सईददुद्दीन की रचनाएँ

अलग अलग इकाइयां

सुब्ह से मैं उस घड़ी की टिक टिक सुन रहा हूँ
जो दीवार से अचानक ग़ाएब हो गई है
लेकिन हर घंटे के इख़्तिताम पर
अलार्म देने लगती है
और फिर टिक टिक टिक
कभी कभी से टिक टिक
मुझे अपने सीने में सुनाई देती है
कभी कलाई की नब्ज़ में
फिर तो जिस चीज़ को उठाकर कान से लगाता हूँ
वो टिक टिक करने और अलार्म देने लगती है
अचानक मैं अपने अक़ब की दीवार को देखता हूँ
वहाँ मुझे ये घड़ी
दीवार पर औंधी चिपकी दिखाई देती है
सामने की दीवार से ये अक़ब की दीवार पर कैसे आ गई
और उस की सूइयाँ और डायल दीवार से चिपक कैसे गए
जैसे उस वक़्त दीवार के उस पार के लिए हो
मैं बराबर के कमरे में जाता हूँ
अब मुझे वक़्त दिख रहा है
लेकिन घड़ी ग़ाएब है
अब न उस की टिक टिक है न अलार्म
मैं ने चाहा कि चीज़ों को छू कर देखूँ
ठीक उस वक़्त मुझे अंदाजा हुआ
मैं चीज़ों को देख सकता हूँ
छू नहीं सकता
इस कमरे में तो मैं ख़ुद उल्टी हुई घड़ी हूँ
ये कमरा और वो कमरा
दो अलग-अलग इकाइयाँ हैं
उन्हें एक नहीं किया जा सकता
बस उस कमरे में थोड़ी देर के लिए झाँका जा सकता है
मैं वास अपने कमरे में आ जाता हूँ
वहाँ जहाँ मैं हर चीज़ को छू सकता हूँ
और हर चीज़ में वक़्त की टिक टिक सुन सकता हूँ
चाहे सामने घड़ी हो
या न हो

नज़्म 1

कोई सख़्त फल काटते हुए
उस ने अपने ख़्वाब में
अपनी उँगली काट ली
जिस्म से अलाहिदा हो जाने वाली उँगली ने
रेत पर लकीरें बनाना शुरूअ कर दीं
कुछ अधूर नुक़ूश उभारे
फिर वो एक लख़्त भड़क उठी
सब्ज़ सुर्ख़ और दूधिया रौशनी निकालने के बाद
ये उँगली राख में तब्दील हो गई
राख से फूटने लगा
एक नन्हा सा पौदा
उस की नाज़ुक पत्तियों पर यूँ गुमान होता था
गोया शाख़ों से नाज़ुक नाज़ुक सी उँगलियाँ निकल रही हों
ये सब कुछ महज़ एक ख़्वाब था
ख़्वाब से जागने के बाद
वो संजीदगी से उस ख़्वाब के बारे में सोचता रहा
फिर हँस दिया
उस ने अपनी हथेली थपथपाई
ठीक उस जगह
जहाँ उस की उँगली ख़्वाब में अलाहिदा हो गई थी
वहाँ उँगली ही न थी
उस का सारा बदन धुँदलाने लगा
साथ ही
उस पौदे के नुक़ूश वाज़ेह होने लगे
जिस की नाज़ुक शाख़ों में
नाज़ुक नाज़ुक उँगलियाँ निकल रही थीं

