हिमांशु पाण्डेय की रचनाएँ

क्यों रह रह कर याद मुझे आया करते हो?

नीरवता के सांध्य शिविर में
आकुलता के गहन रूप में उर में बस जाया करते हो ।
बोलो प्रियतम क्यों रह रह कर याद मुझे आया करते हो ?

आज सृष्टि का प्रेय नहीं हिय में बसता है
मिले हाथ से हाथ यही जग का रिश्ता है
अब कौन कहाँ किसके दिल में बैठा करता है ,
पर तुम मानस के गहन निविड़ में
मधु सौरभ के सघन रूप में आकर बह जाया करते हो –
बोलो प्रियतम क्यों रह रह कर याद मुझे आया करते हो ?

तार प्रीति के आज कहाँ जुड़ते हैं स्नेही
प्रेम-ज्योति के दीप कहाँ जलते हैं स्नेही
स्नेह समर्पित लोग कहाँ मिलते हैं स्नेही,
पर तुम जीवन की श्वांस रूप में
औ’ श्वांसों के लघु कम्पन में आ कुछ कह जाया करते हो –
बोलो प्रियतम क्यों रह रह कर याद मुझे आया करते हो ?

आँखों से आँसू बह आया, तेरी याद आ गयी होगी

आँखों से आँसू बह आया, तेरी याद आ गयी होगी ।

घबराना मत यह आँसू ही कल मोती बन कर आयेंगे
विरह ताप में यह आँसू ही मन को शीतल कर जायेंगे,
शायद यह आँसू ही पथ हों महामिलन के महारास का –
इस चिंतन से सच कह दूँ ,पलकों पर बाढ़ आ गयी होगी,
तेरी याद आ गयी होगी ।

इस आँसू में ही ईश्वर बन प्रेम बहा करता है
इस आँसू में ही प्रियतम का क्षेम रहा करता है,
जब उर में प्रिय छवि बसती, इन आँखों से आँसू बहते है –
नीर बहें प्रिय हेतु कहें भीतर यह बात आ गयी होगी ,
तेरी याद आ गयी होगी ।

मुझमें जो आनंद विरल है

मुझमें जो आनंद विरल है
वह तुमसे ही निःसृत था और तुम्हीं में जाकर खोया ।

घूमा करता हूँ हर पल, जीवन में प्रेम लिए निश्छल
कुछ रीता है, कुछ बीता है, झूठा है यह संसार सकल
यह चिंतन जो बहुत विकल है
वह तुझसे ही उलझा था और तुम्हीं से जाकर रोया ।

सच कहता हूँ वृक्ष बनेंगे मेरे अतल प्रेम के बीज
सच कहता हूँ आयेंगे इस छाया में हर प्रेमी रीझ
मेरा यह जो बीज सबल है
वह तुमसे ही पाया था और तुम्हीं में जाकर बोया ।

जो आँसू थे, हास बनेंगे और मगन हम नाचेंगे
और ढालेंगे सभी स्वप्न सच्चाई के सुधि सांचे में
जो मेरा यह विश्वास प्रबल है
वह तुझसे ही उपजा था औ’ तुझमें ही जाकर संजोया।

मैं सपनों का फेरीवाला 

मैं सपनों का फेरीवाला, मुझसे सपन खरीदोगे क्या ?

यह सपने जो चला बेचने, सब तेरे ही दिए हुए हैं,
इन सपनों के चित्र तुम्हारी यादों से ही रंगे हुए हैं;
मैं प्रिय-सुख ही चुनने वाला,मुझसे चयन खरीदोगे क्या ?

कहाँ कहाँ के चक्कर करता द्वार तुम्हारे आ पाया हूँ
जहाँ जहाँ भी गया खोजते, वहीं गया मैं भरमाया हूँ ;
मैं स्मृति में रोने वाला, मुझसे रुदन खरीदोगे क्या ?

लो तुम्हें समर्पित करता हूँ यह स्वप्न बिचारे, बुरे-भले
तुमको ही इन्हें सजाना है ले लो इनको बिन दाम भले ;
मैं जिनसे स्वप्न देखता आया, मुझसे वह नयन खरीदोगे क्या ?

यह कैसा संवाद सखी!

यह कैसा संवाद सखी ?

प्रेम-विरह-कातर-मानस यह तेरी दरस सुधा का प्यासा
इसके अन्तर में गुंजित है प्रिय के दर्शन की अभिलाषा
जब भी मोह-मथित-मानस यह तुम्हें ढूंढता,तुम छिपते हो
सच बतलाना अतल प्रेम का यह कोई अनुवाद सखी ?
यह कैसा संवाद सखी ?

आज तुम्हारे द्वार गया था नेत्र तुम्हीं पर जा कर ठहरे
सौरभ का वातास खुला हम प्रेम-वारि में गहरे उतरे
मैं वार गया अपनी पलकों पर, तुम पलकों से हार गए
इन आँखों का अंतर्मन से यह कैसा हुआ विवाद सखी ?
यह कैसा संवाद सखी ?

बोलो कैसे रह जाते हो तुम बिन बोले

बोलो कैसे रह जाते हो तुम बिन बोले
जब कोई स्नेही द्वार तुम्हारे आकर तेरा हृदय टटोले ।

जब भी कोई पथिक हांफता , तेरे दरवाजे पर आए
तेरे हृदय शिखर पर अपनी प्रेम-पताका फहराए,
जब तेरी आतुरता में , कोई भी विह्वल मन डोले –
बोलो कैसे रह जाते हो तुम बिन बोले ।

जब भी कोई तुम्हें समर्पित, तुमको व्याकुल कर जाता है
तेरे मन की अखिल शान्ति में करुण वेदना भर जाता है ,
जब भी कोई हेतु तुम्हारे, हो करुणार्द्र नयन भर रो ले –
बोलो कैसे रह जाते हो तुम बिन बोले ।

क्यों न मेरा यह हृदय मूक-सा रहने दिया

क्यों न मेरा यह हृदय
मूक सा रहने दिया ?

क्या करुँ उस अग्नि का
निशि-दिन जले जो इस हृदय में
क्या करुँ उस व्यग्रता का
जा छिपी जो उर-निलय में
क्यों असीमित यह प्रणय
बहु-रूप सा रहने दिया ?

तारकों की तूलिका से
रंगा है, वो व्यथा का आकाश है
घन-तिमिर की लहर में
आंसुओं के कमल का आवास है
क्यों न स्मृति-निलय मेरा
शून्य-सा रहने दिया ?

क्यों न मेरा यह हृदय
मूक-सा रहने दिया ?

मैं हुआ स्वप्न का दास

मैं हुआ स्वप्न का दास मुझे सपने दिखला दो प्यारे ।
बस सपनों की है आस मुझे सपने दिखला दो प्यारे ॥

तुमसे मिलन स्वप्न ही था, था स्वप्न तुम्हारा आलिंगन
जब हृदय कंपा था देख तुम्हें, वह स्वप्नों का ही था कंपन,
मैं भूल गया था जग संसृति
बस प्रीति नियति थी, नियति प्रीति
मन में होता था रास, मुझे सपने दिखला दो प्यारे ।

सपनों में ही व्यक्त तेरे सम्मुख था मेरा उर अधीर
वह सपना ही था फूट पडी थी जब मेरे अन्तर की पीर,
तब तेरा ही एक सम्बल था
इस आशा का अतुलित बल था
कि तुम हो मेरे पास , मुझे सपने दिखला दो प्यारे ।

सोचा था होंगे सत्य स्वप्न, यह चिंतन भी अब स्वप्न हुआ
सपनों के मेरे विशद ग्रंथ में एक पृष्ठ और संलग्न हुआ ,
मैं अब भी स्वप्न संजोता हूँ
इनमें ही हंसता रोता हूँ
सपने ही मेरी श्वांस, मुझे सपने दिखला दो प्यारे ।

मेरी समझ नहीं कि ये कमाल कर सकूं 

इस छ्लना में पड़ी रहूं
यदि तेरा कहना एक छलावा.

तेरे शब्द मूर्त हों नाचें
मैं उस थिरकन में खो जाऊं
तेरी कविता की थपकी से
मेरे प्रियतम मैं सो जाऊं
अधर हिलें मैं प्राण वार दूं
यदि उनका हिलना एक छलावा.

प्रिय तेरे इस भाव-जलधि में
मैं डूबी, बस डूबी जाऊं
तेरी रसना के बन्धन से
मैं असहज हो बंधती जाऊं
इन आंखों पर जग न्यौछावर
यदि इनका खुलना एक छ्लावा.

सारी चाह हुई है विस्मृत
केवल एक अभिप्सित तू है
प्रेम-उदधि मेरे प्राणेश्वर
मेरा हृदय-नृपति तो तू है
प्रतिक्षण मिलन-गीत ही गाऊं
यदि तेरा मिलना एक छलावा.

नहीं, प्रेम है कार्य नहीं

प्रेमिका ने कहा था-“प्यार करते हो मुझसे?” प्रेमी ने कहा-“प्यार करने की वस्तु नहीं. मैं प्यार ’करता’ नहीं, ’प्यार-पूरा’ बन गया हूं.
यहां इसी संवाद का विस्तार है-

कहने वाला कह जाता है सुनने वाला सुन लेता है
लेकिन कहने और सुनने में कहीं विभेद छिपा होता है
कहने वाला तो सीधे ही मन की बातें कह जाता है
भाषा को अनुकूल बनाना भावप्रवण को कब आता है?
पर सुनने वाला तो केवल शब्दों की ही बात जानता
कहां भाव है, कहां अर्थ है, क्या प्रतीति है? नहीं जानता
वह तो निर्णय ले लेता है बिन विमर्श के लगातार
कहने वाला पा जाता है बिना हार के अपनी हार .

