संदीप ‘सरस’ की रचनाएँ

गीत 

शारदे लेखनी में समा जाइए

शारदे लेखनी में समा जाइए,
मेरे गीतों की गरिमा सँवर जायेगी।

प्रेरणा आप हो अर्चना आप हो,
मेरे मन से जुड़ी भावना आप हो।

काव्य की सर्जना स्नेह है आपका,
मेरे हर शब्द की साधना आप हो।

हाथ रख दो मेरे शीश पर स्नेह से,
काव्य प्रतिभा हमारी निखर जायेगी।

सारगर्भित रहे मुक्तकों-सा सदा,
और जीवन बने सन्तुलित छंद सा।

पारदर्शी रहे गीत की भावना,
हो सर्जन सर्वदा शुद्ध आनन्द सा।

ज्ञान की वर्तिका प्रज्वलित कीजिए,
मेरे जीवन में आभा बिखर जायेगी।

मेरी अनुभूतियों को गहन कीजिए,
भावनाओं को अभिव्यक्ति दे पाऊँ माँ।

भाव ऐसे हृदय में जगा दीजिए
कल्पना को सहज शक्ति दे पाऊँ माँ।

लेखनी को हमारी मुखर कीजिए,
शब्द की साधना भी सुधर जायेगी।

स्वाभिमान के सम्मुख मेरे

स्वाभिमान के सम्मुख मेरे,
कुछ अनुदानों का क्या होगा?

हमने अपने मन की प्रियता
पर प्रतिबंध नहीं स्वीकारा।
हमने अंकगणित की शर्तों
पर सम्बन्ध नहीं स्वीकारा।

बंध्या यदि हो गई आस्था,
तो सम्मानों का क्या होगा?

पगडण्डी में कभी न उलझा,
मुख्य मार्ग की अगवानी की।
हमने तो जीवन भर अपने,
संघर्षों की जजमानी की।

लक्ष्य सरलता से मिल जाए,
फिर व्यवधानों का क्या होगा?

अंतस की अनुभूति गहन हो,
तो अभिव्यक्ति मुखर होती है।
भावों की भट्ठी में तपकर,
संवेदना प्रखर होती है।

बिना सृजन इस आतुर मन के,
अनुसंधानो का क्या होगा?

आपस में गलबहियाँ लेकर

आपस में गलबहियाँ लेकर
ठुमक चले हैं अक्षर अक्षर

निश्चित ही रचनाकारों का भाव भरा आमंत्रण होगा।
आज सृजन के राजभवन में गीतों का अभिनंदन होगा।

सँवेगों ने स्वागत गाया, आवेगों ने चरण पखारे।
और उमंगों ने आगे बढ़, सौ सौ मंगलगान उचारे।

हुई घोषणा है सम्मानित उर का हर स्पंदन होगा।
आज सृजन के राजभवन में गीतों का अभिनंदन होगा।1।

संशय का प्रवेश प्रतिबंधित, पहरे पर विश्वास अटल है।
संवेदी अनुभूति गहन है, मानस का उल्लास अटल है।

निश्चल भावों के आँगन में प्रियता का अभिमंत्रण होगा।
आज सृजन के राजभवन में गीतों का अभिनंदन होगा।2।

अन्तस् की अभिव्यक्ति प्रखर है, मृदुता का भावातिरेक है।
भावव्यंजना की रोली से गीतों का राज्याभिषेक है।

साँसों से अनुप्राणित स्वर का शब्दों में उच्चारण होगा।
आज सृजन के राजभवन में गीतों का अभिनंदन होगा।3।

कवि तुम ऐसी रचना लिखना जिसमें जीवन राग मुखर हो

कवि तुम ऐसी रचना लिखना जिसमें जीवन राग मुखर हो।

जीवन के पथरीले पथ को पौरुष का परिचय लिख देना।
बाधाएँ कितनी भी आएँ उनको बस संशय लिख देना।
जल ठहरा तो सड़ जाएगा बहते रहना ही जीवन है,
कलकल जीवनगान सुनाती नदिया का आशय लिख देना।

उठती गिरती और संभलती लहरों की भाषा तो बाँचो,
कवि तुम ऐसी रचना लिखना,जीवन का संघर्ष प्रखर हो।

हँसते चेहरों के पीछे की छिपी वेदना भी पढ़ लेना।
और वेदना के अंकन का कोई फिर मानक गढ़ लेना।
कोई दीन-दुखी मिल जाए उसके कुम्हलाए अधरों पर,
थोड़ी मुस्काने चिपकाकर धीरे से आगे बढ़ लेना।

