हकीम अजमल ख़ाँ शैदा की रचनाएँ

चर्चा हमारा इश्क़ ने क्यूँ जा-ब-जा किया

चर्चा हमारा इश्क़ ने क्यूँ जा-ब-जा किया
दिल उस को दे दिया तो भला क्या बुरा क्या

अब खोलिए किताब-ए-नसीहत को शैख़ फिर
शब मय-कदे में आप ने जो कुछ किया किया

वो ख़्वाब-ए-नाज़ में थे मिरा दीदा-ए-नियाज़
देखा किया और उन की बलाएँ लिया किया

रोज़-ए-अज़ल से ता-ब-अबद अपनी जैब का
था एक चाक जिस को मैं बैठा सिया किया

देखे जो दाग़ दामन-ए-इसयाँ पे बे-शुमार
मैं ने भी जोश-ए-गिर्या से तूफ़ाँ बपा किया

गुम-कर्दा राह आए हैं वो आज मेरे घर
ऐ मेरी आह-ए-नीम-शबी तू ने क्या किया

क्या पूछते हो दस्त-ए-क़नाअत की कोतही
कुछ वा शब-ए-विसाल में बंद क़बा किया

लज़्ज़त ही थी कुछ ऐसी कि छोड़ा न सब्र को
करते रहे वो जौर-ए-सितम मैं सहा किया

क्या शय थी वो जो आँख से दिल में उतर गई
दिल से उठी तो अश्क का तूफ़ाँ बपा किया

फिर ले चला है कल मुझे क्यूँ बज़्म-ए-यार में
ईजाद उस ने क्या कोई तर्ज़-ए-जफ़ा किया

‘शैदा’ ग़ज़ल पढ़ो कोई मज्लिस में दूसरी
इक पढ़ के रह गए तो भला तुम ने क्या किया

दर्द को रहने भी दे दिल में दवा हो जाएगी

दर्द को रहने भी दे दिल में दवा हो जाएगी
मौत आएगी तो ऐ हमदम शिफा हो जाएगी

होगी जब नालों की अपने जेर गर्दू बाज-गश्त
मेरे दर्द-ए-दिल की शोहरत जा-ब-जा हो जाएगी

कू-ए-जानाँ में उसे है सज्दा-रिजी का जो शौक
मेरी परेशानी रहीन-ए-नक्श-ए-पा हो जाएगी

काकुल-ए-पेचाँ हटा कर रूख से आओ सामने
पर्दा-दार-ए-हुस्न महफिल में जिया हो जाएगी

जब ये समझूँगा कि मेरी जीस्त है मम्नून-ए-मर्ग
मौत मेरी जिंदगी का आसरा हो जाएगी

इंतिजार-ए-वस्ल करना उम्र भर मुमकिन तो है
गो नहीं मालूम हालत क्या से क्या हो जाएगी

मोहतसिब और हम हैं दोनों मुतफिक इस बाब मै
बरमला जो मय-कशी हो बे- रिया हो जाएगी

फाश राज-ए-दिल नहीं करता मगर ये डर तो है
बे-खुदी में आह लब से आश्ना हो जाएगी

बारयाब-ए-ख्वाब-गाह-ए-नाज होने दो उसे
उन की जुल्फों में परेशाँ खुद सबा हो जाएगी

मक्सद-ए-उल्फत को कर लो पहले ‘शैदा’ दिल-नर्शी
वर्ना हर आह-ओ-फ़ुग़ाँ बे-मुदद्आ हो जाएगी

गुदाज़-ए-दिल से परवाना हुआ ख़ाक

गुदाज़-ए-दिल से परवाना हुआ ख़ाक
जिया बे-सोज़ में तो क्या जिया ख़ाक

किसी के ख़ून-ए-नाहक़ की है सुर्ख़ी
रंगेंगी दस्त-ए-क़ातिल को हिना ख़ाक

निगह में शर्म के बदले है शोख़ी
खुले फिर रात का क्या माजरा ख़ाक

लबों तक आ नहीं सकता तो फिर मैं
कहूँ क्या अपने दिल का मुद्दआ ख़ाक

बुलंदी से है उस की डर कि इक रोज़
करेगी आशियाँ बर्क़-ए-बला ख़ाक

न देखा जिन का चेहरा गर्द-आलूद
पड़ी है उन पे अब बे-इंतिहा ख़ाक

बयाबाँ में फिरा करते हैं ‘शैदा’
हक़ीक़त में है उल्फ़त की दवा ख़ाक

मरता भला है ज़ब्त की ताक़त अगर न हो

मरता भला है ज़ब्त की ताक़त अगर न हो
कितना ही दर्द-ए-दिल हो मगर चश्म-ए-तर न हो

वो सर ही क्या कि जिस में तुम्हारा न हो ख़याल
वो दिल ही क्या जिस में तुम्हारा गुज़र न हो

ऐसी तो बे-असर नहीं बेताबी-ए-फ़िराक़
नाले करूँ मैं और किसी को ख़बर न हो

मिल जाओ तुम तो शब को बढ़ा लेंगे ता-अबद
माँगेंगे ये दुआ कि इलाही सहर न हो

ज़ुल्फ़ उन की अपने रूख़ पे परेशाँ करेंगे हम
डर है शब-ए-विसाल कहीं मुख़्तसर न हो

मैं हूँ वो तुफ़्ता-दिल की हुआ आफ़्ताब पर
मेरा गुमाँ कि आह का मेरी शरर न हो

‘शैदा’ को तेरे ख़ौफ़ किसी का नहीं यहाँ
सारा जहाँ हो उस का अदू तो मगर न हो

Share