सवाईसिंह शेखावत की रचनाएँ

पुनर्वास

पुनर्वास एक जायज कार्रवाई है
बशर्ते वह दूसरों की जमीन न हड़पती हो
घर बसाने की कला हमें दूब से सीखनी चाहिए
स्थानिकता की जड़ों में ठहरी
समय के निर्मम थपेड़ों को सहती
वह इंतजार करती है रात को झरती ओस का
हितैषी हवाओं और अनुकूल मौसम का
जब वह दीवार की संध में फिर से अंकुरित होगी
और ढाँप लेगी खंडहर महल के कंगूरों को ।​​

यह कोई वीरगाथा नहीं

​​जानता हूँ यह कोई वीरगाथा नहीं है
कितने लोग जो बदल नहीं पाए दुनिया को
और न जीत पाए घटनाओं भरी तवारीख में
भूख-प्यास और चुप्पी भरी जिल्लतों के बीच
मामूली जिन्दगी जीते हुए लड़े हारे और बच रहे

चमकते शानदार हैं यह शहादत ये शौर्य-पदक
लेकिन कुछ लोग रोज गुमनाम शहीद होते हैं
न शोक न विलाप न गुणगान न कोई वीरगाथा
धैर्यपूर्वक जीवन के जरूरी काम करते हुए वे जीते-मरते हैं
ऐश्वर्य से छिन्न-भिन्न दुनिया के जख्मों को भरते हैं।

काश 

एक जोड़ी जूते
कोने की दीवार से सटा कर रखे हुए
अगल-बगल गर​​दन झुकाए बैठी ख़ामोशी
खिड़की से झाँकता बुझा नीला आकाश
धूप से भरा किन्तु कुछ वीरान-सा दिन
घर के अहाते में पसरी परित्यक्त उपस्थिति
गलियारे तक चली आई मुखर अनुपस्थिति
काश, दृश्य में एक आदमी भी होता
इस होेने को दूर तक ले जाता हुआ!

स्नेह भरे गर्वीले

सीधे स्थिर खड़े घर को देखता हूँ
और अपने पुरखों को याद करता हूँ
पाँव तले की ज़मीन सिर पर का आसमान
आँगन का साझा सहकार याद करता हूँ
याद करता हूँ वह ज़बान जो माँ से सीखी
साँवली काली पड़ती माँ की त्वचा याद करता हूँ
विपदा की खरोचों के बीच बची यक़ीन की ज़मीन
खारी जुबान में छिपी मिठास याद करता हूँ
ठसाठस जिंदगी से भरा वह भरपूर अपनापन
एक तालाबंद गुमशुदगी का निज़ाम याद करता हूँ
घर के कोने अंतरों में बसी समूची स्निग्ध नमी
गाँव गली का विरल एतबार याद करता हूँ

दुनिया के तमाम-तमाम बेघर लोगों को
पनाह देने का ख़्वाहिशमंद नहीं मैं
बस इतना चाहता हूँ वे मेरे पड़ौसी हों
स्नेह भरे गर्वीले।

थोड़े पिता थोड़ी-थोड़ी माँ 

मैं जब भी कराहता हूँ मुझे माँ की याद आती है
मेरी यादों में पैबस्त है पिता का रुआबदार चेहरा
खुशी के पलों में मैं अक्सर माँ को बिसराए रहा
दुनिया को बरतते हुए पिता जब-तब याद आए
वैसे हर पिता में छिपी होती है थोड़ी-थोड़ी माँ भी
जो प्रकट होती है केवल जीवन के आर्द्र क्षणों में
ठीक वैसे ही माँ भी​​ भीतर से मजबूत पिता होती है
लेकिन माँ में पिता का आधिपत्य होते ही
माँ अक्सर सिकन्दर हो जाती है फिर वह
घर-परिवार को सल्तनत की तरह चलाती है
जबकि पिता में माँ का होना उन्हें मानवीय बनाता है
ऐसे में ऊपर वाले से बस इतनी-सी दुआ है
बचे रहें माँ में थोड़े पिता, पिता में बची रहे थोड़ी-थोड़ी माँ।

अड़सठ का होने पर

अड़सठ वर्ष का होने पर सोचता हूँ
अब तक ग़ैर की ज़मीन पर ही जिया
एक आधी-अधूरी और उधारी जिंदगी
समय को कोसते हुए कविताएँ लिखीं
ग़म की और छूँछी खुशी की भी
अक्सर डींग भरी और दैन्य भरी
भुला बैठा कि एक दिन मरना भी है
​​
लेकिन कल से फ़र्क दिखेगा साफ़
अपनी रोज़मर्रा जिंदगी जीते हुए अब
हर पल बेहतर होने की कोशिश करूँगा
धीरजपूर्वक जानूँगा घनी चाहत का राज
वृक्षों से सीखूँगा उम्र में बढ़ने की कला
ताकि हो सके दुनियाँ फिर से हरी-भरी
अपराजेय आत्मा के लिए दुआ करूँगा
अपनी धरा, व्योम और दिक् में मरूँगा।