मैने भी जो प्रश्न किया था क्या वह साधारण लगता था?
बिना भाव के प्रेम तत्व का, क्या वह निर्धारण लगता था?
अरे, प्रेम तो पूजा है यह खिलता फ़ूल हृदय के भीतर
मन से मन मिलते ही बहता प्रेम रूप निर्झर सुन्दर
निर्धारण है नहीं प्रेम में, प्रेम बड़ी अनजान डगर है
’मैं को छोड़ प्रेम में आओ’ यही प्रेम का विह्वल स्वर है
कहा आपने प्रेम पूर्ण बन सको तभी कुछ हो सकता है
प्रेम बनाकर कार्य कोई क्या प्रेम हृदय में बो सकता है?
नहीं, प्रेम है कार्य नहीं, है एक अवस्था – यही सही
नहीं पूछ पायी जो मन में, बात गलत वह निकल गयी.

कोई कुछ यदि कहना चाहे और नहीं वह कह पाता है
तो उसके मन के भीतर कहने का दर्द छिपा होता है
मेरी भी है दशा वही, कहना है ना जाने क्या- क्या?
पर सत्य कहूं तो शब्द नहीं हैं ढूंढ़ रही हूं यहां-वहां.

जब कुछ भी कहने लगती हूं, यह लगता है कहीं कमी है
अगले ही पल भय लगता है, कहीं यही तो अधिक नहीं है?

प्रेम-पत्र का प्रेमपूर्ण काव्यानुवाद

अब तक जो मैं हठ करती थी, हर इन्सान अकेला होता
मुझे पता क्या था जीवन यह अपनों का ही मेला होता.
यही सोचती थी हर क्षण केवल मनुष्य अपने में जीता
उसके लिये नहीं होता जग, ना वह किसी और का होता.

किसी एक का, किसी एक से मिलना परम असम्भव है
अलग-अलग दो अस्तित्वों का होना एक कहां सम्भव है?
ऐसे भाव भरे थे मन में मैं बेकल होकर जीती थी
एकाकी मैं किससे कहती मुझ पर कब क्या-क्या बीती थी?

तभी-तभी तो तुम आये थे, सत्य मिला था, सत्व मिला था
मेरे अन्तस में भी तेरे वृहत रूप का फ़ूल खिला था
अब तो प्रियतम दशा वही है, भूल गयी हूं निज को अपने
विस्मृत जग है, कण-क्षण विस्मृत,पाकर इस सुरभित को अपने

बस करती हूं, आज यहीं तक, प्राण! मुझे रह जाने दो
अपने प्रेम-सरित को मेरे हृदय जगत पर बह जाने दो

कविता लम्बी है, पर क्या करुँ कहानी है 

नीचे की कविता, कविता नहीं, कहानी है । नीतू दीदी की कहानी कह रहा हूँ मैं । मेरे कस्बे के इकलौते राष्ट्रीयकृत बैंक में कैशियर होकर आयी थीं और पास के ही घर में किराए पर रहने लगीं थीं । सहज आत्मीयता का परिचय बना-कब गूढ़ हुआ- मैंने नहीं जाना। कुल छः महीने रहीं नीतू दीदी। ट्रांसफर हो गया उनका। पर इन छः महीनों में नीतू दीदी के भीतर का अनंत गह्वर मैंने पहचाना। उस चुलबुली चिड़िया के अन्तर में चिपकी हुई बेचैनी मैंने महसूसी। एक दिन बाँध ढहा, सब कुछ बह निकला- बातों ही बातों में। अब मैं जान गया था, नीतू दीदी ने तब तक शादी क्यों नहीं की थी? वह कभीं भी शादी क्यों नहीं करेंगी? जो उन्होंने मुझसे कहा, ज्यों का त्यों यहाँ –

यह खेल नियति का देखो, कितना विपुल कष्टदायी है
विकल हुआ है हृदय, आज प्राणों पर बन आयी है
जो सौभाग्य पुष्प था अपना वही हृदय का शूल हुआ है
जो उर में उल्लास रूप था वह कष्टों का मूल हुआ है
तरु की छाया समझ रही थी, वह तो दुःख की कठिन धूप है
जो उल्लास समझ बैठी थी, वह तो केवल विजन रूप है
इस संसार सकल में इतना, कहाँ कहाँ कैसा संशय है
सरल रूप में हुआ दृष्टिगत, पर देखो कितना विस्मय है?

खूब घिरे थे बादल , लेकिन बिन बरसे ही चले गए
हम भी कैसी तृप्ति आस से विस्मित होकर छले गए
आज दूर निज से होकर बेचैन हुआ जाता है मन
प्रेम वारि से विलग कहाँ होकर रह पाता है जीवन ?

िन्हें हृदय का अधिपति समझा, उनसे क्या यह प्रत्याशा थी?
क्या मुझको समझाने लायक, केवल एक यही भाषा थी ?
क्या क्षणभर में ही खो बैठे, अपनी दृढ़ता, अपना चिंतन ?
क्या भूल गए जो कभी दिया था मुझको वह अनमोल वचन-
“जग छूट जाय परिवार सही, पर हम न विलग हो पायेंगे
अपनी नीरवता में ही हम आनंद सुधा बरसाएंगे ”
क्या यह छल था? किया बात से तुमने जी भर कर सम्मोहित
मैं विरहित मोहित हो बैठी आज कंटकों से हूँ लोहित ।

यह सत्य, विरह में प्रेम हृदय में संचित होकर रह पाता है
यह सत्य, मिलन में प्रेम ‘प्रेम’ की आंखों से बह-बह जाता है
पर मिलन कहाँ, है विरह कहाँ, यह तो है मुझ पर अनाचार
क्या किया नहीं कुछ भी विचार, मैं आज पडी हूँ निराधार!

उस दिन की याद करो क्षण भर, जब रूप-राशि विस्मित थे हम
आलोक-बिन्दु हिय में संचित था, कण-कण में सुरभित थे हम
गूंजा करता था सजल गान, यह प्रकृति मधुर मुस्काती थी
तुम खो जाते थे शून्य बीच, मैं भी अनंत खो जाती थी
उन प्राणों का कहना क्या था, नर्तन करता आनंद वहाँ
सोचो! जब प्रमुदित हो मानस, स्वीकार तब वह बंध कहाँ?
कैसी अनूप थी, साग्रह थी, अपनी यह प्रेम-पिपासा भी
हो उत्सर्ग प्राण तेरे हित मन की यह अभिलाषा थी
पर हाय! हमारी रूचि कितनी शुचिहीन प्रतिष्ठित होकर आयी
तेरी छवि भी हृदय-मध्य की प्रेम-प्रतिष्ठा खोकर आयी ।

तुम पर तो होकर न्यौछावर हम सब कुछ थे वार गये
पर सत्य कहो, क्यों इस समाज के लघु चिंतन से हार गये
यह समाज तो कहने को केवल अपनों का मेला होता
सत्य कहूं तो इस समाज में हर एक व्यक्ति अकेला होता
पर एक अनोखी बात! प्रीति की रीति जिसे भी आ जाती है
और जिसे यह प्रीति हृदय की विरद नीति समझा जाती है
उसे अकेलेपन का भय भी कहाँ सता पाता है क्षण भर?
वह तो इस एकाकीपन को ही जीता रहता है जीवन भर
और इसी एकाकीपन में हृदय द्वार जब आता कोई
अंधेरी-सी नीरवता में गीत रश्मि बिखराता कोई
तब उस मनभावन का दर्शन, भर देता है उर में कम्पन
और इन्ही कम्पन-पंखों पर उड़ता है प्रेमी का निज-मन
फ़िर तो एकाकीपन अपने हीन भाग्य पर रोने लगता
डूब रास में उर के स्नेही एकाकीपन खोने लगता ।

मन दर्पण हो जाता है, प्रिय शशि मुख दर्शन को तत्पर
विकसित होता लावण्यधाम का प्रीति-पुष्प उर के भीतर
नर्तन करता कण-कण,क्षण-क्षण,बिसरा-सा होता यह तन-मन
प्रिय के हेतु स्वयं का प्रिय ही होता है शाश्वत जीवन धन ।

यह धन ही जब निज जीवन से अनायास दूर हो जाए
बोलो! प्यासा बिन पानी के कैसे क्षण भर भी जी पाये
और किया क्या था मैंने जो तुमने यह परिणाम दे दिया
जिउं सिसकती जीवन भर, मुझको वैसा आयाम दे दिया ।

निश्चय ही जीना अब तो केवल बस एक बहाना है
मैं व्यर्थ नहीं हूँ धरा-धाम पर, तुमको तथ्य बताना है
यह जानो, नारी भले ही सबकुछ पत्थर रखकर सह लेती है
मिली परिस्थिति जो भी उसमें निर्देशित वह रह लेती है
फ़िर भी वामा है सत्व धारिणी, संचित उसमें है शक्तिधाम
संयम की वह मूर्ति रूपिणी, ममता-प्रेम उसी के नाम
दिखलाउंगी नारी क्या है? खाती हूँ यह अनिवार्य शपथ
फ़िर भी जैसे हो स्नेह-विगत! आलोकित हो तेरा आगत-पथ ।

स्नेहिल मिलन की सीख दे दो 

फ़ैली हुई विश्वंजली में , प्रेम की बस भीख दे दो
विरह बोझिल अंत को स्नेहिल मिलन की सीख दे दो ।

चिर बंधनों को छोड़ कर क्यों जा रही है अंशु अब
अपनी विकट विरहाग्नि क्यों कहने लगा है हिमांशु अब
सुन दारुण दारुण व्यथा सब नव वर्ष अपनी चीख दे दो ।
विरह बोझिल अंत को स्नेहिल मिलन की सीख दे दो ।

