सरवत ज़ोहरा की रचनाएँ

बे-तहाशा उसे सोचा जाए

बे-तहाशा उसे सोचा जाए
ज़ख़्म को और कुरेदा जाए

जाने वाले को चले जाना है
फिर भी रस्मन ही पुकारा जाए

हम ने माना कि कभी पी ही नहीं
फिर भी ख़्वाहिश कि सँभाला जाए

आज तन्हा नहीं जागा जाता
रात को साथ जगाया जाए

हर्फ़ लिखना ही नहीं काफ़ी है
आओ अब हर्फ़ मिटाया जाए

हज़ार टूटे हुए ज़ावियों में बैठी हूँ

हज़ार टूटे हुए ज़ावियों में बैठी हूँ
ख़याल ओ ख़्वाब की परछाइयों में बैठी हूँ

तुम्हारी आस की चादर से मुँह छुपाए हुए
पुकारती हुई रूसवाईयों में बैठी हूँ

हर एक सम्त सदाएँ हैं चुप चटख़ने की
ख़ला में चीख़ती तन्हाइयों में बैठी हूँ

निगाह ओ दिल में उगी धूप को बुझाती हुई
तुम्हारे हिज्र की रानाइयों में बैठी हूँ

जुनून-ए-वस्ल तमाशे दिखा गया इतने
मैं आप अपने तमाशाइयों में बैठी हूँ

जब आह भी चूप हो तो ये सहराई करे क्या

जब आह भी चूप हो तो ये सहराई करे क्या
सर फोड़े न ख़ुद से तो ये तन्हाई करे क्या

गुज़री जो इधर से तो घुटन से ये मरेगी
हब्स-ए-दिल-ए-वहशी में ये पुरवाई करे क्या

कहती है जो कहने दो ये दुनिया मुझे क्या है
ज़िंदानी-ए-अहसास में रूसवाई करे क्या

हर हुस्न ओ अदा धँस गए आईने के अंदर
जब राख हों आँखें तो ये ज़ेबाई करे क्या

वो ज़ख्म कि हर लम्स नया ज़ख्म लगे है
बीमारी-ए-इदराक मसीहाई करे क्या

पल भर को ये सौदा-ए-जुनूँ कम नहीं होता
शहरों के तकल्लुफ़ में ये सौदाई करे क्या

ख़ाली ख़ाली रस्तों पे बे-कराँ उदासी है 

ख़ाली ख़ाली रस्तों पे बे-कराँ उदासी है
जिस्म के तमाशे में रूह प्यासी प्यासी है

ख़्वाब और तमन्ना का क्या हिसाब रखना है
ख़्वाहिशें हैं सदियों की उम्र तो ज़रा सी है

राह ओ रस्म रखने के बाद हम ने जाना है
वो जो आश्‍नाई थी वो तो ना-शनासी है

हम किसी नए दिन का इंतिज़ार करते हैं
दिन पुराने सूरज का शाम बासी बासी है

देख कर तुम्हें कोई किस तरह सँभल पाए
सब हवास जागे हैं ऐसी बद-हवासी है

ज़ख्म के छुपाने को हम लिबास लाए थे
शहर भर का कहना है ये तो खूं-लिबासी है

सवाब की दुआओं ने गुनाह कर दिया मुझे 

सवाब की दुआओं ने गुनाह कर दिया मुझे
बड़ी अदा से वक़्त ने तबाह कर दिया मुझे

मुनाफ़िकत के शहर में सज़ाएँ हर्फ़ को मिलीं
क़लम की रौशनाई ने सियाह कर दिया मुझे

मिरे लिए हर इक नज़र मलामातों में ढल गई
न कुछ किया तो हैरत-ए-निगाह कर दिया मुझे

ख़ुशी जो ग़म से मिल गई तो फूल आग हो गए
जुनून-ए-बंदगी ने ख़ुद-निगाह कर दिया मुझे

तमाम अक्स तोड़ के मिरा सवाल बाँट के
इक आईने के षहर की सिपाह कर दिया मुझे

बड़ा करम हुजूर का सुना गया न हाल भी
समाअतों में दफ़्न एक आह कर दिया मुझे

तुम्हारी मुंतज़िर यूँ तो हज़ारों घर बनाती हूँ

तुम्हारी मुंतज़िर यूँ तो हज़ारों घर बनाती हूँ
वो रस्ता बनते जाते हैं कुछ इतने दर बनाती हूँ

जो सारा दिन मिरे ख़्वाबों को रेज़ा रेज़ा करते हैं
मैं उन लम्हों को सी कर रात का बिस्तर बनाती हूँ

हमारे दौर में रक़्क़ासा के पाँव नहीं होते
अधूर जिस्म लिखती हूँ ख़मीदा सर बनाती हूँ

समंदर और साहिल प्यास की ज़िंदा अलामत हैं
उन्हें मैं तिश्‍नगी की हद को भी छू कर बनाती हूँ

मैं जज़्बों से तख़य्युल को निराली वुसअतें दे कर
कभी धरती बिछाती हूँ कभी अंबर बनाती हूँ

मिरे जज़्बों को ये लफ़्जों की बंदिश मार देती है
किसी से क्या कहूँ क्या ज़ात के अंदर बनाती हूँ

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