नज्म़ 2 

‘‘मश्‍कीज़े का पानी उसी रेत पर डाल दो
और नंगे पाँव मेरे पीछे चले आओ’’
मैं ने सारा पानी रेत पर गिरा दिया
और नंगे पाँव उस के पीछे हो लिया
कई सहरा हम ने उबूर कर डाले
ज़हरीले काँटों और ज़हरीले कीड़ों पर पाँव रखते हुए
हम आगे बढ़ते रहे
अचानक मुझे महसूस हुआ
कि मैं तो सहरा में अकेला ही चला जा रहा हूँ
तो क्या उस ने मेरे साथ धोका किया ?
मैं तो सहरा के बीच सम्त का तअय्युन करने से भी क़ासिर था
वो चंद क़दम आगे ही तो था मुझ से
फिर वो अचानक जाने किस बिल में छुप गया
मैं ने उसे बहुत पुकारा
लेकिन मेरी आवाज़ तो सहरा में ऐसे बिखर कर रह गई
जैसे मेरे मश्‍कीज़े का पानी
रेत में जज़्ब हो गया था

जब तुम सहरा में अपना मश्‍कीज़ा छोड़ आए
जब तुम एक साँप के साथ हो लिए
और तुम्हें पता ही न चला कि वो किस बिल में जा छुपा है
तो तुम्हारे पैर रगड़ने से
सहरा में चश्‍मा तो उबलने से रहा

मेरे मश्‍कीज़े में पानी नहीं था
मेरे पाँव नंगे थे
मुझे किसी मंज़िल का पता नहीं था
और किसी सम्त का तअय्युन तक करने से मैं क़ासिर था
मेरे पास बस एक ही रास्ता रह गया था
सो मैं ने अपने पाँव से काँटा निकाला
और रेत में बो दिया
चंद घंटों में वो एक साया-दार दरख़्त में तब्दील हो गया
और उस में अजीब ओ ग़रीब फल पैदा हो गए
मैं ज़हरीले
और ग़ैर ज़हरीले फलों में तमीज़ नहीं कर सकता था
और मेरे लिए
कोई मन्न ओ सलवा भी आसमान से उतरता नहीं था
सो मैं ने इन फलों को रग़बत से खाया
इतने में शाम हो गई
और सहरा की तारीकी में
सहरा के ज़हरीले कीड़े मकोड़े
अपने बिलों से निकल कर मेरे बदन से चिमट गए
कुर्सी पर नीम-दराज़ हो जाता है
हम दोनों
कोई बात नहीं करते
न सिगरेट जलाने के लिए
एक दूसरे को लाइटर पेश करते हैं
उस का बस चले तो वो मुझे हलाक कर दे
मेरे भी उस के बारे में
यही कुछ जज़्बात हैं
इस के बावजूद
जब भी मैं उसे बुलाता हूँ
वो आ जाता है
मेरे बुलावे में न इसरार होता है
न धमकी
न कोई शर्त
ये वो भी जानता है
मेरे बुलावे में
किसी ख़्वाहिश की रमक़ नहीं
हम दोनों
किसी भी दिन
अपने क़रीब तरीन सुतून की ओट ले कर
एक दूसरे को निशाना बनाने की कोशीश कर सकते हैं
लेकिन
ज़िंदा बचने वाले के मुक़ाबले में
मर जाने वाला
ज़्यादा ख़ुश नसीब साबित होगा
बचने वाले को
हलाक होने वाले का जिस्म
उठा कर चलना होगा
उस के ख़ून आलूद कपड़े पहनाने होंगे
मरने वाले की लाष को
किसी भी क़िस्म के ख़ुर्दबीनी कीड़ों से
महफ़ूज़ रखने के लिए
जतन करना होंगें
फिर उस की लाश को
सहारा दे कर
किसी आराम-दह कुर्सी पर बैठाना होगा
उस के मुँह से सिगरेट लगाना होगा
उसे लाइटर भी पेश करना होगा
बल्कि उस की मौत को
अपनी मौत समझते हुए
दो क़ब्रें
बराबर खोदनी होंगी
बसें और कारें उन के क़रीब आ कर
दरख़्तों को छूती हैं
और उन्हें
सड़क के दाएँ या बाएँ हटाने में जुट जाती हैं
लेकिन उसी दौरान
शराब की बू उन्हें भी
बद-मस्त कर देती है
वो भी सड़क के बीचों-बीच नाचने लगती हैं
फिरत तो बल खाती सड़क भी
उठ खड़ी होती है
और ठुमके लगाने लगती है
घर थरथरा उठते हैं
उन में सोए हुए मकीन
हड़बड़ा कर जाग जाते हैं
उन्हें अपनी आँखों पर यक़ीन नहीं आता
शराबी दरख़्तों
नशें में धुत बसों, कारों
और बद-मस्त नाचती सड़क को
शहर में बसने वाले लोगों की
कोई परवा नहीं