ज्यों डूब जाता है सुधाकर , विश्व को आलोक दे
फ़िर उदित होता नवल वह सब दुखों को शोक दे
बढ़ते रहें आगे सदा, नव वर्ष अपनी लीक दे दो ।
विरह बोझिल अंत को स्नेहिल मिलन की सीख दे दो।

परिवर्तन आने वाला है

बज गयी दुन्दुभि, परिवर्तन आने वाला है ।

है निस्सीम अगाध अकल्पित, समय शून्य का यह विस्तार
प्रिय देखो वह चपल विहंगम चला जा रहा पंख पसार
‘काल अमर है’ का संकीर्तन यही विहग गाने वाला है ।

वह देखो गिर रहे दुखों के पीत-पात झर-झर सत्वर
उर में भी गुंजरित हो रहा मधुरिम सुख का मादक स्वर
इसी हास के शैशव का अल्हड़पन अब आने वाला है ।

जीवन के कितनों रंगों से निज मन को रंगता आया हूँ
पर ‘स्नेहिल’ तेरी स्मृति से दूर नहीं मैं जा पाया हूँ
तेरी मधु यादों का संचन अंतर्मन करने वाला है ।

जो बीत गया है उसे नशे की रात समझ लो स्नेहिल साथी
जो आयेगा उसे हृदय की बात समझ लो स्नेहिल साथी
आगत क्षण में हर प्रेमी ही प्रीति सुरा पीने वाला है ।

आशा है हम विहंसेंगे ही प्रेम हास से बिंध जायेंगे
माधुर्य-समर्पण-प्रीत त्रिवेणी निज मानस में लहराओगे
नया वर्ष मंगलमय होकर सब पर सज जाने वाला है ।

परिवर्तन आने वाला है ।

मैं, मैं अब नहीं रहा

मैं, मैं अब नहीं रहा, तुम ही तो हूँ ।

बहुत भटकता रहा खोजता
अपने हृदय चिरंतन तुमको
जो हर क्षण आछन्न रहे
ओ साँसे के चिर बंधन तुमको ,
मैं जाग्रत अब नहीं रहा, गम ही तो हूँ ।
मैं, मैं अब नहीं रहा, तुम ही तो हूँ ।

इस जीवन के कठिन समर में
तुम संबल बन कर आए हो
दुःख की ऐसी विकट धूप में
सुख-छाया बन कर छाये हो,
मैं ना कुछ भी विषम रहा, सम ही तो हूँ।
मैं, मैं अब नहीं रहा, तुम ही तो हूँ ।

क्यों न मेरा यह ह्रदय मूक-सा रहने दिया 

क्यों न मेरा यह हृदय
मूक सा रहने दिया ?

क्या करुँ उस अग्नि का
निशि-दिन जले जो इस हृदय में
क्या करुँ उस व्यग्रता का
जा छिपी जो उर-निलय में
क्यों असीमित यह प्रणय
बहु-रूप सा रहने दिया ?

तारकों की तूलिका से
रंगा है, वो व्यथा का आकाश है
घन-तिमिर की लहर में
आंसुओं के कमल का आवास है
क्यों न स्मृति-निलय मेरा
शून्य-सा रहने दिया ?

क्यों न मेरा यह हृदय
मूक-सा रहने दिया ?

कहाँ हो मेरे मन के स्वामी आओ?

कहाँ हो मेरे मन के स्वामी आओ,
मैं हूँ एक अकिंचन जग में प्रेम-सुधा बरसाओ ।

आज खड़ा है द्वार तुम्हारे तेरी करुणा का यह प्यासा
दृष्टि फेर दो कुछ तो अपनी दे दो अपना स्नेह दिलासा
हे मेरे जीवनधन मुझको, यों ना अब तरसाओ ।
कहाँ हो मेरे मन के स्वामी आओ ?

मैं पुकारता क्षण-क्षण तुमको और विरह के गीत गा रहा
होता यह आभास प्राण-प्रिय हृदय-वीथि में चला आ रहा
होकर प्राण-प्रतिष्ठित हिय में मुझको धन्य-धन्य कर जाओ ।
कहाँ हो मेरे मन के स्वामी आओ ?

यह अनुरागी चित्त जी सकेगा यदि तुम स्मित बिखेर दो
मुझ-से शुष्क तृषित जीवन पर रस्दायिनी दृष्टि फेर दो
मुसका दो, आलिंगन में लो, अन्तर्यामी आओ ।
कहाँ हो मेरे मन के स्वामी आओ ?

तुम ही पास नहीं हो तो

तुम ही पास नहीं हो तो इस जीवन का होना क्या है ?

मेरे मन ने खूब सजाये दीप तुम्हारी प्रेम-ज्योति के
हुआ प्रकाशित कण-कण अन्तर गूंजे गान स्नेह प्रीति के
पर जो यथार्थ थे, स्वप्न हुए, तो अब बाकी खोना क्या है ?
तुम ही पास नहीं हो तो इस जीवन का होना क्या है ?

तेरे मधु-उपकारों से ही अब तक जीवन चलता आया
तुम हो तब ही प्राण-वायु है, तुममें तम-सा घुलता आया
तुम हो नहीं, कहाँ जीवन है? अब इसको ढोना क्या है ?
तुम ही पास नहीं हो तो इस जीवन का होना क्या है ?

सोचा था तेरे प्रेम बीज बोऊँगा उर के अंचल में
फ़िर तरु निकलेंगे दीर्घकाय सुख झूलेगा मन चंचल में
पर जब माटी ही उसर हो तो बीजों का बोना क्या है ?
तुम ही पास नहीं हो तो इस जीवन का होना क्या है ?

रचना क्या है?.

“रचना क्या है, इसे समझने बैठ गया मतवाला मन
कैसे रच देता है कोई, रचना का उर्जस्वित तन ।

लगा सोचने क्या यह रचना, किसी हृदय की वाणी है,
अथवा प्रेम-तत्व से निकली जन-जन की कल्याणी है,
क्या रचना आक्रोश मात्र के अतल रोष का प्रतिफल है
या फिर किसी हारते मन की दृढ़ आशा का सम्बल है ।

’किसी हृदय की वाणी है’रचना, तो उसका स्वागत है
’जन-जन की कल्याणी है’ रचना, तो उसका स्वागत है
रचना को मैं रोष शब्द का विषय बनाना नहीं चाहता
’दृढ़ आशा का सम्बल है’ रचना तो उसका स्वागत है ।

’झुकी पेशियाँ, डूबा चेहरा’ ये रचना का विषय नहीं है
’मानवता पर छाया कुहरा’ ये रचना का विषय नहीं है
विषय बनाना हो तो लाओ हृदय सूर्य की भाव रश्मियाँ
’दिन पर अंधेरे का पहरा’ ये रचना का विषय नहीं है ।

रचना की एक देंह रचो जब कर दो अपना भाव समर्पण
उसके हेतु समर्पित कर दो, ज्ञान और अनुभव का कण-कण
तब जो रचना देंह बनेगी, वह पवित्र सुन्दर होगी
पावनता बरसायेगी रचना प्रतिपल क्षण-क्षण, प्रतिक्षण ।

छन्दमुक्त कविताएँ

दर्द सहता रहा उसे .. 

दर्द सहता रहा उसे,
सहता है अब तलक ।

दर्द ने अपनी हस्ती भर उसे चाहा
उसकी शिराओं, मांसपेशियों से होते- होते
उसके मस्तिष्क, उसके हृदय तक
अपनी पैठ बना ली,
तब उसने इस दर्द को
अपना नाम ही दे दिया ।

दर्द उसका नाम लेकर
अनगिन स्थानों पर गया
उसकी खातिरदारी में कहीं कमी नहीं हुई ।

सबने पूछा दर्द से कि
रिश्ता क्या है तुम्हारा उससे
कि तुमने अपना नाम ही बदल लिया उससे ।
मुस्कराकर दर्द ने सुनाई अपनी कथा –
कथा, जो उसकी अस्मिता से जुडी थी,
जिसने जिंदा रखा था दर्द को
अभी भी दुनिया के लिए ।

सबको मालूम है वह कहानी
कहीं न कहीं , कभीं न कभीं
लोगों की कहावतों, गुमनाम गीतों,
डायरियों और आंसुओं में
लगातार कही जाती है वह ।

वस्तुतः दर्द का बदला हुआ नाम
कुछ और नहीं – प्यार है ।

वह डोर ही नहीं बुन पा रहा हूँ

मैं जिधर भी चलूँ
मैं जानता हूँ कि राह सारी
तुम्हारी ही है, पर
यह मेरा अकिंचन भाव ही है
कि मैं नहीं चुन पा रहा हूँ अपनी राह ।

मैंने बार-बार राह की टोह ली
पर चला रंच भर भी नहीं, टिका रहा
मैं जानता हूँ कि दस-दिगंत में
तुम्हारा बधावा बज रहा है, पर
यह मेरे कान ही हैं जो इस ध्वनि को
नहीं सुन पा रहे हैं ।

मैं क्या करुँ अपनी इस नींद का
कि तुम बार-बार
खटका देते हो मेरे द्वार, पर
यह आँखें खुलती ही नहीं ।
मैं महसूस करता हूँ कि
अनगिनत गीतों का खजाना
पथाते हो तुम मेरे लिए, पर
मैं उन्हें गुनगुना नहीं पाता क्योंकि
मुझे उनकी धुन नहीं मालूम ।

मैं ललचा रहा हूँ
कि तुम्हारे पाँव निरख लूँ
और खिंचा चला जाऊं तुम्हारी ओर,
और जबकि मैं जानता हूँ कि
तुम अवश बाँध जाते हो प्रेम-पाश में,
मैं अभागा
वह डोर ही नहीं बुन पा रहा हूँ ।

एक दिन ब्रह्मा मिल जाते…

एक दिन ब्रह्मा मिल जाते
तो उनसे पूछता कुछ प्रश्न
और अपनी जिज्ञासा शांत करता
कि क्यों नहीं पहुंचती
उन तक किसी की चीख ?

