में ही दिखती थी उनको शिव की काशी
सत्ताओ के खेल खेल ये कैसे किये युगत हैं?
भारत की भोली भाली आवाम प्रतीक्षारत है।

कसमे खाते, वादे करते, ध्वज फहराते रहते
राष्ट्रवंदना के स्वर भी ये अक्सर गाते रहते
सडको से संसद तक जाकर बड़ी कहानी कहते
जन मन देवता बता कर, प्रखर क्रान्ति सी बहते
लेकिन इस दोहरे चरित्र की माया बड़ी पिरत है
गणतन्त्री संकल्पों का परिणाम प्रतीक्षारत है।

विद्रोही का मधुमास

पियरायी धरती, दहकते पलाश
नवजीवन पा जाए हर टूटी सांस
मधुमय मन, मौलिक हों अकुलाये शब्द
अबके कुछ ऐसे ही आना मधुमास।

पल्लव की पाँख लिए झूमें कचनार
मदमाती लहरों सी बह उठे बयार
छुई मुई सकुचाई कली खिल सके
अबके हर निमिष उठे महकी सी सांस।

कुसुमाकर आना तुम दुलहिन के द्वार
घूँघट पट खोलेगी झूमकर बयार
प्रणय गीत गाएंगे पंछी चहुँ ओर
प्रीत राग छेड़ेगी फागुन की आस।

पर्वत की पिघल उठे चोटी इस बार
सीमाएं सज्जित हों पहन विजय हार
प्रहरी का साहस, शहादत की आग
टूट चुकी साँसों को मिले नयी सांस।

सिंहासन कर पाएं जन मन से न्याय
पीड़ा परकाया बन निकले ना आह
संवेगी आंसू की रोक सको धार
अबकी तुम आ जाना बिरहिन के पास।

गंगा की अविरलता, यमुना का रंग
मिलना हो त्रेता सी सरयू के संग
मिलने का सुर बन कर सरिता की धार
मधुमय हो रसवंती बोली मधुमास।

केसर की क्यारी में बारूदी गंध
रिपुवन की काया की माया हो मंद
सांझ ढले प्यास लिए लौटे वह द्वार
विद्रोही यौवन को लगे ऐसी प्यास।

जाति-जाति, पंथ-पंथ बंटे नहीं देश
सुन्दर हो सुखमय हो, ऐसा परिवेश
राजनीति जनमुख हो, सत्ता जनधाम
ऐसा कुछ अद्भुत हो अबकी मधुमास।

भारत संवत्सर 

सृष्टि समय के साथ चली जिस गति से वह अनुभव है
सृजन -सृजन में स्पंदन की धार लिए वैभव है
पावन है, मनभावन है, नव मन है, आंगन आँगन,
सेवा, सार, समर्पण लाया, यह नव संवत्सर है।

प्राचेतस के श्लोक -श्लोक में, गीता के स्वर -स्वर में
गायत्री के अक्षर अक्षर, ब्रह्म कृपा निर्झर में
गंगा की कल -कल धारा में, सागर गीत सुनाता
संकल्पो को पावन करने आया संवत्सर है।

नचिकेता के प्रश्नो का आधार रहा जो स्वर है
उपनिषदों की भाषा का आधार रहा जो स्वर है
अध्यायों, उप अध्यायों की हर वल्ली गाती है
काल चयन है, ऋतु पावन है, भारत संवत्सर है।

नए बरस में मेरी कविता भी शायद बोलेगी

सपनों का श्रृंगार कभी साकार हो नही पाया
जीवन का आधार कभी स्वीकार हो नही पाया
अजब पहेली जन्म मिला क्यो सोच नही पाता हूँ
काजल कोर कल्पना का आकार हो नही पाया।

नई किरण से पूछ रहा हूँ, जाने क्या बोलेगी
उत्तर देगी या फिर कोई दर्दपरत खोलेगी
जाने दो प्रश्नों का कोई अंत नही होता है
नए बरस में मेरी कविता भी शायद बोलेगी।