(ताद्यूश रूजे़विच की कविता से अनुप्रेरित)

मैं ईश्वर से डरता हूँ

दुनियादार लोग क्षमा करें मैं हिसाब-किताब नहीं जानता
मैं बस अपना काम करता हूँ जैसा वह मुझ से बन पड़े
अनगिनत हैं फिक्रमन्द मुझे उनसे ईष्र्या होती है
मुझ में वैसी सामर्थ्य नहीं,
उन्हें देख मैं शर्मिन्दा होता हूँ
अच्छे-बुरे को लेकर भी ज्यादा माथापच्ची नहीं करता
कोशिश करता हूँ जिस्म तंदुरस्त रहे खोपड़ी दुरस्त
मैं प्यार करता हूँ पत्नी ​​से जो सुन्दर है और साहसी भी
अपनी जरूरतों में कम-कम और संघर्ष में अदम्य
विजय के इरादे से मैं बाघ-सा आगे बढ़ता हूँ
लेकिन हिरन की सी शाकाहारी मासूमियत के साथ
आदमी हूँ आदमी से प्यार करता हूँ हर हाल
ईश्वर होने से बचता हूँ मैं ईश्वर से डरता हूँ।

जीवन की सच्चाई

यह मेरा पूर्वाग्रह नहीं है
मेरी आत्मा का खालिस सच है
मैं नहीं रह सकता वहाँ एक पल भी
जहाँ प्रेम का शिष्टाचार निभाया जाता है
निरी औपचारिक​​ता के नाम पर
झूठ-मूठ का नम्र व्यवहार किया जाता है
प्यार के सुचिक्कन अभिजात्य की बजाए
मैं जिन्दा हूँ जीवन की ठोस घृणा में
दोस्तो मुझे सख्त घिन है
कमबख्त सफेदपोश दौगलेपन से
लम्बी नाक वाले छलिया अभिनेताओं से

बोल, ऐ जीवन की सच्चाई बोल!

सच्ची कविता

सच्ची कविता जय-पराजय का हिसाब नहीं रखती
वह न त्याग से लथपथ है न किसी भोग से
बेवजह चीजों से घिन करना भी उसका स्वभाव नहीं
वह किसी करिश्में की तलबगीर नहीं है
उसका कद सामान्य है और वजन भी सामान्य
उसे चीजों का वैसा ही होना पसंद है जैसी वे हैं
अपनी सीमाओं और विविधताओं में मौलिक
जहाँ अनेकता की एकता का सच्चा बसाव है
कोई वायदा, कोई आश्वासन नहीं है वहाँ
पर एक उम्मीद है जीवितों की भाषा में
पीढ़ियों से जिसकी रखवाली की है मनुष्यता ने
वह जानती है स्वतंत्र होने का मतलब
जिम्मेदार होना है हर शै के प्रति
वह हार सकती है स्वयं के विरुद्ध
पर दूसरे की जमीन नहीं हड़पेगी।

जीवन का जुड़वाँ

नहीं, केवल आग बनने की प्रक्रिया भर नहीं है जीवन
शुष्क तथ्यों के भार से लदा निरा ठोस विप्लव
हम स्वागत करते हैं आते हुये सूर्य का दस्तक देती भोर का
लेकिन जीवन की खिड़की में बेहद ज़रुरी है चाँद का अक्स भी
वह मीठी ठंडक जो रचती है लहू में कुछ चमकता हुआ-सा
जिसमें शामिल चाँद का होना,उसका धीरज,उसकी तिरछी मुस्कान
वह कोई भी जो दोनों में किसी एक के होने की तरफ़दारी करता है
वह जन्मजात हत्यारा है उसे माफ़ नहीं किया जाना चाहिए
मैं जो जीवन का जुड़वाँ हूँ दर्प आकाश का फल लदे पेड़ की विनय
जीवन की शर्त पर मैंने ही समझौता किया था, वह मेरा साहस था
हद से बेहद में जाने और जी​​वन को अनवरत रचते चले जाने का
जी उसीने सिरजी यह समूची सचराचर कौतुकमयी सृष्टि
धरती, सूरज, आकाश और पानी ने मिल कर रची यह जीवन-निधि
रगों में दौड़ता सुर्ख लहू तुम्हें देगा जीवन- तन्तुओं के स्पर्श का पता
उस रिश्ते का पता जो जीवन कोशिकाओं में सुरक्षित है प्रार्थना की तरह
पंखुड़ियों पर हस्ताक्षर करता सूर्य झुक रहा है पराग के भार से
ओ तुनक मिजाज दोस्तों , हमें कुछ तो सीखा चाहिए भीगी धरा से
आँधी के थपेड़े झेलते दरख्तों और मझ दोपहर मुस्कराते गुलमुहर से
तलाश है मुझे सहस्राब्दियों की यात्रा कर पृथ्वी पर पहुँचे उस प्रकाश की
जो नियति की पहेली सुलझा जुदा करता है अंधकार और प्रकाश को।