उनसे पूछता कि
जिसका ताना मजेदार, खूब रसभरा है
फलदार क्यों नहीं हो गयी वह ईख ?
और जानता कि
जिसकी लकडियाँ बांटती हैं सुगंध चहुँओर
उस चंदन के वृक्ष में
क्यों नहीं दीखता कोई फूल ?
और समझता कि
जिसे चमकते देख
मुग्ध हो जाता है मन
उस स्वर्ण ने गमकना क्यों नहीं सीखा?
और जवाब मांगता उनसे कि
क्यों अल्पायु होते है सुधि-क्षण
और विद्वान को
क्यों नहीं मिलती भली-भीख ?

एक दिन ब्रह्मा मिल जाते
तो उनसे पूछता यही कुछ प्रश्न ।

एक स्त्री के प्रति 

स्वीकार कर लिया
काँटों के पथ को
पहचाना फ़िर भी
जकड़ लिया बहुरूपी झूठे सच को
कुछ बतलाओ, न रखो अधर में
हे स्नेह बिन्दु !
करते हो समझौता ?
जब पूछ रहा होता हूँ, कह देते हो
‘जो हुआ सही ही हुआ’ और
‘जो बीत गयी सो बात गयी’ ,
कहो यह मौन कहाँ से सीखा ?
जो समाज ने दिया
अंक में भर लेते हो
अपने सुख को, मधुर स्वप्न को
विस्मृत कर देते हो
यह महानता, त्याग तुम्हीं में पोषित
कह दो ना, ऐसा मंत्र कहाँ से पाया ?

मन के भीतर
सात रंग के सपने
फ़िर उजली चादर क्यों ओढी है तुमने
हे प्रेम-स्नेह-करुणा-से रंगों की धारित्री तुम
स्वयं, स्वयं से प्रीति न जाने
क्यों छोड़ी है तुमने ?

मैं अभिभूत खडा हूँ हाथ पसारे
कर दो ना कुछ विस्तृत
हृदय कपाट तुम्हारे
कि तेरे उर-गह्वर की मैं गहराई नापूँ
देखूं कितना ज्योतिर्पुंज
वहाँ निखरा-बिखरा है ।

नेह-स्वांग

उसने नेह-स्वांग रच कर
अपने सामीप्य का निमंत्रण दिया
नेह सामीप्य के क्षणों में
झूठा न रह सका
अपने खोल से बाहर आकर
नेह ने अपनी कलई खोली
दिखा वही गुनगुना-सा
निष्कवच, निःस्वांग विदेह नेह ।

क्षुधा की तृप्ति नेह की तृप्ति नहीं
साहचर्य का उन्माद नेह का विकसन नहीं
दृष्टि का प्रमाद हृदय का स्वाद नहीं
दृश्य का दृष्टान्त अस्तित्व का सत्य नहीं
सब अनमने पन के
निष्ठा में परिवर्तित होने का ऐन्द्रिक जाल है ।

स्वांग परिवर्तन नहीं
परिवर्तन का आभास है,
नेह सायास उपलब्धि नहीं
नेह की सृष्टि अनायास है

मैं मच्छरदानी नहीं लगाता तो इसका मतलब है ..

मच्छरदानी लगाना मेरे कस्बे में
सुरक्षित व सभ्य होने की निशानी है ।

मैं मच्छरदानी नहीं लगाता
तो इसका मतलब है
कि मैं हाईस्कूल की जीव विज्ञान की
पुस्तक का सबक भूल गया हूँ ,
निरा, निपट विस्मृति का शिकार मनुष्य हूँ ।

मैं मच्छरदानी नहीं लगाता
तो इसका मतलब है
कि मैं अज्ञ हूँ निरंतर हो रहे शोध एवं उनके परिणामों से
कि मच्छर का इलाज मच्छर नाशक नहीं,
मच्छरदानी हो सकती है ।

मैं मच्छरदानी नहीं लगाता
कि कैद कराने की जगह मच्छरों को,
यह कैद कर लेती है मुझे
तो इसका मतलब है
कि मैं साहित्य के अलंकारों से परिचित नहीं,
मैंने अन्योक्ति अलंकार का नाम नहीं सुना ।

मच्छरदानी नहीं लगाता
कि “दुश्मन को भी सीने से लगाना नहीं भूले” जैसी
पंक्ति का अनुसरण कर सकूँ
तो इसका मतलब है
कि मुझे समय का यह सच नहीं मालूम कि
सुनने सुनाने वाली यह पंक्तियाँ सच नहीं हुआ करतीं ।

मैं मच्छरदानी नहीं लगाता
कि मच्छर को आजादी दूँ
स्वतंत्र विचरण एवं स्वतंत्र अभिव्यक्ति का
कि उसे लगे कि वतमान में हर एक तक उसकी पहुँच है
तो इसका मतलब है
कि मैं रूढ़ सिद्धांतों का कोरा अनुवादी, मनुवादी नहीं
पक्का जनवादी हूँ ।

वास्तविक अन्तिम उपलब्धि

मैं चला था जिंदगी के रास्ते पर
मुझे सुख मिला ।

मैंने कहा,” बड़ी गजब की चीज हो
आते हो तो छा जाते हो
जीवन में अमृत कण बरसाने लगते हो,
सूर्य का उगना दिखाते हो
झरनों का गिरना, नदियों की कलकल
और इतना आनंद की युगों युगों तक रहे जिसकी आस ।”

कुछ और आगे, आ मिला दुःख
उससे कहा, “बड़े निष्ठुर हो
जब हो रहे होते हैं हम सुख के अनुयायी
दिखा रहे होते हैं जीवन का विहंसित रूप
और जब होती है केवल प्रसन्नता ही प्रसन्नता
तुम आ खड़े होते हो,
तुम्हे नहीं परवाह मेरे सुखों की,
हे दुर्विनीत !
कैसा बैर साधते हो तुम?”
धीरे से सरक गया वह ।

मैं उन दोनों के बारे में सोचता आगे बढ़ा
तो आ मिला प्रेम ।

प्रेम से कहा, “तुम ही अच्छे हो ।
दिन हो या रात
दुःख की हो या फ़िर सुख की बात
रहते हो हमेशा हृदय के किसी कोने में लगातार…”

और प्रेम के साथ ही जीवन का अन्तिम सत्य
मेरे सम्मुख आ खड़ा हुआ
मेरी उपलब्धि मेरे सामने थी-
मृत्यु ।

न दुःख ।
न सुख ।
न प्रेम ।

अभी तक मैं चल रहा हूँ, चलता ही जा रहा हूँ

(१)
“बहुत दूर नहीं
बहुत पास ”
कहकर
तुमने बहका दिया
मैं बहक गया ।

(२)
“एक,दो,तीन…..नहीं
शून्य मूल्य-सत्य है ”
कहा
फिर अंक छीन लिए
मैं शून्य होकर विरम गया ।

(३)
तुम हो
जड़ों के भीतर, वृन्त पर नहीं
तुमने
ऐसा आभास दिया
मैंने जड़े खोद दीं ।

(४)
“विकल्प की कैसी आस
सत्य तो निर्विकल्प है ”
मुझे समझाया था
मैं अब तलक
ढूंढ रहा हूँ सत्य ।

(५)
“चरैवेति, चरैवेति’
नारद ने कहा था, तुमने भी कहा
मैंने आस की डोर पकड़ ली
अभी तक मैं चल रहा हूँ
चलता ही जा रहा हूँ ।

प्रेम-विस्मृति

तुम बैठे रहते हो मेरे पास
और टकटकी लगाए देखते रहते हो मुझे,
अपने अधर किसलय के एक निःशब्द
संक्षिप्त कम्पन मात्र से मौन कर देते हो मुझे
और अपने लघु कोमल स्पर्श मात्र से
मेरा बाह्यांतर कर लेते हो अपने अधीन

हृदय की सारी संवेदनाएं और जीवन की संपूर्ण गति
तब तुम और मैं,
हमारे हृदय के स्पंदन, हमारी चेतना और संसृति
हो जाते हैं एकमेक
विश्राम करने लगता है समय
और रह जाता है चहुँओर अकेला जाग्रत
एक शाश्वत विरल,तरल प्रेम

टांक लेना चाहता हूँ मैं इसे पृष्ठ पर
चित्रित कर लेना चाहता हूँ
एक अलभ्य आस्था – प्रेम विस्मृति
पर खो गयी है तूलिका
अपर्याप्त है पृष्ठ ।

इस अलौकिक दृश्य को अचित्रित ही रहने दो –
मेरे चित्रकार !

मेरी दीवार में एक छिद्र है

मेरी दीवार में एक छिद्र है
उस छिद्र में संज्ञा है, क्रिया है,विशेषण है ।
जब भी लगाता हूँ अपनी आँख उस छिद्र से
सब कुछ दिखाई देता है
जो है दीवार के दूसरी ओर ।

दीवार के दूसरी ओर
बच्चे का खिलखिलाना है
बच्ची का रोना गाना है
प्रेयसी का रूठना है, प्रेमी की मनुहार है
माँ की झिड़की, पिता की सीख है
दीवार के दूसरे ओर ही
गुरु जी का ज्ञान है
विद्यार्थी का अध्ययन है
आजी की गुदगुदाती बात है
और बाबा की राम रटन है
उस छिद्र के पार
खेत है, खेत की लाट है
खेत में झूमता खड़ा हरा धान है
धान की बाट जोहता खलिहान है
एक कुँआ है, कुँए पर लटकी बाल्टी है
बाल्टी में थरथराता पानी है,
पानी से बर्तन माँजती एक सयानी है
छिद्र के भीतर, दीवार के उस पार
वह सब कुछ है जो जीवन है
अयाचित, स्वतःस्फूर्त, स्वयंसिद्ध…..
आह! उस विशुद्ध आनंद की गोद में
ढुलक जाने का आनंद !
पर……….
मेरे चारो तरफ़
मेरे स्वयं की दीवार है
और मेरी दीवार में एक अतार्किक छिद्र है।

अब तुम कहाँ हो मेरे वृक्ष ?

