हरीश निगम की रचनाएँ

नवगीत-संग्रह

होंठ नीले धूप में

दुख नदी भर 

सुख अंजुरि-भर
दुख नदी-भर
जी रहे
दिन-रात सीकर!

ढही भीती
उड़ी छानी
मेह सूखे
आँख पानी

फड़फड़ाते
मोर-तीतर!

हैं हवा के
होंठ दरके
फटे रिश्ते
गाँव-घर के

एक मरुथल
उगा भीतर!

आक हो-
आए करौंदे
आस के
टूटे घरौंदे
घेरकर
बैठे शनीचर!

बादल लिखना

मेहंदी-सुर्खी
काजल लिखना
महका-महका
आँचल लिखना!

धूप-धूप
रिश्तों के
जंगल
ख़त्म नहीं
होते हैं
मरुथल
जलते मन पर
बादल लिखना!

इंतज़ार के
बिखरे
काँटे
काँटे नहीं
कटे
सन्नाटे

वंशी लिखना
मादल लिखना!

बिखरे हैं पर

खाली पिंजरा
डोल रहा
ओसारे में!

चला गया
सुगना
बिखरे हैं पर
टीसों के
मौसम से
गए ठहर
फ़र्क न लगता
शाम-सुबह
अंधियारे में!

फेरे हैं
दिन-भर
परछाईं के

आए ना
झोंके
पुरवाई के
टोना-सा है
अमलतास
कचनारों में!

फुनगियों तक बेल 

फुनगियों तक
बेल चढ़ आई!

बादलों को
टेरती
होती सिंदूरी
देह सौगंधों हरी
मन की मयूरी

इंद्रधनु के
पत्र पढ़ आई!

दूब-अक्षत
फूल खुशबू
धूप गाती
सप्तपदियाँ घोलती
पायल बजाती

नेह के
सौ बिंब गढ़ आई!

चाँदनी सिसकी

रात भर जागे
सिरहाने नींद धर के।

एक पल को भी नहीं
पतझड़ थमा
आँख में होते रहे
बीहड़ जमा

याद ने किस्से सुनाए
खंडहर के।

चाँदनी सिसकी
कोई सपना दुखा
सिलसिला हम पर
खरोंचों का झुका

लग रहा,
आए बबूलों से गुज़र के।

ज़िंदगी की बात

ऊँघते दिन छटपटाती रात
क्या करें हम
ज़िंदगी की बात

छाँव के छींटे नहीं बस धूप है
हर कदम पर एक अंधा कूप है
छत नहीं
सिर पर खड़ी बरसात
क्या करें हम
ज़िंदगी की बात

क्या कहें इस पार ना उस पार के
हो गए हम नाम केवल धार के
हैं भँवर
कितने लगाए घात
क्या करें हम
ज़िंदगी की बात

नाव काग़ज़ की बनाता है शहर
बाजियों से हम नहीं पाए उबर
जेब में
लेकर चले हैं मात
क्या करें हम
ज़िंदगी की बात

पनघटों पर धूल

गाँव अब
लगते नहीं हैं
गाँव से!

पनघटों में धूल
सूने खेत
घूमते अमराइयों में प्रेत,
आ रही लू, नीम वाली
छाँव से!

ठूँठ अपनापन झरे
मन-पात
कोयलों पर बाज की है घात,
धूप के हैं थरथराते
पाँव से!

खाँसते
आँगन हवा में टीस
कब्र में डूबे घुने आशीष,
लोग हैं हारे हुए हर
दाँव से।

बालगीत-संग्रह

टिंकू बंदर

पंख दिला दो ना

पंख नहीं मेरे अम्मा
पंख नहीं मेरे।
अम्माँ पंख दिला दो ना।

तितली से मँगवा दो ना,
मोरों से दिलवा दो ना,
गुण गाऊँगी
मैं तेरे!
अम्माँ पंख दिला दो ना।

मिल जाएँ जो मुझको पर
धरती से पहुँचूँ अंबर,
पल में कर लूँ
सौ फेरे!
अम्माँ पंख दिला दो ना।

उड़कर मिलूँ पतंगों से
इंद्रधनुष के रंगों से
घूमूँ परियों
के डेरे!
अम्माँ पंख दिला दो ना।

भइया बस्‍ते जी

थोड़ा अपना वज़न घटाओ
भइया बस्‍ते जी।
हम बच्‍चों का साथ निभाओ
भइया बस्‍ते जी।

गुब्‍बारे से फूल रहे तुम
भरे हाथी से,
कुछ ही दिन में नहीं लगोगे
मेरे साथी से।
फिर क्‍यों ऐसा रोग लगाओ
भइया बस्‍ते जी।

कमर हमारी टूट रही है
कांधे दुखते हैं,
तुमको लेकर चलते हैं कम
ज़्यादा रूकते हैं।
कुछ तो हम पर दया दिखाओ
भइया बस्‍ते जी।

तितली और भौंरा 

तितली रानी,
बड़ी सयानी,
बोली-भौंरे सुन!

