सज्जाद बाक़र रिज़वी की रचनाएँ

ग़ज़लें

अपने जीने को क्या पूछो सुब्ह भी गोया रात रही 

अपने जीने को क्या पूछो सुब्ह भी गोया रात रही
तुम भी रूठे जग भी रूठा ये भी वक़्त की बात रही

प्यार के खेल में दिल के मालिक हम तो सब कुछ खो बैठे
अक्सर तुम से शर्त लगी है अक्सर अपनी मात रही

लाख दिए दुनिया ने चरके लाख लगे दिल पर पहरे
हुस्न ले लाखों चालें बदलें लेकिन इश्क़ की घात रही

तुम क्या समझे तुम से छुट कर हाथ भला हम क्यूँ मलते
चश्म ओ दिल के शग़्ल को अक्सर अश्कों की बरसात रही

तुम से दो दो बात की ख़ातिर हम आगे बढ़ आए थे
पीछे पीछे साथ हमारे तल्ख़ी-ए-लम्हात रही

ठंडी ठंडी आह की ख़ुश्बू नर्म ओ गर्म अश्कों के हार
सच पूछो तो अपनी सारी ज़ीस्त की ये सौग़ात रही

कैसे सुब्ह को शाम करूँगा कैसे काटेंगे उम्र के दिन
सोच रहा हूँ अब जो यही बे-चारगी-ए-हालात रही

गलियाँ झाकीं सड़कें छानी दिल की वहशत कम न हुई

गलियाँ झाकीं सड़कें छानी दिल की वहशत कम न हुई
आँख से कितना लावा उबला तन की हिद्दत कम न हुई

ढब से प्यार किया है हम ने उस के नाम पे चुप न हुए
शहर के इज़्ज़त-दारों में कुछ अपनी इज्जत कम न हुई

मन-धन सब क़ुर्बान किया अब सर का सौदा बाक़ी है
हम तो बिके थे औने पौने प्यार की क़ीमत कम न हुई

जिन ने उजाड़ी दिल की खेती उन की ज़मीनें ख़त्म हुईं
हम तो रईस थे शहर-ए-वफ़ा के अपनी रियासत कम न हुई

अब भी इतना तर ओ ताज़ा है जैसे अव्वल दिन का हो
वाह रे अपनी काविश-ए-नाख़ून ज़ख़्म की लज़्ज़त कम न हुई

‘बाक़र’ को तुम ख़ूब समझ लो रंजिश है ये दिखावे की
यूँ तुम से बे-ज़ार फिरे हैं दिल से चाहत कम न हुई

हम राज़-ए-गिरफ़्तारी-ए-दिल जान गए हैं

हम राज़-ए-गिरफ़्तारी-ए-दिल जान गए हैं
फिर भी तेरी आँखों का कहा मान गए हैं

तू शोला-ए-जाँ निकहत-ए-ग़म सौत-ए-तलब है
हम जान-ए-तमन्ना तुझे पहचान गए हैं

क्या क्या न तेरे शौक़ में टूट हैं यहाँ कुफ्र
क्या क्या न तेरी राह में ईमान गए हैं

इस रक़्स में शोले के कोई सहर तो होगा
परवाने बड़ी आन से क़ुर्बान गए हैं

खींचे है मुझे दस्त-ए-जुनूँ दश्त-ए-तलब में
दामन जो बचाए हैं गिरेबान गए हैं

‘बाक़र’ है इसी गर्द-ए-रह-ए-दिल का परस्तार
जिस राह से कुछ साहब-ए-दीवान गए हैं

जुर्म-ए-इज़हार-ए-तमन्ना आँख के सर आ गया

जुर्म-ए-इज़हार-ए-तमन्ना आँख के सर आ गया
चोर जो दिल मे छुपा था जा बाहर आ गया

मेरे लफ़्ज़ों में हरारत मेरे लहजे में मिठास
जो कुछ इन आँखों में था मेरे लबों पर आ गया

जिन की ताबीरों में थी इक उम्र की वारफ़्तगी
फिर निगाहों में उन्हीं ख़्वाबों का मंज़र आ गया