सपने बाँझ हुए हैं जिनके, जीवन प्रश्न चिह्न जैसा है,
कवि तुम ऐसी रचना लिखना, उनके प्रश्नों का उत्तर हो।

जब इतना हो जाए कवि तो, अंतर को आंदोलित करना।
जीकर जीवन गान लिखा क्या, खुद को भी संबोधित करना।
हम सुधरेंगे युग सुधरेगा यह तो सदियों से सुनते थे,
निज शोधन की मर्यादा भी जीवन में संशोधित करना।

जितनी हो अनुभूति गहन उतनी अभिव्यक्ति प्रखर होती है,
कवि तुम ऐसी रचना लिखना जो जीवन का जीवित स्वर हो।

सद्भाव दया करुणा ममता का जन जन मन में हो प्रवेश। 

सद्भाव दया करुणा ममता का जन जन मन में हो प्रवेश।
मानवता चूमे उच्च शिखर, अन्तस् में शुचिता हो विशेष।

अनुभूति गहनतम हो मन की, अभिव्यक्ति प्रखरतम हो जाए।
भावों का अंतर्द्वंद मिटे, संवाद मुखरतम हो जाए।

माँ सरस्वती ऐसा वर दें
अविराम अर्चना कर पाऊँ।।
लेखन में ऐसी शक्ति भरें
साहित्य साधना कर पाऊँ।1।

हर शब्द शब्द अनुप्राणित हो भावों से भी अनुबंधित हो।
संवादशिल्प हो सधा हुआ शास्त्रीय भाव सम्बंधित हो।

जीवन्त बिम्ब के मानक हों,भाषा हो प्रांजल निर्विकार।
सम्मोहन से हम मुक्त रहें शोधन हो मन का बार बार।

आलोकित तन मन जीवन हो,
संदीप्त चेतना कर पाऊँ।।
लेखन में ऐसी शक्ति भरो,
साहित्य साधना कर पाऊँ।2।

सम्प्रेषणीयता हो समर्थ, संशय का भाव बहिष्कृत हो।
अप्रतिम हो स्वत्व सौष्ठव भी,चारणता वृत्ति अस्वीकृत हो।।

मानस के कोरे पृष्ठों पर नव सृजन सदा शब्दांकित हो।
जीवन में शुभ संघर्षों का श्रृंगार सदा नामांकित हो।।

अमरत्व लेखनी को सौंपे,
संपुष्ट सर्जना कर पाऊँ।।
लेखन में ऐसी शक्ति भरो,
साहित्य साधना कर पाऊँ।3।

मुखर वेदना को सहेजकर जीना भी कैसा जीना है

मुखर वेदना को सहेजकर जीना भी कैसा जीना है,
जीवन यदि जीवन्त नहीं हो, तो जीवन से मरण श्रेष्ठ है।।

बाधाओं के सम्मुख कैसे, नतमस्तक हो झुक जायेंगे।
थककर चूर हुए भी तो क्या, हार मानकर रुक जायेंगे।

पथ के कण्टक पुष्प बनाना, पौरुष का परिचय होता है,
पथ को जो गौरव दे पाये, मानूँगा वह चरण श्रेष्ठ है।।

जनहित जगहित मानवता से, बढ़कर कोई धर्म नहीं है।
भूखे को रोटी देने से, बेहतर कोई कर्म नहीं है।

व्यक्ति नहीं व्यक्तित्व अमर है, हम बदलेंगे युग बदलेगा,
जीवन को अमरत्व सौंप दे, ऐसा शुभ आचरण श्रेष्ठ है।।

मंज़िल से पहले रुक जाना, यह यात्री का काम नहीं है।
जीवनपथ पर चलना जीवन, पलभर भी विश्राम नहीं है।

ठहरा जल सडांध देता है, बहते रहना ही जीवन है,
हरक्षण जीवनगान सुनाती सरिता का अनुसरण श्रेष्ठ है।।

सपने तो सपने होते हैं लाखो हों चाहे इकलौता 

सपने तो सपने होते हैं लाखो हों चाहे इकलौता,
जो सपना सच हो न सके उस सपने का मर जाना अच्छा।।

क्या चिड़ियो के उड़ जाने से आँगन नहीं मरा करता है?
क्या सपनों के मर जाने से जीवन नहीं मरा करता है?
उन कलियों की व्यथा टटोलो जिन्हें कंटकों ने ही छेड़ा,
क्या पुष्पों के मुरझाने से उपवन नहीं मरा करता है?

