सरोज सिंह की रचनाएँ

गृहस्थी की काँवर

परिणय मंडप में धरे गए दो कलशों में
बराबर, भरे गए मधुर संबंधों के सभी तत्व
प्रेम, मैत्री, स्नेह और विश्वास
और इससे तैयार हुआ, गृहस्थी का काँवर

यात्रारंभ में जब कंधे की बारी आई
तुम्हारे अहम् ने
उसे अपने कंधे पर रखना स्वीकारा
मैं पथगामिनी, तुम्हारी सहचर
साथ चलना बदा था
सभी ऋतुओं अवरोधों को पार करते
शिवालय तक !!
प्रारंभ, सूर्योदय की स्निग्ध लालिमा लिए
थकन से दूर, वानस्पतिक सम्पदा से पूर्ण
उत्सव से भरा अरण्य था !

चलते समय…
आगे के घट का छलकना तुम्हे दिखता था
तुम संभल जाते
पीछे का घट, जो मेरा था
जाने कितनी बार छलका
किन्तु, वह अदीख था तुम्हारे लिए
जितना छलकती
तापस भूमि पर पड़ते ही, वाषिप्त हो जाती
और मेघ बन तुम्हारे शुष्क अधरों पर बरस जाती
और नेत्र कोरों के जल के आशय से
उस घट को पुनह भर देती
कारण, काँवरमें

दोनों घटों में संतुलन आवश्यक था !
वर्षा ऋतू में जल से भरे मार्ग में
जाने कितनी बार पाँव फिसला तुम्हारा
हर बार काँवरके साथ साथ
तुम्हे संभालते हुए मैं स्वयं आहत हो जाती !
शीत ऋतू में, तुम्हारे ठिठुरते देह पर
अग्रहायणी की प्रातः धूप सी
तुम्हारे देह पर पसर जाती !
तुम्हारे नंगे पाँव आहत न हों इसलिए
कंटीले मार्ग पर
पतझड़ की मरमरी पत्तियों सी मार्ग पर बिछ जाती !
किन्तु इन सब से अनभिग्य
तुम यदा कदा विस्मृत भी हो जाते हो कि
साथ तुम्हारे मैं भी हूँ…!
जीवन के इस पड़ाव पर
तुम्हारे मुख पर सूर्यास्त सा मलिन भाव
नहीं देखा जाता,
यह काँवरतुम्हे बोझ न प्रतीत हो
अतः कुछ देर को, यह मुझे दे सकते हो
किन्तु ओह्ह !! तुम्हारा अहम् !!

प्रिय, देखो शिवालय की घंटियाँ
सुनाई दे रही हैं !
तुमने अबतक…
अपने पुरुषत्व को मेरे स्त्रीत्व से मिलाया है,
क्या ही अच्छा हो कि…
तुम अपने भीतर के छिपे स्त्रीत्व को
मेरे भीतर के छिपे पुरुषत्व से मिला दो
क्योंकि, शिवालय में बैठे उस अर्धनारीश्वर को
यह जलाभिषेक तभी पूर्ण एवं सफल होगा!!

तुम तो आकाश हो 

नेह के नीले एकांत में
क्षितिज की सुनहरी पगडंडी पर
चलते हुए…
तुम्हारे होने या ना होने को
सूर्यास्त से सूर्योदय के बीच
कभी विभक्त नहीं कर पायी मैं!

जाने कब से
धरती पर चलती आ रही मैं
इस ज्ञान से परे, कि
तुम अपनी छ्त्रछाया में
संरक्षित करते आये हो मुझे!

अपनी थाली में परोसते रहे
मन भर अपनापन
ना होते हुए भी तुम्हारे होने का
आभास होता रहा मुझे!

ऋतुएँ संबंधों पर भी
अपना असर दिखाती है शायद
चटकती बिजली ने
तुम्हारे सिवन को उधेड़ते हुए
जो दरार डाली है
तुम्हारी श्वेत दृष्टि अब श्यामल हो उठी है!

