सर्वत एम जमाल की रचनाएँ

नज़्में

बाढ़ या सूखा …..

पीठ पर,

लोगों ने फिर

रख लीं सलीबें हैं,

हाकिमों के हाथों में

शायद जरीबें हैं।

‘राजधानी कूच’ का

पैगाम है

गांव, बस्ती, शहर तक

कोहराम है

देवता वरदान देने पर तुले हैं

दो ही वर हैं

बाढ़ या सूखा।

खेत बिन पानी

फटे, फटते गये

या नदी की धार में

बहते गये

फसल बोना धर्म था, सो बो चुके हैं

क्या उगेगा

डंठलें ,भूसा .

प्रेम,प्यार,अनुराग …..

प्रेम, प्यार, अनुराग, मुहब्बत
यह भावनाएं मुझमें भी हैं
आख़िर हूँ तो मैं भी
इंसान ही।
किसी की नशीली आँखें
सुलगते होंठ
खुले-अधखुले, सुसज्जित केश
मुझे भी प्रभावित करते हैं
शायद तुम्हे विश्वास नहीं
क्योंकि मेरी रचनाओं में
तुम्हें इसकी परछाई तक
दिखाई नहीं पड़ती।
यह भी मेरे
प्रेम, अनुराग
प्यार, मुहब्बत का
प्रमाण है
जो मुझे है
प्रकृति से,
धरती से,
विधाता की हर रचना से।

मैं नफरत करता हूँ
शोषण से,
अत्याचार से,
दिखावे से,
झूट को सच
और सच को
झूट कहने से।
यही कारण है
मेरी रचनाएं
इनके विरोध में खड़ी हैं।

जब कभी
इस अघोषित युद्ध में
जीत,
मेरी कविताओं की
मेरे विचारों की होगी
और हार जायेंगे
शोषण, अत्याचार, कदाचार
एवं
धरती पर नफरत उगाने वाले
और उनके सहायक तत्व
तब इस धरती पर
सिर्फ़ प्रेम होगा

कोई बच्चा,
नहीं शिकार होगा
कुपोषण और
बालश्रम के
दानव का।
कोई महिला
देह्शोषित
नहीं होगी।
कोई पुरूष
अपने ही
परिजनों की नजरों में
शर्मिन्दा नहीं होगा

तब
मेरी रचनाएं
फ़िर
समय का दर्पण बनेंगी
और एक
नया फलक बनाएंगी,
इस धरती के लिए।

मुझे विश्वास है
तब मैं अकेला नहीं रहूँगा
अजूबा नहीं रहूँगा
और ऐसा नहीं रहूँगा ।
परन्तु क्या
मेरे जीते जी
ऐसा होगा ?

धुंध और कुहरे से

धुंध और कुहरे से

आँखें बेहाल हैं

बेपनाह कचरे से .

नियमों के पालन में

यहाँ-वहां ढील है

चूजों की रक्षा को

प्रहरी अब चील है

राजा से मंत्री से

खौफ नहीं अब कोई

जनता को ख़तरा है

अब केवल मुहरे से .

पछुआ के झोंके से

होंट फटे जाते हैं

फर्नीचर बनने को

पेड़ कटे जाते हैं

नदियों में पानी का

तल नीचे आ पहुंचा

सागर भी लगते हैं

अब ठहरे -ठहरे से.

लोग तुम्हारे वास्ते….

लोग तुम्हारे वास्ते
पलकें बिछाते हैं
मुस्कुराते हैं
कभी-कभी
आकाश के तारे भी
तोड़ लाने की बात करते हैं
सिर्फ़ इसलिए
कि तुम ख़ुश रहो
उन पर
अपनी पसंदीदगी की
मुहर लगा दो
और तुम
ऐसा करते भी हो ।

तुम्हारा मिलने-जुलने का दायरा
कुछ बढ़ता जा रहा है
लेकिन जो घट रहा है
उसकी कल्पना कभी कि है तुमने?
तुम इस पृथ्वी के
एक निरीह प्राणी थे
अब भी हो
लोग तुम्हे आकाश बना चुके हैं
और तुम
लोगों के कहने पर
अपनी पहचान
भूल गए हो ।
कब तक ?