हाँ, कुछ पुष्प हुए उपवन में जिनमें रची सुवास नहीं है,
ऐसे पुष्पों का खिलने से पहले ही मुरझाना अच्छा।1।

मन की पीड़ा कहें अधर ना, यह भी कोई बात हुई है।
जीवन हो जीवन्त अगर ना, यह भी कोई बात हुई है।
टुकड़ा-टुकड़ा जीने को मैं जीना कैसे कह सकता हूँ,
थोडा जीना थोडा मरना यह भी कोई बात हुई है।

बूँद-बूँद से तृप्ति मिली तो प्यास बहुत शर्मिंदा होगी,
तो उस प्यासे का पनघट से प्यासा ही घर आना अच्छा।2।

शब्द शब्द से संवादों का गठबंधन अच्छा लगता है।
सच कहता हूँ कविताओं का अपनापन अच्छा लगताहै।
मेरे गीतों में जीवन का आँसू-आँसू अभिमन्त्रित है,
वेदों के मन्त्रों से ज़्यादा गीत मुझे सच्चा लगता है।

जीवन की अनुभूति हमारे गीतों में अभिव्यक्त न हो तो,
फिर जीवन के हर पन्ने का कोरा ही रह जाना अच्छा।3।

मैंने तेरा मन माँगा था तूने जीवन माँग लिया है

मैंने तेरा मन माँगा था तूने जीवन माँग लिया है।
सपनों के सजने से पहले तूने आँगन माँग लिया है।

मेरा उस पथ से क्या नाता तेरे द्वार नहीं जो जाए।
वह पुरवाई व्यर्थ जो तेरे आने का आभास न लाए।

चाहत मेरी श्रवण सरीखी तुम दशरथ के तीर बन गए,
साँसो की सरगम से पहले तूने धड़कन माँग लिया है।1।

साँसो की साँकल खटकाई तेरे मन में द्वार न खोले।
फिर भी मेरे आकुल मन ने पानी में प्रतिबिंब टटोले।

एकलव्य सा हृदय बिचारा द्रोण सरीखी तुम निर्मोही,
प्रतिमा के अर्चन से पहले तूने चंदन माँग लिया है।2।

अनचाहे से अनुबंधों ने जब जब मन की व्यथा छुई है।
मेरे अभिशापित अधरों की पीड़ा तब तब विवश हुई है।

प्रश्न कर्ण से तीखे मेरे, तुम कुंती की भाँति मौन हो,
रिश्तो के जुड़ने से पहले तूने बिछुड़न माँग लिया है।3।

अन्तस् की पीड़ा को गाकर 

अन्तस् की पीड़ा को गाकर
शब्दशिल्प में उसे पगाकर

मैं जीवन की राम कहानी सदियों तक दोहराऊँगा।
अखिल विश्व में एक व्यक्ति भी सुनता है, मैं गाऊँगा।

गीतों की हर पंक्ति पंक्ति से अक्षर अक्षर अनुबंधित है।
शब्द शब्द से अनुप्राणित हो,भाव गीत से सम्बंधित है।
अंतर के आंदोलित भावों का अक्षरशः आमंत्रण है,
पीड़ाओं के गरल पान से ,मन शिवता को सम्बोधित है।

मानस में अनुभूति जगाकर
और उसे अभिव्यक्ति बनाकर

पीड़ा के अनुनादित स्वर को जन जन तक पहुँचाऊँगा।
अखिल विश्व में एक व्यक्ति भी सुनता है, मैं गाऊँगा।1।

रेती के तट पर रेतीले सपनों की आशा जीवित है।
जीवन हो जीवन्त हमेशा मन में अभिलाषा जीवित है।
उच्छंखल लहरों की आहट सुनकर ये आभास हुआ है,
इन उठती गिरती लहरों में गति की परिभाषा जीवित है।

मन के भावों को सहलाकर
शब्दों से उनको दुलारकर

अविरल बहती नदिया का मैं जीवन गान सुनाऊँगा।
अखिल विश्व में एक व्यक्ति भी सुनता है, मैं गाऊँगा।2।

