सलीम फ़िगार की रचनाएँ

कहीं आँखें कहीं बाज़ू कहीं से सर निकल आए 

कहीं आँखें कहीं बाज़ू कहीं से सर निकल आए
अंधेरा फैलते ही हर तरफ़ से डर निकल आए

हुए हैं खोखले हम लोग हिजरत में सो डरते हैं
ख़ला ये रूह का ऐसा न हो बाहर निकल आए

ये लगता है कि पत्तों पे रखी थीं मुंतज़िर आँखें
मिरे आते ही कितने फूल शाख़ों पर निकल आए

न जाने खोल दे कब कोई लम्हा याद की गठरी
किसी कोने से माज़ी का हसीं मंज़र निकल आए

मिरे होंटों पे बिखरा ये तबस्सुम ढाल है मेरी
कि जाने कब उदासी का कहीं ख़ंजर निकल आए

गिरे हैं जितने आँसू दामन-ए-सहरा में सदियों से
सुलगती रेत भी अंदर से शायद तर निकल आए

दीद के बदले सदा दीदा-ए-तर रक्खा है

दीद के बदले सदा दीदा-ए-तर रक्खा है
हम को क्यूँ राँदा-ए-दरगाह-ए-नज़र रक्खा है

शब की दहलीज़ से उस सम्त हैं रहों कैसी
पर्दा-ए-ख़्वाब में ये कैसा सफ़र रक्खा है

साया-ए-वस्ल-ए-मोहब्बत की वो ख़ल्वत न सही
ये भी काफ़ी है ख़यालो में गुज़र रक्खा है

कितने औसाफ़ मुझे अपने अता उस ने किए
ज़ौक़-ए-तख़्लीक़ दिया मुझ में हुनर रक्खा है

शाख़-दर-शाख़ तिरी याद की हरियाली है
हम ने शादाब बहुत दिल का शजर रक्खा है

हर घड़ी मुझ पे नए और जहाँ खुलते हैं
सो भी जाऊँ तो खुला ज़ेहन का दर रक्खा है

उस को क़ुदरत है जिसे जैसा भी तख़्लीक़ करे
शुक्र है उस का मुझे उस ने बशर रक्खा है

हर क़दम आगही की सम्त गया 

हर क़दम आगही की सम्त गया
मैं सदा रौशनी की सम्त गया

लफ़्ज़ ले कर ख़्याल की वुसअत
शेर की ताज़गी की सम्त गया

मैं जो उतरा लहद के ज़ीने से
इक नई ज़िंदगी की सम्त गया

तिश्नगी को मैं अपने साथ लिए
दश्त-ए-आवारगी की सम्त गया

कच्चे रंगों की इस नुमाइश से
मैं उठा सादगी की सम्त गया

नुत्क़ फिर ताज़गी की ख़्वाहिश में
गोश-ए-ख़ामोशी की सम्त गया

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