या तुम बहुत पास हो
या कि बहुत दूर
पर वहां नहीं हो जहाँ मैं हूँ
संबंधों पर ठण्ड की आमद से
सूरज भी अधिक देर तक नहीं टिकता!

ऐसे अँधेरे से घबराकर मैं
स्मृतियों की राख में दबी
चिंगारियों को उँगलियों से
अलग कर रही हूँ
किन्तु उससे रौशनी नहीं होती
बल्कि उंगलियाँ जलतीं है!

तुम्हे दस्तक देना चाहती हूँ
पर तुम तो आकाश हो ना
कोई पट-द्वार नहीं तुम्हारा
बोलो…तो कहाँ दस्तक दूँ?
जो तुम सुन पाओ!

दिवस के अवसान में 

दिवस के अवसान में
घिरती घटायें घन सी
छेड़ती है तार तन की
विरह का कोई गीत गाऊँ
साँझ का दीया जलाऊँ
बुझे मन के दलान में

काल के मध्याह्न में
तृष्णायें हर क्षण सताती
कामनाएं कुनमुनाती
बांचता है ज्ञान अपना
योग का मन-मनीषी
मोह के उद्यान में

ह्रदय के सिवान में
प्रेम का जो धान रोपा
नेह के न बरसे बादल
नियति ने परोसे हलाहल
भाग्य बैरी सोया रहा
दुर्भाग्य के मचान में

निराशा के मसान में…
चिंता चिताओं सी जल रही
जिजीविषा हाथ मल रही
अँधियारा जो छंटता नहीं
मैं बांट जोहूँ सूर्य का
आशा के नव-विहान में!

विरसे में निकलेगा प्रेम 

अजनबी ज़ुबानो में खुदे
सिक्के और मोहरें
आहन, मिटटी के बर्तन टूटे-फूटे
देवी-देवताओं की खंडित प्रतिमाएं
मिटटी में पोशीदा ज़ेवर
कुंद हथियार
पक्के स्नानागार
क्या बस यही विरसा है हमारा?
सोचती हूँ
जाने से पहले
मिटटी में गाड़ जाऊँ.
सहेजा…संजोया
“प्रेम “

प्रतिध्वनित स्वर

प्रतीक्षा की शिला पर
खड़ी हो
बारम्बार
पुकारती रही तुम्हे
वेदना की घाटियों से
विरह स्वर का लौटना
नियति है किन्तु,
तुम, उन स्वरों को
शब्दों में पिरो कर
काव्य से…
महाकाव्य रचते रहे
मैं मूक होती गयी
और तुम्हारी कवितायें वाचाल
मैं अब भी अबोध सी
खड़ी हूँ उसी शिला पर
कि कभी तो
प्रतिध्वनित स्वर
मेरे मौन को
मुखरित करने
पुन: आवेंगे!

इक ख्वाब संजोया है मैंने 

इक ख्वाब संजोया है मैंने, कभी वक़्त मिले तो सुन लेना
सच्चा है या झूठा है, तुम खुद ही इसे गुन लेना…!
इक ख्वाब संजोया है मैंने…

चिड़ियों से पूछा है मैंने, कुछ ठौर ठिकाना तिनकों का
कुछ तिनके मैं चुन लाऊँगी, उन तिनकों को तुम बुन देना
इक ख्वाब संजोया है मैंने…

होगी विश्वास की इक खिड़की, तकरार की मीठी सी झिड़की
किवाड़ प्रेम की मैं लगवा दूंगी, निवाड़ नेह की तुम बुन लेना
इक ख्वाब संजोया है मैंने…

घर में उजियारा करने को, मैं सूरज की रेज़े ले आउंगी
चंदा की चिरौरी करके तुम उजास चांदनी की चुन लेना
इक ख्वाब संजोया है मैंने…

घर को और सजाने को, अरमानो के झालर लटकाऊंगी
आँगन का अंधियारा मिटाने को, तुम बन से जुगनू चुन लेना
इक ख्वाब संजोया है मैंने…