मैं पत्थर में मूरत गढ़ने की प्रवृत्ति का अभिलाषी हूँ।
रेती को निचोड़ कर अपनी प्यास तृप्ति का अभ्यासी हूँ।
स्वाभिमान के बदले मुझको सुविधाएँ स्वीकार नहीं हैं,
अपना जीवन अपनी शर्तों पर जीने का विश्वासी हूँ।

मन मे फिर विश्वास जगाकर
जीवन को जीवंत बनाकर

सृजन साधना के फलतः मैं गीतों में ढल जाऊँगा।
अखिल विश्व में एक व्यक्ति भी सुनता है,मैं गाऊँगा।3।

वेदना से प्रीति की भाँवर हुई तो

वेदना से प्रीति की भाँवर हुई तो,
भावना के पाँव भारी हो गए हैं।

हर कली का पुष्प से संबंध क्यों है?
कंटकों का पुष्प से अनुबंध क्यों है?
जब प्रणय का गान है प्राणों से प्यारा,
तो कहो फिर गीत पर प्रतिबंध क्यों है?

आह ने उर में जलन के बीज घोले,
तो नयन के अश्रु खारी हो गए हैं।

आज मेरी गूँज फिर अनुगूँज बनकर
पास मेरे हाथ खाली लौट आयी।
कर दिया तुमने तिरस्कृत तो बिचारी,
भावना हो कर सवाली लौट आयी।

देहरी जबसे तुम्हारी छू के लौटे,
गीत मेरे ब्रह्मचारी हो गए हैं।

आयु गीतों की होती है कवि से बड़ी

आयु गीतों की होती है कवि से बड़ी,
गीत रह जाएंगे हम गुजर जाएँगे।

हम मिलेंगे हमारे किसी गीत को,
गुनगुना लीजिएगा नज़र आएँगे।।

तेरे मन ने कभी द्वार खोले नहीं,
साँस की साँकलें खटखटाते रहे।
भावनाएं सभी बेदखल हो गईं,
द्वार पर ही पड़े छटपटाते रहे।।

तुमने ठुकरा दिया तुम नहीं जानते,
दर्द के काफ़िले अब किधर जाएँगे।

नींद की अनछुई चादरों के लिए,
स्वप्न के बोझ ने सलवटें सौंप दीं।
याद ने आपकी कसमसाकर हमें,
रात भर के लिए करवटें सौंप दीं।

अब दिवास्वप्न के साथ हम हो लिए,
वो जिधर जाएँगे हम उधर जाएँगे।

दासता बादलों की नहीं चाहिए,
प्यास को कोई पनघट मिले न मिले।
हम सलामी न दे पाएँगे सूर्य को,
दीप को कोई जमघट मिले न मिले।।

जब उजाले की होगी जरूरत हमें,
धूप मुट्ठी में हम बन्द कर लाएँगे।

यूँ तो अनुमति दे देता हूँ अधरों को तुम हास सजा लो 

यूँ तो अनुमति दे देता हूँ अधरों को तुम हास सजा लो,
सच तो यह है जनम-जनम से आँसू से रिश्तेदारी है।

अभिसंचित है उनसे सागर, पगली सरिताओं को भ्रम है।
क्या जाने सागर का आँचल, अपने ही आँसू से नम है।

सरिताओं ने लाख उड़ेली मृदुता अपनी ही बलि देकर,
यह कैसी पीड़ा है अब तक सागर का पानी खारी है।1।

कुछ रिश्ते झूठे पकड़े थे, मुट्ठी से वे फ़िसल गये हैं।
कुछ सपने झूठे देखे थे, नींद खुली तो निकल गये हैं।

जेबें हल्की होती हैं तो, वज़न बात का कम होता है,
वैभव का स्वामी हो उसकी बातों की कीमत भारी है।2।

पाने को तो कुछ आँसू है खोने को सारा सागर है।
कहने भर को ही धरती है गर छूना हो तो अम्बर है।

लावारिस झूठे सपनों को छाती से भींचे बैठा हूँ,
मेरा मन अंधों की नगरी में दर्पण का व्यापारी है।3।

तेरा दोष नहीं, जाने क्यों मेरा मन भटका करता है

तेरा दोष नहीं, जाने क्यों मेरा मन भटका करता है,
मैं जाने अनजाने ही परिचय को प्यार समझ बैठा था।।

