सलाम मछलीशहरी की रचनाएँ

रद्द-ए-अमल

इक हक़ीक़त इक तख़य्युल
नक़रई सी एक कश्ती
दो मुनव्व क़ुमकमे

इन पे मग़रूर थी
इस ज़मीं की हूर थी

किस क़दर मसरूर थी
टूट जा आईने
अब तेरी ज़रूरत ही नहीं
नुक़रई कश्ती है अब बच्चों की इक काग़ज़ की नाव

वो मुनव्वर क़ुमक़ुमे भी हो गए हैं आज फ़्यूज़
और सरापा बज़्म हूँ मैं

कोई ख़ल्वत ही नहीं
टूट जा आईने

अब तेरी ज़रूरत ही नहीं

आग

अब क़लम में
एक रंगीं इत्र भर लो
तुम हसीं फूलों के शाइर हो कोई ज़ालिम न कह दे
शोला-ए-एहसास के काग़ज़ पे कुछ लिखने चला था
और काग़ज़ पहले ही इक राख सा था
बात वाज़ेह ही नहीं है

शाइर-ए-गुल
दाएरे सब मस्लहत-बीनी के अब मौहूम से हैं
बात खुल कर कह न पाए तुम
तो बस ज़िरो रहोगे

अब क़लम में आग भर लो
आग तुम को राख कर देने से पहले सोच लेगी
ज़िंदा रहने दा इसे
शायद ये मेरी लाज रख ले
लोग अब तक आगे के मअ’नी ग़लत समझे हुए हैं
आग आँसू आग शबनम
आग आदम के रबाब-ए-अव्वलीं की गीत

कशमकश

ज़िंदगी आज भी इक मसअला है
न तख़य्युल
न हक़ीक़त
न फ़रेब-ए-रंगीं
गीत क़ुर्बान किए
शोला-ए-दिल नज्र
नग़्मा-ए-ख़्वाब दिए
फिर भी ये मसअला
गीत मौसम का
हसीं जिस्म का
ख़्वाबों का जिसे
मैं ने और मेरे हम-अस्रों ने गाया था उसे
ज़िंदगी सुनती नहीं
सुन के भी हँस देती है
आग
जज़्बात की आग
दिल-नशीं
शबनमीं
मासूम ख़यालात की आग
अपने क़स्बे की किसी दर्द भरी रात की आग
ज़िंदगी आज भी हर आग पे हँस देती है
कौन जाने कि मिरी तरह हो मर्ग़ूब इसे
दर्द-ए-दिल नश्शा-ए-मय
ज़िंदगी आज भी इक मसअला है
और इसे हल होना है
मैं अगर नज़अ में हूँ
हल तो इसे होना है
दिल ये कहता है कि ले जाए जहाँ रात चलो
और साइंस ये कहती है मिरे साथ लो

तसलसुल

ठहर जाओ इन्हीं गाती हुई पुर-नूर राहों में
और इक लम्हे को ये सोचो
हरे शीतल मनोहर कितने जंगल आज वीराँ है
वो कैसी लहलहाती खेतियाँ थीं अब जो पिन्हाँ हैं
वो मंज़र कितने दिलकश थे जो अब याद-ए-गुरेज़ाँ हैं

बस इक लम्हे को ये सोचो
न जाने कितनी नाशों को कुचल कर आज लाए हो
नई तहज़ीब की इन जन्नतों में
जल्वा-गाहों में

सुनो इंसाँ हूँ
और रोज़-ए-अज़ल ही से
मिरी तख़्लीक़ और तामीर के जल्वे फ़रोज़ाँ हैं
मैं जब मरता हूँ
तब इक ज़िंदगी आबाद होती है

धरती अमर है

ज़रा आहिस्ता बोल
आहिस्ता
धरती सहम जाएगी
ये धरती फूल और कलियों की सुंदर सज है नादाँ
गरज कर बोलने वालों से कलियाँ रूठ जाती हैं

ज़रा आहिस्ता चल
आहिस्ता
धरती माँ का हृदय है
इस हृदय में तेरे वास्ते भी प्यार है नादाँ
बुरा होता है जब धरती किसी से तंग आती है

तिरी आवाज़
जैसे बढ़ रहे हों जंग के शोले
तिरी चाल
आज ही गोया उठेंगे हश्र के फ़ित्ने

मगर नादान ये फूलों की धरती ग़ैर-फ़ानी है
कई जंगें हुईं लेकिन ज़मीं अब तक सुहानी है

मज़दूर लड़की

वो इक मज़दूर लड़की है
बहुत आसान है मेरे लिए उस को मना लेना

ज़रा आरास्ता हो लूँ
मिरा आईना कहता है
किसी सब से बड़े बुत-साज़ का शहकार हूँ गोया
मैं शहरों के तबस्सुम-पाश नज़्ज़ारों को पाला हूँ
मैं पर्वार्दा हूँ बारों क़हवा-ख़ानों की फ़ज़ाओं का
मैं जब शहरों की रंगीं तितलियों को छेड़ लेता हूँ
मैं आरास्ता ख़ल्वत-कदों की मेज़ पर जा कर
शराबों से भी ख़ुश-रंग फूलों को अपना ही लेता हूँ

तो फिर इक गाँव की पाली हुई मासूम सी लड़की
मिरे बस में न आएगी
भला ये कैसे मुमकिन है
और
फिर ऐसे में जब मैं चाहता हूँ प्यार करता हूँ
ज़रा बैठो
मैं दरिया के किनारे
धान के खेतों में हो आऊँ
यही मौसम है
जब धरती से हम रोटी उगाते हैं
तुम्हें तकलीफ़ तो होगी
हमारे झोंपड़ों में चारपाई भी नहीं होती
नहीं मैं रूक गई
तो धान तक पानी न आएगा
हमारे गाँव में
बरसात ही तो एक मौसम है
कि जब हम
साल भर के वास्तु कुछ काम करते हैं

इधर बैठो
पराई लड़कियों को इस तरह देखा नहीं करते
ये लिपिस्टिक
ये पाउडर
और ये स्कार्फ़
क्या होगा
मुझे खेतों में मज़दूरी से फ़ुर्सत ही नहीं मिलती
मिरे होंटों पे घंटों बूँद पानी की नहीं पड़ती
मिरे चेहरे मिरे बाज़ू पे लूू और धूप रहती है
गले में सिर्फ़ पीतल का ये चंदन हार काफ़ी है
हवा में दिलकशी है
और फ़ज़ा सोना लुटाती है
मुझे उन से अक़ीदत है
यही मेरी मता मेरी नेमत है

बहुत मम्नून हूँ लेकिन
हुज़ूर आप अपने तोहफ़े
शहर की परियों में ले जाएँ

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