मानस में जो बसी उसी के लिए सदा गाऊंगा
दुत्कारे या ठुकराए बस उसी लिए लाऊंगा
शब्द खोजने निकला हूँ,अब लेकर ही लौटूंगा
डगर यही है यहीं चलूँगा, कही नही जाऊंगा।

मातृ दिवस पर विशेष 

माँ
रस है
छंद है
अलंकार है
सृजन की सत्कार है

दोहा है,
सोरठा है,
चौपाई है
खय्याम की रुबाई है
सूर के पद है
तुलसी के मंत्रो का नद है

श्रुति की ऋचाओं का अनहद स्वर है
स्मृतियों की सहचर है
उपनिषद् का ज्ञान है
पुराणों का प्राण है
शास्त्रों से बहुत ऊपर है
शस्त्रों से बहुत भारी है
सृष्टि भी जिसकी आभारी है

सृष्टि से इतर
सृष्टि का दर्शन है
उसी में जीवन का प्रदर्शन है
सम्भावनाये हैं
संत्रास भी
हर पल जी सकने का आभास भी
प्रकृति की प्रीति है
वही जगत की रीति है

सागर से भी अथाह
अँधेरे से भी स्याह
सूर्य से भी प्रज्जवलित
हिम सी गलित
गंगा
जमुना
सरस्वती
साक्षात् संगम की गति
संतति के सुख के लिए
आजीवन व्रती

जगत के फलक से असीमित सत्ता
शब्द सामर्थ्य से परे उसकी महत्ता
तीन लोक,
चौदह भुवन में
एकमात्र अधिष्टात्री
सकल ब्रह्माण्ड में एकमात्र
सहयात्री

माया
ममता
क्षमता
समता
ईर्ष्या
करुणा
दया
क्षमा
माया
छाया
विद्या
प्रज्ञा
सांस
उच्छ्वास
जीवन की इकलौती आस
नहीं रखे उदास
हर पल है आभास
यही कहीं है पास

साल,
ऋतु
माह
पक्ष
दिन
रात
पल,
छिन

सभी में तू ही समायी है
बहु प्यारी है, माई है।

विष्णुपदी हूँ 

राम,
बहुत हारी हूँ
तुम्हारी सरयू को भी
बहुत प्यारी हूँ
मेरी हर सज्ञा
कोई न कोई संस्कार है
मेरी संज्ञा में ही संसार है।

मेरी संज्ञा में ही
तुम भी समाये हो
इसीलिए आज
मेरे तट पर आये हो
देखो न
कितना सयोग है विचित्र
मेरे सामने तुम हो
और विश्वामित्र।

एक पड़ाव तक
अब मैं आ चुकी हूँ
तुम्हे पा चुकी हूँ।
मानसी हूँ
देवसरि हूँ
विष्णुपदी हूँ
तुम्हारी सृष्टि की
हर नयी सदी हूँ।

तुमसे पूर्व से हूँ
तुम्हारे बाद तक रहूँगी
अभी ऐसे ही बहूँगी
वैद्यों के लिए
स्वांस गति
इड़ा,पिंगला और सुषुम्ना
में से ‘सुषुम्ना’
खगोलशास्त्रियों के लिए
आकाश गंगा।

श्रीकृष्ण के लिए
‘गीता गंगोदक’
तुलसी के लिए
सुरसरि गंगा
श्रध्दा-भावना और
लोक-प्रतिष्ठा
को देखकर
अपने से मिलाते हुए
आस्था के गीत गाते हुए।
सागर ने
मुझे बहुत सम्मान दिया है
‘गंगा सागर’ नाम दिया है।

कुछ अंत है, कही अनंत है 

माघ की महारात
अद्भुत सौगात
शिव से शिव का संवाद
अनहद नाद
पिंड से ब्रह्माण्ड तक
ब्रह्माण्ड से पिंड तक
विष का शमन
ऊर्जा का ऊर्ध्वगमन

