सुनीता जैन की रचनाएँ

ऋण फूलों-सा

इस काया को
जिस माया ने
जन्म दिया,
वह माँग रही-कि

जैसे उत्सव के बाद
दीवारों पर
हाथों के थापे रह जाते

जैसे पूजा के बाद
चौरे के आसपास
पैरों के छापे रह जाते

जैसे वृक्षों पर
प्रेम संदेशों के बँधे,
बँधे धागे रह जाते,
वैसा ही कुछ
कर जाऊँ

सोच रही,
माया के धीरज का
काया की कथरी का

यह ऋण
फूलों-सा हल्का-
किन शब्दों में
तोल,
चुकाऊँ

फागुन 

बहुत दिनों में वन देवी ने
बालों को खोला है
फूलों में गूँथ कर
लट-लट में टाँका है

लिये संग में वनबाला को
देख रहीं अपनी छवि को
खड़ी ताल पे ताली दे-दे
उड़ारहीं सारस को

देख रहीं वे जिधर लता, वह
उमड़-उमड़ आती है
रख देती हैं पाँव जिधर वे
वह धरा सिहर जाती है

क्या तुमने भी मेला यह
रंगों का देखा है?

ज़रा-ज़रा -सा

जी में जी खुलता है
ज़रा-ज़रा-सा

फागुन ऋतु का बौर
हवा घुलता है
ज़रा-ज़रा-सा

गेरू रंग मधुमाखी है
रंग पीलाततै-
य्या जहरीला
तितली के तो रंग गिनूँ क्या
हर रंग ही चट-
कीला

अंतस में ज्वार उमड़ता
कहाँ कहाँ का
ज़रा-ज़रा-सा

सुबह-सुबह यह पक्षी

सुबह-सुबह यह पक्षी
क्यों रोता है?
क्या कहता है?

क्या कहने को इसकी
किसी जन्म में
बची रह गई बात

जिसको करता याद,
बुलाता रो-रो कर
मीत किसी अपने को?

या यह सब
मेरा अपना
इस पर आरोपित है?

पक्षी तो शायद
केवल गाता है
यों गा-गा कर
सोए हुए पलाशों,
सेमल और ढाकों को
बतलाता है
कि जीवन का
ऋतु से कुछनाता है

या यह भी तो संभव है
कि इतने सब ईंट-पत्थरों से
घिरा बेचारा,
हेर किसी जंगल को
यह जंगल-राग
सुनाता है

न रोता
न गाता पक्षी,
बस अपने सुर से
अपना मन बहलाता है!

लकड़हारा

“भरी दोपहरी में सोए हो!
लकड़हारे?”
“जी, महाराज”
“कुछ लकड़ी काटो”
“सो तो काट चुका सवेरे,
दे भी आया मंडी में”
“कितने की?”
‘बारह आने!”
‘कुल में! काटो कुछ और अभी
पहले से दुगनी तिगुनी, प्रतिदिन”
“तब क्या होगा, महाराज?”
“मंदबुद्धि हो क्या, भाई! पैसे से
गुदड़ी भर जाएगी”
“तब क्या होगा, महाराज?”
“तो करना न होगा काम,
करना आराम! सोना लम्बी तान!”
“मैं अभी पड़ा हो करता था, वह क्या था,
महाराज?”

खंडहर के पक्षी

खंडहरों के पक्षी,
खंडहरों की
श्वास होते हैं,
तब तक नहीं मरता
खंडहर
जब तक
पक्षी उसमें जीते हैं-
गाते हैं
सुबह भैरवी
दिन में लाते
भर खेत चोंच,
निशि में
पिछले दिन की कथा सुनाकर
सूत्रधार सोते हैं

अब यह बतलाना
बहुत कठिन है
कि पहले पक्षी
कूच कर जाते,
या पहले
खंडहर मरते हैं

अच्छा लगता है 

अच्छा लगता है
आँखों को बंद रखना।
जो दिखता है
बंद आँखों को,
तुमको क्या दिखता है?
झरने,
झील
पहाड़ी,
देवदार कद्दावर
नीर, धीर, नद, नदिया
खड़े कगार पर
सागर?
बचपन के
वे देव
वृक्ष-वृक्ष,
परछाईं में दानव?
और अचानक
डूब गया जो
माथे पर उगता
सूरज?

चम्पा 

अक्षर-अक्षर को तरसा है
पंक्ति-पंक्ति को प्यासा मन

शब्दों को खोने की व्यथा
जानी जाती है खोकर ही-

संसृति पर बरप जाता
एक विराट सूनापन

आँखों की पुतली तक
काजल से सन जाती

मर्म नहीं सुन पाता अपनी कथनी
पीड़ा का हर पल भी आता है गूँगा ही

जो अनायास, शब्दों की
चम्पा-चैती, खिल आई तुम,
खिलती रहना सावन में आने तक
सावन में शायद
केसर-पुष्पी, हरसिंगार
मेरी झोली झर जाए

फिर शीत ऋतु के आते-आते
खिल ही जाएँगे गुलाब

यों,
हर एक दिन
हर एक पल
हर शब्द-फूल
कविता हो,
कविता हो।

छुआ किसने

छुआ किस ने फूल हो गया
धरती का मैला रंग
चटक कर लागा किसके अंग
बीन-सा
कुहुक उठा रस-धार भीग मन
उमड़ा तन
अंगार हो गया

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