सरमद सहबाई की रचनाएँ

कौन है किस ने पुकारा है सदा कैसे हुई

कौन है किस ने पुकारा है सदा कैसे हुई
ये किरन तारीकी-ए-शब से रिहा कैसे हुई

एक इक पल में उतर कर सोचता रहता हूँ मैं
नूर किस का है मिरे ख़ूँ में ज़िया कैसे हुई

ख़्वाहिशें आएँ कहाँ से क्यूँ उछलता है लहू
रूत हरी क्यूँकर हुई पागल हवा कैसे हुई

उस के जाने का यक़ीं तो है मगर उलझन में हूँ
फूल के हाथों से ये ख़ुश-बू जुदा कैसे हुई

वो मचा है ग़ुल कि बरहम हो गई हैं सूरतें
कौन किस किस ये ये पूछेगा ख़ता कैसे हुई

जिस्म ओ जाँ का फ़ासला है हासिल-ए-गर्द-ए-सफ़र
जुस्तुजू-ए-ज़िंदगी तेरा पता कैसे हुई

हँस दिया था सुन के वो ‘सरमद’ बस इतना याद है
बात उस के सामने लेकिन अदा कैसे हुई

मरने का पता दे मिरे जीने का पता दे

मरने का पता दे मिरे जीने का पता दे
ऐ बे-ख़बरी कुछ मिरे होने का पता दे

इक दूसरे की आहटों पे चलते हैं सब लोग
है कोई यहाँ जो मुझे रस्ते का पता दे

खुद आप से बिछड़ा हूँ मैं इस अंधरे सफ़र में
ऐ तीरगी-ए-शब मिरे साए का पता दे

इस आस पे हर आईने को जोड़ रहा हूँ
शायद कोई रेज़ा मिरे चेहरे का पता दे

गुज़री है मिरी उम्र के सराबों के सफ़र में
ऐ रेग-ए-रवाँ अब किसी चश्मे का पता दे

हर पल किसी आहट पे मिरे कान लगे हैं
जैसे अभी कोई तिरे आने का पता दे

बिखरा हुआ हूँ सदियों की बे-अंत तहों में
मुझ को कोई खोए हुए लम्हे का पता दे

दहलीज़ दिलासा है न दीवार अमाँ है
ऐ दर-बदरी मेरे ठिकाने का पता दे

हूँ क़ैद हिसार-ए-रग-ए-गिर्दाब में ‘सरमद’
कोई नहीं जो मुझ को किनारे का पता दे

रौशनी रंगों में सिमटा हुआ धोका ही न हो

रौशनी रंगों में सिमटा हुआ धोका ही न हो
मैं जिसे जिस्म समझता हूँ वो साया ही न हो

आईना टूट गया चुनता हूँ रेज़ा रेज़ा
इसी आईने में मेरा कहीं चेहरा ही न हो

मैं तो दीवार के इस पार रवाँ हूँ कब से
कोई दीवार के उस पार भी चलता ही न हो

वो जो सुनता है मिरी बात बड़े ग़ौर के साथ
बाद जाने के मिरे मुझ पे वो हँसता ही न हो

जागती आँखों में क्यूँ फैलता जाता है ख़ला
खा गई है जिसे दूरी तिरा रस्ता ही न हो

मोड़ हर राह पे पाँव से लिपट जाते हैं
वो मुझे छोड़ के चल दे कहीं ऐसी ही न हो

उस के मिलने पे भी महसूस हुआ है ‘सरमद’
उस ने देखा ही न हो मैंने बुलाया ही न हो

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