अधकच्चे रिश्ते पकाने को मैं घर में चुल्हा जोडूंगी
उसमे अगियारा करने को तुम अना का इंधन चुन लेना
इक ख्वाब संजोया है मैंने…

हालात से मिले दो सिक्कों से दो ही रुत मुझे मोल मिले
इक पतझड़ वो मैं रख लूंगी, दूजा बसंत वो तुम चुन लेना
इक ख्वाब संजोया है मैंने…

ज़ारबंद 

थाने में…
बेंच के कोने पर
ज़ख्म से बेज़ार
गठरी बनी घायल लड़की
सिकुड़ी, सहमी सिसकती है
घूरती नज़रें उसके ज़ख्मों को
और भी गहरा कर देती हैं
उसकी माँ बौख़लाई सी
उनके, कब, कहाँ, कितने, कैसे
जैसे सवालों का
जवाब देती हुई, दर्ज़ करा देती है
उन दरिंदों के ख़िलाफ़
ऍफ़ आई आर !

अस्पताल के…
जनाना जनरल वार्ड में
मुश्किल से बेड मयस्सर हुआ है
वार्ड बॉय, नर्स और मरीज़ों में
फुसफुसाहट जारी है
एक के बाद एक डाक्टर
जिस्म के ज़ख्मों का
अपने-अपने तरीके
से जांच करता हैं
मन का जख्म
जो बेहद गहरा है
वो किसी को नहीं दिखता
और इस तरह
तैयार हो जाती है
बलात्कार की
मेडिकल रिपोर्ट!

अदालत में…
अभियोगी वकील बे-मुरउव्वत हो
उससे सवाल पर सवाल दागता है
कब, कहाँ, कितने, कैसे
वो घबराहट और शर्म से
बेज़ुबान हो जाती है
जवाब आंसुओं में मिलता है
उसका वकील
उसके आँसू पोंछते हुए कहता है
जनाब-ए-आली ये सवाल ग़ैर-ज़रूरी है
अदालत वकील पर एतराज़ कर
उसके आँसू खारिज़ कर देता है
आँसू रिकॉर्ड-रूम में चले जाते हैं
हर पेशी तक उसकी माँ
उम्मीद का एक शॉल बुन लेती है
और अदालत बर्ख़ास्त होने तलक़
वो तार-तार उधड़ जाता है

अब वो…
खाक़ी, सफ़ेद, और काले रंग से
बेहद ख़ाहिफ़ है
विभिन्न कोणों के पैमाने पर
उन रंगों ने उसे, लड़की से
ज्यामिति बना दिया
जिसे केवल…
जांचा, नापा, परखा जा सकता है
उसे अब लड़की बनने नहीं देता
उस भयावह घटना को
वो वक़्त की खिड़की से
परे ढकेल देना चाहती है
पर समाज और हालात
उसे भूलने नहीं देते !
अब वो स्कूल नहीं जाती
मां के सिवा किसी को भी
याद नहीं उसका नाम
पीड़िता, रेप वाली लड़की, विक्टिम
कई नाम दे दिए गए है उसे
माँ अब लोगों के घरों में
काम करने नहीं जाती
अब वो घर में ही
सिलती है, औरतों के पेटीकोट
और बगल में बैठी वो
डालती जाती है
उन पेटीकोटों में ज़ारबंद
और दांत भींच कर
कस कर लगा देती है उनमे गांठ
जैसे कोई जल्दी खोल ही न पाए!

उनके लिए वक़्त थम सा गया है
बस दीवार पर
टंगी केलेंडर की तारीख़ बदलती है
बावजूद इसके
माँ अब भी
अगली पेशी के लिए
बुन रही है उम्मीद की इक शॉल!

