सरफ़राज़ ज़ाहिद की रचनाएँ

ऐसी वैसी पे क़नाअत नहीं कर सकते हम 

ऐसी वैसी पे क़नाअत नहीं कर सकते हम
दान ये फ़क्ऱ की दौलत नहीं कर सकते हम

इक अदावत से फ़राग़त नहीं मिलती वर्ना
कौन कहता है मोहब्बत नहीं कर सकते हम

किसी ताबीर की सूरत में निकल आते हैं
अपने ख़्वाबों में सुकूनत नहीं कर सकते हम

इस्तिआरों के तकल्लुफ़ में पड़े हैं जब से
अपने होने की वज़ाहत नहीं कर सकते हम

शाख़ से तोड़ लिया करते हैं आगे बढ़ कर
जिन की ख़ुश-बू पे क़नाअत नहीं कर सकते हम

बे-ख़बर यूँ हर इक बात ख़बर लगती है
बा-ख़बर ऐसे कि हैरत नहीं कर सकते हम

नज़र की धूप में आने से पहले

 नज़र की धूप में आने से पहले

गुलाबी था वो सँवलाने से पहले

सुना है कोई दीवाना यहाँ पर
रहा करता था वीराने से पहले

खिला करते थे ख़्वाबों में किसी के
तिरे तकिए पे मुरझाने से पहले

मोहब्बत आम सा इक वाक़िआ था
हमारे साथ पेश आने से पहले

नज़र आते थे हम इक दूसरे को
ज़माने को नज़र आने से पहले

तअज्जुब है कि इस धरती पे कुछ लोग
जिया करते थे मर जाने से पहले

रहा करता था अपने ज़ोम में वो
हमारे ध्यान में आने से पहले

मुज़य्यन थी किसी के ख़ाल-ओ-ख़द से
हमारी शाम पैमाने से पहले

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