सीमाब अकबराबादी की रचनाएँ

शेर-1

(1)
कफस1 में खींच ले जाए मुकद्दर या निशेमन2 में,
हमें परवाजे-मतलब3 है, हवा कोई भी चलती हो।

(2)
है हुसूले – आरजू का नाम तर्के -आरजू,
मैंने दुनिया छोड़ दी तो मिल गई दुनिया मुझे।

(3)
मेरे गुनाहों पर करें तब्सिरा4 लेकिन,
सिर्फ मैं ही तो गुनहगार नहीं।

(4)
बहुत मुश्किल है कैदे-जिन्दगी में मुतमइन होना,
चमन भी इक मुसीबत था कफस भी इक मुसीबत है।

(5)
फकत एहसासे-आजादी ही से आजादी इबारत5 है,
वही घर की दीवार है, वही दीवार, जिन्दा6 की।
1. कफस – पिंजड़ा, कारागार 2. निशेमन – घोंसला, नीड़ 3. परवाज – उड़ान 4.तब्सिरा – आलोचना 5.इबारत – कायम 6.ज़िन्दां – कारागार, जेल

शेर-2

(1)
कोई उल्फत1 का दीवाना, कोई मतलब का दीवाना,
यह दुनिया सिर्फ दीवानों का घर मालूम होती है।

(2)
खुदा और नाखुदा2 मिलकर डुबो दें यह तो मुमकिन है,
मेरी वजहे-तबाही सिर्फ तूफां हो नहीं सकता।

(3)
छीन ली फ़िक्र-ए-निशेमन3 ने मेरी आजादियाँ,
जज्बा-ए-परवाज4 महदूदे-5गुलिस्ताँ हो गया।

(4)
जवानी ख्वाब6 की-सी बात है, दुनिया-ए-फानी7 में,
मगर यह बात किसको याद रहती है, जवानी मे।

(5)
तअज्जुब8 क्या लगी गर आग ‘सीमाब’ सीने में,
हजारों दिल में अंगारे भरे थे, लग गई होगी।

(6)
नहीं मिलते तो इक अदना शिकायत है न मिलने की,
मगर मिलकर, न मिलने की शिकायत और होती है।
1.उल्फत – प्यार, मुहब्ब्त 2 नाखुदा – मल्लाह, नाविक, केवट, कर्णधार 3.फ़िक्र-ए -निशेमन – घोंसला या नीड की चिंता 4.परवाज – उड़ान 5.महदूद – सीमित6.ख्वाब – स्वप्न, सपना 7.फानी – नश्वर, नाशवान, मिट जाने वाला, न रहने वाला 8.तअज्जुब – आश्चर्य, विस्मय

नसीम-ए-सुबह गुलशन में गुलों से खेलती होगी

नसीम-ए-सुबह गुलशन में गुलों से खेलती होगी|
किसी की आख़िरी हिचकी किसी की दिल्लगी होगी|
[नसीम=हवा]

तुम्हें दानिस्ता महफ़िल में जो देखा हो तो मुजरिम हूँ,
नज़र आख़िर नज़र है बे-इरादा उठ गई होगी|
[दानिस्ता=जान बूझ कर/क्नोविन्ग्ल्य]

मज़ा आ जायेगा महशर में कुछ सुनने सुनाने का,
ज़ुबाँ होगी हमारी और कहानी आप की होगी|
[महशर=फैसले का दिन]

सर-ए-महफ़िल बता दूँगा सर-ए-महशर दिख दूँगा,
हमारे साथ तुम होगे ये दुनिया देखती होगी|

यही आलम रहा पर्दानशीनों का तो ज़ाहिर है,
ख़ुदाई आप से होगी न हम से बंदगी होगी|
[ज़ाहिर=प्रकट]

त’अज्जुब क्या लगी जो आग ऐ ‘सीमाब’ सीने में,
हज़ारों दिल मे अँगारे भरे थे लग गई होगी|

ये क्या जाने में जाना है

ये क्या जाने में जाना है, जाते हो ख़फ़ा होकर|
मैं तब जानू मेरे दिल से चले जाओ जुदा होकर|

