हरीसिंह पाल की रचनाएँ

धरती छोटी है 

न थककर बैठ,
यह धरती तुझसे छोटी है।
कोई ऐसा नहीं थका दे, तेरे थके बिना
सब कुछ है तेरे हाथों में,
खोना-पाना और मिट जाना।
कुछ भी तुझे अलभ्य नहीं है,
यह मंत्र जान ले
जो कुछ है तेरे कर में है,
किस्मत तुझसे छोटी है
न थककर बैठ, यह धरती तुझसे छोटी है।

सब कुछ है जीवन में तेरे
यह गांठ बांध ले
जो कुछ कर लेगा हाथों से,
अपना उसे ही मान ले।
मत मन को मार,
यह सब दुनिया खोटी है
न थककर बैठ, यह धरती तुझसे छोटी है।

जीवन इतना सरल नहीं है,
जितना मान लिया है
सभी तो इतने बुरे नहीं हैं,
जैसा जान लिया है।
कुछ खोकर कुछ पाना होगा,
यह जग की गोटी है।
न थककर बैठ, यह धरती तुझसे छोटी है।

दीपक 

हमारा काम है जलना
चाहे यहाँ जलें, या वहाँ जलें
झोंपड़ी में, महलों या देवस्थान पर।
ये छोटे-मोटे आंधी, तूफान
हमें हिला तो सकते हैं
मगर बुझा नहीं सकते
हम वहीं है, जहाँ पहले कभी थे
राह चलते, बाधा और मुश्किलें
आयीं तो क्या आयीं?
इससे हमारी राहें, क्षणिक ठहरीं जरूर
मगर रुकीं नहीं
यह तो और आगे बढऩे की
अदम्य लालसा बढ़ा गए
हम न झुके कभी, न रुके कभी,
हमारी राह बदली तो
पर चाह नहीं बदली।
वो हम ही थे, जो हम बने रहे
न कभी दीन बने, न कभी हैवान बने।
जीवन में उतार-चढ़ाव आए जरूर
और आगे भी आएंगे
न इनसे हम तब घबराए थे
और न अब घबराएंगे
जिंदगी चुक थोड़े जाती है
मौसमी आँधी-तूफान से।
हम तब भी प्रकाश देते रहे
आगे भी देते रहेंगे।

अपनी डाल

ये जो फूल झड़ रहे हैं
अपनी डाल से
झडऩा ही इनकी नियति है।
अपनी डाल से बिछुडऩा ही
प्रकृति है इनकी।
आखिर सभी की होती है
अपनी कालावधि
उसमें हर कोई अपनी
सुगंध, प्रकाश और यश
बिखेरता है, दिखलाता है।
डाल से बिछुडऩे पर हर फूल
भौतिक रूप में मर जाता है,
मगर उसकी फैलायी सुगंध
लोगों के मन-मस्तिष्क में समा जाती है।
और वायुमंडल में तिरती है।
नव सृजन के लिए, नवनिर्माण के लिए
उन्हें अपना अस्तित्व
नए में विलीन करना ही होगा,
फूलों को डाल से झडऩा ही होगा।
ये जमीन पर बिखरे फूल
हम सभी की तो कहानी कह रहे हैं
बता रहे हैं, एक दिन
तुम भी झड़ जाओगे
अपनी जीवन डाल से हमारी तरह,
मानव सृष्टि के नवनिर्माण
और विकास के लिए।

रिश्ते 

राह के रिश्ते
याद के बादल
कब तक टिक पाते हैं
समय बीत जाने पर बह जाते हैं,
अतीत की बाढ़ में।
मगर होता है उनका भी अस्तित्व
समय के पृष्ठ पर होती है उनकी भी मुहर
ये हमारे चाहने या नहीं चाहने से
मिट नहीं जाते, बस धुंधले हो जाते हैं
राह की बातें, राह की घातें, दे जाती हैं यादें
घर आकर रह जाती हैं बस उनकी यादें-दर-यादें
किंतु घर, घर होता है, राह नहीं
और राह को घर नहीं बनाया जा सकता
राह तो मंजिल पर पहुंचने का
माध्यम भर होती है।
जबकि घर, मंजिल होता है
एक ऐसी मंजिल, जो तन और मन को तृप्ति देती है।
इसलिए घर को घर ही रहने दें, राह न बनाएं
यदि राह बन गयी तो, मंजिल राह में भटक जाएगी।
मंजिल को भटकने से बचाने के लिए
राह को राह ही रहने दें
राह काटने के लिए होती है,
बसने या बसाने के लिए नहीं।

आस्था और विश्वास

यह आस्था,
यह विश्वास
कहीं बिकते नहीं, कहीं मिलते नहीं
उपजते हैं अंतर्मन से
उखड़ते हैं अंतर्मन से।
ईश्वर कहीं बिकते नहीं, कहीं मिलते नहीं
ईश्वर कहीं जाते नहीं, आते नहीं कहीं से
हमारे अंतर्मन में बैठे हैं वह
हमारे अंतर्मन की आवाज से ही
साकार होते हैं।
वह कहीं सोए नहीं, कहीं खोए नहीं
खोए हैं हम, सोये हैं हम
यह आस्था, यह विश्वास
और यह ईश्वर, खुदा, गॉड,
जहाँ थे कभी, आज भी हैं वहीं
हमारे मतिभ्रम ने दूर कर दिया है इन्हें
बेच दिया है, दान में दे दिया है
चोरी कर लिया है, कैद कर दिया है
मंदिर, मस्जिद और गिरजाघर में
फिर ढूंढ़ते हैं उसे गली-गली,
पहाड़ों और रेगिस्तानों में
ऐसे कोई पा सका है
ईश्वर की आस्था को
और विश्वास को!