वो कौन है 

वो कौन है जो
घने अँधेरे में गुमसुम सा
ख़ामोश सदा देता है
सिलसिला लम्हों का
सदियों सा बना देता है

वो कौन है जो
मेरी सहमी हुई साँसों की रास
थामे हुए चल रहा है
उससे मिलने को मगर
मन मचल रहा है

वो कौन है जो
अपने ना होने पर भी
अपना वजूद थमा देता है
हर इक अक्स पर
नक़्श अपना जमा देता है

जाने किस सम्त से
हवा बह कर आई है
मेरे कानो में फुसफुसाई है
वो तो तेरी जाँ भी नहीं
उसके मिलने का इम्काँ भी नहीं

सुनकर, मेरे
पलकों की सलीबो पर
झूलने लगते हैं ख़्वाब
चांदनी नींद को
लोरी गा के सुला देती है
रातें बिस्तर पर कांटे उगा देती है
और नींद…
नींद से उठकर
मुझे सुलानेआती नहीं आती ही नहीं!

इंतज़ार

अकसर इंतज़ार की दहलीज़ पर
अपनों के लौट आने का
होने लगता है एतबार
जैसे कि जाती हुई नदी
आती हूँ कहकर
पर्वत, घाटियों से होती हुई
फिर लौट आती है सावन में
पर अफ़सोस
इस तरह हमेशा
कहाँ लौट पाते हैं सब
“अभी आता हूँ”
कहकर जाते हुए लोग!

पारा प्रेम का 

“पारा” प्रेम का, हाई हो न हो
“प्रेम” पारे सा होना चाहिए
जो गिरकर टूटता है कई टुकड़ों में
जुड़ने में पल नहीं गंवाता
कोई गांठ भी नहीं होती उस जुडाव में
और…उस “पारे”(प्रेम) को
कोई रंगे हाथों पकड़ भी तो नहीं पाता
तभी कहती हूँ…
पारा प्रेम का हाई हो न हो
प्रेम पारे सा होना चाहिए!

बूँदें

स्नेह की परिधि में
तुम, मुझसे विमुख
किन्तु तुम्हारा मौन
मेरे सन्मुख रच देता है
स्नेह की परिभाषा
इस नेह को निहारता सूरज
समेट लेता है
अपनी तीक्ष्ण किरणें
और तुम…
बादलों के कान में
धीरे से कुछ कह कर
बन जाते हो आकाश
के तभी बूंदे बरसने लगतीं हैं
और मैं मिटटी सी गल कर
बन जाती हूँ धरती।

कमबख़त ये ख्व़ाब

किसी बड़े पत्थर को
यक़-ब-यक़ उठाने से
उसके भीतर पल रहे
क़िस्म-क़िस्म के कीड़े मकोड़ों की
दुनिया आबाद नज़र आती है
जिनपर रौशनी के पड़ते ही
अफ़रा तफ़री मच जाती है
रौशनी की किरन जानलेवा जान पड़ती है उन्हें
वे एक पल को भी टिक नहीं पाते
ढूंढ लेते हैं कोई और नम आलूद तह आसरे के लिए l
ये ज़रूरी नहीं के रौशनी हर किसी के लिए सवेरा ही हो
कभी-कभो हम धंस जाते हैं धूप के दल-दल में भी
धनक के साए में भी ज़िन्दगी बेरंग सी दिखती है l
और अँधेरे…
अँधेरे वो ख्वाब दिखला जाते हैं
जिसमें हसरतों की प्यास बुझ जाती है
पर कमबख़त, ये ख्व़ाब
बंद आँखों में ही पलते हैं
और ज़िन्दगी
ज़िन्दगी खुली आँखों में ही गुज़र हो सकती है!

शबदेग

कल सारी रात, तेरे तस्सवुर की आंच पर
मेरे नज़्मों की, शबदेग[1] पकती रही
तुम्हारे होने का एहसास
भट्टी में ईधन लगाता रहा
बारहा, दर्द का धुंआ
आँखों में नमी लाता रहा
हसीं तब्बसुम नज़्मों में
कलछी घुमाता रहा
बंद खिड़कियों पर थपकियाँ
बारिश की आमद बताती रही
आंच दहकती रही, ख्वाब ख़दक़ते रहे
देग से उठती हुई इश्क़ की खुशबुओं से
आलम सारा सराबोर था
मेरे बेक़रार सफ़हों को
बेनज़ीर नज़्मों का इंतज़ार था
मेरी नींद जो अरसों से
पसे-परदा थी, ख्वाबे परीशां थी
जाने किस पहर वो भूख से बेज़ार, नमूदार हुई
शबदेग देख उसके लबों पर तल्ख़ हँसी फिसलती रही
वो ज़ालिम, मेरी नज़्मों का लुकमा निगलती रही
सुबह की पहली किरन ने नींद के जाने की इत्तला दी
उठकर देखा तो…भट्टी में बची थी राख
और गुमसुम पड़े शबदेग के कोरों में
नज़्मों के कुछ लफ्ज़ चिपके पड़े थे l