क़यामत तक उड़ेगी दिल से उठकर ख़ाक आँखों तक,
इसी रास्ते गया है हसरतों का काफ़िला होकर|

तुम्हीं अब दर्द-ए-दिल के नाम से घबराये जाते हो,
तुम्हीं तो दिल में शायद आए थे दर्द-ए-आशियाँ होकर|

यूँ ही हमदम घड़ी भर को मिला करते तो बहतर था,
के दोनो वक़्त जैसे रोज़ मिलते हैं जुदा होकर|

शब-ए-ग़म ऐ मेरे अल्लाह बसर भी होगी

 शब-ए-ग़म ऐ मेरे अल्लाह बसर भी होगी|
रात ही रात रहेगी के सहर भी होगी|
[सहर=शाम]

मैं ये सुनता हूँ के वो दुनिया की ख़बर रखते हैं,
जो ये सच है तो उंहें मेरी ख़बर भी होगी|

चैन मिलने से है उन के न जुदा रहने से,
आख़िर ऐ इश्क़ किसी तरह बसर भी होगी|

नामा गया कोई न कोई नामाबर गया

 नामा गया कोई न कोई नामाबर गया|
तेरी ख़बर न आई ज़माना गुज़र गया|
[नामा=पत्र; नामाबर=डाकिया]

हँसता हूँ यूँ कि हिज्र की रातें गुज़र गईं,
रोता हूँ यूँ कि लुत्फ़-ए-दुआ-ए-सहर गया|
[हिज्र=ज़ुदाई; लुत्फ़=मज़ा; दुआ=प्रार्थना;सहर=शाम]]

अब मुझ को है क़रार तो सब को क़रार है,
दिल क्या ठहर गया कि ज़माना गुज़र गया|

या रब नहीं मैं वाक़िफ़-ए-रुदाद-ए-ज़िन्दगी,
इतना ही याद है कि जिया और मर गया|
[वाक़िफ़=जान पहचान; रुदाद=बताना या कहना]

तेरे क़दमों पे सर होगा क़ज़ा सर पे खड़ी हो

 तेरे क़दमों पे सर होगा क़ज़ा सर पे खड़ी होगी|
फिर उस सज्दे का क्या कहना अनोखी बंदगी होगी|

नसीम-ए-सुबह गुलशन में गुलों से खेलती होगी,
किसी की आखरी हिचकी किसी की दिल्लगी होगी|

दिखा दूँगा सर-ए-महफ़िल बता दूँगा सर-ए-महशर,
वो मेरे दिल में होंगे और दुनिया देखती होगी|

मज़ा आ जायेगा महशर में फिर सुनने-सुनाने का,
ज़ुबाँ होगी वहाँ मेरी कहानी आप की होगी|

तुम्हें दानिस्ता महफ़िल में जो देखा हो तो मुजरिम,
नज़र आख़िर नज़र है बे-इरादा उठ गई होगी|

न हो गर आशना नहीं होता

 न हो गर आशना नहीं होता|
बुत किसी का ख़ुदा नहीं होता|

तुम भी उस वक़्त याद आते हो,
जब कोई आसरा नहीं होता|

दिल में कितना सुकून होता है,
जब कोई मुद्दवा नहीं होता|

हो न जब तक शिकार-ए-नाकामी,
आदमी काम का नहीं होता|

ज़िन्दगी थी शबाब तक “सीमाब”,
अब कोई सानेहा नहीं होता|

जन्नत जो मिले ला के मैख़ाने में रख देना

 जन्नत जो मिले लाके मैख़ाने में रख देना|
क़ौसर मेरे छोटे से पैमाने में रख देना|
[क़ौसर= स्वर्ग में नदी]

मय्यत न मेरी जा के वीराने में रख देना,
पैमानों में दफ़ना के मैख़ाने में रख देना|

वो जिस से समझ जायें रुदाद मेरे ग़म की,
ऐसा भी कोई टुकरा अफ़साने में रख देना|
[रुदाद=कहानी; अफ़साना=बताना या कहना]

