सफ़ी लखनवी की रचनाएँ

तालिबे-दीद पर आँच आये यह मंज़ूर नहीं 

तालिबे-दीद पर आँच आए यह मंज़ूर नहीं।
दिल में है वरना वो बिजली जो सरे-तूर नहीं॥

दिल से नज़दीक है, आँखों से भी कुछ दूर नहीं।
मगर इस पर भी मुलाक़ात उन्हें मंज़ूर नहीं॥

छेड़ दे साज़े-अनलहक़ जो दुबारा सरे-दार।
बज़्मे-रिन्दाँ में अब ऐसा कोई मन्सूर नहीं॥

हमको परवाना-ओ-बुलबुल की रक़ाबत से ग़रज़?
गुल में वह रंग नहीं, शमअ़ में वो नूर नहीं॥

कभी ‘कैसे हो सफ़ी?’ पूछ तो लेता कोई।
दिल-दही का मगर इस शहर में दस्तूर नहीं॥

वो खुद सरसे क़दम तक डूबे जाते हैं पसीने में

वो खुद सर से क़दम तक डूब जाते हैं पसीने में।
मेरी महफ़िल में जो उनको, पशेमां देख लेते हैं॥

‘सफ़ी’ रहते हैं जानो-दिल फ़िदा करने पै आमादा।
मगर उस वक्त जब इन्साँ को इन्साँ देख लेते हैं॥

न ख़ामोश रहना मेरे हम-सफ़ीरो

न ख़ामोश रहना मेरे हम-सफ़ीरो!
जब आवाज़ दूँ तुम भी आवाज़ देना॥

ग़ज़ल उसने छेडी़ मुझे साज़ देना।
ज़रा उम्रे-रफ़्ता की आवाज़ देना॥

इन्सान को उसने ख़ाक से पाक किया 

इन्सान को उसने ख़ाक से पाक क्या।
जी-हौसलये-ओ-साहबे-इदरीक[1] किया॥

पहले तो बनाया उसे गंजीनये-इल्म[2]
फिर गंज को पोशीदा-तहे-ख़ाक[3] किया॥

क्योंकर यहाँ तुम्हारी तबीयत बहल गई

क्योंकर यहाँ तुम्हारी तबीयत बहल गई।
इतनी ही ज़िंदगी हमें ऐ खिज़्र! खल गई॥

जब एक रोज़ जान का जाना ज़रूर है।
फिर फ़र्क क्या वह आज गई, ख्वाह कल गई॥

जब दम निकल गया ख़लिशे-ग़म भी मिट गई।
दिल में चुभी थी फाँस जो दिल से निकल गई॥

कुछ भी न हैफ़ कर सके हस्तीए-मुस्तआ़र में

कुछ भी न हैफ़ कर सके हस्ती-ए-मुस्तआ़र में।
हो गई खत्म ज़िन्दगी मौत के इन्तज़ार में॥

खुलते ही आँख इश्क़ ने हुस्ने-अदा पै जान दी।
आई क़ज़ा शबाब में, देखी खिज़ाँ बहार में॥

भूले हुए ज़हेनसीब अब भी जो याद आ गए।
फ़ातिहा को आये कब जब ख़ाक नहीं मज़ार में॥

ख़ामोश रहने दो ग़मज़दों को, कुरेद कर हाले-दिल न पूछो

ख़ामोश रहने दो ग़मज़दों को, कुरेद कर हाले-दिल न पूछो।
तुम्हारी ही सब इनायतें हैं, मगर तुम्हें कुछ खबर नहीं है।

उन्हीं की चौखट सही, यह माना, रवा नहीं बेबुलाए जाना।
फ़क़ीर उज़लतगुज़ीं[1] ‘सफ़ी’ है, गदाये-दरवाज़ागर[2] नहीं है॥

बेक़रारी दिले-बीमार की अल्ला-अल्ला

बेक़रारी दिले-बीमार की अल्ला-अल्ला।
फ़र्शेगुल पर भी न आना था, न आराम आया॥

जौरे-दरबाँ की तो कुछ भी न हुई तहक़ीक़ात।
मेरे ही सर मेरी फ़रियाद का इलज़ाम आया॥

नज़र हुस्न-आश्ना ठहरी वो खिलवत हो कि जलवत हो

नज़र हुस्न-आश्ना ठहरी वो ख़िलवत हो कि जलवत हो।
जब आँखें बन्द कीं तसवीरे-जानाँ देख लेते हैं।

वो खुद सर से क़दम तक डूब जाते हैं पसीने में।
मेरी महफ़िल में जो उनको, पशेमां देख लेते हैं।

‘सफ़ी’ रहते हैं जानो-दिल फ़िदा करने पै आमादा।
मगर उस वक़्त जब इन्साँ को इन्साँ को देख लेते हैं।

क़त’आत

कैसी-कैसी सूरतें ख़्वाबे-परीशाँ हो गईं?
सामने आँखों के आईं और पिन्हाँ हो गईं॥

ज़ोर ही क्या था जफ़ाये-बाग़बां देखा किये।
आशियां उजडा़ किया, हम नातवां देखा किये॥

तू भी मायूसे-तमन्ना मेरे अन्दाज़ में है।
जब तो यह दर्द पपीहे तेरी आवाज़ में है॥

हमारी आँख से जब देखिये आँसू निकलते हैं।
जबीं की हर शिकन से दर्द के अहलू निकलते हैं॥

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