सिदरा सहर इमरान की रचनाएँ

आसमाँ एक किनारे से उठा सकती हूँ

आसमाँ एक किनारे से उठा सकती हूँ
यानी तक़दीर सितारे से उठा सकती हूँ

अपने पाँव पे खड़ी हूँ तुझे क्या लगता था
ख़ुद को बस तेरे सहारे से उठा सकती हूँ

आँखें मुश्ताक़ हज़ारों हैं मगर सोच के रख
तेरी तस्वीर नज़ारे से उठा सकती हूँ

राख हो जाए मोहब्बत की हवेल पल में
इक तबाही में शरारे से उठा सकती हूँ

मैं अगर चाहूँ तो जीने की इजाज़त देकर
ज़िंदगी तुझ को ख़सारे से उठा सकती हूँ

इस्म पढ़ने का इरादा हो तो फ़ुर्सत में ‘सहर’
मैं तुझे दिल के शुमारे से उठा सकती हूँ

अपनी आँखों को अक़ीदत से लगा के रख ली

अपनी आँखों को अक़ीदत से लगा के रख ली
तेरी दहलीज़ की मिट्टी थी उठा के रख ली

तुझ को तकते ही रहे रात बहुत देर तलक
चाँद के ताक़ में तस्वीर सजा के रख ली

दिल सी नौ-ख़ेज कली तेरी मोहब्बत के लिए
सींच के जज़्बों से पहलू में खिला के रख ली

इस ए साल के स्वागत के लिए पहले से
हम ने पोशाक उदासी की सिला के रख ली

दम उलझता था शब-ए-तीरा का तारीकी से
इस लिए चाँद की क़िंदील जला के रख ली

असबाब-ए-हस्त रह में लुटाना पड़ा मुझे

असबाब-ए-हस्त रह में लुटाना पड़ा मुझे
फिर ख़ाली हाथ दहर से जाना पड़ा मुझे

सब लोग तेरे शहर में माज़ी-परस्त थे
मुश्किल से हाल में उन्हें लाना पड़ा मुझे

पहले बनाए आँख में ख़्वाबों के मक़बरे
फिर हसरतों को दिल में दबाना पड़ा मुझे

मुझ को तो ख़ैर ख़ाना-बदोशी ही रास थी
तेरे लिए मकान बनाना पड़ा मुझे

कुछ और जब रहा न ज़रिया मआश का
काँधों पे बार-ए-इश्क़ उठाना पड़ा मुझे

दुनिया ये घूमती रहे परकार की तरह
इक दाएरा ज़मीं पे बनाना पड़ा मुझे

इक दिन ये जी में आई वो आँखें ही फोड़ दूँ
जिन के लिए अज़ाब उठाना पड़ा मुझे

अपने मुआमले में ही शिद्दत-पसंद थी
अपने लिए ही जान से जाना पड़ा मुझे

बे-ख़याली में कहा था कि शनासाई नहीं

बे-ख़याली में कहा था कि शनासाई नहीं
ज़िंदगी रूठ गई लौट के फिर आई नहीं

जो समझना ही न चाहे उसे समझाई नहीं
जो भी इक बार कही बात वो दोहराई नहीं

हुस्न सादा है तिरा मैं भी बहुत आम सी हूँ
मेरी आँखों में किसी नील की गहराई नहीं

मेरा हिस्सा मुझे ख़ामोशी से दे देता है
दर्द के आगे हथेली कभी फैलाई नहीं

अपने अफ़्कार लिए पहलू-नशीं हो के रहा
दिल से दरवेश ने दुनिया तिरी अपनाई नहीं

शब के तारीक लबों पर है कई साल की चुप
ख़ुद से नाराज़ है इतनी कभी मुस्काई नहीं

बास फूलों की चुरा ली है हवाओं ने मगर
जो कली याद की तेरी है वो मुरझाई नहीं

आग ये दोनों तरफ़ क्यूँ न बराबर सी लगे
हाए वो इश्क़ ही क्या जिस में पज़ीराई नहीं

बे-इरादा भी काम तअत्तुल न पड़ा
बा-इरादा थी मुलाक़ात की शब आई नहीं

 ग़मगीन बे-मज़ा बड़ी तन्हा उदास है

ग़मगीन बे-मज़ा बड़ी तन्हा उदास है