“आज की रात… मैं नींद पर पहरा दूंगी”

अल्फाज का इक पुल

हमारे दरमियाँ
लम्हा दर लम्हा
अल्फाज़ का इक पुल सा बना जाता है
मैं इस छोर पर कि स ओर हूँ
नहीं जानती
मेरे लिए तो रोज़ सुबह, सूरज
पुल के उस छोर से ही निकलता हैl

तनहाई 

.शाम बारिशों में तो रात बूँदों में
किसी तूल कट ही गयी
आज फिर सहर ने
कोहरे की लिहाफ से
ज़बरन दिन को जगाया है
गूंगे दिन ने फिर
भीड़ में…तनहाई दोहराई हैl

तीन तबके की औरतें

.1. संपा

सूरज की दस्तक से बेखबर
तीन चौथाई शहर जब सोया रहता है
तब कसमसाती सी उठ जाती है संपा
आँखों को कुछ सुझाई दे
उससे पहले ही सूझ जाता है
उसे ओसारे में रखी खाली बाल्टी
एक हाथ में बाल्टी, दुसरे में मंजन ब्रश लेकर
चल पड़ती है म्यूनिस्पेलिटी के नलके की तरफ
और डट जाती है पानी के मोर्चे पर
फिर जल्दी से तैयार होकर
चाय में रोटी बोर कर खाते हुए
घरवाले को उठाती है, जो रिक्शा चलाता है
शीशे के सामने कंघी करते वक़्त
माथे पर घाव के निशान को निहारती है
जो उसे पहले पति से मिले हैं
भरती है लम्बी मांग में टक-टक लाल सिन्दूर
लगाती है बड़ी सी बिंदी…
बांग्लादेश में ही छोड़ आई अपने नेशेड़ी पति को
दूधमुही बच्ची को छाती से चिपकाए
देवर के साथ भाग आई थी
१०वी फेल बेटी अब पास ही टेलरिंग सीखने जाती है
सफिया से अब वो संपा बन गई है
रोजी-रोटी ही उसका मजहब है
उसकी बस्ती प्रवासी बांग्लादेशियों से अटी पड़ी है
वो सब कमला, विमला, निर्मला बन चुकी है,
वो बेहतर जानती हैं की घरों में काम, इसी नाम से मिलेगा
वरना घरो में मालकिनों की दया से
जो चाय भी पीने को मिलती है, वो कप उनका बिसैना हो जायेगा
वे सब इकट्ठी निकल पड़ती है, अपने काम की तरफ

