सहजोबाई की रचनाएँ

सखी री आज जनमे लीला-धारी

सखी री आज जनमे लीला-धारी।
तिमिर भजैगो भक्ति खिड़ैगी, पारायन नर नारी॥
दरसन करतै आनँद उपजै, नाम लिये अघ नासै।
चरचा में सन्देह न रहसी, खुलि है प्रबल प्रगासै॥
बहुतक जीव ठिकानो पैहैं, आवागवन न होई.
जम के दण्ड दहन पावक की, तिन कूं मूल निकोई॥
होई है जोगी प्रेमी ज्ञानी, ब्रह्मरूप ह्वै जाई.
चरन दास परमारथ कारन, गावै सहजो बाई॥

सखी री आज जनम लियौ सुख दाई

सखी री आज जनम लियौ सुख दाई.
दूसर कुल में प्रगट हुए हैं, बाजत अनँद बधाई॥
भादों तीज सुदी दिन मंगल, सात घड़ी दिन आये।
सम्बत् सत्रह साठ हुते तब, सुभ समयो सब पाये॥
जैजैकार भयौ सधि गाऊँ, मात पिता मुख देखौ।
जानत नाहिंन कौन पुरुष हैं, आये हैं नर भेखौ॥
संग चलावन अगम पन्थ कूं, सूरज भक्ति-उदय को।
आप गुपाल साधनन धारयौ, निहचै मो मन ऐसो॥
गुरु सुकदेव नाँव धरि दीन्हौ, चरनदास उपकारी।
सहजोबाई तन मन बारै, नमो-नमो बलिहारी॥

‘सहजो’ भजि हरि नाम कूं, तजो जगत सूं नेह

सहजोबाई का कविता काल लगभग सं। 1800 मानना चाहिये। ये दूसर कुल की रत्न-स्वरूपा थीं। इनमें संसार की अनित्यता के प्रति विराग-भाव या, इसका परिचय इन पंक्तियों से मिलता है:-

‘सहजो’ भजि हरि नाम कूं, तजो जागत सूं नेह।
अपना तो कोइ है नहीं, अपनी सगी न देह॥
जैसे संडली लोह की, छिन पानी छिन आग।
ऐसे दुख सुख जगत के ‘सहजो’ तू मन पाग॥
अचरज जीवन जगत में, मरिबों साँचो जान।
‘सहजो’ अवसर जात है, हरि सूंना पहिचान॥
झूठा नाता जगत का, झूठा है घर बास
यह तन झूठा देख कर, ‘सहजो’ भई उदास॥
कोई किसी के संग ना, रोग मरन दुख बंध।
इतने पर अपनौ कहैं, सत जो ये नर अंध॥
मर बिछुड़न यो होइगो, ज्यों तरुवा सूं पात।
सहजो काया प्रान यों, सुख सेती ज्यों बात॥
निर्गुण भगवान का गुणगान सहजो ने इस प्रकार किया है:-
नाम नहीं औ नाम सब, रूप नहीं सब रूप।
सहजो सब कछु ब्रह्म है, हरि परगट हरी रूप॥
भक्त हेत हरि आइया, पिरथी भार उतारि।
साधन की रच्छा करी, पापी डारे मारि॥
ताके रूप अनन्त हैं, जाके नाम अनेक।
ताके कौतुक बहुत हैं, ‘सहजो’ नाना भेष॥
है अखंड व्यापक सक्ल, सहज रहा भर पूर।
ज्ञानी पावै निकट हीं, मूरख जानै दूर॥
नया पुराना होय ना, घुन नहिं लागे जासु।
‘सहजो’ मारा न मरै, भय नहिं ब्यापै तासु॥
किरै घटै छीजै नहीं, ताहि न भिजवै नीर।
ना काहू के आसरे, ना काहु के सीर॥
रूप बरन वाके नहीं, ‘सहजो’ रंग न देह।
मीत इष्ट वाके नहीं, जाति पांति नहिं गेह॥
सहजो उपजै ना मरै, सद बासी नहिं होय।
रात दिवस तामें नहीं, सीत उस्न नहि सोय॥
आग जलाय सकै नहीं, सस्तर सकै न काटि।
धूप सुखाय सकै नहीं, पवन सकै नहिं आटि॥
मात पिता वाके नहीं, नहिं कुटुंब को साज।
‘सहजो’ वाहि न रंकता, ना काहू को राज॥
आदि अन्त ताके नहीं, मध्य नहीं तेहि माहिं।
वार पार नहिं ‘सहजिया’ लघू दीर्घ भी नाहिं॥
परलय में आवै नहीं, उत पति होय न फेर।
ब्रह्म अनादि ‘सहजिया’ घने हिराने हेर॥
जाके किरिया करम ना, पट दर्सन को भेस।
गुन औगुन ना ‘सहजिया’ , ऐसे पुरुष अलेस॥
रूप नाम गुन सूं रहित पाँच तत्त सूं हजूर॥
आपा खाये पाइये और जतन नहिं कोय।
नीर छीर निताय के ‘सहजो’ सुरति समोय॥