तेरे बग़ैर तो मिरी दुनिया उदास है

फैला हुआ है रात की आँखों में सोज़-ए-हिज्र
महताब-रूत में चाँद का चेहरा उदास है

लो फिर से आ गया है जुदाई का मरहला
आँखें हैं नम मिरी तिरा लहजा उदास है

बारिश बहा के ले गई तिनकों का आशियाँ
भीगे शजर की शाख़ पे चिड़िया उदास है

शहज़ादा सो गया है कहानी सुने बग़ैर
बचपन के ताक़ में रखी गुड़िया उदास है

आँखें मुंडेर पर धरे गुज़री शब-ए-विसाल
लिपटा हुआ कलाई से गजरा उदास है

सूरज लिपट के झील के पानी से रो दिया
मंज़र फ़िराक़-ए-शाम का कितना उदास है

किस को हैं रास हिज्र की कठिनाईयां ‘सहर’
जितना क़रीब हो कोई उतना उदास है

सफ़र के बीच वो बोला कि अपने घर जाऊँ

सफ़र के बीच वो बोला कि अपने घर जाऊँ
अँधेरी रात में तन्हा मैं अब किधर जाऊँ

मुझे बिगाड़ दिया है मिरे ही लोगों ने
कोई ख़ुलूस से चाहे तो मैं सँवर जाऊँ

मिरी जुदाई में गुज़री है ज़िंदगी कैसी
ये जी में आई है इस बार पूछ कर जाऊँ

बता तू कुफ्ऱ कर फ़तवा लगाएगा मुझ पर
ख़ुदा मैं मानूँ तुझे और फिर मुकर जाऊँ

तू सब्ज़ झील के पानी में ढूँढता ही रहे
मैं चाँद ओक में भर लूँ कमाल कर जाऊँ

बला का ख़ौफ़ थमाया है आइनों ने मुझे
मैं अक्स अपना जो देखूँ तो जैसे डर जाऊँ

सफ़र की धूप ने चेहरा उजाल रक्खा था

सफ़र की धूप ने चेहरा उजाल रक्खा था
वो मर गया तो सिरहाने विसाल रक्खा था

हसीन चेहरे कशीदा किए थे मिट्टी से
बला का ख़ाक में हुस्न ओ जमाल रक्खा था

वो हाशियों में तिरे सुर्मगीं मोहब्बत थी
कि आइनों में कोई अक्स डाल रक्खा था

फ़लक की साँस उखड़ने लगी तो राज़ खुला
कि आसमाँ को ज़मीं ने संभाल रक्खा था

तिरा उरूज था सूरज के मांद पड़ने तक
मिरे नसीब में शब सा ज़वाल रक्खा था

हिसार-ए-ख़्वाब से बाहर कभी निकल न सकूँ
बिछा के राह में पल्कों का जाल रक्खा था

वो एक शख़्स जो वक़्त-ए-ज़वाल मुझ से मिला
सुनहरी आँखों मं उस की मलाल रक्खा था

किसी को सहरा-नवर्दी से इश्क़ लाहक़ था
किसी को शौक़ पे घर से निकाल रक्खा था

उसी ने ज़हर उंडेला है मेरी नस नस में
जो आस्तीन में इक साँप पाल रक्खा था

वो सर्द धूप रेत समुंदर कहाँ गया

वो सर्द धूप रेत समुंदर कहाँ गया
यादों के क़ाफ़िले से दिसम्बर कहाँ गया

कुटिया में रह रहा था कई साल से जो शख़्स
था इश्क़ नाम जिस का क़लंदर कहाँ गया

तूफ़ान थम गया था ज़रा देर में मगर
अब सोचती हूँ दिल से गुज़र कर कहाँ गया

तेरी गली की मुझ को निशानी थी याद पर
दीवार तो वहीं है तिरा दर कहाँ गया

चाय के तल्ख़ घूँट से उठता हुआ ग़ुबार
वो इंतिज़ार-ए-शाम वो मंज़र कहाँ गया

उस की सियाह रंस से निस्बत अजीब थी
वो ख़ुश-लिबास हिज्र पहन कर कहाँ गया

रक्खा नहीं था लौह-ए-मोहब्बत पे आज फूल
किस बात पर ख़फ़ा था मुजाबिर कहाँ गया

 

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