ये देख कर आदमी का नषा
हिरन हो जाता है

नज़्म 3

घर से ऑफ़िस जाते हुए
मैं रोज़ सड़क के दाएँ बाएँ
दरख़्तों को गिनता हुआ चलता हूँ
हमेशा गिने हुए दरख़्तों की तादाद मुख़्तलिफ़ होती है
कभी दौ सौ बीस
कभी तीन सौ ग्यारह
कभी कभी तो दरख़्तों की तादाद इतनी बढ़ जाती है
कि मुझे गुज़िश्‍ता दिन के आदाद ओ शुमार पर
शक होने लगता है
पर एक दिन पता चला
रास्ते के दरख़्त आधे भी नहीं रहे
क्या आधे दरख़्त काट दिए गए हैं
लेकिन अगले रोज़ दरख़्तों की तादाद इतनी थी
कि मेरा ख़ुद पर से ए‘तिमाद उठ गया
मुझे यूँ लगा
जैसे कुछ दरख़्त मुझे देख कर
इधर उधर हो जाते हैं
कुछ दूसरे दरख़्तों के पीछे छुप जाते हैं
कुछ दरख़्त रातों रात इस लिए उग आते हैं
कि मुझे हैरान कर दें
और कुछ इस लिए ग़ाएब हो जाते हैं
कि मेरा ख़ुद पर से ए‘तिमाद ही जाता रहे

लेकिन ये बात भी एक दिन ग़लत साबित हो गई
मेरे घर से दफ़्तर तक के रास्ते में
कोई दरख़्त था ही नहीं
ये मुझे कई लोगों ने बताया
दूसरे कई लोगों ने इस बात की तस्दीक़ की
कुछ ने ये मानने तक से इंकार कर दिया
कि इस रास्ते पर अभी कोई दरख़्त भी था
उस रोज़ जब मैं उदास और ग़मगीं
ऑफ़िस से घर लौट रहा था
मेरे रास्ते के दोनों जानिब
दरख़्त सड़क पर नीचे तक झुक आए थे
हर घर की चार दीवारी के ऊपर से
एक न एक दरख़्त झाँक रहा था

घरों की बालकॉनियों
और छतों पर उग आए थे दरख़्त
कुछ दरख़्त तो उल्टे ही खड़े थे
कुछ आधे दीवारों में
और आधे दीवारों के षिगाफ़ों से
बाहर निकल कर
सड़क को यूँ तक रहे थे
जैसे राहगीरों को गिन रहे हों

नज़्म 4

मैं उसे बुलाता हूँ
और वो आ जाता है
मेरी किताबों के वरक़ उलट पलट करता है
फिर वो मेरी मेज़ पर पाँव रख कर
उस की माँ ने भी उस के साथ सही सुलूक किया था
और उस की माँ के साथ
और उस की माँ ने भी
तो क्या तुम ने अपनी माँ को मुआफ़ कर दिया था ?
और क्या लौट के आने वाली माँ
पहले वाली माँ ही थी ?
मेरे सवालात पर मेरी माँ की नज़रें झुक गई थीं
हमें जन्म देने वाली माएँ
और हमारी परवरिश करने वाले बाप
एक दिन हम से झूठ बोल कर निकालते हैं
और जब वो लौट कर आते हैं
तो वो वो नहीं होते
हमारे सवालात पर
उन की निगाहें नीची होती हैं
आज मैं अपने बच्चे से झूठ बोल कर घर से निकला हूँ
और बस क्या बताऊँ
मैं अपने घर का रास्ता भूल गया हूँ