शहर के आबाद सन्नाटों की वहशत देख कर
दिल को जाने क्या हुआ मैं शाम से घर आ गया

पहले चादर की हवस में पाँव फैलाए बहुत
अब ये दुख है पाँव क्यूँ चादर से बाहर आ गया

हम दीवानों के लिए थीं वुसअतें ही वुसअतें
ख़त्म जब सहरा हुआ आगे समंदर आ गया

तुम ने ‘बाक़र’ दिल का दरवाज़ा खुला रक्खा था क्यूँ
जिस को आना था वो आख़िर दर्द बन कर आ गया

ख़्वाहिश में सुकूँ की वही शोरिश-ए-तलबी है

ख़्वाहिश में सुकूँ की वही शोरिश-ए-तलबी है
यानी मुझे ख़ुद मेरी तलब ढूँढ रही है

दिल रखते हैं आइना-ए-दिल ढूँढ रहे हैं
ये उस की तलब है कि वही ख़ुद-तलबी है

तस्वीर में आँखें हैं कि आँखों में है तस्वीर
ओझल हो निगाहों से तो बस दिल पे बनी है

दिन भर तो फिरे शहर में हम-ख़ाक उड़ाते
अब रात हुई चाँद सितारों से ठानी है

हैं उस की तरह सर्द ये बिजली के सुतूँ भी
रौशन हैं मगर आग कहाँ दिल में लगी है

फिर ज़हन की गलियों में सदा गूँजी है कोई
फिर सोच रहे हैं कहीं आवाज़ सुनी है

फिर रूह के काग़ज़ पे खिंची है कोई तस्वीर
है वहम की ये शक्ल कहीं देखी हुई है

कतराए तो हम लाख रह-ए-वहशत-ए-दिल से
कानों में सलासिल की सदा गूँज रही है

‘बाक़र’ मुझे फ़ुर्सत नहीं शोरीदा-सरी की
काँधों पे मेरे सर है की इक दर्द-सारी है

लफ़्ज़ जब कोई हाथ आया मुआनी के लिए

लफ़्ज़ जब कोई हाथ आया मुआनी के लिए
किया मज़े हम ने ज़ुबाँ-ए-बे-ज़ुबानी के लिए

ये दोराहा है चलो तुम रंग ओ बू की ख़ोज में
हम चले सहरा-ए-दिल की बाग़बानी के लिए

ज़िंदगी अपनी थी गोया लम्हा-ए-फ़ुर्क़त का तूल
कुछ मज़े हम ने भी उम्र-ए-जावेदानी के लिए

मैं भला ठंडी हवा से क्या उलझता चुप रहा
फूल की ख़ुश्बू बहुत थी सर-गिरानी के लिए

टूट पड़ती थीं घटाएँ जिन की आँखें देख कर
वो भरी बरसात में तरसे हैं पानी के लिए

राख अरमानों की गीली लकड़ियाँ एहसास की
हम को ये सामाँ मिले शोला-बयानी के लिए

शम्मा हो फ़ानूस से बाहर तो गुल हो जाएगी
बंदिश-ए-अल्फ़ाज़ मत तोड़ो मआनी के लिए

दो किनारे हों तो सैल-ए-ज़िंदगी दरिया बने
एक हद लाज़िम है पानी की रवानी के लिए

आज क्यूँ चुप चुप हो ‘बाक़र’ तुम कभी मशहूर थे
दोस्तों यारों में अपनी ख़ुश-बयानी के लिए