2. शिल्पी

अलसुबह संपा, शिल्पी के घर का कॉलबेल बजाती है
शिल्पी दरवाज़े पर संपा को देखकर
देवी दर्शन जैसे भाव ले आती है चेहरे पर
उसे पता है जिस दिन उसके दर्शन नहीं हुए
उस दिन उसकी हालत बेगार मजदूरनी सी होती है
शिल्पी यंत्रवत दोनों बच्चों को उठाकर
स्कूल के लिए तैयार कर टिफिन बनती है
बच्चों को…बसस्टॉप तक छोड़ कर आती है
सास को चाय देती है, पति को उठाती है
उसका चाय-नाश्ता और लंच-बॉक्स तैयार करती है
पति के ऑफिस जाने के बाद
घर दोबारा आबाद होने के पहर भर पहले
जो उसका खास अपना वक़्त होता है
लम्बी सांस लेती हुई अपने और संपा के लिए चाय बनाती है
संपा तबतक झाड़ू पोछा कर चुकी होती है
दोनों तसल्ली से कालोनी की गॉसिप बतियाते हुए चाय सुड़कती हैं
4 बजे आउंगी बीबीजी.. कहकर संपा निकल जाती है फ्लैट से
इधर शिल्पी धोये कपड़ों को अपनी अधूरी हसरतों की तरह
जोर से झिड़क कर अलगनी पर टांग देती है
नहा धोकर पूजा करते वक़्त घर की बरक़त मांगती है
फिर हिसाब की डायरी निकालकर
दूध, अखबार, राशन, सब्जी, ट्यूशन, दवाई का
हिसाब लगाती हुई बची तनख्वाह गिनती है
शाम को पति से रिमोट का मसला न हो इसलिए
दिन के खाली वक़्त रिपीटेड सीरियल देख कर संतुष्ट हो जाती है
बच्चों के स्कूल से आते ही
फिर उसके बदन का मशीन चालू हो जाता है
रात बिस्तर तक पहुचने तलक
वहाँ भी पति का तंज़ उसका पीछा नहीं छोड़ता
क्या हो गया है तुम्हे?
एक दम ठंडी हो गई हो
मिसेज सहगल को देखो कितनी टिप-टॉप रहती हैं
पति की फरमाइश पूरी कर
वो करवट बदल कर यही सोचती है कि
क्या यही ज़िन्दगी है?
घर में सभी की जरूरियात पूरी करना?
क्या वो प्लास्टर औफ़ पेरिस है?
जो अलग-अलग उनके सांचे ढलती रहे?
पढाई की डीग्रीयां केवल शादी तय करने के लिए जरुरी थे?
ये कैसा मकड़जाल है जिसमे…
वो निकलने की कोशिश में और फँसती जाती है
सोचते हुए तमाम सवालों का गाव तकिया लगाकर सो जाती है

3. सूज़ी

सूरज सर चढ़ने पर, संपा पहुच जाती है
सूज़ी मैडम की कोठी पर
सूज़ी मैडम यानि सुजाता
जिसकी सोसाइटी में सुजाता नाम आउट डेटेड है
संपा की बनी ब्लैक काफी से खुलती है उसकी नींद
बच्चे दून स्कूल में पढ़ते हैं
जो सालाना छुट्टियों में ही घर आ पाते हैं
पति बिजनेस के सिलसिले में अक्सर बाहर रहता है
किट्टी, सोशल वर्क, ब्यूटी पार्लर,
शोपिंग, पार्टीज़ में खुद को मशगूल रखती है
पति के घर आते ही
खुद को हर तरह मेकप से संवारकर पेश करती है
पति को घंटो किसी से बाते करते देखकर भी अनदेखा कर देती है
उड़ती-उड़ती एक्स्ट्रा मेरिटल अफेयर की ख़बर को
वो सुनना ही नहीं चाहती
क्यूंकि वो सिक्युरिटी, शान और स्टेटस की
बर्खास्तगी से खौफज़दा है
वो जानती है कि पति से अल्हेदा
उसका अपना कोई वज़ूद है ही नहीं
अब उसके टखने भारी होने लगें हैं
उम्र का खौफ़ सताने लगा है
घर में संपा, माली, कुक, गार्ड इन मुलाज़िमो के इलावा
और कोई तवज्जो देने वाला नहीं है
ये सोचते हुए उसके अन्दर सांसो का साइफन लग जाता है
जो पिछली कमाई हुई खुशियां बाहर फेंकता जाता है
और उसके बदले झुरियां ब्लड-प्रेशर चिड़चिडापन की आदत
और खाली दिन और खाली रातें अता करता है l
सूजी बदहवासी में सुलगा लेती है तीसरी सिगरेट और सोचती है
कि क्या, बच्चे पैदा करना, उन्हें अच्छी तालीम देना,
योरोप का सफर करना, पति की ख्वाहिशे पूरी करना
देर रात पार्टी करना…क्या यही ज़िन्दगी है?
फिर जवाब में धीरे से बुदबुदाती है ..पेरासाईट हूँ
इतने में संपा उसके हाथों से सिगरेट छीनकर
खाना के साथ-साथ डिप्रेशन की दवा खिलाकर उससे विदा लेती है
तो यूँ सांझ के ढलते ही ख़त्म जो जाता है संपा का काम
“जा चाहीबो ता पाहिबो”
गुनगुनाते हुए…साक भाजी खरीदकर
अपने साथिनों के साथ लौट पड़ती है अपने चाळ की ओर
ऐसे में मुझे तो सबसे नीचे तबके की संपा ही
आज की आज़ाद ख्याल बिंदास और संतुष्ट औरत जान पड़ती हैl