सज्दों पे ना देना मुझ को अर्बाब-ए-हरम ताने,
काबे का कोई पत्थर बुत-ख़ाने में रख देना|
[अर्बाब=दोस्त]

“सीमाब” ये क़ुद्रत का अदना सा करिश्मा है,
ख़ामोश सी इक बिजली परवाने में रख देना|
[अदना=छोटा; करिश्मा=चमत्कार]

मुझसे मिलने के वो करता था बहाने कितने

 मुझसे मिलने के वो करता था बहाने कितने|
अब गुज़ारेगा मेरे साथ ज़माने कितने|

मैं गिरा था तो बहुत लोग रुके थे लेकिन,
सोचता हूँ मुझे आए थे उठाने कितने|

जिस तरह मैंने तुझे अपना बना रखा है,
सोचते होंगे यही बात न जाने कितने|

तुम नया ज़ख़्म लगाओ तुम्हें इस से क्या है,
भरने वाले हैं अभी ज़ख़्म पुराने कितने|

ग़म मुझे हसरत मुझे वहशत मुझे सौदा मुझे

ग़म मुझे हसरत मुझे वहशत मुझे सौदा मुझे|
एक दिल देके ख़ुदा ने दे दिया क्या क्या मुझे|

है हुसूल-ए-आरज़ू[1] का राज़[2] तर्क-ए-आरज़ू[3],
मैंने दुनिया छोड़ दी तो मिल गई दुनिया मुझे|

कह के सोया हूँ ये अपने इज़्तराब-ए-शौक़ से,
जब वो आयेँ क़ब्र पर फ़ौरन जगा देना मुझे|

सुबह तक क्या क्या तेरी उम्मीद ने ताने दिये,
आ गया था शाम-ए-ग़म एक नींद का झोंका मुझे|

ये नमाज़-ए-इश्क़ है कैसा अदब किसका अदब,
अपने पाय-ए-नमाज़ पर करने दो सज़दा मुझे|

देखते ही देखते दुनिया से मैं उठ जाऊँगा,
देखती की देखती रह जाएगी दुनिया मुझे|

शब्दार्थ
ऊपर जायें↑ इच्छा-पूर्ति
ऊपर जायें↑ रहस्य
ऊपर जायें↑ इच्छा का त्याग

बक़द्र-ए-शौक़ इक़रार-ए-वफ़ा क्या

 बक़द्र-ए-शौक़ इक़रार-ए-वफ़ा क्या|
हमारे शौक़ की है इंतहा क्या|

मुहब्बत का यही सब शगल ठहरा,
तो फिर आह-ए-रसा क्या ना-रसा क्या|

दुआ दिल से जो निकले कारगर हो,
यहाँ दिल ही नहीं दिल से दुआ क्या|

दिल-ए-आफ़त-ज़दा का मुद्द’आ क्या,
शिकस्ता-साज़ क्या उस की सज़ा क्या|

सलामत दामन-ए-उम्मीद-ए-“सीमाब”,
मुहब्बत में किसी का आसरा क्या|

अब क्या बताऊँ मैं तेरे मिलने से क्या मिला

अब क्या बताऊँ मैं तेरे मिलने से क्या मिला
इर्फ़ान-ए-ग़म[1] हुआ मुझे, दिल का पता मिला

जब दूर तक न कोई फ़कीर-आश्ना मिला,
तेरा नियाज़-मन्द [2]तेरे दर से जा मिला

मन्ज़िल मिली,मुराद[3] मिली मुद्द’आ[4] मिला,
सब कुछ मुझे मिला जो तेरा नक़्श-ए-पा [5] मिला