ओ अज्ञानी,
पड़ी पुरानी,
तेरी ये गुनगुन!

कालू राजा,
खा के खाजा,
छेड़ नई-सी धुन!

जाड़े की हवा 

ठंडी-ठंडी चली हवा
लगे बर्फ़ की डली हवा ।

चुभती है तीरों जैसी,
कल की वो मखमली हवा ।

बाहर मत आना भइया,
लिए खड़ी ‘दो-नली’ हवा ।

दादी कहती मफ़लर लो,
चलती है मुँहजली हवा ।

स्वेटर, कम्बल, कोट मिले,
नहीं किसी से टली हवा ।

गर्मी में सबको भाई,
अब गर्मी में खली हवा ।

नवगीत

दुख नदी भर

सुख अंजुरि-भर
दुख नदी-भर
जी रहे
दिन-रात सीकर!

ढही भीती
उड़ी छानी
मेह सूखे
आँख पानी

फड़फड़ाते
मोर-तीतर!

हैं हवा के
होंठ दरके
फटे रिश्ते
गाँव-घर के

एक मरुथल
उगा भीतर!

आक हो-
आए करौंदे
आस के
टूटे घरौंदे
घेरकर
बैठे शनीचर!

बादल लिखना

मेहंदी-सुर्खी
काजल लिखना
महका-महका
आँचल लिखना!

धूप-धूप
रिश्तों के
जंगल
ख़त्म नहीं
होते हैं
मरुथल
जलते मन पर
बादल लिखना!

इंतज़ार के
बिखरे
काँटे
काँटे नहीं
कटे
सन्नाटे

वंशी लिखना
मादल लिखना!

बिखरे हैं पर

खाली पिंजरा
डोल रहा
ओसारे में!

चला गया
सुगना
बिखरे हैं पर
टीसों के
मौसम से
गए ठहर
फ़र्क न लगता
शाम-सुबह
अंधियारे में!

फेरे हैं
दिन-भर
परछाईं के

आए ना
झोंके
पुरवाई के
टोना-सा है
अमलतास
कचनारों में!

फुनगियों तक बेल

फुनगियों तक
बेल चढ़ आई!

बादलों को
टेरती
होती सिंदूरी
देह सौगंधों हरी
मन की मयूरी

इंद्रधनु के
पत्र पढ़ आई!

दूब-अक्षत
फूल खुशबू
धूप गाती
सप्तपदियाँ घोलती
पायल बजाती

नेह के
सौ बिंब गढ़ आई!

मँझधार में रहे

सूखे में
सूखे हम, बाढ़ में बहे,
जहाँ रहे हरदम मँझधार में रहे!

धूप सदा
कच्ची ही कान की रही
खेत-बैल-
फसलें परधान की रहीं
अपने तो कर्ज़ों के
क्रूर अजदहे!

चाहे हो
जनवरी चाहे हो जून
एक जून
रोटियाँ, एक जून सून
बाज़ों की घातों से
रात-दिन सहे!

मुट्ठी में
काग़ज़ से मुड़े-तुड़े हैं
टूट-टूट,
रोज़ कई बार जुड़े हैं
घुन खाई देहों में
लिए कहकहे!

धूप की मिठाई

धूप की मिठाई के दिन
कंबल के दिन, रजाई के दिन,
फिर आए धूप की
मिठाई के दिन!

मफलर की धाक जमी
चले गए छाते,
अब स्वेटर-कोट यहाँ
फिरते इतराते।
बूँदों का खेल खतम
कुहरे की बारी,
थर-थर-थर काँपने की
सबको बीमारी।

सिगड़ी के दिन,
सिंकाई के दिन,
फिर आए आग की
बड़ाई के दिन

इस नगर से 

इस नगर से
आ गए हम तंग।

भीड़ का
पीकर ज़हर हँसते रहो
रोज़ उजड़ो
और फिर बसते रहो
किस तरह के
ये नियम, ये ढंग
इस नगर से
आ गए हम तंग।

थी बहुत
अपनी नदी मीठा कुआँ
खो गए सब
बच रहा काला धुआँ
लग गई है
ज़िंदगी में जंग
इस नगर से
आ गए हम तंग।

ऊँघता बैठा शहर

धूप ने
ढाया कहर

फूल घायल
ताल सूखे
हैं हवा के बोल रूखे,
बो रहा मौसम
ज़हर

धूप ने
ढाया कहर

हर गली
हर मोड़ धोखे
बंद कर सारे झरोखे,
ऊँघता बैठा
शहर

धूप ने
ढाया कहर

कहाँ जाएँ

पथराया नेहों का टाल कहाँ जाएँ
गली-गली फैले हैं जाल
कहाँ जाएँ

देख-देख मौसम के धोखे
बंद किए हारकर झरोखे
बैठे हैं
अंधियारे पाल
कहाँ जाएँ

आए ना रंग के लिफ़ाफ़े
बातों के नीलकमल हाफे
मुरझाई
रिश्तों की डाल
कहाँ जाएँ

कुहरीला देह का नगर है
मन अपना एक खंडहर है
सन्नाटे
खा रहे उबाल
कहाँ जाएँ?