देखना, अब बदलेंगी लोकगीतों की दास्तानें

परिंदे और परदेसियों के
दूर वतन जाने पर
दुआओं की गठरी बाँध
घर की चौखट पर
बैठी वजूद का
मिटटी होना लाज़मी होता
आँखों के बहते आंसू
उस मिटटी को सींचते रहते
जिनमे… गाहे-बगाहे
उम्मीदों के सब्ज़े उग आते
लोकगीतों की दास्ताने
उनसे ही आबाद थी
मगर अब…हमवतन ही
दुआओं की छतरी लिए
सुबह के निकले परिंदे औ बाशिंदे
वाजिब वक़्त…
जब घर को लौट नहीं आते
बजाये आने के उनके
बजती है फोन की घंटी
तब…चौखट पर
अपसकुन बुहारती
बेसब्र आँखे पथरा जाती हैं
अब उन आँखों से
अश्क तर नहीं होते
उन पथराई वजूदों पर
कोई सब्ज़ा भी नहीं उगता
बस इक आह: होती है
के, कोई तो आये
और उन्हें मिटटी कर दे
देखना…
अब बदलेंगी लोकगीतों की दास्तानें

कह देते मुझसे एक बार

मेरा स्नेह, मेरी पूजा,
मात्र प्राक्कथन था तुम्हारे लिए
जल रही थी शंकाएं जब मन में
कह देते मुझसे एक बार
मै उपलब्ध थी, शमन के लिए…

ह्रदय कुंड में स्वाहा किया,
निज अहंकार तुम्हारे लिए
जब दिनोंदिन शेष होती रही प्रेम समिधा
कह देते मुझसे एक बार मैं उपलब्ध थी हवन के लिए…

संबंधो के मंथन में
सदा अमृत ही चाहा तुम्हारे लिए
किन्तु अमृत पान कहाँ सरल है गरल के बिना
कह देते मुझसे एक बार
मैं उपलब्ध थी, आचमन के लिए…

आदम और हौवा के मानी 

मिटटी से बने आदम
और…
उसकी पसली से बनी हौवा का
जन्नत से निकाले जाने का कसूर, सिर्फ इतना ही तो था
कि उन दोनों ने जिस्मानी फ़र्क को जान लिया था
ज़मीं पर आते-आते उस फर्क ने काफी फासला तय कर लिया
अब ज़मीं पर हौवा के पैदा होते ही उसे उढ़ा दिया जाता है
शर्म हया, सब्र, चुप्पी का जामा
और वो खुद ब खुद हिस्सा बन जाती है
आधी आबादी कहे जाने वाले उस ज़हादती जमाअत का
जिसमे पहला सबक यही सिखाया जाता है कि
तू लड़की है, जिम्मेदारी है
तू अबला है, तू नारी है
तू मरियम, है तू दुर्गा है
तू औरत है, लाचारी है
पर अब बस!
अब और नहीं पूजा जाना
अब और नहीं भोगा जाना
सभी फर्क ओ फासले मिटाने होंगे
पुराने सिखाये सबक भूलने होंगे
और…
बदलना होगा आदम और हौवा के मानी
जिसमे लड़की होना कमतर और कमज़ोर नहीं
और लड़का होना क्रूर और कठोर नहींl

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