जब-जब टेढ़ी नज़र चाँद की तुम पर हुई बहुत अखरा था।
तेज हवाएं तेरा आँचल छूकर गई बहुत अखरा था।
रेती के आँचल पर मैंने जब जब तेरा नाम लिखा था,
कोई लहर तुझे छूने को तत्पर हुई बहुत अखरा था।

अपराधी मैं हूँ मुझको सीमाओं का अनुमान नहीं था,
अनायास ही मैं तुझपे अपना अधिकार समझ बैठा था।1।

हर आहट पर मुझको तेरे आने का आभास मिला था।
लावारिस झूठे सपनों के सजने को आकाश मिला था।
आख़िर साबित हुई छलावा कभी यहाँ थी कभी वहाँ थी,
मेरे आँसू पी जाने को तुझे कहाँ अवकाश मिला था।

कस्तूरी के लिए बेचारा मन मृग सा छटपटा रहा है,
मैं तेरी अठखेली को सच्चा मनुहार समझ बैठा था।।

संकल्पो के पहरे लगवा दूँगा मैं सपनों के द्वारे।
सावधान कर दूँगा अधरों को, ना तेरा नाम पुकारें।
जान गया हूँ यह अँधेर नगरी है इसका चौपट राजा ,
अंधों की नगरी में आखिर दर्पण कैसे बिकें बिचारे।

सपनो का बाजार सजा कर, होती रिश्ते की नीलामी,
मैं तो इसको भावों का सच्चा संसार समझ बैठा था।।

नैतिकता को गिरवी रख दूँ, क्यों सच से समझौता कर लूँ

नैतिकता को गिरवी रख दूँ, क्यों सच से समझौता कर लूँ,
युग मुझसे जब प्रश्न करेगा तब बोलो उत्तर क्या दूंगा।

मैं ठहरुँ मंजिल खुद आए ऐसी कोई राह नहीं है।
स्वाभिमान के आगे मुझको सुविधा की परवाह नहीं है ।
अपना जीवन अपने ढंग से जी लूँ मेरा हक बनता है ,
मन के पंछी को सोने के पिंजरे जैसी चाह नहीं है ।।

आदर्शों की बलि क्यों दे दूँ, अपनी क्यों मर्यादा छोड़ूँ,
जग मुझसे जब प्रश्न करेगा तब बोलो उत्तर क्या दूंगा ।।1।।

मेरे सब अरमान छीन लो मैं अपना ईमान न दूँगा।
मेरे सब अधिकार छीन लो मैं अपना सम्मान न दूँगा।
जैसा भी हूँ जितना भी हूँ खुश हूँ उतना ही रहने दो ,
मेरे सब अधिकार छीन लो मैं अपनी पहचान दूँगा।।

राजद्वार से नाता जोडूँ क्यों प्रतिभा पर वैभव थोपूँ,
मन मुझसे जब प्रश्न करेगा तब बोलो उत्तर क्या दूँगा।।2।।

दो घड़ी के लिए आप सो जाइए

दो घड़ी के लिए आप सो जाइए,
स्वप्न बनकर नयन में समा लूँ जरा।

प्रीति की पुस्तिका बाँच पाया न मन,
जिल्द बांधा किया आखिरी साँस तक।
तृप्ति की कामना काम ना आ सकी,
मैं भटकता रहा प्रीति से प्यास तक।

पीर जीवन की मृदु गीत में ढ़ाल कर,
आइए चार पल गुनगुना लूँ ज़रा।1।

बादलों ने कहा आसमाँ से सुनो,
चाँद को आवरण में छुपा लीजिए।
है नशीली बला चांद की चांदनी,
भोर होने से पहले चुरा लीजिए।

रात ने दी चुनौती ठहर जाइए,
मैं सितारों की महफिल सजा लूँ जरा।2।

कामना आँसुओं की अधूरी रहीं,
भावनाएँ हृदय की कुँआरी रहीं।
दीप जलता रहा फिर पतंगा जला,
वासनाएँ प्रणय की भिखारी रहीं।