कभी

इतने संघर्षों,
इतने अनवरत प्रयासों के बावजूद
अगर कुछ नहीं बन पाए
तो क्या अपनी ही कमी है?
अपना ही दोष है?
अपना कर्मफल है,
क्या उस नियन्ता का नहीं?
जो इस जगत को नियंत्रित कर रहा है।
अगर हम नियंत्रित हो रहे थे
तो क्या उसका दायित्व नहीं था
हमें नियंत्रित करने का?
सही मार्ग पर लाने का!
उस निर्माता का दोष नहीं
उसने हमें अधूरा बनाया ही क्यों?
वह उसकी कमजोरी नहीं
यह सब कुछ जानते हुए भी,
अनजान बना रहा।
क्या उस परमेश्वर-पालक का दोष नहीं
जिसने हमें ठीक से पाला ही नहीं
हम तो किए ही जाएंगे, अपना कर्म
उसका फल अच्छा मिले या बुरा
मगर ऐ नियन्ता, निर्माता और पालक,
क्या बच पाओगे इस दायित्व से।
तुम्हारी छत्रछाया में पलते हुए भी,
हम अधूरे ही क्यों बन पाएं?

दु:ख के दिन 

जब जानेंगे अपने को
जब पहचानेंगे अपने को
तो मन के सब भ्रम मिट जाएंगे
रात की कालिमा कट जाएगी।
कोई पुराना पल कब तक रह पाता है?
सपनों के आगे रास्ता नहीं है
यथार्थ के आगे आंखें तो खोलें।
उठ खड़े होकर अपने को तोलें
समझ लें अपने को धीर भी, वीर भी
अपना भाग्य-निर्माता और कर्मवीर भी।
ये मन के भ्रम ही तो हैं
जो आगे बढऩे नहीं देते
अपने ही बनाए हवाई किलों से
अंतर्मन में झांककर तो देखें
हर कोई मित्र हैं, हर कोई अपना है
हंसना, मुस्कराना तो अपना है
चाहे जिसे अपना बना लें
फिर यह कैसी उदासी?
इसे अपने मन की खुशी से सजा लें
सब भ्रम मिट जाएंगे
दु:ख के दिन टल जाएंगे।

अपूर्णता तेरा स्वागत

पूर्णता है कहाँ?
यदि पूर्ण हो ही गया
तो शेष क्या रहा?
पूर्ण होने पर
संसार ही असार है।
इसीलिए अपूर्णता
तेरा स्वागत है।
तुझ में ही तो
संसार चक्र चल रहा है।
सभी गतिशील हैं
प्रयत्नशील हैं,
सक्रिय हैं पूर्णता पाने को।
परंतु मिल कहाँ पाती है?
अधूरापन लिये सब जी रहे हैं।
अधूरे सपने, अधूरे संकल्प
जीवन इन्हीं में व्यतीत हो जाता
और मृत्यु के आलिंगन में
मिल जाती है पूर्णता।

पूर्णता की ओर

हमारे कार्य,
हमारे प्रयत्न,
एक सीमा के अंदर हैं
कहीं भी, कभी भी लगता नहीं
हम पूर्णता के निकट आ गए हैं,
यह अधूरापन ही तो पूर्णता
की ओर ले जा रहा है।
असंतुष्टि ही नवीनता
तक पहुंचाती रही है।
अभाव ही हमें प्रयत्नशील
और उद्यमी बनने की प्रेरणा देता है
यही बनाता है हमारा कर्तव्य
और उत्तरदायित्व,
इसी से पाते हैं अधिकार।
प्रयत्न के प्रति जागरूकता
ही तो जीवन का नाम है
यह जागरूकता ही तो
हमें ‘हम’ बनाती है
यह वैसी ही होती है
जैसा हम करते हैं
जैसा हम विचारते हैं।
यही हमें पूर्णता
की ओर
ले जाती है।

