हरिश्चन्द्र की रचनाएँ

राधा श्याम सेवैँ सदा वृन्दावन वास करैँ

राधा श्याम सेवैँ सदा वृन्दावन वास करैँ,
रहैँ निहचिँत पद आस गुरुवरु के ।
चाहैँ धन धाम ना आराम सोँहै काम ,
हरिचँदजू भरोसे रहैँ नन्दराय घरु के ।
एरे नीच नृप हमैँ तेज तू देखावै काह ,
गज परवाही कबौँ होहिँ नाहिँ खरु के ।
होय ले रसाल तू भले ही जगजीव काज ,
आसी न तिहारे ये निबासी कल्प तरु के ।

हरिश्चन्द्र का यह दुर्लभ छन्द श्री राजुल मेहरोत्रा के संग्रह से उपलब्ध हुआ है।

सजि सेज रँग के महल मे उमँग भरी

सजि सेज रँग के महल मे उमँग भरी ,
पिय गर लागि काम कसकेँ मिटाए लेति ।
ठानि विपरीत पूरे मैन के मसूसनि सोँ ,
सुरति समर जय पत्रहिँ लिखाए लेति ।
हरिचँद केलि कला परम प्रवीन तिया ,
जोम भरि पियै झकझोरनि हराए लेति ।
याद करि पीय की वे निरदई घातेँ आज ,
प्रथम समागम को बदलो चुकाए लेति ।

हरिश्चन्द्र का यह दुर्लभ छन्द श्री राजुल मेहरोत्रा के संग्रह से उपलब्ध हुआ है।

यह सावन सोक नसावन है मनभावन यामें न लाज भरौ

यह सावन सोक नसावन है मनभावन यामें न लाज भरौ ।
जमुना पे चलौ सु सबै मिलिकै अरु गाइ बजाइ कै शोक हरौ।
हरि आवत हैँ हरिचंद पिया अहो लाड़िली देर न यामें करौ ।
बलि झूलौ झुलावौ झुकौ उझकौ यहि पाखैँ पतिब्रत ताखैँ धरौ ।

हरिश्चन्द्र का यह दुर्लभ छन्द श्री राजुल मेहरोत्रा के संग्रह से उपलब्ध हुआ है।

थाकी गति आँगन की मति परि गई मँद 

थाकी गति आँगन की मति परि गई मँद ,
सूखि झाँझरी सी ह्वै कै देह लागी पियरान ।
बाबरी सी बुद्धि भई हँसी काहू छीन लई ,
सुख के समाज जित तित लागे दूर जान ।
हरीचँद रावरे बिरह जग दुख भयो ,
भयो कछु और होनहार लागे दिखरान ।
नैन कुम्हिलान लागे बैन हू अथान लागे ,
आओ प्रान नाथ अब प्रान लागे मुरझान ।

हरिश्चन्द्र का यह दुर्लभ छन्द श्री राजुल मेहरोत्रा के संग्रह से उपलब्ध हुआ है।

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