जाने कब जिंदगी को उजाला मिले,
रोशनी की उमर आजमा लूँ जरा।3।

ग़ज़लें

हकीकत है कोई किस्सा नहीं है

हकीकत है कोई किस्सा नहीं है।
वो भूखा है मगर झूठा नहीं है।

सबब है बदनसीबी का यक़ीनन
कि सर पे बाप का साया नहीं है।

वो वाकिफ़ है जड़ों की हैसियत से
जो पत्ता डाल से टूटा नहीं है।

ये बच्चे पीठ पर जो ढो रहे हैं,
यकीनन बोझ है बस्ता नहीं है।

जो होना है वो होकर ही रहेगा,
न हो ऐसा कभी होता नहीं है।

कोई सूरत न सीरत के मुकाबिल,
वो सुंदर है मगर सच्चा नहीं है।

वो मेले से भरे मन से है लौटा
खिलौना एक भी सस्ता नहीं है।

किसी की पीठ पर चढ़ने से सुन लो,
किसी का कद हुआ ऊंचा नहीं है।

कलेजा चीरना पड़ता है यारों
ग़ज़ल का शेर यूँ होता नहीं है।

ज़माना जीत लेता है मगर घर हार जाता है

ज़माना जीत लेता है मगर घर हार जाता है।
स्वयं से ज़ंग लड़ता है वो अक़्सर हार जाता है।

इरादे ज़ुल्म सहकर और भी मज़बूत होते हैं,
मेरे सर से तेरे हाथों का पत्थर हार जाता है।

कफ़न को खोलकर देखा तो दोनों हाथ खाली थे,
समय के सामने बेबस सिकन्दर हार जाता है।

मुसाफिर ही चले हैं रास्ते चलते नहीं देखे,
नहीं जो कर्म का राही मुक़द्दर हार जाता है।

शराफ़त छोड़ कर लहरें बग़ावत पर उतर आएँ,
तो फिर अपने ही पानी से समन्दर हार जाता है।

बनाकर बाँह की तकिया, मैं गहरी नींद सोता हूँ
मेरे फुटपाथ से महलों का बिस्तर हार जाता है।

तेरा ऐश्वर्य तेरा है, मेरा अभिमान मेरा है,
मेरी गैरत के आगे तेरा तेवर हार जाता है।

हमेशा से ज़माने के सितम सहते चले आये 

हमेशा से ज़माने के सितम सहते चले आये।
कि दरिया हैं तभी हर हाल में बहते चले आये।

बुजुर्गों की दुआएँ आज भी महफ़ूज हैं उसमें,
पुराना घर जहाँ हम उम्र भर रहते चले आये।

भले बच्चे हमारे,अनसुने कर दें सुझावों को,
हमारा काम कहना था तो हम कहते चले आये।

हमारे हौसलों की हद कहाँ तक आजमाओगे,
दिये सा आँधियो के बीच में जलते चले आये।

हमारा वक़्त बदलेगा, तुम्हारी राय बदलेगी,
इसी उम्मीद के साये तले पलते चले आये।

सफ़र लम्बा रहे,पगडंडियां अच्छी नहीं होती,
भले हम देर से पहुंचे मगर चलते चले आये।

नई नस्लें पुरानी बंदिशों को बोझ कहती हैं,
हमेशा हम नये बदलाव में ढलते चले आये।

वो रिश्तों की गणित के एक संजीदा खिलाड़ी थे,
हमारे स्नेह के अनुपात में छलते चले आये।

चिर व्यथा का भार लेकर क्या करोगे?

चिर व्यथा का भार लेकर क्या करोगे?
दोगला संसार लेकर क्या करोगे?

आप इस अपमान के पश्चात बोलो,
खोखले उपहार लेकर क्या करोगे?

ढोंग लादे पीठ पर जब घूमते हो,
ज्ञान का विस्तार लेकर क्या करोगे?

न्यायसंगत बात की अनुमति न हो तो,
व्यर्थ के अधिकार लेकर क्या करोगे?

आपके जो खेत तक जाती नहीं हो,
उस नहर की धार लेकर क्या करोगे?

चाटुकारों का जहाँ मजमा लगा हो,
आप वह दरबार लेकर क्या करोगे?

पेट भूखा हो, नहीं रुचता भजन, हम क्या करें?

पेट भूखा हो, नहीं रुचता भजन, हम क्या करें?
बींध देता है हृदय को, यह रुदन, हम क्या करें?

भींच रक्खे थे दबाकर दांत से अपने अधर,
पीर मन की खोल देते हैं नयन, हम क्या करें?

कंटको के बीच खिलते फूल की थी कामना,
किन्तु हिस्से में हमारे है चुभन हम क्या करें?

आसमाँ को चूमते हैं झोपड़ी के हौसले ,
हो भले ही आपका ऊँचा भवन, हम क्या करें?

कीजिए टुकड़े हमारे, यह हमें स्वीकार है,
स्वाभिमानी हैं, नहीं झुकना सहन,हम क्या करें?