महा शिव रात्रि
कोई त्यौहार नहीं है
केवल किसी उपासना का
आधार नहीं है

इस विज्ञान से भी बड़ा महा विज्ञान है
पिंड में जीवन का एक मात्र संज्ञान है

शिव की शक्ति
शक्ति का शिव
किसी की भक्ति
किसी का इव
सृजन का आधार
संस्कृति का आभार
प्रकृति का उद्धार
अप्रकृति का संहार

यह मृत्यु का जीवन है,
अमृत का सागर है
निशानिमन्त्रण है,
आत्म नियंत्रण है
विष है, सुधा है
तृप्ति है, क्षुधा है
आग्रह है, अबीर है
सुख है, पीर है
कुछ अंत है, कही अनंत है
वही शिव है, वही संत है।

अबकी फिर आयी है
शिव की रात
मन से देखें
प्रकृति की बरात
इस माघ की महानिशा
बदलेगी दिशा
उर्ध्वगामी ऊर्जा का प्रवाह
संभावनाएं अथाह

सुख की मात्रा
महादेव की महायात्रा
सती की आह
गंगा का प्रवाह
बिल्वपत्र से पलाश तक
धरती से कैलाश तक
ज्योतिर्पीठो के लिंग
हिमग्राम का आत्मलिंग

परमाणु से परमाणु तक
महकाया से विषाणु तक
संध्या से प्रभा तक
क्लांति से आभा तक

अर्चना
आराधना
उपासना
साधना
पूजा
वंदना
स्तुति
अर्घ्य
हवन
और आरती
अद्भुत है भारती

पृश्नि ब्रह्माण्ड में
जम्बू द्वीप में
आर्यावर्त की
यही तो शक्ति है
संहार से पूर्व
सृजन
पोषण और संवेदना में
जो समायी है
यही शिवभक्ति है।

मेरी साँझ तिरपाल में ही ढलेगी

वन में ही चक्रवर्ती जी के
अवसान की सूचना आयी थी
पिता की गोद बहुत याद आयी थी
माँ की रुदन व्यथा
भीतर तक समायी थी
कनक भवन की चांदनी
भी परायी थी, दुखदायी थी
पीड़ादायी थी हर बात
पोर पोर दुख था गात

जब जानकी धरती में समायी थी
धड़कने रुकने को आयी थीं
मन में न्याय की दुहाई थी
प्रजा के भरोसे की कमाई थी
इसी में दीं की भलाई थी
न ह्रदय फटा, न आँखे झुकी
केवल एक धारा बाहर आयी थी

सरयू की धारा में जब समाया
किसी के मन को बहुत नहीं भाया
नहीं थी कोई माया
लेकिन कोई नहीं आया
जो भी आया, धारा में समाया
बिना काया
बिना माया
बिना छाया

तब त्रेता का राम था
स्वयं से बड़ा नाम था
मानव होने का इलहाम था
लोकमंगल ही काम था

वन में रहने के चौदह साल
बड़ी ऊंची हो गयी थी भाल
संवेदना थी निहाल
मनुष्यता थी खुशहाल
वेदना थी बेहाल

इस कलियुग में यह आवास
तिरपाल में वास
पच्चीस वर्षो से
एक टकटकी, एक आस
इस पीढ़ी को क्या कहूँ
असमंजस में कब तक रहूँ
इस कलिकाल में खुद को
अजीब स्थिति में पाता हूँ
इस नस्ल को इसी के हाल पर छोड़
अब लौट जाता हूँ
या फिर करता रहूँ प्रतीक्षा
आस्था जीतती है या इच्छा?

