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इन दिनों 

इन दिनों नहीं लिखी
कविताएँ और चिट्ठियाँ
आलेख तो दूर की बात है
हाँ टी० वी० पर ख़बर सुनता रहा ।
और सब कुछ
जलते हुए देखता रहा ।

आते रहे अनर्गल विचार
बुदबुदाता रहा अपने से
कि सामने वाले पर जड़ दूँ
दो-चार तमाचे
और भरी भीड़ में उसे गाली दूँ ।

क्योंकि उसने
लोकतन्त्र के गंजे सिर पर
चोट की है
और चुरा लिया है
सर्वधर्म समभाव वाला
उसका विचार ।

खिलेगा तो देखेंगे 

कहने को तो
वह आचार्य है
स्थानीय शिशु-मन्दिर का
लेकिन इस आचार्यत्व को
स्वेच्छा से
नहीं वरा है उसने ।

यहाँ सवाल रोज़ी-रोटी का
विचारधारा पर भारी है ।

इधर चुनावी मौसम है
और अधिकांश क्षेत्रों में
चढ़ गया है
पारा तापमान का
`छाँहो चाहत छाँह`
के दुष्कर समय में
वह जुटा है
जनसम्पर्क अभियान में
फूल का झण्डा लगाए
साइकिल पर ।

उसे उम्मीद है कि
वह खरा उतर जाएगा
और अपनी कर्मठता का
दे सकेगा सबूत उनके सामने ।

आख़िर स्कूल के प्रबन्ध तन्त्र का
यही तो आदेश है
और साथ में आश्वासन भी
कि खिलेगा तो देखेंगे ।

कौन तुम

त्रयोदशी के चाँद सा
तुम्हारे जीवन में मैं
संयोग की तरह घटित हुआ ।

और समझ सका
कि अंकों के विषम अवकाश के बीच
भाषा के सीमान्त पर
फूल खिलाने का समय
आ गया है ।

गोया कर रहा हो साफ़

वह दस बरस का है
जोड़ रहा है पंचर
जबकि यह उसके
स्कूल जाने का समय है ।

नियति की तरह खड़ी छोटी से गिमटी
जिसमें औजारों का एक छोटा बक्सा ही
कुल जमा पूंजी है
परिवार का पेट भरने के लिए ।

पैदल किसी स्कूटर
या साइकिल को आते देख
खिल जाती है उसकी बाँछें
दौड़ पड़ता वह ‘आइए, बाबू जी’ ।

ठोकर लगी है या कील
कच्चा जोड़ या पक्का जोड़
या महज कण्टी है छुछ्छी
सब एक ही दृष्टि में
जान लेता वह ।

रेती से कुरेद कर
लगाता है सलूशन
गोया कर रहा हो साफ़
लोकतन्त्र पर जमी मैल को ।

फिर चिपकाता है उस पर
ट्यूब का एक टुकड़ा
फिर ठोक पीट कर
करता है उसे पोढ़ ।

सन्देह होने पर
पूरे विश्वास के साथ कहता
बाबू जी कहीं और से
निकल सकती है हवा
पर यहाँ से तो बिल्कुल नहीं ।

उम्मीद 

बस, बात कुछ बनी नहीं
कह कर चल दिया
सुदूर पूरब की ओर
मेरे गाँव का गवैया ।

उसे विश्वास है कि
अपने सरगम का आठवाँ स्वर
वह ज़रूर ढूँढ़ निकालेगा
पश्चिम की बजाय पूरब से ।

वह सुन रहा है
एक अस्पष्ट सी आवाज़
नालन्दा के खण्डहरां में या
फिर वहीं कहीं जहाँ
लटका है चेथरिया पीर ।

धुन्ध के बीच समय को आँकता
ठीक अपने सिर के ऊपर
आधे चाँद की टोपी पहनकर
अब वह ‘नि’ के बाद ‘शा’
देख रहा है
और उसकी चेतना
अंकन रही है ‘सहर’
जहाँ उसे मिल सकेगा
वह आठवाँ स्वर ।

जब से गुज़रा हूँ इन बातों से 

वह औरत जो सुहागिन
बनी रहने के लिए
करती है लाख जतन
टोना-टोटका से मन्दिर में पूजा तक
अपने पति से कह रही है —
तुम कारगिल में काम आए होते तो
पन्द्रह लाख मिलते
अब मैं तुम्हारा क्या करूँ
जीते जी तुम
मकान नहीं बना सकते ।

कह रहे हैं हमदर्द
साठ साल के पिता की बीमारी के बाद
वे चले गए होते तो
अच्छा होता, उनकी जगह
उनका बेटा लग जाता ।