झूठ कैसे बोल दें, सिद्धांत के विपरीत है,
हैं अखण्डित सत्य के सारे वचन,हम क्या करें?

भावनाओं को हमारी आपने समझा नहीं,
आपका है एकपक्षी आकलन, हम क्या करें?,

जो जिया जैसा जिया है, बस ग़ज़ल में कह दिया,
आपको लगता नहीं मौलिक सृजन,हम क्या करें?

झुकी हुयीं बाअदब हैं आँखें

झुकी हुयीं बाअदब हैं आँखें।
खुदा कसम क्या ग़ज़ब हैं आँखें।

भले ही लब चुप रहें तुम्हारे,
मुझे तो लगता है लब हैं आँखे।

तुम्हारी आँखों में जब से झाँका,
हुई मिरी बेअदब हैं आँखें।

निगाह उठना निगाह फिरना,
अदा का तेरी ही ढब हैं आँखें।

सम्हालती हो न जाने कैसे,
मुझे लगा बातलब हैं आँखें।

निगाह में शोखियाँ सी थीं कल,
मगर नशीली सी अब हैं आँखें

कभी नज़ाकत में कातिलाना,
कभी सितम का सबब,हैं आँखें।

हमें ये खाली खाली जिंदगी अच्छी नहीं लगती 

हमें ये खाली खाली जिंदगी अच्छी नहीं लगती।
हमेशा ही सवाली जिंदगी अच्छी नहीं लगती।

हमारा हक़ हमे दे दो या सब कुछ छीन लो हमसे,
हमें ये बीच वाली जिंदगी अच्छी नहीं लगती।

कभी इस द्वार बैठी तो कभी उस द्वार जा बैठी,
हमें हरगिज हलाली जिंदगी अच्छी नहीं लगती।

किसी माँ का पतीली में जरा सी कंकड़ी भरकर,
छलावे से उबाली जिंदगी अच्छी नहीं लगती।

कभी घर से निकल के दर्द साझा हो पड़ोसी का,
सदा गूगल खंगाली जिंदगी अच्छी नहीं लगती।

नसीहत आप ही रक्खें हमें संघर्ष करने दें,
हमेशा पाठशाली जिंदगी अच्छी नहीं लगती।

सफर पर पांव तो निकले कोई ठोकर भी लगने दो,
दुआओं से सम्हाली जिंदगी अच्छी नहीं लगती

उजाला भीख में पाकर मिटायें क्यों अँधेरों को,
हमें ऐसी उजाली जिंदगी अच्छी नहीं लगती।

बड़ा कितना भी हो जाऊँ, वो बचपन याद आता है 

बड़ा कितना भी हो जाऊँ, वो बचपन याद आता है।
पुराने घर में था मेरे, जो आँगन, याद आता है।

निवाले गोद में अपनी बिठा करके खिलाती थी,
मेरे गालों पे अम्मा का वो चुम्बन याद आता है।

सुबह बाबा की पूजा,गूँजती मानस की चौपाई,
मेरे माथे पे बाबा का वो चन्दन याद आता है।

कि जब भी खेलकर आते पसीना पोंछ लेते थे,
मेरा रूमाल, वो दादी का दामन याद आता है।

समूचा गाँव जुड़ता था किसी रिश्ते की डोरी से,
वो भीगा प्रेम से रिश्तों का बन्धन याद आता है।

भरा बरसात का पानी, बहाना नाव कागज की,
मुझे बागों में झूला और सावन याद आता है।

मेरे परिवार को जिसने अभी तक जोड़ रक्खा है,
रसोई में रखा चूल्हा वो पावन याद आता है।

महानगरों के कल्चर ने मशीनी कर दिया मुझको,
मुझे वह गाँव का अलमस्त जीवन याद आता है।

ढाक जैसे पात बनकर क्या करुँंगा

ढाक जैसे पात बनकर क्या करुँंगा।
स्वप्न की सौगात बनकर क्या करूँगा।

जानता हूँ मैं सभी प्रश्नो का उत्तर,
सत्य का सुकरात बनकर क्या करुँगा।।

प्यास पोखर की कुँआरी रह गयी तो,
बेरहम बरसात बनकर क्या करुँगा।।

लाख कुंती सी तुम्हारी हो निठुरता,
कर्ण सा प्रतिघात बनकर क्या करूँगा।।

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