कलयुग के ये मनुष्य
नहीं जान सकते विधि का अभिप्राय
क्या युक्ति है और क्या न्याय
ये नहीं जान सकते
जब सत्य की समझ होती है अविभाज्य
तब आता है राम राज्य
अभी तुम्हारी यात्रा चलेगी
वत्स
मेरी साँझ तिरपाल में ही ढलेगी।

यही है राम की पहचान

वह अनजान नहीं है
उसका अनुमान नहीं है
उसकी दृष्टि में
यह स्वाभिमान नहीं है।
यह अयोध्या का सवाल नहीं है
क्या गलत है, क्या सही है
सवाल उस मनुष्य का है
जिसकी खुद की संज्ञा
इसी अयोध्या से बनती है
सृष्टि के प्रथम पुरुष
मनु से ही यह जनती है
इसी संज्ञा में छिपा है
अयोध्या और मेरा अस्तित्व
मेरा क्या हो सकता है अभिमान
इस घोर कलिकाल में कैसा अपमान
या कि कैसी कोई निशानी
इन्हे कौन बताये
यही है सरयू का पानी
दुःख तो यह कि ये जान नहीं सकते
यह मनुष्य मनु से ही बना है
ये मान नहीं सकते
यह कितना बड़ा खिलवाड़ है?
बुद्धि का कैसा उजाड़ है?
कागज के पन्नो में
ईंट, गारे और पत्थर के जंगल में
आपस के ही दंगल में
मनुष्य के ये दल
तलाश रहे मेरा अस्तित्व
किसी भूमि के अंश पर
मेरा स्वामित्व
मनुष्य और मनुष्य के बीच का विवाद
मनुष्य ही कर रहे न्याय का संवाद
और न्यायासन पर भी
मनुष्य ही विराजमान
अभूतपूर्व अभिमान
अनुमान
भविष्य से अनजान
इन्हे कौन बताये कि
मैं केवल एक शहर नहीं हूँ
किसी सभ्यता के लिए जहर नहीं हूँ
मैं सृष्टि का अवध्य हूँ
जगत का निबध्य हूँ
जीवन के लिए बाध्य हूँ
इस मनुष्य के लिए असाध्य हूँ
केवल दशरथ या इक्ष्वाकु की नहीं हूँ
तुम नहीं जान सकोगे
मैं इस धरती पर
पृथु की कृपा नहीं हूँ
नहीं हूँ किसी नृप की नृपा
अयोध्या यूँ ही नहीं हूँ
मनु के पूर्व भी रही हूँ
मानव
तुम कैसे जान सकोगे मेरा इतिहास
तुम्हे कभी न होगा इसका आभास
निष्फल ही होगा प्रयास
मैं तो सनातन दर्शन की सहयात्री हूँ
तुम कैसे समझोगे कि गायत्री हूँ
अनुभव करो सरयू का ताप
अनुभव करो
कौशलपति के महल में
आरती का आलाप
अनुभव करो सागर को, सगर को
अनुभव करो सिद्धाश्रम की डगर को
अनुभव करो या करो विश्राम
अनुभव करो सिया के राम को
अनुभव करो उस विराम को
काल के लिए बेमानी हैं
अनुभव और अनुमान
सृष्टि के लिए जरुरी है
संस्कृति,संस्कार और स्वाभिमान
यही है अयोध्या
यही है राम की पहचान।

राम के अस्तित्व की करोगे तलाश?