आदमी का नशा

दो शराबी दरख़्त
अपना बड़ा सर हिला हिला कर झूम रहे हैं
सूरज के जाम से
आज उन्होंने
कुछ ज़्यादा ही चढ़ा ली है
अब वो
अपनी शाख़ों में बैठे
परिंदों की चहकार से ज़्यादा
सड़क पर चलते ट्रैफिक के शोर को
इंहिमाक से सुन रहे हैं
दोनों शराब दरख़्त
जड़ों समेत
सड़क पर आ गिरे हैं
ट्रैफ़िक जाम हो जाता है
बसें, कारें
स्कूटर और साइकलें रूक जाती हैं
हॉर्न बजना शुरूअ हो जाते हैं
मगर नशे में धुत दरख़्त
जड़ों समेत
सड़क के बीचों बीच पड़े हैं
मैं ने दरख़्त से एक शाख़ तोड़ी
और सारी रात
अपने आस पास रेंगने वाली कीड़ों को
मारने में गुज़ार दी
सुब्ह दूसरे कीड़ों के साथ साथ
मुझे उस की लाश अपने पैरों के आस पास ही मिल
जिस के हुक्म पर मैं ने अपनी मश्‍कीज़े का पानी
रेत पर गिरा दिया था
और नंगे पैर उस के पीछे हो लिया था
शायद मैं ने अंधेरे में
दरख़्त की शाख़ से उसे भी कुचल दिया था
मैं ने दरख़्त को देखा
मगर वहाँ तो सिरे से कोई दरख़्त था ही नहीं
मैं ने आगे बढ़ने की ठानी
फिर मुझे अंदाज़ा हुआ
कोई मेरे साथ चल रहा है
मैं ने उस मुख़ातिब किया
और उसे मश्‍कीज़े का पानी ज़ाए करने का हुक्म दिया
और उस के आगे आगे चलने लगा

रेत पर सोया हुआ है आदमी

उस में सिरे से कोई जुम्बिश ही नहीं
मुझे हौल होत है
मैं उस के पास जाता हूँ
वहाँ रेत का एक ढेर होता है

मैं उस ढेर को हाथ से छूता हूँ
मेरे पंजे का निशान रेत पर बन जाता है
फिर ये निशान
पानी से निकली हुई मछली की तरह तड़पने लगता है
और कुछ देर बाद साकित हो जाता है
मेरे हाथ से चिपकी रेत
जब मेरे साथ साथ चलती रही है
मैं ने उसे कई बार हाथ से झाड़ना चाहा
बार बार हाथ को पानी से धोया भी
लेकिन रेत हाथ से छूटती ही नहीं
राह चलते हुए मैं अपना हाथ
जेब मैं छुपा कर चलता हूँ
लेकिन मुसाफ़ह करने के लिए तो
हाथ जेब से निकालना ही पड़ता है
मुझ से मुसाफ़ह करने के बाद
कोई आदमी पहले जैसा नहीं रहता
कुछ दूर जा कर
वो अपने हाथ से लगी रेत को
झाड़ने की कोशिश करता है
और रेत के ढेर में तब्दील हो जाता है
हर गली और मोहल्ले में
हर घर की दहलीज़ पर
आप को रेत के ये ढेर दिखाई देंगे
उन पर मेरी उँगलियों के निशान भी मिलेंगे
ख़ुद मेरी पीठ पर भी
ऐसा ही एक निशान है

एक दिन ये सारे ढेर यकजा कर दिए जाएँगे
एक बड़ा सा ढेर बना दिया जाएगा
ये सारा काम
एक शख़्स तन-ए-तन्हा करेगा
फिर वो ढेर पर बने उस निषान को
उठा कर अपनी जेब में रख लेगा

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