समझौता

समझौता
आज हो या कल
करना ही पड़ता है
सिर झुकाना ही पड़ता है आज हो या कल।
कब तक बचेंगे, कब तक छिपेंगे
टकराना पड़ेगा, जब यथार्थ से।
झुक जाएंगे या झुका ही लेंगे
टूट जाएंगे या तोड़ ही देंगे
वक्त की पुकार पर चलना ही पड़ेगा।
सुनाया है किसी को तो
सुनना ही पड़ेगा।
रुलाया है किसी को तो
रोना भी पड़ेगा।
हमें कोई जानता नहीं?
कोई तो हमें जान ही लेगा।
किसी ने हमें देखा नहीं?
कोई तो हमें देख ही लेगा
फिर? फिर?
समझौता करना ही पड़ेगा
उससे नहीं तो किसी और से
और नहीं तो प्रकृति से
तब दर्प टूट जाएंगे, दम्भ मिट जाएंगे
हम हैं क्या आखिर कच्ची मिट्टी के बने घड़े ही न?
समझौते से आखिर कब तक बचेंगे
कभी-न-कभी तो किसी-न-किसी से
करना ही पड़ेगा
समझौता।

मिट्टी को प्रणाम

गाँव की मिट्टी
को प्रणाम!
उसकी सौंधियाती गंध
आज भी मन-मस्तिष्क
में समाहित है
वह मिट्टी का घर
जिसमें जन्म हुआ
पुरानी दीवारों से झरती मिट्टी,
उड़ती मिट्टी का स्पर्श
तन को छूकर अपनापा जोड़ गया
घुटनों के बदल रेंगते हुए
सीखा चलना, मां की गोद के लिए
घिसटना सीखा,
फिर जमीन की मिट्टी को चाटना सीखा
मिट्टी का स्वाद, मां के दूध से कुछ अलग था
यही तो वो स्वाद जाने थे बचपन में
एक जन्मदात्री के दूध का
दूसरा धरती मां का।
फिर इसी मिट्टी में
नन्हें-नन्हें पद-चिन्ह बनाए
खेल-खेल में खुद ही बिगाड़े
अंगुली से मिट्टी पर
अनजान और अनाम आकृतियां बनायीं
जो बाद में अक्षर बनाने
के काम आयीं।
उस मिट्टी ने
बचपन में प्रतिरक्षण का काम किया
किसी ओझा सयाने, पंडे-पुजारी ने
रजकण को अभिमंत्रित कर
साधारण से गंभीरतम रोगों तक
छुटकारा दिलाने का उपक्रम किया था
रोग तो ठीक हो गया या घाव भर गया
इसी मिट्टी के बल पर।
मिट्टïी में आकृतियां खींचकर
सजाए और संवारे भविष्य के सपने
जो बने कम, चूर-चूर ज्यादा हुए
उसी मिट्टी पर शायद
किशोरावस्था की प्रेमिका का भी नाम
उकेर दिया और मन साधते रहे
पर उससे बात तक न हुई।
चौमासे में, पानी भरे खेतों की मेंड़ पर
दौड़ते हुए, मिट्टी पर पैर साधते हुए
आगे बढ़े थे, तब इस मिट्टी ने ही
बल दिया था, चलने का, फिर दौडऩे का
और फिर सुस्ताने का
जेठ की लू और धूलभरी आंधी ने
भूगोल का व्यावहारिक ज्ञान कराया था।
विद्यालय जाते हुए
और खेत पर जाते हुए
या वैसे ही मौज-मस्ती के लिए घूमते हुए
इन्हीं रजकणों ने अपना अस्तित्व जताया था
ये रजकण कितने मुंह में गए
और कितने आंखों में
इसका हिसाब कोई नहीं।
लगता है खाने से ज्यादा मिट्टी
चबाई थी और यह शरीर बना है
अपने गांव की ही मिट्टी से
इसी मिट्टी में
हंसते, खेलते-मुस्कराते
हठीलें, गर्वीले, इठलाते,
मदमाते शरीरों को मृत्युपरान्त
मिट्टी होते देखा है।
लोगों ने खेत बांटे, मकान बांटे
धन-संपत्ति बांटी, कुछ न बेटे-बेटी
और कुछ न मां-बाप ही बांट लिये
पर कोई बांट पाया है मिट्टी को
इसे बांटने वाले भी एक दिन मिट्टी में मिल जाते हैं।
बंटवारा रह जाता है, जमीन पर
मन बंट जाते हैं, पर मिट्टी नहीं बंट पाती
बंट भी गयी तो फिर मिलकर
एक हो जाती है मिट्टी।
मिट्टी मेरे खेत की रही हो,
या फिर शहर की
मिट्टी-तो-मिट्टी ही होती है
सिर्फ गंध का ही तो फर्क होता है
गांव की मिट्टी सौंधियाती है
तो शहर की मिट्टी गंधियाती है
डीजल पेट्रोल और धुएं की गंध से।
मकान यहाँ भी बने हैं
झुग्गी झौपड़ी से लेकर बहुमंजिली इमारतों तक
पर क्या मिट्टी के बिना
इनका कोई अस्तित्व भी है?
शायद नहीं, एक-न-एक दिन धराशाही होकर
इन्हें मिट्टïी में ही मिल जाना है।
क्या इस मिट्टïी से कभी उऋण
हुआ जा सकता है?
क्या इसका स्वाद भुलाया जा सकता है,
और इसका स्पर्श झुठलाया जा सकता है?
यह मिट्टी है महान
जो हमें जीवन भी देती है,
और अंत में अपनी गोद में शरण भी
यह मिट्टी प्रणम्य है।

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