फिर कोई नवागंतुक
लोगों के वोट
अपनी तरफ़ करके
तुम्हे तुम्हारे सही स्थान पर
वापस पहुँचा देगा ।
उस पल
तुम्हे
सहानुभूति या सान्त्वना
देने वाला भी नहीं मिलेगा ।

मेरी बात छोड़ो
मैं आज भी
उसी मोड़ पर
जहाँ तुम मुझे छोड़कर
आकाश-यात्रा पर गए थे,
जमीं पर अपने पाँव
मजबूती से टिकाए
खड़ा हूँ ।
इस प्रतीक्षा में
कि शायद
कभी तुम नीचे आओ
तो स्वयं को
अकेला न पाओ

ग़ज़लें

दूसरों पर ख़ुद को भारी करके देख

दूसरों पर ख़ुद को भारी करके देख
एक फतवा तू भी जारी करके देख

कैसे आवाज़ें दबाई जाती हैं
हक की ख़ातिर मारामारी करके देख

अब गए वक़्तों के किस्से मत सुना
आजकल ईमानदारी करके देख

एकता से प्यार नामुमकिन है अब
आपकी, उनकी, हमारी करके देख

ख़ौफ़ तू भी जान जाएगा, ज़रा
शेर के ऊपर सवारी करके देख

यह शराफ़त कुछ नहीं दे पाएगी
एक दिन लहजा दुधारी करके देख

ये हवा, कैसी भी हो, चलती तो है

ये हवा, कैसी भी हो, चलती तो है
रात काली ही सही ढलती तो है

है ग़ुलामों में भी आज़ादी की ज्योति
आग मद्धम है मगर जलती तो है

हम बहुत ख़ुश हैं, यही कुछ कम है क्या
आप को भी बेबसी खलती तो है

ख़ुद फ़रेबी ऐसी शय है, जो सदा
लाख बचिए, आप को छलती तो है

तुम उगा लो रोशनी के लाख पेड़
तीरगी माहौल में पलती तो है

ख़्वाब वालो आओ, लेकिन सोच लो
नींद आँखों से कभी टलती तो है

लोग कहते बदन से खाल तक

लोग कहते बदन से खाल तक
जबकि बिकते हैं यहाँ कंकाल तक

अब शिकारी की ख़ुशी मत पूछिए
कुछ परिंदे आ गए हैं जाल तक

है सभी कुछ आदमी के हाथ में
बाढ़, सूखा, आंधियाँ,भूचाल तक

गाँव में वर्दी का मतलब और है
जंगलों का राज है चौपाल तक

हमने देखे हैं हज़ारों अक्लमंद
हर किसी की सोच रोटी-दाल तक

एक थोड़ी सी तरावट जब मिली
तुम बदल देते हो अपनी चाल तक

जान दे देता है सर्वत आदमी
आन की ख़ातिर यहाँ कंगाल तक

हर तरफ़ एक ही समां क्यों है

हर तरफ़ एक ही समां क्यों है
चेहरा-चेहरा धुआँ-धुआँ क्यों है

पाँव से जब सरक चुकी है ज़मीन
सर पे यह नीला आसमाँ क्यों है

उन दिनों और बात थी, लेकिन
आज हर शख़्स बेज़ुबां क्यों है

कोई परछाईं ही नहीं बनती
धूप सूरज से बदगुमाँ क्यों है

सोच में पड़ गए हैं सारे खेत
अब्र फ़सलों पे मेहरबाँ क्यों है

अब तो घर-घर चिराग जलते हैं
रोशनी फिर यहाँ-वहाँ क्यों है

कोई बतलाए एक बेचारी जुबान
इतने दाँतों के दरम्याँ क्यों है

शोर तो यही था ना ! बदगुमान हैं चेहरे

शोर तो यही था ना ! बदगुमान हैं चेहरे
जबकि आप लोगों पर मेहरबान हैं चेहरे

आँख-आँख शोले हैं दुश्मनों की सेना में