अयोध्या
सर्वदा राम के साथ
उसकी डोर उन्ही के हाथ
वन हो या पहाड़
शांति हो या असुरो की दहाड़
नदी का तीर हो
या झरनों की ताल
जैसी प्रकृति वैसा हाल
यह केवल वनवास की पीड़ा नहीं
केवल जीवन की क्रीड़ा नहीं
कर्तव्य और मर्यादा
न कम न ज्यादा
सबसे बड़े संस्कार
सृष्टि का आभार
सृजन का संसार
सेवा का प्रसार
राम से बड़ी राम की मर्यादा
संलयन का इरादा
ऋषिकुलों का रक्षण
दर्शन का संरक्षण
कोशल से कानन
न बच सका दशानन
वही अयोध्या जहां राम
शेष समस्त वन अनाम
अयोध्या
कोई नगर नहीं
मानव सस्कृति का है नाम
मूलाधार हैं राम
जगत्पति जगदीश
ब्रह्माण्ड के अधीश
कलियुग की अयोध्या
कलियुग की राजनीति
काल की चेतना में
कलियुग की रीति
कैसी हार और कैसी जीत
न कोई छत
न कोई भीत
न हवा, न गर्मी, न शीत
इस अराज में न देख सपने
मनुष्य हो
नहीं ला सकते रामराज
तुम्हारे वश का नहीं यह आज
तुम्हारे न्यायालयों की औकात क्या है मित्र
इनकी दीवारों पर देखो
लगे हैं किनके किनके चित्र
इन चित्रों के सहारे
राम के अस्तित्व की करोगे तलाश?
क्या ऐसी क्षमता है तुम्हारे पास?

ऐसे ही पड़ी हूँ

जब नहीं था
युग का अस्तित्व
नहीं था काल का प्रवाह
नहीं थे चाँद सितारे
और उनके परिवार
नहीं था संसार
मई तो थी तब भी
हूँ अब भी
और रहूँगी
अस्तित्व के अस्तित्व से इतर
जैसी थी
जैसी हूँ
वैसी ही रहूँगी
मतझे बसाया नहीं है
किसी मनुष्य ने बनाया नहीं है
अस्तित्व से पूर्व लायी गयी हूँ
अवधपुरी हूँ
मैं स्वयं आयी नहीं हूँ
मेरे बाद शुरू होते हैं तुम्हारे युग
मेरे बाद आता है तुम्हारा दर्शन
मेरे बाद आती हैं तुम्हारी श्रुतियाँ
स्मृतियाँ
पुराण
इतिहास
साहित्य
और
सबके बाद तुम
बहुत छिछले हो
राह से बिछले हो
कैसे जान सकोगे
मेरा मूल
नहीं देख सकोगे
मेरे ह्रदय का शूल
मनुओ की माता भी हूँ
राम की जाता भी हूँ
युगो की धराता भी हूँ
काल की प्रजाता भी हूँ
अस्तित्वपूर्व से अस्तित्व तक की
एकमात्रा ज्ञाता भी हूँ
मैं अयोध्या हूँ
ऐसे ही पड़ी हूँ
ब्रह्माण्ड
सृष्टि
समय
इनसे पूर्व भी थी
आज भी खड़ी हूँ।

अष्टचक्रा नवद्वारा देवानां पूरयोध्या

कलियुग की अदालत में
अगम के अस्तित्व की तलाश
तलाशने वालो के खुद का
कैसा आभास
उन्हें भी होगा एहसास
अंत तो वही होना है
रह जाने वालो को
रामनाम सत्य
गाकर ही रोना है
उसी सत्य के जन्म की
लकीर
कैसे ये पा सकेंगे
रामनाम सत्य
कैसे ये गा सकेंगे
उन्हें क्यों नहीं होती
अनुभूति
जीवन की रीति
एक राम की ही नहीं
सप्तहरि की भी भी
जननी है यह भूमि
न केवल काल
न ही केवल नेमि
ऋषियों
मुनियो
तपस्वियों के आराध्य
हरि ही साध्य
गुप्तहरि
विष्णुहरि
चक्रहरि
पुण्यहरि
चन्द्रहरि
धर्महरि
अाैर बिल्वहरि
का प्राकट्य
कथाये है अकथ्य
अखिल ब्रमांड नायक
जगत के हैं नाथ
हे मनुष्य
क्या कर रहा तू उनके साथ
श्रुति ने गाया
अष्टचक्रा नवद्वारा देवानां पूरयोध्या
सच में हो सकेगी यह तलाश?
देखो कैसे काँप रही
तुम्हारी देह
ठहर गए
तुम्हारे हाथ

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