सुनीत बाजपेयी की रचनाएँ

बिन तुम्हारे मैं भला कब तक जियूँगा

साँस का ये साज न रुक जाये, आओ,

रो रहा है हृदय पर आँसू निकलते ही नहीं है।
नयन में उम्मीद के अब ख्वाब पलते ही नहीं हैं।
हो गया है बावरा मन कौन समझाये इसे ये,
लाख चीखो किन्तु पत्थर दिल पिघलते ही नहीं हैं।
मौन रहने का तुम्हें कैसे वचन दूँ,
खुद बताओ किस तरह ये लब सियूँगा।

सेंध किसने भावनाओं के घरौंदे में लगायी।
प्रीति के विश्वाश की ये नींव कैसे चरमरायी।
हाँ चले जाना ख़ुशी से छोड़कर लेकिन बताओ,
क्या करोगे कल तुम्हें मेरी कभी यदि याद आयी।
सोंचना था किन्तु ये तुमने न सोंचा।
मैं नहीं शंकर, जहर कैसे पियूँगा।

बीते सभी पल याद आये

कल गया जब मैं बहुत दिन बाद अपने गाँव फिर से,
प्रिय तुम्हारे साथ में बीते सभी पल याद आये।

किन्तु अबके बार था बदला हुआ हर इक नजारा।
शान्ति थी पहले वहाँ पर शोरगुल है ढेर सारा।
खेलते थे हम जहाँ छप्पर पुराना ढह गया है,
सूख कर सिमटा दिखा बड़की तलैया का किनारा।
नीम घर के सामने वाला भले ही कट चुका पर,
हो गए हैं अब बड़े वो पेड़ जो तुमने लगाये।
प्रिय तुम्हारे साथ में बीते सभी पल आये।

बाग़ में भी क्या बताऊँ इस दफा मुश्किल बड़ी थी।
तुम नहीं थीं साथ पर बरात यादों की खड़ी थी।
बैठ कर घंटों जहाँ हम प्रेम की पींगें बढ़ाते,
उस जगह पर लाश उन लम्हात की बिखरी पड़ी थी।
याद है तुमको, खिलाता था स्वयं ही तोड़कर के,
कल उसी जामुन तले रोते रहे फिर लौट आये।
प्रिय तुम्हारे साथ में बीते सभी पल याद आये।

वो गली जिसमें बना था घर तुम्हारा और मेरा।
सिर्फ सन्नाटा मिला डाले वहाँ अपना बसेरा।
पास जीने के बना कमरा व्यथित होकर मिला कल,
शाम को मिलते जहाँ हम रोज होने पर अँधेरा।
आज तक समझा नहीं ये मैं गया छत पर कभी जब,
आ गयीं हर बार ऊपर किस तरह तुम बिन बुलाये।
प्रिय तुम्हारे साथ में बीते सभी पल याद आये।

मेरे चाँद का उपवास है

रात गहरी हो गयी सूना पड़ा आकाश है।
आ गगन के चाँद मेरे चाँद का उपवास है।

आ गये देखो गगन में अनगिनत झिलमिल सितारे।
आँख अपलक शाम से ही बस तेरा रस्ता निहारे।
प्रेम के संसार का पावन समर्पण है बुलाता,
नेह की शुभ साधना का दीप तुझको ही पुकारे।
तू न समझे आज का दिन किसको कितना ख़ास है।
आ गगन के चाँद मेरे चाँद का उपवास है।

आज श्रद्धा में समायीं हैं ह्रदय की कल्पनायें।
तृप्ति का अहसास पाने को विकल हैं कामनायें।
तुम नही आओगे तब तक कैसे मुखरित हो सकेंगी,
मौन बैठीं हैं छतों पर आज मन की भावनायें।
स्वप्न सिन्दूरी तुझी से,आस्था – विश्वाश है।
आ गगन के चाँद मेरे चाँद का उपवास है।

जो भी करना है तुझे ओ चाँद नभ के बाद में कर।
वृत किसी का टूटना है आज तुझको अर्घ्य देकर।
एक तू जो एक पल को भी न किंचित सोंचता है,
सब खड़े हैं आरती का थाल अपने हाँथ लेकर।
फिर किसी की प्रीति का जग कर रहा उपहास है।
आ गगन के चाँद मेरे चाँद का उपवास है।

गीत गाना छोड़ दूँगा

आप मेरे होंठ की थिरकन कभी यदि पढ़ न पायीं,
आपकी सौगंध उस दिन गीत गाना छोड़ दूँगा।।

आप क्या जाने कि कितना द्वार दिल का खटखटाया।
और कितनी बार वापस बिन कहे कुछ लौट आया।
देवता-देवी मनाये रात दिन जब एक करके,
तब कहीं जाकर हृदय ने आपका है प्यार पाया।
सुन अगर आवाज मेरी भी नहीं इस ओर आयीं,
तो हमेशा के लिये फिर मैं बुलाना छोड़ दूँगा।

है कठिन लाना गगन से तोड़कर के चाँद तारे।
इसलिये वादे करूँगा ही नहीं मैं ढेर सारे।
पर कभी भी दुःख न दूँगा ये सदा विश्वाश रखना,
क्योंकि मेरी जिन्दगी अब आपके ही है सहारे।
प्रिय कभी मेरी वजह से आपको पीड़ा हुयी तो,
साँस के अंतिम सफर तक मुस्कुराना छोड़ दूँगा।

खूब बचपन में सुना था एक राजा एक रानी।
सोंचते उनके विषय में आ गयी मुझ पर जवानी।
आपको पाया तभी से ले लिया संकल्प मैंने,
प्रेम के इतिहास में अपनी लिखी होगी कहानी।
आपने यदि साथ मेरा छोड़ने का मन बनाया,
ठीक अगले पल ख़ुशी से ये जमाना छोड़ दूँगा।

गले से लगा लें तुम्हें

प्रेम के साज पर नेह के गीत का भाव कोई सुहाना सुना लें तुम्हें।
ये है अंतिम मिलन फिर मिलें न मिलें आओ प्रियवर गले से लगा लें तुम्हें।।

जानते हैं कि संभव न पाना तुम्हें, बिन तेरे जी सकेंगे कहें कैसे हम।
जिसके संग अनगिनत स्वप्न देखा किये उससे अलगाव का गम सहें कैसे हम।
गीत के बंद के छंद के वर्ण सा अपने होंठों पे हमदम सजा लें तुम्हें।

दिल के आँगन में पतझार आ जायेगा, कैसे खिल पायेगा अब कोई भी सुमन।
अब तलक जो रहा तेरे आगोश में, विरह की अग्नि में रोज तड़पेगा मन।
ये प्रणय यामिनी जाने फिर आये कब, आँख की पुतलियों में बिठा लें तुम्हें।

रह गयी अनसुनी ही हमारी कथा, प्रीति अपनी जगत को दिखी ही नहीं।
होती लिपि-बद्ध तो पढ़ भी लेता ये जग, क्या पढ़ेगा कोई जब लिखी ही नहीं।
दो बदन एक मन ही रहे हम सदा, रूठिये, इक दफा तो मना लें तुम्हें।

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