छत पर झुक आयी तुम्हारी डालियों के बीच
देखता कितने स्वप्न
कितनी कोमल कल्पनाएँ
तुम्हारे वातायनों से मुझ पर आकृष्ट हुआ करतीं,
कितनी बार हुई थी वृष्टि
और मैं तुम्हारे पास खड़ा भींगता रहा
कितनी बार क्रुद्ध हुआ सूर्य
और मैं खड़ा रीझता रहा तुम्हारी छाया में
कितनी बार पतझर का दंश झेलकर भी
तुम हरित हुए नवीन जीवन चेतना का संदेश देने
और खिलखिला उठे
मेरे साथ अपने किसलय में
और न जाने कितनी बार आया सावन
जब अपनी ही डालों के झूले में
मेरे साथ झूलने लगे थे तुम –
पर अब तुम कहाँ हो मेरे वृक्ष ?

और आज जब तुम नहीं हो
तो वृष्टि भी यत्किंचित है
सूर्यातप भी मारक नहीं रहा
अब पतझड़ के पास भी नहीं रहा कोई योग्य पात्र
और जानते हो तुम ?
सावन भी अब सड़कों पर लडखडाया चला करता है ।

छिन्न भिन्न हो गए हैं स्वप्न
विलीन हो गयी हैं कल्पनाएँ
क्योंकि हृदय हो गया है वस्तु
और वस्तु उपयोगितावादी व वैकल्पिक होती है ।

वह खत नहीं दस्तखत था

एक कागज़
तुम्हारे दस्तख़त का
मैंने चुरा लिया था ,

मैंने देखा कि
उस दस्तख़त में
तुम्हारा पूरा अक्स है ।

दस्तख़त का वह कागज़
मेरे सारे जीवन की लेखनी का
परिणाम बन गया ।

मैंने देखा कि
अक्षरों के मोड़ों में
ज़िंदगी के मोड़ मिले ,

कुछ सीधी-सपाट लकीरें थीं
कहने के लिए कि
सब कुछ ऐसा ही सपाट, सीधा है
तुम्हारे बिना ।

मुझे एक ख़त लिखना
गर हो सके,
क्योंकि वह तो ख़त नहीं,
दस्तख़त था ।

आपका हँसना 

आपके हँसने में
छ्न्द है
सुर है
राग है,
आपका हँसना एक गीत है।

आपके हँसने में
प्रवाह है
विस्तार है
शीतलता है,
आपका हँसना एक सरिता है।

आपके हँसने में
शन्ति है
श्रद्धा है
समर्पण है,
आपका हँसना एक भक्ति है।

आपके हँसने में
स्नेह है
प्रेम है
करुणा है,
आपका हँसना एक भाव-तीर्थ है।

आपके हँसने में
आपका विचार है
अस्तित्व है
रहस्य है,
आपका हँसना स्वयं आप हैं।

मेरे जीवन में
आपकी तरलता है
स्निग्धता है
सम्मोहन है,
मेरा जीना आपका हँसना है।

वह आँसू कह जाते हैं

मेरा प्रेम
कुछ बोलना चाहता है ।
कुछ शब्द भी उठे थे, जिनसे
अपने प्रेम की सारी बातें
तुमसे कह देने को
मन व्याकुल था ,
पर जबान लड़खडा गयी।
अन्दर से आवाज आयी
“कोई बाँध सका है
की तुम चले हो बांधने
प्रेम को, शब्दों में ।
ठहर गया मैं ।

प्रश्न था, प्रेम बोलना चाहता है,
अभिव्यक्त होना चाहता है,
पर प्रेम के पास तो कोई भाषा ही नहीं-
मौन है प्रेम ।
तो ऐसी दुविधा में उलझकर
पोर-पोर रो उठे,
आंखों से आंसू झरें
तो आश्चर्य क्या ?
आंसू झर पड़ते हैं, जब
गहरी हो जाती है कोई अनुभूति-
प्रेम की अनुभूति – शब्दातीत।

राह मिल गयी……
जो शब्द नहीं कह पाते
वह आँसू कह जाते हैं।

पढ़ा तुम्हारा गीत-पत्र

एक खामोशी-सी दिखी
एक इंतिजार भी दिखा
अनसुलझी आंखों में बेकली का
सिमटा ज्वार भी दिखा,
आशाओं के दीप भी जले
विश्वास के सतरंगी स्वप्न भी खिले
लगा जैसे हर सांस
वीणा के सुर में सुर मिलाकर
गुनगुना रही हो, और
जैसे कोई काली-सी कोयल
एक थके राही को प्रेम का,निश्चय का
सुधा-सा गीत सुना रही हो ।

मन हुआ मैं क्यों न लिखता
गीत कुछ इस बानगी के?
पिरोया हो प्यार जिसमें और
बंधा हो स्नेह का अनमोल मोती,
कर सकूं मैं याचना उस गीत में
‘याद रखना मुझे और मेरा पता’।

वह तुम्हारा गीत,या फ़िर पत्र
बह गया इस मन-विजन में
स्वर-समीरण बन .

कितना सिखाओगे मुझे?

चेहरे पर मौन सजा लेते हो
क्योंकि बताना चाहते हो मुझे
मौन का मर्म,
हर पल प्रेम और स्नेह से
सहलाते हो मुझे
शायद बताना चाहते हो
एक स्नेही,एक प्रेमी का कर्म
आकंठ डूब जाते हो हास्य में
मेरे जैसे गर्हित की आस के लिये
शायद देना चाहते हो यह जीवन-दर्शन
कि ‘जीवन हास ही तो है’
और सोख कर गम
बरसा देते हो खुशी
यही समझाने के लिये शायद
कि ‘जीवन गम और खुशी का रास ही तो है”।

और भी न जाने कितने अनगिनत भाव
सजा लेते हो एक साथ
एक ही अरूप-रूप पर
मुझ जैसे अकलित,विरहित,अकुसुमित के लिये।

कितना सिखाओगे मुझे?

सर्वत्र तुम 

मैंने चंद्र को देखा
उसकी समस्त किरणों में
तुम ही दिखाई पड़े
मैंने नदी को देखा
उसकी धारा में तुम्हारी ही छवि
प्रवाहित हो रही थी
मैंने फूल देखा
फूल की हर पंखुड़ी पर
तुम्हारा ही चेहरा नजर आया
मैंने वृक्ष देखा
उसकी छाया में मुझे
तुम्हारी प्रेम-छाया दिखाई पड़ी
फ़िर मैं आकाश की ओर देखने लगा
उसके विस्तार ने खूब विस्तृत अर्थों वाली
तुम्हारी मुस्कान की याद दिला दी
और तब मैंने धरती को देखा
उसके प्रत्येक अवयव में तुम ही
अपनी सम्पूर्ण प्रज्ञा के साथ अवस्थित थे,

मैं सम्मोहित था
मैं स्वयं को देखा
मेरी बुद्धि, आत्मा, हृदय – सब कुछ
तुम्हारे ही प्रकाश से प्रकाशित था,

वस्तुतः वाह्य में भी तुम हो,
अन्तर में भी तुम –
सर्वत्र तुम ।

तुम हँस पड़ते हो…

मैं अकेला खड़ा हूँ
और तुम्हारे आँसुओं की धाराएँ
घेर रही हैं मुझे ,
कुछ ही क्षणों में यह
पास आ गयी हैं एकदम ,
शून्य हो गया है मेरा अस्तित्व
बचने की कोई आशा ही नहीं रही,
मैं हो जाता हूँ निश्चल,
फ़िर धाराएँ
जिधर चाहती हैं बहा ले जाती हैं
मेरे जैसा अधीर, गंभीर हो जाता है
मेरा मस्तिष्क, मेरी आत्मा,
मेरा चिंतन -सब कुछ
इन धाराओं के अधीन हो चला है ,
इन धाराओं की गति से
मैं निश्चेष्ट तुम्हारे सम्मुख
आ पड़ा हूँ, और तुम
उन्हीं आँसू भरी आंखों से
निहार रहे हो मुझे …
……………………..
तभी तुम हँस पड़ते हो
मैं जी उठता हूँ ।

तुम्हारे सामने ही तो अभिव्यक्त हूँ

कुछ अभीप्सित है
तुम्हारे सामने आ खड़ा हूँ
याचना के शब्द नहीं हैं
ना ही कोई सार्थक तत्त्व है
कुछ कहने के लिए तुमसे।

यहाँ तो कतार है
याचकों, आकांक्षियों की,
सब समग्रता से अपनी कहनी
कहे जा रहे हैं

न तो मेरी तुम्हारे मन्दिर में
कुछ कहने की सामर्थ्य है
ना ही कुछ करने की,
तुम्हारे श्रृंगार में
एक भी अंश मेरा नहीं,
फ़िर भी आ खड़ा हूँ ।

क्या स्नेह न दोगे,
स्वीकार न करोगे मेरा अभीप्सित ?
अनवरत संघर्षों में उलझा मेरा जीवन
तुम्हारे सामने ही तो व्यक्त है,
हर मौन, संवाद होकर प्रस्फुटित है,
और मैं अकिंचन
तुम्हारे सामने ही तो व्यक्त हूँ।

मत पूछना वही प्रश्न 

अगर कभी ऐसा हो
कि कहीं मिल जाओ तुम
तो पूछने मत लगना
वही अबूझे, अव्यक्त प्रश्न
अपने नेत्रों से
क्योंकि मेरी चुप्पी
फ़िर तोड़ देगी,
व्यथित कर देगी तुम्हें
और तब मैं भी
खंड-खंड हो जाऊंगा
अपने उत्तरों को समेटते-समेटते।