या ज़ख़्म-ए-दिल को चीर के सीने से फेंक दे,
या ऐतराफ़[6] कर कि निशान-ए-वफ़ा मिला

“सीमाब” को शगुफ़्ता[7] न देखा तमाम[8]उम्र,
कमबख़्त[9] जब मिला हमें कम-आश्ना मिला

शब्दार्थ
ऊपर जायें↑ ज्ञान
ऊपर जायें↑ विनीत, चाहने वाला
ऊपर जायें↑ इच्छा,चाह
ऊपर जायें↑ विषय
ऊपर जायें↑ पद-चिह्न
ऊपर जायें↑ स्वीकार कर
ऊपर जायें↑ आनंदित
ऊपर जायें↑ सारी
ऊपर जायें↑ अशुभ

दुआ

 दुआ

यारब! गमे- दुनिया से इक लम्हे की फ़ुर्सत दे
कुछ फ़िक्रे-वतन कर लूँ इतनी मुझे मुहलत दे

वतन

जहाँ जाऊँ वतन की याद मेरे साथ रहती है
निशाते-महफ़िले- आबाद मेरे साथ रहती है

वतन ! प्यारे वतन ! तेरी मुहब्बत जुज़वे ईमाँ है
तू जैसा है,तू जो कुछ है, सुकूने-दिल का सामाँ है

वतन में मुझको जीना है,वतन में मुझको मरना है
वतन पर ज़िन्दगी को एक दिन क़ुरबान करना है

निशाते-महफ़िले-आबाद : भरी महफ़िलों के वैभव

दिल की बिसात क्या थी

दिल की बिसात क्या थी निगाह-ए-जमाल में
एक आईना था टूट गया देखभाल में

सब्र आ ही जाए गर हो बसर एक हाल में
इमकां एक और ज़ुल्म है क़ैद-ए-मुहाल में

आज़ुर्दा इस क़दर हूँ सराब-ए-ख़याल से
जी चाहता है तुम भी न आओ ख़याल में

तंग आ के तोड़ता हूँ तिलिस्म-ए-ख़याल को
या मुतमईन करो कि तुम्हीं हो ख़याल में

दुनिया है ख़्वाब हासिल-ए-दुनिया ख़याल है
इंसान ख़्वाब देख रहा है ख़याल में

उम्रर-ए-दो-रोज़ा वाक़ई ख़्वाब-ख़याल थी
कुछ ख़्वाब में गुज़र गई बाक़ी ख़याल में

चमक जुगनू की बर्क-ए-अमां मालूम होती है

चमक जुगनू की बर्क-ए-अमां मालूम होती है

क़फ़स में रह के क़द्र-ए-आशियाँ मालूम होती है

कहानी मेरी रूदाद-ए-जहाँ मालूम होती है

जो सुनता है उसी की दास्ताँ मालूम होती है

हवा-ए-शौक़ की कुव्वत वहाँ ले आयी है मुझको

जहाँ मंजिल भी गर्द-ए-कारवाँ मालूम होती है

क़फ़स की तीलियों में जाने क्या तरकीब रखी है

कि हर बिजली क़रीब-ए-आशियाँ मालूम होती है

तरक्की पर है रोज़-अफ्जूँ खलिश दर्द-ए-मोहब्बत की

जहाँ महसूस होती थी, वहाँ मालूम होती है

न क्यूँ सीमाब मुझको कदर हो वीरानी-ए-दिल की

यह बुन्याद-ए-निशात-ए-दो-जहाँ मालूम होती है

जंगी तराना

दिलावरान-ए- तेज़ दम, बढ़े चलो, बढ़े चलो
बहादुरान-ए- मोहतरम, बढ़े चलो, बढ़े चलो

ये दुश्मनों के मोर्चे फ़क़त हैं ढेर ख़ाक़ के
तुम्हारे सामने जमे,कहाँ किसी के हौसले ?

