सत्य मोहन वर्मा की रचनाएँ

दधीचि पिता

जब तक तुम्हारी ममतामयी काया थी
मेरे सर पर वट – वृक्ष की छाया थी
जिसके तले मैंने
अपनापन, अवज्ञा और आक्रोश
अत्यंत सहजता से जिए

आज अपने अभिशप्त जन्मदिन पर
तुम्हारी अस्थियां संचित करते हुए
मन करता है
इनसे वज्र बना लूँ
सांसारिक भयावहता से लड़ने के लिए

किन्तु दधीचि- पिता
अस्थियां ही क्यों
स्मृतियाँ भी तो वज्र बन सकती हैं
और निबिड़ अँधेरे में
दामिनी सी चमक सकती हैं ..

बेबसी के तंग घेरे की तर

बेबसी के तंग घेरे की तरह
घुट रहा है दम अँधेरे की तरह.

खो गया रब मज़हबों की भीड़ में
सोन चिड़िया के बसेरे की तरह.

वायदों की करिश्माई बीन पर
वो नाचता है सपेरे की तरह.

ज़िन्दगी के रास्तों पर ताक में
वक़्त बैठा है लुटेरे की तरह.

धुप से रोशन इरादों के लिए
फुट कर देखो सवेरे की तरह।

ओम कर दी ज़िन्दगी 

कौन सी अवमानना थी,
होम कर दी ज़िन्दगी ।
गंध सा उड़ कर बिखरना था मुझे
स्वर्ण सा गल कर निखारना था मुझे
कौन सी हठ साधना थी
मोम कर दी ज़िन्दगी ।
किस दिशा से कौन सी आवाज़ थी
जिस वजह से बेझिझक परवाज़ थी
कौन सी सम्भावना थी
व्योम कर दी ज़िन्दगी ।
अर्चना तट आज तक छूटा नहीं
आज तक वह ध्यान फिर टूटा नहीं
कौन सी आराधना थी
ओम कर दी ज़िन्दगी ।

यार कमाल हुए, गाल गुलाल हुए 

यार कमाल हुए, गाल गुलाल हुए,
दहके टेसू वन, आँगन लाल हुए,
बिखरे कुंतल मेघ, जी के काल हुए,
फागुन लूट गया, हम कंगाल हुए,
नखत देह दमके, नैन निहाल हुए,
परिचय मौन रहे, व्यर्थ सवाल हुए,
रस की स्पर्धा में मौर रसाल हुए..

भोग कर अवमाननाओं की जलन

भोग कर अवमाननाओं की जलन
पड़ गए धुंधले सभी जीवन रतन

हैं बहुत आतुर यहाँ सिंगार को
हर डगर महके अभावों के सुमन

संत की सौगंध से रहना परे
टाक में हैं तक्षकों के नागफन

रौशनी भरपूर दे कर जायेंगे
छा रहे जो वायदों के स्याह घन

स्वर्ग में निश्चित तुम्हें ले जायेंगे
सर झुका के सुनते रहो इनके वचन

हर इबारत इस तरह बिगड़ी हुई
जिस तरह जम्हूरियत के आचरण.

मन मार कर भी दीप लौ जलती रही

मन मार कर भी दीप लौ जलती रही
खामोश थी पर बात कुछ चलती रही
मैं नहीं रोई, नहीं रोई कहा नादान ने
इस तरह एक पीड़ा प्राण में पलती रही.
लाख वह परदे गिराए सत्य पर
स्वर सत्य का कोमल गवाही दे रहा
की दीप लौ रो रो जली है रात भर
भीत का काजल गवाही दे रहा …

तुमने जो दिए थे गुलाब के फूल

तुमने जो दिए थे गुलाब के फूल,
आज भी रक्खे हैं मेरी किताबों में,
गंध-हीन .

तुमने जो भेजे थे कवितानुमा संकेत,
आज भी रक्खे हैं मेरी अलमारी में,
अर्थ-हीन .

तुमने जो बोले थे अनजाने नेह-बोल,
आज भी रक्खे हैं मन के तहखानों में,
शब्द-हीन .

और अब ये मुझसे गंध, अर्थ और शब्द मांगते हैं …

दरवाज़े खड़े हुए लोग

दरवाज़े खड़े हुए लोग,
चौखट में जड़े हुए लोग

सुर्यगीत लिखने का मन,
कालिख में मढ़े हुए लोग

सोने के पिंजरे की धुन,
तोतों से पढ़े हुए लोग

बंजारे सपनों का पंथ,
खूँटी से गड़े हुए लोग

सिरहाने क्रांति का कफ़न,
मुर्दों से पड़े हुए लोग

रेत में छिपा कर के सिर,
आंधी से लड़े हुए लोग ।।

राग ज्यों होता तिरोहित मींड़ में

राग ज्यों होता तिरोहित मींड़ में
रह गयी हैं सिसकियाँ उत्पीड़ में .

आँधियाँ हैरान इतना कर गयीं
कैंचियाँ उगने लगी हैं चीड़ में .

ज़िन्दगी का एक अनुभव ये भी है
चीटियाँ सी रेंगती हैं रीड़ में .

चोंच भर पानी परिंदे क्या करें
आग लगती जा रही है नीड़ में .

कुल मिलकर बस यही हासिल रहा
कोई भी सुनता नहीं है इस भीड़ में .

कश्तियों वाला सफर था और हम थे

कश्तियों वाला सफर था और हम थे
नाख़ुदाओं का भी दर था और हम थे

बारिशों का, बादलों का और बिजली का
बादबानों पर कहर था और हम थे

सोच में डूबे हुए रहते थे क्या करते
धड़ के ऊपर एक सर था और हम थे

शाम से तन्हाईयाँ आकर जकड़ती थीं
मुब्तला यादों से घर था और हम थे

घूमती थी ज़िन्दगी कश्कोल लेकर के
आब ओ दाना मुन्तज़र था और हम थे

थी बहुत दिल में उडानों की हवस
हाथ में तितली का पर था और हम थे.

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