और तुम समझते हो खानदान हैं चेहरे

सौ जतन करो फिर भी मेल हो नहीं सकता
क्योंकि तुम तो धरती हो, आसमान हैं चेहरे

बस्ती-बस्ती में सुनिए ज़िंदाबाद के नारे
पहले मुल्क होता था, अब महान हैं चेहरे

उन दिनों यही चेहरे सरफ़रोश होते थे
अब वतन फ़रोशों के मेज़बान हैं चेहरे

इस तरफ़ तिरंगा है, उस तरफ़ हरा परचम
लाख कीजिये कोशिश, दरम्यान हैं चेहरे

यार पिछले मौसम में शोर भी था, मातम भी
आज क्या हुआ सर्वत, बेज़बान हैं चेहरे

शौहर बोला क्यों कडुवाहट घोले जाती है

शौहर बोला क्यों कडुवाहट घोले जाती है
माँ पाग़ल है, बेमतलब ही बोले जाती है

उनके काले काम सही पर उनके चेहरे पर
ऐसी तेज़ चमक है, आँखों को ले जाती है

घर, दफ़्तर, खूराक, सभी पर डाल दिए पर्दे
और ग़रीबी सारे पर्दे खोले जाती है

बस्ती-बस्ती सन्नाटा है, चौराहों पर भीड़
अफ़वाहों पर इतराती है, डोले जाती है

जो कुछ भी हो, जीवन-गाड़ी कभी नहीं रुकती
लाख लगें हिचकोलों पर हिचकोले, जाती है

बाबा नाहक तुम ने इतनी लम्बी राह चुनी
पगडंडी तो सीधे दक्खिन टोले जाती है

सारा गाँव एकजुट था, अड़ गई हवेली फिर

सारा गाँव एकजुट था, अड़ गई हवेली फिर
और इक तमाचा-सा जड़ गई हवेली फिर

लालमन की हर कोशिश मिल गई न मिट्टी में
चार बीघा खेतों में बढ़ गई हवेली फिर

था गुमान भाषा में अब के हार जाएगी
कुछ मुहावरे लेकिन गढ़ गई हवेली फिर

मीलों घुप अंधेरे में रात भर चला, फिर भी
भोर में हथेली से लड़ गई हवेली फिर

नंगे-भूखे लोगों की खुल गईं जुबानें जब
आ के उनके पैरों में पड़ गई हवेली फिर

ज़ोर आज़माइश की, हर किसी ने कोशिश की
एक पल को उखड़ी थी, गड़ गई हवेली फिर

उम्मीद सभी को है कि इस बार लकीरें

उम्मीद सभी को है कि इस बार लकीरें
कुछ और दिखाने को हैं तैयार लकीरें

हर शख़्स किसी तौर मिटाने पे तुला है
चेहरे पे हुईं जब से नमूदार लकीरें

कब, किसको कमी अपनी नज़र आई यहाँ पर
सब मान चुके हैं कि खतावार लकीरें

आँगन हो कि फ़सलें हों कि सरहद हो, कहीं भी
फ़न अपना दिखा जाती हैं फ़नकार लकीरें

आए हैं बड़ी शान से मंडी में ख़रीदार
इस बार किसे लाई है बाज़ार लकीरें

हर मुल्क समझता है कि सब ठीक है लेकिन
नक्शों में छुपी रहती हैं गद्दार लकीरें

औरों की हथेली पे लुटा देती है सब-कुछ
कब अपने लिए होंगी वफ़ादार लकीरें

सर्वत किसी इन्सां को लकीरों से न परखो
हर हाथ में होती हैं अदाकार लकीरें

फिर कहा उस ने, वजू करना

फिर कहा उस ने, वजू करना
मैं ने पूछा तुम को छू कर ना !

दिल तो इक नन्ही-सी थैली है
इस में इतनी आरजू करना !