चाँदनी सिसकी

रात भर जागे
सिरहाने नींद धर के।

एक पल को भी नहीं
पतझड़ थमा
आँख में होते रहे
बीहड़ जमा

याद ने किस्से सुनाए
खंडहर के।

चाँदनी सिसकी
कोई सपना दुखा
सिलसिला हम पर
खरोंचों का झुका

लग रहा,
आए बबूलों से गुज़र के।

ज़िंदगी की बात

ऊँघते दिन छटपटाती रात
क्या करें हम
ज़िंदगी की बात

छाँव के छींटे नहीं बस धूप है
हर कदम पर एक अंधा कूप है
छत नहीं
सिर पर खड़ी बरसात
क्या करें हम
ज़िंदगी की बात

क्या कहें इस पार ना उस पार के
हो गए हम नाम केवल धार के
हैं भँवर
कितने लगाए घात
क्या करें हम
ज़िंदगी की बात

नाव काग़ज़ की बनाता है शहर
बाजियों से हम नहीं पाए उबर
जेब में
लेकर चले हैं मात
क्या करें हम
ज़िंदगी की बात

पनघटों पर धूल

गाँव अब
लगते नहीं हैं
गाँव से!

पनघटों में धूल
सूने खेत
घूमते अमराइयों में प्रेत,
आ रही लू, नीम वाली
छाँव से!

ठूँठ अपनापन झरे
मन-पात
कोयलों पर बाज की है घात,
धूप के हैं थरथराते
पाँव से!

खाँसते
आँगन हवा में टीस
कब्र में डूबे घुने आशीष,
लोग हैं हारे हुए हर
दाँव से।

शेष हैं परछाइयाँ

फट गए
सारे गुलाबी चित्र

सूख कर
झरता हरापन
और उड़ती धूल
शेष हैं परछाइयाँ कुछ
दर्द वाले फूल
टीसते हैं
फाँस जैसे मित्र

एक आदमखोर-चुप्पी
लीलती दिन-रात
और
दमघोटू हवाएँ
हर कदम आघात,
खो गए
काले धुएँ में इत्र

फागुन में 

फूल पाने लगी है फागुन में
देह गाने लगी है फागुन में।

सूनी-सूनी उदास खिड़की से
धूप आने लगी है फागुन में।

सीधी सादी सी मखमली बिंदिया
ज़ुल्म ढाने लगी है फागुन में।

क्या करें हम हर एक बंदिश पर
उम्र छाने लगी है फागुन में।

एक भूली-सी मुलाकात हरीश
रंग लाने लगी है फागुन में।

फागुनों की धूप ने

गुनगुनी
बातें लिखीं फिर
फागुनों की धूप ने ।

देह
तारों-सी बजी
कुछ राग बिखरे
तितलियों के
फूल के
हैं रंग निखरे

गन्ध-सौगातें
लिखीं फिर
फागुनों की धूप ने ।

मन उड़ा
बन-पाखियों-सा
नए अम्बर
नेह की
शहनाइयों के
चले मन्तर

स्वप्न-बारातें
लिखीं फिर
फागुनों की धूप ने ।

शब्द पाखी
गीत के
आकाश पहुँचे
पतझड़ों के
रास्ते
मधुमास पहुँचे,

जागती रातें
लिखीं फिर
फागुनों की धूप ने ।

फुलझड़ियाँ लिख देतीं

(1)
मन के
अँधियारों में जलती
एक दीप-सी तुम!

आँखों से छू लेती,
पोर-पोर में जैसे
फुलझड़ियाँ लिख देती

घोर अमावस
के पृष्ठों पर
चाँद-दीप-सी तुम!

बस्ती जब सो जाती,
याद तुम्हारी घर में
शहनाई-सी गाती
भीड़ भरे
इस कोलाहल में
मौन सीप-सी तुम!

(2)
दिए-सा
कब से जल रहा हूँ मैं,
तुम आओ!
चाहे हवा-सी आओ
और बुझा दो मुझे,
यह रंगीन आत्मघात
मंज़ूर है मुझे
क्योंकि
इस बहाने ही सही
तुम मुझे छुओगी तो!