उड़ चली है आत्मा परमात्मा के पास

सच में ‘मैना’ ही नाम था उसका । मेरे पास अब केवल यादें शेष रह गयी हैं उसकी । छः बरस पहले अचानक ही लिख गयी थी यह कविता ।



आज मैना उड़ चली
पिता के घर से पिया के घर
गीलीं हो आयीं पिता के घर की दीवारें , चौखटे, फर्श और दरवाजे –
आंखों का पानी थमा ही कहाँ ?
और इस गीले फर्श पर फिसल फिसल कर
गिरने लगीं सारी यादें पिछले पल की ।
पिया के घर तो जैसे उजाला हो गया
उड़ने लगीं उस घर की आशाएं, आकांक्षाएं
और जाकर गिरीं उस बहू की गोद में ।
कट गए पंख उसके उत्साह के
सुनने लगी वह वैभव का वार्तालाप ।

          • ***** ***** *****

हाँथ से तोते उड़ गए जब देखा
इस भारतीय नारी का परमेश्वर भी रटता है वही जबान
जो रटते हैं सब -अतिरेकी, पराये, लोलुप ।
‘लक्ष्मी’ से लक्ष्मी की निराशा
उन्हें खाए जा रही है
लग गए हैं पंख वासना के,
प्रेम-विहग कहीं दूर अपने पर कटा कर छटपटा रहा है
और वह रह गयी है एक – एक ठूंठ-सी ।

          • ***** ***** *****

छूट गया है पिया का घर
और निकल आयी है वह रात के अंधेरे में ,
अब वह है अज्ञात के प्रति उत्साहित ।
बिछल रहे हैं स्मृति-पट पर कई विगत चित्र –
पिता-पिता का घर,पिया-पिया की देहरी,
पुत्री,बहू,गृहलक्ष्मी और निष्कासिता व प्रताडिता वह
विचार मग्न और आलम्ब-शून्य अभी अभी
जा गिरी है सड़क के किनारे – ऊपर से निकल गयी है एक गाड़ी,
कट गए हैं पंख उसकी चेतना के
उड़ गया है प्राण-पखेरु ।

          • ***** ***** *****

अभी अभी उड़े हैं गिद्धों के झुंड
सड़क के किनारे पडी लावारिश लाश का करने अन्तिम संस्कार,
कट गए हैं पंख मानवता के
उड़ चली है आत्मा परमात्मा के पास ।

काश ! मेरा मन

काश ! मेरा मन
सरकंडे की कलम- सा होता
जिसे छील-छाल कर,
बना कर
भावना की स्याही में डुबाकर
मैं लिखता
कुछ चिकने अक्षर –
मोतियों-से,
प्रेम के ।

खामोशी हर प्रश्न का जवाब है 

मुझे नहीं लगता
कि खामोशी जवाब नहीं देती।

मैं समझता हूँ
खामोशी एक तीर्थ है
जहाँ हर बुरा विचार
अपनी बुराई धो डालता है ।

ये हो सकता है की तीर्थ के रास्ते में
कठिनाइयों का अम्बार हो,
और इसीलिये हर खामोशी भी शायद
कई गम और निराशाओं का भण्डार हो
लेकिन अंत फिर भी श्रेयस्कर है-
तीर्थ या फ़िर खामोशी।

संस्कार, आचार
सही अर्थों में आत्मा का संचार
जिस तरह तीर्थ दिया करता है
खामोश विश्रब्द्ध एवं शांत,
बस उसी तरह खामोशी भी दिया करती है
हर अनसुलझे, सिमटे और सहमे
प्रश्नों का उत्तरान्त।

वस्तुतः खामोशी हर प्रश्न का जवाब है
और सौंदर्य भी ।

समय का शोर

जब ध्वनि असीम होकर सम्मुख हो
तो कान बंद कर लेना बुद्धिमानी नहीं
जो ध्वनि का सत्य है
वह असीम ही है ।

चलोगे तो पग ध्वनि भी निकलेगी
अपनी पगध्वनि काल की निस्तब्धता में सुनो
समय का शोर
तुम्हारी पगध्वनि का क्रूर आलोचक होगा।

मैं अभी भी खड़ा हूँ 

तुम्हें नहीं पता
कितनी देर से
तुम्हारी राह देख रहा हूँ ।

तुमने कहा था आने के लिए
अंतरतम में अनुरागी दीप जलाने के लिए
मुझे बहलाने के लिए और
प्रणय के शाश्वत गीत सुनाने के लिए
पर तुम नहीं आए…. ।

खड़े खड़े ही मैंने देखा
सूरज संध्या-सुन्दरी के अंचल में
जाने को पग बढ़ा रहा है,
दिन भर की थकान के बाद
पक्षी का एक जोड़ा बेतहाशा
अपने घर की ओर उड़ा जा रहा है,
पास के घरों से लौटे कामगारों का स्वर
सुनाई देने लगा है
और दिन ढले आयी शाम से डरा बच्चा भी
माँ की गोद में ले जुन्हाई, रोने लगा है।

पर मैं निर्विकार हूँ इन कार्य-व्यापारों से
और तुम्हारी राह देख रहा हूँ ।

रात भी बीत गयी
मैं तारे गिनता रह गया,
शायद तुम्ही हो यह सोच
हर खटके को ध्यान से सुनता रह गया,
पर तुम नहीं आए।

अब सुबह होने वाली है
क्या तुम आओगे ?
मेरे न रूठने पर भी
क्या मुझे मनाओगे?

“तुम इतने निष्ठुर नहीं जरूर आओगे !”
इसी विश्वास पर अड़ा हूँ,
मैं अभी भी खड़ा हूँ ।

अखिल शान्ति है तुम्हारा ध्यान 

मैं देखना चाहता हूँ
तुम्हें हर सुबह
कि मेरा दिन बीते कुछ अच्छी तरह,
कि मेरे कल्पना लोक की
साम्राज्ञी बनो तुम,
कि आतुरता का विहग
तुम्हारी स्मृति का विहान देख उड़ चले,
कि मेरा विरह-कातर हृदय
तुम्हारे दर्शन मात्र से
एक उर्जस्वित चेतना से आप्लावित हो सके,
कि जीवन के प्रति
मेरी नास्तिकता
तुम्हारे प्रति आस्तिकता में परिणत हो जाय,
कि मेरा मनस्ताप
जल कर राख हो जाय
तुम्हारे नेत्रों की एक ज्योति से केवल,
कि अभिमंत्रित जल की भांति
तुम्हारी मुस्कान
नष्ट कर दे
मेरे कष्टों के सारे आडम्बर,
कि नाचूँ मैं-अहोभाव है नाच
कि गाऊं मैं-प्रिय स्वभाव है गान
और तुम्हारी प्रीति के लिए
हो जाऊं समर्पित ।

वस्तुतः अखिल शान्ति है तुम्हारा ध्यान।

क्यों ?

क्यों ?
खो गए हो विकल्प में,
चर्चित स्वल्प में
विस्मृत सुमधुर अतीत
क्यों लेकर चलते हो
बेगाना गीत
स्वर्ग की ईच्छा क्यों
छोड़ दी तुमने
आख़िर अनसुलझी, अस्तित्वविहीन
अनगिनत कामनाओं की डोर
क्यों जोड़ दी तुमने

आख़िर क्यों बहक जाते हो
तुम इस चक्रव्यूह में,
क्या नहीं कोई तुम्हारा
साथ कालने वाला सहारा
जो करता हो मार्ग प्रशस्ति
और क्या नहीं रहा
तुम्हारा साहस
जिसकी एक आहट
दिखाती चैतन्य
हो जातीं कठिनाइयाँ अनुमन्य
और उगता तुम्हारा सूर्य।

भला क्यों कोई साथी
कोई सहारा
कोई साहस न रहा
भिगोने को हृदय उद्यत
क्यों कोई पावस न रहा ?

मैं पूछता हूँ प्रश्न –
आख़िर क्यों ?
और तुम कहते हो उत्तर –
हाँ, क्यों ?

मैं समर्पित साधना की राह लूँगा 

मुझसे मेरे अन्तःकरण का स्वत्व
गिरवी न रखा जा सकेगा
भले ही मेरे स्वप्न,
मेरी आकांक्षायें
सौंप दी जाँय किसी बधिक के हाँथों

कम से कम का-पुरुष तो न कहा जाउंगा
और न ऐसा दीप ही
जिसका अन्तर ही ज्योतिर्मय नहीं,
फिर भले ही
खुशियाँ अनन्त काल के लिये
सुला दी जायेंगी किसी काल कोठरी में,
या कि चेतना का अजस्र संगीत
मूक हो जायेगा निरन्तर,
या मन का मुकुर चूर-चूर हो जायेगा
क्षण-क्षण प्रहारों से

मैं समर्पित साधना की राह लूँगा
नियम-संयम से चलूँगा-
यदि चल सकूँगा ।

दिनों दिन सहेजता रहा.

दिनों दिन सहेजता रहा बहुत कुछ
जो अपना था, अपना नहीं भी था,
मुट्ठी बाँधे आश्वस्त होता रहा
कि इस में सारा आसमान है;
बाद में देखा,
जिन्हें सहेजता रहा क्षण-क्षण
उसका कुछ भी शेष नहीं,
हाँ, जाने अनजाने बहुत कुछ
लुटा दिया था मुक्त हस्त-वह सारा
द्विगुणित होकर मेरी सम्पदा बन गया है ।

कई बार निर्निमेष .. 