सख़्त मुश्किल था, किया हम ने
ख़ुद को यूँ बेआबरू करना

चीज़ें ऊँचे दाम बिकती हैं
सोचना, फिर जुस्तजू करना करना

इन दिनों ख़ामोश रहता हूँ
आ गया है गुफ़्तगू करना

सारी बातें पीठ के पीछे
चंद बातें रूबरू करना !

अजब हैं लोग थोड़ी सी परेशानी से डरते हैं

अजब हैं लोग थोड़ी सी परेशानी से डरते हैं
कभी सूखे से डरते हैं, कभी पानी से डरते हैं

तब उल्टी बात का मतलब समझने वाले होते थे
समय बदला, कबीर अब अपनी ही बानी डरते हैं

पुराने वक़्त में सुलतान ख़ुद हैरान करते थे
नये सुलतान हम लोगों की हैरानी से डरते हैं

हमारे दौर में शैतान हम से हार जाता था
मगर इस दौर के बच्चे तो शैतानी से डरते हैं

तमंचा ,अपहरण, बदनामियाँ, मौसम, ख़बर, कालिख़
बहादुर लोग भी अब कितनी आसानी से डरते हैं

न जाने कब से जन्नत के मज़े बतला रहा हूँ मैं
मगर कम-अक़्ल बकरे हैं कि कुर्बानी से डरते हैं

हर पल दुःख जैसा लगता है

हर पल दुःख जैसा लगता है
लेकिन जब पैसा लगता है?

कुछ लोगों को मय पानी-सी
और लहू मय-सा लगता है

सूखे की आँखों में सावन
जैसे को तैसा लगता है

कच्ची नींद से उठने वालो
अब सूरज कैसा लगता है !

आज अपना चेहरा भी हमको
जाने किस शय-सा लगता है

सब कहते हैं, बस कुछ ही दिन
सचमुच क्या ऐसा लगता है?

चमकती रोशनी आँखों के जब नजदीक होती है

चमकती रोशनी आँखों के जब नजदीक होती है
फिर उसके बाद कुछ पल तक फ़िजा तारीक होती है

क़दम ठहरें तो उग आते हैं घास और फूस धरती पर
क़दम बढ़ते रहें तो इससे पैदा लीक होती है

जहाँ से लोग थैले और तोहफ़े ले के आते हैं
वहाँ बिगड़े दिमागों की ख़राबी ठीक होती है

ये रातों-रात कुछ का फूलना, फलना, चमक जाना
हमें बतलाओ इस करतब में क्या तकनीक होती है

बहुत से नाम हैं इमदाद, राहत, कर्ज़, हमदर्दी
समझ पाना कठिन है कौन सी शै भीख होती है