(3)

मन के आकाश पर घिरते
अवसाद के अँधेरे में
तुम्हारी याद
अकसर
किसी पूनम के चाँद-सी
दबे पाँव आती है
और फिर सचमुच!
बे-मौसम
मेरी रग-रग
दीवाली हो जाती है।

बालगीत

पंख दिला दो ना

पंख नहीं मेरे अम्मा
पंख नहीं मेरे।
अम्माँ पंख दिला दो ना।

तितली से मँगवा दो ना,
मोरों से दिलवा दो ना,
गुण गाऊँगी
मैं तेरे!
अम्माँ पंख दिला दो ना।

मिल जाएँ जो मुझको पर
धरती से पहुँचूँ अंबर,
पल में कर लूँ
सौ फेरे!
अम्माँ पंख दिला दो ना।

उड़कर मिलूँ पतंगों से
इंद्रधनुष के रंगों से
घूमूँ परियों
के डेरे!
अम्माँ पंख दिला दो ना।

भइया बस्‍ते जी

थोड़ा अपना वज़न घटाओ
भइया बस्‍ते जी।
हम बच्‍चों का साथ निभाओ
भइया बस्‍ते जी।

गुब्‍बारे से फूल रहे तुम
भरे हाथी से,
कुछ ही दिन में नहीं लगोगे
मेरे साथी से।
फिर क्‍यों ऐसा रोग लगाओ
भइया बस्‍ते जी।

कमर हमारी टूट रही है
कांधे दुखते हैं,
तुमको लेकर चलते हैं कम
ज़्यादा रूकते हैं।
कुछ तो हम पर दया दिखाओ
भइया बस्‍ते जी।

तितली और भौंरा 

तितली रानी,
बड़ी सयानी,
बोली-भौंरे सुन!

ओ अज्ञानी,
पड़ी पुरानी,
तेरी ये गुनगुन!

कालू राजा,
खा के खाजा,
छेड़ नई-सी धुन!

जाड़े की हवा

ठंडी-ठंडी चली हवा
लगे बर्फ़ की डली हवा ।

चुभती है तीरों जैसी,
कल की वो मखमली हवा ।

बाहर मत आना भइया,
लिए खड़ी ‘दो-नली’ हवा ।

दादी कहती मफ़लर लो,
चलती है मुँहजली हवा ।

स्वेटर, कम्बल, कोट मिले,
नहीं किसी से टली हवा ।

गर्मी में सबको भाई,
अब गर्मी में खली हवा ।

बाल कविताएँ

मामी कहाँ हमारी 

चंदा मामा! चंदा मामा
मामी कहाँ हमारी?

रोज अकेले आते हो,
मामी को ना लाते हो,
सच्ची-सच्ची
बात बताओ
ऐसी क्या लाचारी?

क्या वो काली-काली हैं
शायद नखरे वाली हैं
या फिर उनकी
ठीक समय पर
होती ना तैयारी?

या वो मस्त कलंदर हैं?
परियों जैसी सुंदर हैं!
सोच रहे तुम
देख रहे कब से रस्ता,
सपनों का खोले बस्ता,
कभी किसी दिन
हमें दिखा दो
मामी प्यारी-प्यारी!

हवा का गीत 

बोल हवा तू आती कैसे
पेड़ों को लचकाती कैसे?
हाथ-पाँव ना दिखते तेरे
करती रहती फिर भी फेरे,
रंग-रूप को हम लोगों से
कुछ तो बता, छिपाती कैसे?

मीठी-मीठी और नरम-सी
ठंडी-ठंडी कभी गरम-सी
बोली बदल-बदल के अपनी
सबको रोज छकाती कैसे?

आँधी बन के आ जाती हो
सारे जग पर छा जाती हो,
धूल-धुएँ का जादू बनकर
अपना रंग जमाती कैसे?
पुरवाई, पछुआ बासंती
नामों की कोई ना गिनती,
सच कहना तुम इतने सारे
नाम याद रख पाती कैसे?

दिन इमली से

अम्माँ!
लिखा-पढ़ी के दिन क्यों
लगें न अच्छे?
सुबह देर तक
मन करता है सोने को
हँसते-हँसते
यूँ ही अकसर रोने को।
अम्माँ कहाँ गए वो
पल छिन सीधे-सच्चे?
पास बड़ों के बैठो तो-
टोका जाता,
साथ मिनी के खेलो तो
रोका जाता।
अम्माँ!
बड़े हुए हैं, फिर क्यों
रहें न बच्चे
धूप, हवाएँ
चाँद, फूल सब सपनों से।
आँखें रीत नहीं पाती हैं, सपनों से।
अम्माँ!
दिन इमली से झरते कच्चे पक्के!

-साभार: किशोर साहित्य की संभावनाएँ, सं. देवेंद्र देवेश, 204

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