मेरे सफ़र की हदें ख़त्म अब कहाँ होंगी 

मेरे सफ़र की हदें ख़त्म अब कहाँ होंगी
कि मंज़िलें भी तो आख़िर रवाँ दवाँ होंगी

ये फ़ासले जो अभी तय हुए हैं कहते हैं
ये क़ुर्बतें तेरे एहसास पर गिराँ होंगी

जो दिन को रंग लगें और शब का फूल बनें
वो सूरतें कहीं होंगी मगर कहाँ होंगी

वो हाथ रूठ गए और वो साथ छूट गए
किस ख़बर थी कि इतनी जुदाइयाँ होंगी

सुना तो था मगर इस रम्ज़ को समझते न थे
कि तेरी ख़ुशी-निगही में भी तल्ख़ियाँ होंगी

तलाश थी गोहर-ए-दर्द की न जानते थे
कि बहर-ए-दिल में वो गहराइयाँ कहाँ होंगी

वो आज अंजुमन-ए-आम बन के जागीं हैं
वो ख़ल्वतें जो कभी तेरी राज़-दाँ होंगी

हमारे दम से है रौशन दयार-ए-फ़िक्र-ओ-सुख़न
हमारे बाद ये गलियाँ धुआँ धुआँ होंगी

ये अहद वो है की मेरी वफ़ा के क़िस्सों में
तेरी जफ़ा की हिकायत भी बयान होंगी

चले चलो की दयार-ए-ख़िरद कि उस जानिब
सुकूँ की छाँव में ख़्वाबों की बस्तियाँ होगी

तू राह-ए-शौक़ में तन्हा नहीं ठहर ‘बाक़र’
कि तेरे साथ अभी जग-हँसाइयाँ होंगी

राहों के ऊँच-नीच ज़रा देख-भाल के

इधर न आओ
कि ये महल अब शिकस्त-ए-शौकत की दास्ताँ है
कि ये महल अब शिकस्त-ए-अक़्दार का निशाँ है
कि ये महल अब शिकस्त-ए-अफ़्कार की फ़ुग़ाँ है

इधर न देखो
कि ये खंडर है जुनूँ का भूतों का आस्ताँ है
कि ये उमंगों की बे-बसी कि बड़ी तवील एक दास्ताँ है
कि ये है मसकन सियाह रातों का हर तरफ़ बस धुआँ धुआँ है

इधर न झाँको
कि ये खंडर है जुनूँ का भूतों का आस्ताँ है
कि ये उमंगों की बे-बसी कि बड़ी तवील एक दास्ताँ है
कि ये है मसकन सियाह रातों का हर तरफ़ बस धुआँ धुआँ है

उधर झाँको
शिकस्ता ईंटों की इन दराज़ों में चाँदनी भी सिसक रही है
अँधेरी रातों की काली नागिन सियाहियों में चमक रही है
किरन किरन का लहू पिए है तो मस्त है और बहकर रही है

जो पहले तुम उस महल में आते
तो रंग ओ नग़मा के सैल पुर नूर से गुज़रते
तो आरज़ू की शराब में डूबते उभरते
रसीली बाँहों में मीठे सपनों की डूब कर किस सुकूँ से मरते

जो पहले उस सम्त से गुज़रते
तो आरज़ुओं के नग़मा-ए-दिल नशीं को सुनते
बहुत ही रोते और आँसुओं से कई नए ख़्वाब अपने बुनते
और एक बे-नाम कैफ़-ए-मस्ती में डूब कर अपने सर को धुनते

जो पहले उस दर्द को खटकाते
हसीं उम्मीदों के पासबाँ तुम को रंग ओ बू का पयाम देते
हरे भरे सर्व ओ तुम को परियों के शहज़ादे का नाम देते

और अब जो आए हो क्या मिलेगा
निगार ख़ाना उजड़ चुका है वो सारी महफ़िल उखड़ गई है
वो निकहत-ए-आरज़ू भी दीवाना वार हर-सू भटक रही है
अमीं थी जो दर्द-ए-बेकराँ कि वो आह घुट घुट के मर चुकी है
और अब यहाँ किस को ढूँढते हो
यहाँ पे तुम चीख़ते रहोगे जवाब कोई नहीं मिलेगा
यहाँ पे तुम चीख़ते रहोगे जवाब कोई नहीं मिलेगा
यहाँ पे शेर ओ शराब ओ चंग ओ रूबाब कोई नहीं मिलेगा

