हृदयेश की रचनाएँ

मन बहुत है

आज तपती रेत पर कुछ छंद
लहरों के लिखें हम
समय के अतिरेक को
हम साथ ले अपने स्वरों में
मन बहुत है !

कस रहे गुंजलक से
ये सुबह के पल बहुत भारी
अनय को देता समर्थन
दिवस यह गेरुआधारी
चिमनियों से निकल सोनल धूप
उतरी प्यालियों में
ज़िंदगी की खोज होने
है लगी कहवाघरों में

चलो, फिर इन घाटियों को
जुगनुओं से हम सजा दें
मोरपँखों-सा सुबह को
खोंस ले अपने परों में
मन बहुत है !

विकट आई घड़ी यह
जिसमें लुभावन फंद केवल
भेदिए-सी छाँह सुख की
घरों भीतर कर रही छल
जिधर भी लरजे घटा
उस ओर ही आकाश तारे
लपलपाती चल रही रुत
आग लेकर खप्परों में

खौलती नदियाँ जहाँ भी
चलो, उसकी थाह पाएँ
और उसके वेग को हम
थाम लें अपने करों में
मन बहुत है ।

खेल-सियासत

यह कैसी शतरंज बिछी है,
जिसपर खड़े पियादे-से हम
खेल-खेल में पिट जाते हैं,
कितने सीधे-सादे-से हम ।

बिना मोल मोहरे बनें हम
खड़े हुए हैं यहाँ भीड़ में
ऐसी क्या है मज़बूरी जो
बँधे प्राण राजा-वजीर में

फलक-विहीन किसी तुक्के-सा चलते हैं,
जिस-तिस के हाथों
राजा के हाथी-घोड़ों से कुछ थोड़े,
कुछ ज़्यादे-से हम ।

हम कैसे सर्कस के बौने
डग-डग में दुनिया नापें
सबके आगे चलते जाएँ
उठते-गिरते कभी न काँपे

अपना सब कुछ लगा दाँव पर
राजा की शह-मात बचाएँ
खेल-सियासत की हर बाज़ी
अपने कंधों लादे-से हम ।

यहाँ खेल के कुछ उसूल हैं
बने हुए कुछ चौखट-ख़ाने
हुक्म हमें हैं चढ़े दाँव पर
मर-कट जाएँ इसी बहाने

कौन खिलाड़ी, कौन अनाड़ी,
हमको इससे मतलब ही क्या
राजा की मायानगरी में
झूठे कसमें-वादे-से हम ।

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