हम न काग़ज़ हैं न कोई सींक हैं

हम न काग़ज़ हैं न कोई सींक हैं
ऐ हवा हम इक नई तहरीक हैं

इंकलाबी जोश सब में है मगर
सबके चेहरे ख़ौफ़ से तारीक हैं

अब सफ़र के बाद कुछ अंजाम हो
पाँव के छाले अभी तो ठीक हैं

रोशनी, ताज़ा हवा, खुशियाँ, सुकून
यह हमारे हक़ नहीं हैं, भीख हैं

मछलियाँ कितनी भी हुशियारी करें
जाल भी अबके बहुत बारीक हैं

आप ख़ुश हैं, जानते हैं आजकल
आप किस इतिहास के नजदीक हैं

मुझे ये वक्त घुटन से रिहाई भी देगा

मुझे ये वक़्त घुटन से रिहाई भी देगा
मैं जानता हूँ कि मुझको सफ़ाई भी देगा

अभी तो प्यास बुझा लो नदी की धारा से
नदी रुकी तो यही पानी काई भी देगा

सब अपना दर्द बताने चले तो आए हैं
मैं सोचता हूँ तुम्हें कुछ सुनाई भी देगा

जो रो रहे हैं अभी कल रुलायेंगे सबको
ये इन्कलाब सभी को दिखाई भी देगा

वो अपने भाई के हाथों मरा, ये चर्चा है
मगर जनाजे को कंधा तो भाई भी देगा

लगाओ पौधा, मगर इतनी आस मत रखना
कि जब ये पेड़ बनेगा, कमाई भी देगा

जो खुल के सामने आने लगे हो तुम सर्वत
यही मिज़ाज तुम्हें बेहयाई भी देगा

गीत

मर्यादाएं क्या होती हैं 

हममें, बस, यह अनुशासन है
चलते हमें रहना जीवन है
तेज़ हवाएँ क्या होती हैं
गर्म शिलाएँ क्या होती हैं

वह क्या छान सकेंगे जंगल
जिनके पाँव तले है मखमल
हमसे पूछो जीवन गाथा
दन्तकथाएँ क्या होती हैं

पछुआ या पुरवाई कैसी
मरने में कठिनाई कैसी
चिंता ही इस युग में विष है
विष-कन्याएँ क्या होती हैं

हक़-अधिकार जताना सीखो
अब हथियार उठाना सीखो
हाथ बढ़ाकर छीनो रोटी
मर्यादाएँ क्या होती हैं?

मधुमासी दिन बीत चुके हैं

मधुमासी दिन बीत चुके हैं
सुख के सागर रीत चके हैं
आज महाभारत से पहले
कौरव बाज़ी जीत चुके हैं
आँगन-आँगन सन्नाटा है ।

दुखियारों की रात बड़ी थी
पैरों में ज़जीर पड़ी थी
दशरथ तो वर भूल चुके थे
कैकेयी की आँख गड़ी थी
पुरखों की गति सिखलाती है
धर्म निभाने में घाटा है ।

ताने-बाने बिखरे-बिखरे
सभी सयाने बिखरे-बिखरे
जीवन ने वो रूप दिखाया
हम दीवाने बिखरे-बिखरे
पहले मन में क्रांति बसी थी
अब तो दाल, नमक, आटा है ।

निरन्तर साँझ करे शृंगार

निरन्तर साँझ करे शृंगार
निशा ने पहना चन्दन हार ।

तिमिर किरणों ने बांधे हाथ
उजाला असमंजस में है
धराशायी हैं आदमक़द
सफलता किसके बस में है
ठगे से देख रहें हैं सब
प्रलय का पल-प्रतिपल विस्तार।

निरन्तर साँझ करे शृंगार
निशा ने पहना चन्दन हार ।

सदाशयता का यह अपमान
विदेशी ठप्पे फ़सलों पर
गड़ी हैं ग़ैरों की आँखें
सुरक्षा तक के मसलों पर
सुना है, आने वाले हैं
यहाँ आयातित व्रत-त्यौहार ।

निरन्तर साँझ करे शृंगार
निशा ने पहना चन्दन हार ।

अहिल्या आतंकित भयभीत
चकित हैं जनक-दुलारी आज
खड़ाऊँ फेंकी घूरे पर
भरत ने पहना शाही ताज
निराली कलियुग की है रीति
दशानन लेता है अवतार ।

निरन्तर साँझ करे शृंगार
निशा ने पहना चन्दन हार ।

सम्मोहन के बदले अब लाचारी है

सम्मोहन के बदले अब लाचारी है
आँखों में जाने कैसी बीमारी है ।
अख़बारों में निविदा का विज्ञापन है
आबण्टन क्रम में थोड़ा परिवर्तन है।

भाषा की मनुहार किसी खलनायक से
क्या होता है स्वाति पूछो चातक से
मण्डी की परिभाषा जबसे बदल गई
व्यापारी भी दीख रहे हैं ग्राहक से
ठहरी हुई नदी के जल में कम्पन है
आबण्टन क्रम में थोड़ा परिवर्तन है !

दस्तूरी दावत के खेल निराले थे
अभिनंदन-स्वागत के खेल निराले थे
ऊँच-नीच सब नारायण की इच्छा पर
अनुमानित लागत के खेल निराले थे
आज सभी की परछाई में कम्पन है
आबण्टन क्रम में थोड़ा परिवर्तन है !!