कई बार निर्निमेष
अविरत देखता हूँ उसे

यह निरखना
उसकी अन्तःसमता को पहचानना है

मैं महसूस करता हूँ
नदी बेहिचक बिन विचारे
अपना सर्वस्व उड़ेलती है
फिर भी वह अहमन्य नहीं होता
सिर नहीं फिरता उसका;
उसकी अन्तःअग्नि, बड़वानल दिन रात
उसे सुखाती रहती है
फिर भी वह कातर नहीं होता
दीनता उसे छू भी नहीं जाती ।

कई बार निर्निमेष अविरत देखता हूँ उसे
वह मिट्टी का है, पर सागर है –
धीर भी गंभीर भी ।

बचपन, यौवन, वृद्धपन..

बचपन !
तुम औत्सुक्य की अविराम यात्रा हो,
पहचानते हो, ढूढ़ते हो रंग-बिरंगापन
क्योंकि सब कुछ नया लगता है तुम्हें ।

यौवन !
तुम प्रयोग की शरण-स्थली हो,
आजमाते हो, ढूँढ़ते हो नयापन
क्योंकि सबमें नया स्वाद मिलता है तुम्हें ।

वृद्ध-पन !
तुम चाह से पगे परिपक्व आश्रय हो,
तुम भी उत्कंठित होते हो, ललचाते हो
उन्हीं रंगबिरंगी चीजों में अनुभव आजमाते हो ।

जागो मेरे संकल्प मुझमें 

जागो मेरे संकल्प मुझमें
कि भोग की कँटीली झाड़ियों में उलझे,
भरपेट खाकर भी प्रतिपल भूख से तड़पते
स्वर्ण-पिंजर युक्त इस जीवन को
मुक्त करूँ कारा-बंधों से,
दग्ध करूँ प्रेम की अग्नि-शिखा में ।

मेरा मनोरथ सम्हालो मेरे प्रिय !
कलमुँहीं रजनी के प्रभात हो तुम !
मन्दोत्साहित चेतना के मन्द हास हो तुम !
तुम दिक्काल से परे प्रेम-ज्ञान के ज्ञान-फल हो !
तुम सीमा रहित अतल-तल हो !

मैंने जो क्षण जी लिया है..

मैंने जो क्षण जी लिया है
उसे पी लिया है ,
वही क्षण बार-बार पुकारते हैं मुझे
और एक असह्य प्रवृत्ति
जुड़ाव की
महसूस करता हूँ उर-अन्तर

क्षण जीता हूँ, उसे पीता हूँ
तो स्पष्टतः ही उर्ध्व गति है,
क्षण में रहकर
क्षण से पार जाने की जुगत –
पार जाने की चरितार्थता ।

पर ढलान पर जैसे पानी
दौड़ता है नीचे की ओर
मैं भी कहाँ ठहर पाता हूँ कहीं ?
वर्तमान का सुख-दुःख, माया-मोह…..
सबको देखता हूँ लुढ़कते हुए किसी ओर ……

आगत प्रेम मेरी प्रतीक्षा में है ।

कौतूहल एक धुँआ है

कौतूहल एक धुआँ है
उपजता है तुम्हारी दृष्टि से,
मैं उसमें अपनी आँखे मुचमुचाता
प्रति क्षण प्रवृत्त होता हूँ
आगत-अनागत के रहस लोक में

समय की अनिश्चित पदावली
मेरी चेतना का राग-रंग हेर डालती है
जो निःशेष है वह ध्वनि का सत्य है ,
वह सत्य जो निर्विकल्प है,
गूढ़ है, पर सहज ही अभिव्यक्त है ।

हार गया तन भी, डूब गया मन भी 

समय की राह से
हटा-बढ़ा कई बार
विरम गयी राह ही,
मन भी दिग्भ्रांत-सा
अटक गया इधर-उधर ।

भ्रांति दूर करने को
दीप ही जलाया था
ज्ञान का, विवेक का,
देखा फिर
खो गयीं संकीर्णतायें
व्यष्टि औ’ समष्टि की ।

स्व-प्राणों के मोह छोड़
सूर्य ही सहेजा था
उद्भासित हो बैठी, और कौन ?
अन्तर की प्रज्ञा ही;
अंधकार दुबक गया
मेरे अवांछित का,
अंधापन सूरज की
आग में दहक गया ।

राह खुली कौन-सी ?
अतिशय आनन्द की,
हार गया तन भी
डूब गया मन भी ।

तू सदा ही बंधनों में ही व्यक्त है अभिव्यक्त है

व्यथित मत हो
कि तू किसी के बंधनों में है,

अगर तू है हवा
तू सुगंधित है सुमन के सम्पुटों में बंद होकर
या अगर तू द्रव्य है निर्गंध कोई
सुगंधिका-सा बंद है मृग-नाभि में
या कवित है मुक्तछंदी तू अगर
मुक्त है आनन्द तेरा सरस छान्दिक बंधनों में
या अगर नक्षत्र है तू
परिधि-घूर्णन ही तुम्हारी लक्ष्य-गति है
या अगर तू आत्मा है
देंह के इस मृत्तिका घट में बंधी है,

मत व्यथित हो
कि तू सदा ही बंधनों में व्यक्त है, अभिव्यक्त है ।

दोनों हाथ जोड़कर

मैं अपनी कवितायें
तुम्हें अर्पित करता हूँ
जानता हूँ
कि इनमें खुशियाँ हैं
और प्रेरणाएँ भी
जो यूँ तो सहम जाती हैं
घृणा और ईर्ष्या के चक्रव्यूह से
पर, नियति इनमें भी भर देती है
नित्य का संगीत ।

यह कवितायें तुम्हारे लिये
इसलिये
कि यह कर्म और कारण की धारणा से
पृथक होकर लिखी गयी हैं
और यह मेरी तृप्त भावनाओं का अर्घ्य हैं ।

मेरी क्षुद्र-मति
यही तो कह रही है बारंबार
अपने संकल्प और विकल्प के दोनों हाँथ जोड़कर

कि ये कवितायें मेरी हैं…..
कि ये कवितायें मेरी नहीं हैं !

मैं कैसे प्रेमाभिव्यक्ति की राह चलूँ 

तुम आये
विगत रात्रि के स्वप्नों में

श्वांसों की मर्यादा के बंधन टूट गये
अन्तर में चांदनी उतर आयी
जल उठी अवगुण्ठन में दीपक की लौ
विरह की निःश्वांस उच्छ्वास में बदल गयी
प्रेम की पलकों की कोरों से झांक उठा सावन
और तन के इन्द्रधनुषी आलोक से
जगमगा उठा मन,

मैं कैसे प्रेमाभिव्यक्ति की राह चलूँ
होठ तो काँप रहे हैं
सात्विक अनुभूति से ।

तुम कौन हो

तुम कौन हो ?
जिसने यौवन का विराट आकाश
समेट लिया है अपनी बाहों में,
जिसने अपनी चितवन की प्रेरणा से
ठहरा दिया है सांसारिक गति को

तुम कौन हो ?
जिसने सौभाग्य की कुंकुमी सजावट
कर दी है मेरे माथे पर,
जिसने मंत्रमुग्ध कर दिया है जगत को
कल-कण्ठ की ऋचाओं से

तुम कौन हो ?
जिसने मेरी श्वांस-वेणु बजा दी है, और
लय हो गयी है चेतना में उसकी माधुरी,
जिसने अपने हृदय के कंपनों से भर दिये हैं
मेरे प्राण, कँप गयी है अनुभूति

तुम कौन हो ?
आखिर कौन हो तुम ?
कि तुम्हारे सम्मुख
प्रणय की पलकें काँप रही हैं
और मैं विलीन होना चाह रहा हूँ
तुममें ।

तुम्हें कौन प्यार करता है 

हे प्रेम-विग्रह !
एक द्वन्द्व है अन्तर्मन में,
दूर न करोगे ?

मेरी चेतना के प्रस्थान-बिन्दु पर
आकर विराजो, स्नेहसिक्त !
कि अनमनेपन से निकलकर मैं जान सकूँ
कि तुम्हें प्यार कौन करता है ?

क्या वह जो अपने प्राणों की वेदी पर
प्रतिष्ठित करता है तुम्हारी मूर्ति,
या वह जो तुम्हारी प्राप्ति के लिये
उजालों और परछाइयों की दुर्गम राह छानता है ;

क्या वह जो गुपचुप अपने में गुम होकर
स्मरण की गहराइयों में तुमसे मिलता है,
या वह जो तुम्हारे प्रेम-गीत के गान से
जगती का अन्तर्मन झकझोर देता है ।

कौन प्यार करता है तुम्हें ?
तुम्हें कौन प्यार करता है ?

दिनों दिन सहेजता रहा बहुत कुछ

(१)
दिनों दिन सहेजता रहा बहुत कुछ
जो अपना था, अपना नहीं भी था,
मुट्ठी बाँधे आश्वस्त होता रहा
कि इस में सारा आसमान है;
बाद में देखा,
जिन्हें सहेजता रहा क्षण-क्षण
उसका कुछ भी शेष नहीं,
हाँ, जाने अनजाने बहुत कुछ
लुटा दिया था मुक्त हस्त-वह सारा
द्विगुणित होकर मेरी सम्पदा बन गया है ।

(२)
मैं ऐसा क्यों हूँ ?
कि मैं हर बार अपना अस्तित्व
लगा देता हूँ दाँव पर,
कूद जाता हूँ समन्दर में
केवल यह जानने के लिये, कि
कोई तो है जो मुझे बचाने आयेगा,
और यह सच पता चल सकेगा
कि वह तो सिद्धहस्त है
किसी को भी बचा सकने में ।

कई बार निर्निमेष..