बैरागी का वह हुनरवान लड़का
जो चारों में अव्वल है
बाप से लड़ रहा है
मैं तुम्हारे यहाँ क्यों पैदा हुआ ।

कालेज में एडमीशन के समय
कैटेगरी पूछे जाने पर
एक लड़की दे रही है जवाब
मैं उस जाति से हूँ
जिसे अब कोई नहीं पूछता ।

मित्रों जब से गुज़रा हूँ इन बातों से
तब से लगता है मेरी कनपटी पर
एक कील गड़ी है
आपको भी गड़े इसके पहले
कोई उपाय सुझाइए
जल्दी कीजिए
दर्द बेतहाशा बढ़ता जा रहा है ।

अचानक 

अचानक कुछ नहीं होता
बस एक परदा है
जिसके पीछे पहले से ही
सब कुछ होता है तय ।

और सामने आने पर
लगता है अचानक।

गोधरा अचानक नहीं था
निठारी अचानक नहीं है
अचानक नहीं है
सद्दाम की फाँसी।

दोस्तों का विमुख होना तक
नहीं है अचानक ।

सब पहले से तयशुदा है
सबके अपने-अपने हिस्से हैं ।

परिदृश्य ही ऐसा है
जहाँ मिट गया है
विलाप और प्रलाप का भेद
और नैतिकता
तमाशबीन-सी खड़ी है
हारे थके लोगों का संलाप वन ।

अब अचानक और औचक
कुछ भी नहीं होता
सब अपनी-अपनी गोटी बिछाते हैं
और तुम्हें पता भी नहीं
शिकारगाह में शिकारी ताक में है ।

गुजरात-2002

जल रहा है गुजरात
जल रहे हैं गाँधी
गोडसे के नववंशजों ने
मचाया है रक्तपात ।

हत्यारे ही हत्यारे
दीख रहे हैं सड़कों पर
एक विशेष समुदाय पर
गिर रही है गाज ।

फ़रमान है न बचे कोई
घर के घर, एक-एक घर में
दस से बीस को ज़िन्दा
जला रहे हैं हत्यारे ।

कौन कहे इज़्ज़त आबरू की
यहाँ तो जान पर बन आई है ।

समाज को बाँट, वोट को छाँट
रथारूढ़ रावण एक बार फिर
कर रहा है अट्टाहास
खल खल ख…ल…ख…ल ।

दिल्ली के देवताओं को
पूज लिया है उसने
उसका कोई भी नहीं
बिगाड़ सकता है कुछ भी
है यह विश्वास अटल
अ…ट…ल ।

मेरे पास कोई चारा नहीं
सिवाय इस सदिच्छा के
कि गुज़र जा रात
क़त्लोग़ारत की रात
गुज़र जा गुजरात ।

अब भी भरोसा

तमाम नारों के बीच
जनता ने चुना है विकास का नारा
उन्हें फ़र्क नहीं पड़ता है
कि कौन सेकुलर है कौन नहीं
उनके लिए वही ठीक
जो करे विकास का वायदा ।

वायदे के तिलिस्म में
अब भी एक जादू है
जो तर्कों की राजनीति से
परे है उनके लिए ।

भ्रष्टाचार के अब
कोई मायने नहीं
जैसे कि वह हो गया है
इस मुल्क का स्थायी भाव ।

लोग देख रहे हैं कैमरे में
सुन रहे हैं टेप
और हँसते हुए कर रहे हैं बहस
यह सब राजनीति है ।

जबकि सत्ता और संदेह की
राजनीति के बीच उड़ रहे हैं
उनके सपने
उजड़ रहे हैं उनके घर
बीत रही है उनकी उम्र
वादे के च्यवनप्राश की लालसा में ।

जनता ही असली ताक़त है
कर रहे हैं वे ही उद्-घोषणा
जिन्होंने सबसे अधिक बनाया है बेवकूफ़
जिन्होंने काटी है
वोट की लहलहाती फ़सल ।

वे बढ़ाते रहते हैं
इस फ़सल के दाम
इसका भी एक सूचकांक है
जो धर्म या जाति के नाम पर
कभी भी उठ जाता है ऊपर ।

इन सबके बीच
आदमी के बीच आदमियत का ग्राफ़
गिरता जा रहा है सबसे नीचे ।

और मेरे पास कोई विकल्प नहीं
सिवाय तमाम संदेहों के
मैं अब भी भरोसा करूँ कि
जनता ही असली ताक़त है ।

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