शब्द के अवमूल्यन पर

कितना निष्करुण समय है
ज़रूरतन नहीं महज शौक़ के लिए
हम शामिल होते हैं शब्दों के पतन में
बिना किसी खेद के

भाषा की दुनिया में जगह बनाने के लिए
सोपान से शिखर तक जाने के लिए
विकट साधना करनी पड़ती है शब्द को
बहुत कठिन और जोखिम भरी है यह यात्रा
एक-एक क़दम तौल कर रखना पड़ता है
कितने खंदक मुंह बाए खड़े हैं राह में

“भाषा का नेक नागरिक होने के लिए
हम किसी शब्द की रीढ़ न बन पाएं
कोई हर्ज़ नहीं
लेकिन एक अच्छे खासे शब्द को
गर्त में धकेलने का हक़ हमें नहीं है

शब्दों की दुनिया में
कल फिर एक हादसा हुआ
जब चैनल वालों ने एक गुंडे को
बाहुबली कहकर पुकारा

मुझे सख्त एतराज़ है
शब्द के अवमूल्यन पर

हमारे सुनने का ऐब

हमारे सुनने का बुनियादी ऐब है
हम अक्सर ऊँचा सुनते हैं
नर्म मुलायम आवाज़ों को तवज्जो नहीं देते
जीवन की कोमल तानों को अनसुना करते हैं
जब कि मानुष होने के लिए
उनका सुना जाना ज़्यादा ज़रुरी है

सुनने की कोशिश में
हम नहीं सुनते मनुष्य की रुलाई
हम शब्दों की गूंज सुनते हैं या आक्रामक हँसी
भूतपूर्व सुनते है या फिर महान भविष्य में
हमारा सुनना समकाल में नहीं होता
(बावजूद तमाम उद्घोषणाओं के)

याद रखने की जुगत में हम भुलाने को सुनते हैं
ठोस सुनते हैं मगर आड़ा-तिरछा
सूधा नहीं सुनते सयानप और बाँकपने से रहित
चुप से बचकर सुनते हैं और एक चीख़
हमें खींच लेती है गुरुत्वाकर्षण की तरह

हमारे सुनने में देश है और दुनिया भी
लेकिन अपने ही मुहल्ले की आवाज़ नहीं है
हम हड़बड़ी में सुनते है या फिर सतर्क होकर
सहज मिली खुशी की तरह नहीं सुनते

हमारे सुनने में शामिल हैं कुछ चुस्त जुमले
सीधी सरल बातें हमें बोदी लगती हैं और दयनीय भी
एक कामयाब चालू आदमी को हम आदरपूर्वक सुनते हैं
एक असफल आदमी को सुनते हैं उपहास की तरह

सुनने के विमर्श को लेकर
हम कितना ही गंभीर होने का नाट्य करें
अपने तमाम संजीदापन के बावजूद
हम सुनते हैं मतलब की यारी की
जबरे की सुनते हैं या जरदारी की।
​​​​

पुराने जूते

पुराने जूते सुखद और उदार हैं
किसी पुराने आत्मीय की तरह
अपना विन्यास और अकड़ भूल कर
वे पाँवों के अनुरूप ढल जाते हैं
इतने अपने इतने अनुकूल

गंदले होकर ही कमाई जा सकती है
जीवन की मशक्कत भरी तमीज़
यह केवल जूते जानते हैं
नये जूते बेशक च​​मचमाते शानदार हैं
लेकिन जीवन की आवश्यक विनम्रता
उन्हे पुराने जूतों से सीखनी पड़ती है

कहते हैं ‘गेटे’ को पुराने जूते छोड़ते हुए
बहुत तकलीफ़ होती थी
प्रिय पुरखे को दफ़नाने की तरह

एक कवि को पुराने जूतों की तरह
आत्मीय और उदार होना चाहिए
केवल तभी उसकी कविता बचा सकती है
जीवन को कंटीले धूल-धक्कड़ से
झुलसती धूप से ठिठुरते शीत से।

कुपाठ

जीवन का यह कौन-सा पाठ है
जब जीवन की बुनियादी जरूरतों को बिसरा कर
हम जीने लगे हैं सनक भरी किस्सागोई को

मसलन मुल्क के नाम पर अब हमें याद नहीं आते
उसके बाशिंदे उनकी ज़िंदा ज़रूरते
उनके सुख-दुःख ​​ उनके गीत-गान
अन्याय के खिलाफ़ उठी उनकी आवाज़
उनके असली सच और नकली झूठ
आसुओं से लबालब आँखे ख़ुशी से खिले चेहरे…

हमें याद है फ़कत उनकी जात-बिरादरी
उनकी नस्ल ,रंग, उनका हिंदू मुसलमान होना
खूँ में डूबी उनकी हिकारत और बदचलनी
या फिर भाषा में उनका खामखा ब्राह्मण होना

कुछ लोग इस कुपाठ को प्रयत्नपूर्वक ज़िन्दा रखते हैं
फिर भी पूजे जाते है पीरो-पैगम्बर की तरह!

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