तेरी गति कितहुँ न जानी हो 

तेरी गति कितहुँ न जानी हो।
ब्रह्म सेस महेसुर थाके, चारो बानी हो॥
बाद करंते सब मत थाके, बुद्धि थकानी हो।
विद्या पढ़ि-पढ़ि पंडित थाके, अरु ब्रह्मज्ञानी हो॥
सबके परे जुअन मम हारी, थाह न आनी हो।
छान बीन करि बहुतक थाकी, भई खिसानी हो॥
सुर नर मुनिजन गनपति थाके, बड़े विनानी हो।
चरन दास थकी ‘सहजोबाइ’ भई सिरानी हो॥

मेरे इक सिर गोपाल और नहीं कांउ भाई

सहजो ने निर्गुण और सगुण का समंजस्य भी उपस्थित किया है। उनकी दृष्टि में श्रीकृष्ण का रूप ऐसा ही है। वे कहती हैंः-

(1)

मेरे इक सिर गोपाल और नहीं कांउ भाई.
आइ बैस हिये मांहिं और दूजा ध्यान नाहिं,
मेरे तो सर्बस उन और हिताई बोई॥
जाति हू की कान तजा, लोक हू की लाज भजी,
दोनों कुल माहिं बनी, कहा करै सोई॥
उघरी है प्रीति मेरा, निहचै हुई वाकी चेरा,
पहिरि हिये प्रेम बेरा, टूटै नहिं जोई॥
मैं जो चरनदास भइ, गति सति सब खोइ दई,
‘सहजो’ बाई नहीं रही, उठि गई दोई.

धन्य जसोदा नन्द धन, धन बज मंडल देस

धन्य जसोदा नन्द धन, धन बज मंडल देस।
आदि निरंजन ‘सहजिया’ भयो ग्वाल के भेष॥
निर्गुन सर्गुन एक प्रभु देख्यो समझ विचार।
सतगुरु ने आँखी दइ, निहचै कियो निहार॥

गुरु बिन मारग ना चलै, गुरु बिन लहै न ज्ञान 

सहजो का मत है कि ईश्वर को निर्गुण रूप मंे मानो या सगुण रूप में, पर किसी सच्चे गुरु की सहायता के बिना ज्ञान की प्राप्ति नहीं हो सकती।

गुरु बिन मारग ना चलै, गुरु बिन लहै न ज्ञान।
गुरु बिन सहजो धुन्ध है, गुरु बिन पूरी हान॥
हरि किरपा जो होय तो, नाहीं होय तो नाहिं।
पै गुरु किरपा दया बिनु, सकल बुद्धि नहिं जाहिं॥

राम तजूँ पै गुरु न बिसारूँ

राम तजूँ पै गुरु न बिसारूँ। गुरु के सम हरि कूँ न निहारूँ॥
हरि न जन्म दियो जगमगाहीं। गुरु ने आवागमन छुटाहीं॥
हरि ने पांच चोर दिये साथा। गुरु ने लइ लुटाय अनाथा॥
हरि ने कुटुँब जाल में गेरी। गुरु ने काटी ममता बेरी॥
हरि ने रोग भोग उरझायो। गुरु जोगी कर सबै छुटायो।
हरि ने कर्म मर्म भरमायो। गुरु ने आतम रूप लखायो॥
फिर हरि बंध मुक्ति गति लाये। गुरु ने सब ही मर्म मिटाये॥
चरन दास पर तन मन वारूँ। गुरु न तजूँ हरि को तजि डारूँ॥

गुरु की अस्तुति कहाँ लौं कीजै 

गुरु की अस्तुति कहाँ लौं कीजै। बदला कहा गुरु कूँ दीजै॥
गुरु का बदला दिया न जाई. मन में उपजत है सकुचाइ॥
इन नैनन जिन राम दिखाये। बंधन कोटि-कोटि मुक्ताये॥
अभय दान दीनन कूँ दीन्हे। देखत आप सरीखे कान्हे॥
गुरु की किरपा अपरम्पारै। गुन गावत मन रसना हारै॥
सेस सहस मुख निसिदिन गावै। गुरु अस्तुति का अन्त न पावै॥

प्रेम दिवाने जो भये पलटि गयो सब रूप 

जिस किसी को ईश्वर की लगन लग जाती है, उससे सच्चा अनुराग हो जाता है, उसकी दशा ही और की और हो जाती है। सहजो का कहना है:-

प्रेम दिवाने जो भये पलटि गयो सब रूप।
‘सहजो’ दृष्टि न आवई, कहा रंक कहा भूप॥
प्रेम दिवाने जो भये, नेम धरम गयो खोय।
‘सहजो’ नर नारी हंसैं, वा मन आनँद होय॥
प्रेम दिवाने जो भये, ‘सहजो’ डिगमिग देह।
पाँव पड़ै कितकै किती, हरि संभाल जब लेह॥
प्रेम लटक दुर्लभ महा, पावै गुरु के ध्यान।
अजपा सुमिरन करत हूँ, उपजै केवल ज्ञान॥

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