सुधा चौहान ’की रचनाएँ

ऊँट 

रोज़ सवेरे कितने ऊँट,
पीठ लाद ढेरांे तरबूज़।
धीरे-धीरे कहाँ चले,
जब पहुँचेंगे पेड़ तले-
गर्दन ऊँची कर खाएँगे,
कड़वी नीम चबा जाएँगे।
मालिक हाँकेगा जब उनको
बल-बल, बल-बल, गुस्साएँगे!

केला

हरे-भरे छिलकों का केला,
इससे भरा हुआ है ठेला!
फलवाला चिल्लाता ले लो,
मीठा हलुआ-सा है देखो!
बीज न गुठली इसमें पाओ,
छिलका छीलो गप से खाओ!

Share