नहीं हो तुम किसी से कम, बढ़े चलो, बढ़े चलो

सितम के तमतराक को बढ़ा के हाथ छीन लो
है फ़तह सामने चलो,उठो,उठो, बढ़ो,बढ़ो

यह जामे-जम, वोह तख़्ते-जम, बढ़े चलो, बढ़े चलो

ग़द्दारे-क़ौम और वत

किया था जम’अ जाँबाज़ों ने जिसको जाँ-फ़रोशी से
रुपहले चन्द टुकडों पर वो इज़्ज़त बेच दी तूने

कोई तुझ-सा भी बे-ग़ैरत ज़माने में कहाँ होगा?
भरे बाज़ार में तक़दीरे-मिल्लत बेच दी तूने

मज़दूर

गर्द चेहरे पर, पसीने में जबीं डूबी हई
आँसुओं मे कोहनियों तक आस्तीं डूबी हुई

पीठ पर नाक़ाबिले बरदाश्त इक बारे गिराँ
ज़ोफ़ से लरज़ी हुई सारे बदन की झुर्रियाँ

हड्डियों में तेज़ चलने से चटख़ने की सदा
दर्द में डूबी हुई मजरूह टख़ने की सदा

पाँव मिट्टी की तहों में मैल से चिकटे हुए
एक बदबूदार मैला चीथड़ा बाँधे हुए

जा रहा है जानवर की तरह घबराता हुआ
हाँपता, गिरता,लरज़ता ,ठोकरें खाता हुआ

मुज़महिल बामाँदगी से और फ़ाक़ों से निढाल
चार पैसे की तवक़्क़ोह सारे कुनबे का ख़याल

अपनी ख़िलक़त को गुनाहों की सज़ा समझे हुए
आदमी होने को लानत और बला समझे हुए

इसके दिल तक ज़िन्दगी की रोशनी जती नहीं
भूल कर भी इसके होंठों तक हसीं आती नहीं.

मज़रूह: घायल ; मुज़महिल :थका हुआ ; बामाँदगी: दुर्बलता

शायरे-इमरोज़

क्या है कोई शेर तेरा तर्जुमाने दर्दे-क़ौम ?
तूने क्या मंजूम की है दास्ताने दर्दे-क़ौम?

अपने सोज़े-दिल से गरमाया है सीनों को कभी?
तर किया है आँसुओं से आस्तीनों को कभी?

क़ौम के ग़म में किया है ख़ून को पानी कभी?
रहगुज़ारे-जंग में की है हुदीख़्वानी कभी?

क्या रुलाया है लहू तूने किसी मज़मून से?
नज़्में आज़ादी कभी लिक्खी है अपने ख़ून से?

रहगुज़ारे-जंग :युद्ध के मार्ग में  ; हुदीख़्वानी: बलिदानों की प्रशंसा

हिन्दोस्तानी माँ का पैग़ाम

मेरे बच्चे सफ़शिकन थे और तीरंदाज़ भी
मनचले भी साहबे-हिम्मत भी, सरअफ़राज़ भी

मैं उलट देती थी दुश्मन की सफ़ें तलवार से
दिल दहल जाते थे शेरों के मेरी ललकार से

जुरअत ऐसी, खेलती थी दश्नओ-खंजर के साथ
बावफ़ा ऐसी कि होती थी फ़ना शोहर के साथ

छीन कर तलवार पहना दी सुनहरी चूड़ियाँ
रख दिया हर जोड़ पर ज़ेवर का एक बारे-गिराँ

दर्स आज़ादी का का देती क्या तुझे आग़ोध में
मै तो ख़ुद ही क़ैद थी इक मजलिसे-गुलपोश में

मैंने दानिस्ता बनाया ख़ायफ़ो-बुज़दिल तुझे
मैंने दी कमहिम्मती की दावते-बातिल तुझे

दिल को पानी करने वाली लोरियाँ देती थी मैं
जब ग़रज़ होती थी दामन में छुपा लेती थी मैं

हाँ तेरी इस पस्त ज़ेहनीयत की मैं हूँ ज़िम्मेदार
तू तो मेरी गोद में ही था ग़ुलामी का शिकार

सुन कि इस दुनिया में मिलता है उसी को इक़्तदार
जिसको अपनी क़ूवते तामीर पर पर हो इख़्तियार.

सफ़शिकन : व्यूह तोड़ने वाले; सरअफ़राज़ : सर ऊँचा रखने वाले; जुरअत: दिलेरी ; क़ूवते तामीर :निर्माण बल  ; इक़्तदार:अधिकार

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