सुभाष नीरव की रचनाएँ

दोहे

(1)
बहुत कठिन है प्रेम पथ, चलिये सोच विचार।
विष का प्याला बिन पिये, मिले न सच्चा प्यार॥

(2)
भूख प्यास सब मिट गई, लागा ऐसा रोग।
हुई प्रेम में बांवरी, कहते हैं सब लोग।।

(3)
बहुत गिनाते तुम रहे, दूजों के गुणदोष।
अपने भीतर झाँक लो, उड़ जायेंगे होश॥

(4)
बोल बड़े क्यों बोलते, करते क्यूँ अभिमान।
धूप-छाँव सी ज़िन्दगी, रहे न एक समान॥

(5)
बूढ़ी माँ दिल में रखे, सिर्फ यही अरमान।
मुख बेटे का देख लूँ, तब निकलें ये प्राण॥

अपने मन की पीर

(१)
लाख छिपायें हम भले, अपने मन की पीर।
सबकुछ तो कह जाय है, इन नयनों का नीर॥

(२)
दूर हुईं मायूसियाँ, कटी चैन से रात।
मेरे सर पर जब रखा, माँ ने अपना हाथ॥

(३)
बाबुल तेरी बेटियाँ, कुछ दिन की मेहमान ।
आज नहीं तो कल तुझे, करना कन्यादान॥

(४)
पानी बरसा गाँव में, अबकी इतना ज़ोर ।
फ़सल हुई बरबाद सब, बचे न डंगर-ढोर।।

(५)
बुरा भला रह जाय है, इस जीवन के बाद।
कुछ तो ऐसा कीजिए, रहे सभी को याद॥

शुक्र है…..

शुक्र है-

निरन्तर बढ़ रहे इस विषाक्त वातावरण में

बची हुई है, थोड़ी-सी प्राणवायु।

शुक्र है-

कागज और प्लास्टिक की संस्कृति में

बचा रखी है फूलों ने अपनी सुगन्धि

पेड़ों ने नहीं छोड़ी अपनी ज़मीन

नहीं छोड़ा अपना धर्म

स्वार्थ में डूबी इस दुनिया में।

बेईमान और भ्रष्ट लोगों की भीड़ में

शुक्र है-

बचा हुआ है थोड़ा-सा ईमान

थोड़ी-सी सच्चाई

थोड़ी-सी नेकदिली।

शुक्र और राहत की बात है

इस युध्दप्रेमी और तानाशाही समय में

बची हुई है थोड़ी-सी शांति

बचा हुआ है थोड़ा-सा प्रेम

और

अंधेरों की भयंकर साजिशों के बावजूद

प्रकाश अभी जिन्दा है।

एक बेहतर दुनिया के लिए

थोड़ी-सी बची इन अच्छी चीजों को

बचाना है हमें-तुम्हें मिलकर

भले ही हम हैं थोड़े–से लोग !

घर में आने से पहले

तुमने
मेरी यादों की धरती पर
अपना घर बना रखा है
घर कि
जिसके द्वार
खुले रहते हैं सदैव।

जब जी चाहता है
तुम आ जाते हो इस घर में
जब जी चाहता है
चले जाते हो इससे बाहर।

तुम्हारे आने का
न कोई समय तय है
न जाने का।

तुम्हारे आते ही
जीवंत हो उठता है यह घर
तुम्हारे चले जाने से
पसर जाता है इसमें
मरघटों-सा सन्नाटा।

तुम्हें हाथ पकड़ कर
रोक लेने की
चाहत भी तो पूरी नहीं होती
क्योंकि
न जाने कहाँ छोड़ आते हो
तुम अपनी देह
इस घर में आने से पहले।

माँ-बेटी

बेटी के पाँव में आने लगी है
माँ की चप्पल
बेटी जवान हो रही है।

माँ को आ जाता है अब
बेटी का सूट
बेटी सचमुच जवान हो गई है।

माँ -बेटी आपस में अब
कर लेती हैं अदला-बदली
अपनी-अपनी चीजों की।

जब मन होता है
बेटी, माँ के नए सैंडिल पहन
चली जाती है सहेली के बर्थ-डे पर
और माँ –
बेटी का नया सिला सूट पहन कर
हो आती है मायके।

कभी-कभी दोनों में
‘तू-तकरार’ भी होती है
चीजों को लेकर
जब एक ही समय दोनों को पड़ती है
एक-सी ही चीजों की ज़रूरत।

माँ को करती है तैयार बेटी
शादी-पार्टी के लिए ऐसे
जैसे कर रही हो खुद को तैयार।

हेयर-क्लिप हो या नेल-पालिश
लिपिस्टिक हो या कपड़ों के रंग
हेयर-स्टाइल हो या बिंदी का आकार
इन सब पर देती है बेटी खुल कर
माँ को अपनी राय
और बन जाती है ऐसे क्षणों में
माँ के लिए एक आइना।

माँ भी निकाल देती है बेटी के लिए
अपनी सबसे प्यारी संजो कर रखी साड़ी
और खुद अपने हाथों से सिखाती है
साड़ी को बांधना,
चुन्नटों को ठीक करना
और पल्लू को संवारना
जब जाना होता है बेटी को
कालेज के ऐनुअल-फंक्शन में।

अकेले में बैठ कर अब
जाने क्या गिट-पिट करती रहती हैं दोनों
दो हम-उम्र और अंतरंग सहेलियों की तरह
राम जाने!

नदी 

पर्वत शिखरों से उतर कर
घाटियों-मैदानों से गुजरती
पत्थरों-चट्टानों को चीरती
बहती है नदी ।

नदी जानती है
नदी होने का अर्थ ।

नदी होना
बेरोक निरंतर बहना
आगे…आगे… और आगे ।

कहीं मचलती,
कहीं उद्विग्न, उफनती
किनारे तोड़ती
कहीं शांत-गंभीर
लेकिन,
निरंतर प्रवहमान ।

सागर से मिलने तक
एक महायात्रा पर होती है नदी ।

नदी बहती है निरंतर
आगे… और आगे
सागर में विलीन होने तक
क्योंकि वह जानती है
वह बहेगी
तो रहेगी ।

नववर्ष में 

क्या खोया, क्या पाया के गणित में उलझे

कहा अलविदा जाते वर्ष को

शुभकामनाओं के आदान-प्रदान के बीच

किया स्वागत नये साल का।

लिए कुछ नये संकल्प

की कुछ कामनाएँ-प्रार्थनाएँ

संजोये कुछ नये स्वप्न।

संकल्प कि

दोहरायें नहीं वे गलतियाँ

जो हुईं जाने-अनजाते बीते बरस में।

कामनाएँ-प्रार्थनाएँ कि

बची रहे रिश्तों-संबंधों की महक

संवेदनाएँ न हों मृत

वैमनस्य बदले प्रेम में

ख़ुशहाल हो बचपन

न हो उपेक्षा, बेकद्री बुज़ुर्गों की।

स्वप्न कि

किसी भी तरह के आतंक से मुक्त

एक खुशहाल और बेहतर दुनिया में

साँस ले सकें हम

इस नए वर्ष में।

 

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