हैरत इलाहाबादी ’ की रचनाएँ

आगाह अपनी मौत से कोई बशर नहीं

आगाह अपनी मौत से कोई बशर नहीं
सामान सौ बरस के हैं कल की ख़बर नहीं

आ जाएँ रोब-ए-ग़ैर में हम वो बशर नहीं
कुछ आप की तरह हमें लोगों का डर नहीं

इक तो शब-ए-फ़िराक़ के सदमे हैं जाँ-गुदाज़
अंधेर इस पे ये है कि होती सहर नहीं

क्या कहिए इस तरह के तलव्वुन-मिज़ाज को
वादे का है ये हाल इधर हाँ उधर नहीं

रखते क़दम जो वादी-ए-उल्फ़त में बे-धड़क
‘हैरत’ सिवा तुम्हारे किसी का जिगर नहीं

बोसा लिया जो चश्म का बीमार हो गए

बोसा लिया जो चश्म का बीमार हो गए
ज़ुल्फ़ें छूईं बला में गिरफ़्तार हो गए

सकता है बैठे सामने तकते हैं उन की शक्ल
क्या हम भी अक्स-ए-आईना-ए-यार हा ेगए

बैठै तुम्हारे दर पे तो जुम्बिश तलक न की
ऐसे जमे कि साया-ए-दीवार हो गए

हम को तो उन के ख़ंजर-ए-अबरू के इश्क़ में
दिन ज़िंदगी के काटने दुश्वार हो गए

सुना है ज़ख़मी-ए-तेग़-ए-निगह का दम निकलता है 

सुना है ज़ख़मी-ए-तेग़-ए-निगह का दम निकलता है
तिरा अरमान ले ऐ क़ातिल-ए-आलम निकलता है

न आँखाों में मुरव्वत है न जा-ए-रहम है दिल में
जहाँ में बेवफ़ा माशूक़ तुम सा कम निकलता है

कहा आशिक़ से वाक़िफ़ हो तो फ़रमाया नहीं वाक़िफ
मगर हाँ इस तरफ़ से एक ना-महरम निकलता है

मोहब्बत उठ गई सारे ज़माने से मगर अब तक
हमारे दोस्तों में बा-वफ़ा इक ग़म निकलता है

पता क़ासिद ये रखना याद उस क़ातिल के कूचे से
कोई नालाँ कोई बिस्मिल कोई बे-दम निकलता है

ये मह्व हुए देख के बे-साख़्ता-पन को 

ये मह्व हुए देख के बे-साख़्ता-पन को
आईने में ख़ुद चूम लिया अपने दहन को

करती है नया रोज़ मिरे दाग़-ए-कुहन को
ग़ुर्बत में ख़ुदा याद दिलाए न वतन को

छोड़ा वतन आबाद किया मुल्क-ए-दकन को
तक़दीर कहाँ ले गई यारान-ए-वतन को

क्या लुत्फ़ है जब मोनिस ओ यावर न हो कोई
हम वादी-ए-ग़ुर्बत ही समझते हैं वतन को

मुरझाए पड़े थे गुल-ए-मज़्मून हज़ारों
शादाब किया हम ने गुलिस्तान-ए-सुख़न को

ख़िदमत में तिरी नज़्र को क्या लाएँ ब-जुज़ दिल
हम रिंद तो कौड़ी नहीं रखते हैं कफ़न को

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