कई बार निर्निमेष
अविरत देखता हूँ उसे

यह निरखना
उसकी अन्तःसमता को पहचानना है

मैं महसूस करता हूँ
नदी बेहिचक बिन विचारे
अपना सर्वस्व उड़ेलती है
फिर भी वह अहमन्य नहीं होता
सिर नहीं फिरता उसका;
उसकी अन्तःअग्नि, बड़वानल दिन रात
उसे सुखाती रहती है
फिर भी वह कातर नहीं होता
दीनता उसे छू भी नहीं जाती ।

कई बार निर्निमेष अविरत देखता हूँ उसे
वह मिट्टी का है, पर सागर है –
धीर भी गंभीर भी ।

कैसे ठहरेगा प्रेम जन्म-मृत्यु को लाँघ

तुम आते थे
मेरे हृदय की तलहटी में
मेरे संवेदना के रहस्य-लोक में
मैं निरखता था-
मेरे हृदय की श्यामल भूमि पर
वन्यपुष्प की तरह खिले थे तुम ।

तुम आते थे
अपने पूरे प्रेमपूर्ण नयन लिये
निश्छल दूब का अंकुर खिलाये
मुग्धा, रसपूर्णा, अनिंद्य ;
मेरी चितवन ठहरा देते थे
अपने उन किसलय-कपोलों पर ,
फिर तुम्हारी श्वांस-रंध्र में समाकर
अनन्त यात्रा पूरी हो जाती थी ।

तुम आते थे
साँझ-सकारे के बादल के किनारे
चमके सितारे की तरह,
मेरी बरौनियों में उमड़ पड़ता था
आश्चर्य-मोद-लोक;

सोचता हूँ
कितना छोटा होता है प्रत्येक निमिष
कितनी छोटी होती है तुम्हारी चितवन
कितना छोटा होता है तुम्हारा आलिंगन

फिर यह भी सोचता हूँ
कि कितना छोटा होता है यह क्षण,

पर यह विस्तरित न हो
इस जगती में, इस विपुल व्योम में
तब कैसे
काँपेंगे अन्तराकुल मन,
कैसे विहरेंगी साँसे
कैसे ठहरेगा प्रेम
जन्म-मृत्यु को लाँघ !

मैंने जो क्षण जी लिया है

मैंने जो क्षण जी लिया है
उसे पी लिया है ,
वही क्षण बार-बार पुकारते हैं मुझे
और एक असह्य प्रवृत्ति
जुड़ाव की
महसूस करता हूँ उर-अन्तर

क्षण जीता हूँ, उसे पीता हूँ
तो स्पष्टतः ही उर्ध्व गति है,
क्षण में रहकर
क्षण से पार जाने की जुगत –
पार जाने की चरितार्थता ।

पर ढलान पर जैसे पानी
दौड़ता है नीचे की ओर
मैं भी कहाँ ठहर पाता हूँ कहीं ?
वर्तमान का सुख-दुःख, माया-मोह…..
सबको देखता हूँ लुढ़कते हुए किसी ओर ……

आगत प्रेम मेरी प्रतीक्षा में है ।

स्वर अपरिचित 

बीती रात
मैंने चाँद से बातें की ।
बतियाते मन उससे एकाकार हुआ ।
रात्रि के सिरहाने खड़ा चाँद
तनिक निर्विकार हुआ ,
बोला –
“काल का पहिया न जाने कितना घूमा
न जाने कितनी राहें मैं स्वयं घूमा
और इस यात्रा में
– जीवन से मृत्यु की अविराम-
सब कुछ हुआ ज्ञात
नहीं शेष कोई धाम
पर आज मिल गया है
अपिरिचित-सा एक स्वर
सिहर रहे हैं कर्ण-कुहर ।”

“देखता हूँ सृष्टि का विस्तार,
चतुर्दिक
मूर्छना के भाव में सिमटी हुई धरती-
तरु-तृण-पात के स्नेह से
नीर-निधि-उछ्वास तक ,
अनगिनत आयाम हैं इस मूर्छना के ।”

“मैंने सुन लिया है स्वर अपरिचित
मृत्यु के भी पार का ।
मैं अकंपित, अ-श्लथ यात्रा अविराम लेकर
सहज ही निर्मित करुँगा मार्ग ।
मुक्त होगा मार्ग वह,
नींव होगी चेतना की ।
जायेगा वह मार्ग
प्राची के ठौर ।”

मैं स्वलक्षण-शील हूँ 

’महाजनो येन गतः..’ वाला मार्ग
भरी भीड़ वाला मार्ग है
नहीं रुचता मुझे,
जानता हूँ
यह रीति-लीक-पिटवइयों की निगाह में
निषिद्ध है, अशुद्ध है ।

चिन्ता क्या !
मेरी इस रुचि में (या अरुचि में)
बाह्य और आभ्यन्तर,
प्रेरणा और व्यापार की साधु-मैत्री है ।

मैं हठी हूँ,
जानता हूँ क्षिप्र भी हूँ
तो क्या !
सोचता ही हूँ कहाँ मैं
निन्दा और स्वीकृति, विधि और निषेध को
साहसी हूँ ,
औ’ विजेता हूँ
लोक-लज्जा से उफनती भीरुता का ।

मैं स्वलक्षण-शील हूँ ।

मुझे मौन होना है

मुझे मौन होना है
तुम्हारे रूठने से नहीं,
तुम्हारे मचलने से नहीं,
अन्तर के कम्पनों से
सात्विक अनुराग के स्पन्दनों से ।

मेरा यह मौन
तुम्हारी पुण्यशाली वाक्-ज्योत्सना को
पीने का उपक्रम है,
स्वयं को अनन्त जीवन के भव्य प्रकाश में
लीन करने की आस है,
सुधि में प्रति-क्षण तल्लीन करने वाली
आसव-गंध है ।

अपने स्पन्दनों के संजीवन से
मेरे प्राणों में अमरत्व भरो,
अपने स्पन्दनों से निःसृत मौन से ही
छंदों और ऋचाओं से अलभ्य
’उसे’ ढूँढ़ने की लीक दो,
और मिट्टी की गंध-सा यह मौन
साकार कर दो चेतना में
कि युगों की जमी हुई काई हट जाय,
दृश्य हो शुद्ध चैतन्य !

तुमने चुपके से मुझे बुलाया 

तुमने चुपके से मुझे बुलाया ।

पूजा की थाली लेकर
साँझ सकारे
हाथों में, तुम चली
बिखर गयी अरुणाभा दीपक में
चली हवा
साड़ी सरकी
’सर’ से सर से
दीपक भकुआया
कँपती लौ ने संदेश पठाया
तुमने चुपके से मुझे बुलाया ।

कंगन खनका हाथों में
खन खन खन् न् न्
स्वर में, बह चली
गंध गजरे की मन में
काँपी आँखें
बन गई
श्वास-प्रश्वास
सरस सिहरन
मुख-चितवन ने संदेश पठाया
तुमने चुपके से मुझे बुलाया ।

पूर्ण चन्द्रमा-रात बैठकर
मधुरिम स्वर
तुमने गाया, पलकों से
चन्दा से ना जाने क्या बतियाया
मुग्ध हुआ
क्षण-क्षण
मन का
यह आवारापन
झूमा बचपन-सा औ’ संदेश पठाया
तुमने चुपके से मुझे बुलाया ।

अपनी महरी के लिये

मुझे मालूम है
कि रोज घिसते हुए
मेरे घर के बर्तन
तुम घिसना चाहते हो
अपने अतीत का कोई टुकड़ा
जो, इन बर्तनों की तरह
खुद में ही किसी की मिटी हुई
भूख का अनुभव करता हुआ
जूठा पड़ा रहता है ।

मुझे मालूम है
कि रोज यह बर्तन घिसना
घिस कर चमकाना
और फ़िर तैयार कर देना उसे
किसी भूखे के सम्मुख परसने के लिये
तुम्हारा कार्य व्यापार नहीं है
बल्कि, अतीत के स्मृति-चिह्नों से
निर्मित हो गया
तुम्हारा स्वभाव है ।

तुम हर बार किसी भूखे की

भोजन-सामग्री के वाहक बने,
अपने अस्तित्व पर उसकी
क्रूर तृप्ति के चिह्न समेटे,
जूठे होकर बार-बार चमक उठे हो,
बार-बार उपयोग में आने के लिये
अपना अतीत भूल जाने के लिये ।

सब तो कविता है

मैं रोज सबेरे जगता हूँ
दिन के उजाले की आहट
और तुम्हारी मुस्कराहट
साफ़ महसूस करता हूँ ।
चाय की प्याली से उठती
स्नेह की भाप चेहरे पर छा जाती है ।

फ़िर नहाकर देंह ही नहीं
मन भी साफ़ करता हूँ,
फ़िर बुदबुदाते होठों से सत्वर
प्रभु-प्रार्थना के मंद-स्वर
कानों से ही नहीं, हृदय से सुनता हूँ ।
अगरबत्ती की नोंक से उठता
अखिल शान्ति का धुआँ मन पर छा जाता है ।

फ़िर दिन की चटकीली धूप में
राह ही नहीं, चाह भी निरखता हूँ,
देख कर भी जीवन की अथ-इति दुविधा
समझ कर भी तृष्णा की खेचर-गति विविधा
मैं औरों से नहीं, खुद से ठगा जाता हूँ ।
तब कसकीली टीस से उपजी
वीतरागी निःश्वास जीवन पर छा जाती है ।

फ़िर गहराती शाम में
उजास ही नहीं, थकान भी खो जाती है,
तब दिन की सब यंत्र-क्रिया
लगती क्षण-क्षण मिथ्या
सब कुछ काल-चक्र-अधीन महसूसता हूँ ।
तत्क्षण ही अपने सम्मोहक-लोक से उठकर
सपनों से पगी नींद आँखों में छा जाती है ।

मैं रोज सबेरे जगता हूँ
और रात को सो जाता हूँ,
पता नहीं कैसे इसी दिनचर्या से
निकाल कर कुछ वक्त
इसी दिनचर्या को निरखने के लिये,
अलग होकर अपने आप से
देखता हूँ अपने आप को ।
महसूस करता हूँ,
सब तो कविता है ।

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