यहाँ पे किस को बुला रहे हो
यहाँ तुम्हारी सदाओ के ख़ोल गूँज बन कर उड़ा करेंगे
वो खोखली गूँज तुम से पूछेगी आप याँ आ के क्या करेंगे
डरोगे ख़ुद अपने साए से तुम तो भूत तुम पर हँसा करेंगे

उधर न आओ
उधर न आओ यहाँ पे तुम आ के क्या करोगे
यहाँ पे भूतों का रक़्स देखोगे और फिर आप ही डरोगे
डरोगे आ काले का काले सायों का रक़्स
दीवार की दराज़ों से देख कर तुम बहुत हँसोगे
बहुत हँसोगे
ये एक दीवार-ए-क़हक़हा

फेरी वाला

प्रीत नगर से फेरी वाला मेरी गली में आया
चूड़ी लूँगा अँगूठी छल्ले रंग बिरंगे लाया
मैंने पूछा और भी कुछ है बोला मीठा सपना
जिस को ले कर जीवन भर इक नाम की माला जपना

मैं ने कहा क्या मोल है इस का बोला इक मुस्कान
तन में आग लगाओ इस से रक्खो मन की आन
सस्ता सौदा देख के आख़िर में पगली मुस्काई
जीवन भर का रोग समेट के मैं कैसी इठलाई

रहेगा लाल गुलाब सा सपना कब तक मेरे संग
कब तक इस में बास रहेगी कब तक उस में रंग
इस के तार बिखर जाएँगे कब मेरा दिल माने
दिल पे रहेगा कब तक जादू फेरी वाला जाने

रात

आँधियाँ आसमानों का नौहा ज़मीन को सुनाती हैं
अपनी गुलोगीर आवाज़ में कह रही हैं
दरख़्तों को चिंघाड़
नीची छतों पर ये रक़्स आसमानी बगूलों का
ऊँची छतों के तले खेले जाते ड्रामा का मंज़र है
ये उस ज़ुल्म का इस्तिआरा है
जो शह-ए-रग से हाबील कि गर्म ओ ताज़ा लहू बन के उबला है
आँधियों में था इक शोर-ए-कर्ब ओ बला
और मैंने सुना कर्बला कर्बला
रात के सहम से अन कहे वहम से
बंद आँखों में वहशत ज़दा ख़्वाब उतरा
सुब्ह अख़बार की सुर्ख़ियाँ बन गया

शाम

दिन को उस का लहू था अर्ज़ां
फिर ये आई ये शाम-ए-ग़रीबाँ
तौक़ गले में पाँव ब-जूलाँ
सब्र है गिर्यां ज़ुल्म है ख़ंदाँ
शाम हुई
कर्ब ओ बला सन्नाटा हर-सू
हर-सू उस के लहू की ख़ुश्बू
मेरे लफ़्ज और उस के जादू
शाम हुई

सुब्ह

आख़िर-ए-शब थी
वो सेहन-ए-मस्जिद में बे-सुद पड़ा
मैं ने उस को जगाया

उठ
ये शहादत का तकबीर का वक़्त है
दुआओं की तस्ख़ीर का वक्त है
वो उठा मेरा क़ातिल जिस मैं ने ख़ुद ही उठाया
उठा
और मेहराब-ए-मस्जिद में मेरे लहू से चराग़ाँ हुआ

ज़हर का सफ़र

मैं इंसान हूँ
मैं ने इक नागिन को डसा
उस को अपना ज़हर दिया
ऐसा ज़हर की जिस का मंत्र कोई नहीं
उस की रग रग में चिंगारी
उस के लहू में आग

मेरे ज़हर में नशा भी है
ऐसा नशा जिस का कोई ख़ुमार नहीं
वो नागिन अब मस्त नशे में झूमेगी
बहक बहक कर हर सू मुझ को ढूँडेगी
उस की ज़ुबान बाहर को निकली
उस के मुँह में झाग
आज है लोगो पूरन-माशी
ज़ख़्मी नागिन ज़हर उगलती
इंसानों को डस के उन के ख़ून में अपना ज़हर भरेगी
मेरी रग रग में चिंगारी
मेरे लहू में आग

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