तुमने सुना-सुनाया होगा बँटवारा
हमने तो छूकर देखा है अंगारा
अफ़वाहों की जकड़न में सारी दुनिया
अब किस-किस को राह दिखाए ध्रुवतारा
नव-युग में पाशार-काल का दर्शन है
आबण्टन क्रम में थोड़ा परिवर्तन है !!!

कोई मन को भा जाए चुन लेती हैं

कोई मन को भा जाए चुन लेती हैं
आँखों का क्या है सपने बुन लेती हैं
लेकिन सपने केवल सपने होते हैं।

ख़ाली कमरा चीज़ों से भर सकता है
कोई कितना दुख हलका कर सकता है
हमने बाहर भीतर से घर-आँगन में
घायल होकर भी देखा है जीवन में
सारे दर्द अकेले सहने होते हैं
लेकिन सपने केवल सपने होते हैं।

पीड़ाओं की हद किस-किस को दिखलाएँ
आख़िर अपना क़द किस-किस को दिखलाएँ
पौधा वृक्ष बनेगा ये आशा भी है
सबको फल पाने की अभिलाषा भी है
उनकी बात करो जो बौने होते हैं
लेकिन सपने केवल सपने होते हैं।

क्या होता है बारहमासा क्या जाने
गर्मी जाड़ा धूप कुहासा क्या जाने
सारी चिंता अख़बारों की ख़बरों पर
बैठे रहे किनारे कब थे लहरों पर
जिनके नाख़ून चिकने-चिकने होते हैं
लेकिन सपने केवल सपने होते हैं।3

अब मगर का भय नहीं है

अब मगर का भय नहीं है
कहीं कुछ संशय नहीं है
हर नदी हर ताल में, बस,
केकड़े ही केकड़े हैं
आप बाहर क्यों खड़े हैं?

कल्पना से आकलन तक,
लोग जा पहुँचे गगन तक
और हम सदियों पुरानी
दास्तानों पर अड़े हैं।

मज़हबी बीमारियों में
समर की तैयारियों में
ध्वंस की पकती फ़सल में
सब बिजूका से गड़े हैं।

पथ सभी अवरुद्ध जैसे
कुल विधर्मी युद्ध जैसे
आज घर ही में पितामह
बाण शैया पर पड़े हैं॥

हथेली देखता हूँ / सर्वत एम जमाल

हथेली देखता हूँ! पहेली देखता हूँ!!

सभी ने पर निकले
मगर हर पांव छाले
जुबां खुलती नहीं है
अधर पर बंद ताले
कुहासा बढ़ रहा है
अँधेरा चढ़ रहा है
यहाँ सूरज किरन भी, अकेली देखता हूँ !
हथेली —————————-! !

लगा है फिर अडंगा
हुआ इन्सान नंगा
नगर देहात बस्ती
सवेरे शाम दंगा
लगे फुफकारने सब
नजर के सामने अब
निराला खंडहर है, हवेली देखता हूँ !
हथेली ————————!!

घुटन स्वीकार है क्या
हवा बीमार है क्या
सुगन्धित वाटिका से
किसी को प्यार है क्या
नवेले आचरण से
निराले व्याकरण से
सफेदी भूल बैठी, चमेली देखता हूँ !
हथेली ————————-!!

सफेद बालों पर

सफेद बालों पर
उदास गालों पर
चमक दमक जागी।
दिशा अंधेरे की
लगन सवेरे की
सफर खुलेपन का
बयार घेरे थी
महानता कैसी
उठापटक जागी।
सफ़ेद ———-॥

विचार की बातें
बहार की बातें
गली -गली चर्चा
सुधार की बातें
जिधर किरन फूटी
नई सनक जागी ।
सफ़ेद ———–॥

अजीब ठहरे दिन
अवाक् बहरे दिन
जनक दुलारी के
गए सुनहरे दिन
नयन -नयन सपने
पलक पलक जागी ।
सफ़ेद ————॥

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