Skip to content

गिरीष बिल्लोरे ‘मुकुल’ की रचनाएँ

तुम मेरे साथ

तुम मेरे साथ
एक दो क़दम चलने का
अभिनय मत करो
एक ही बिंदू पर खड़े-खड़े
दूरियां तय मत करो..!
तुमको जानता हूं
फ़ायदा उठाओगे –
मेरे दुखड़े गाने का
मुझे मालूम है/तुम मेरे आंसू पौंछने को भी
भुनाते हो
तुम सदन में मेरे
दर्द की दास्तां सुनाते हो !
तुम जो
हमारी भूख को भी भुनाते हो !
तुम जो कर रहे हो
उसे “अकिंचन-सेवा” का नाम न दो..!!
जो भी तुम करते हो
उसे दीवारों पर मत लिखो ..!!
तुम जो करते हो उसमें
तुम्हारा बहुत कुछ सन्निहित है
मित्र
ये सिर्फ़ तुम जानते हो..?
न ये तो सर्व विदित है…!

एक अकेला

एक अकेला
कँवल ताल में
संबंधों की रास खोजता !
आज त्राण फैलाके अपने ,
तिनके-तिनके पास रोकता !!
बहता दरिया चुहलबाज़ … है
तिनका तिनका छिना कँवल से !
दौड़ लगा देता है पागल
कभी त्राण-मृणाल मसल के !
सबका यूं वो प्रिय सरोज है ,
उसे दर्द क्या ?
कौन सोचता !!

तुमसे अक्सर 

तुमसे अक्सर
बातौं-बातौं में
पूछता हूं-
” क्या तुम्हैं मुझसे प्यार है..?
तुम नि:शब्द हो जाती
अतीत के धवल पन्नों को
देखती हो
और मैं फ़िर एक बार
उस अतीत में पहुंच
खुद को खड़ा करने की
असफ़ल कोशिश करता हूं
उत्तर की
प्रतीक्षा में
अपने कल के लिये
एक धवल अतीत बनाता हूं मैं
और तुम कहती हो
अचानक
अब जाना होगा
सच हम अपने सपनों को
अतीत के धवल-पन्नों
उकेरें तो
बताओ..?
कैसा होगा ..?

हां !! मुझे याद हैं

हां !! मुझे याद हैं
वो दिन
जब तुम
अंगूठे और तर्जनी के बी़च
रवीली रंगोली कस के उठातीं थीं
फ़िर रवा-रवा रेखाओं से
बिंदु – बिंदु मिलाती थीं
आंगन सजाती थीं..!!
तब मैं भी
एक “पहुना-दीप”
तुम्हारे आंगन में
रखने के बहाने
आता था ..
याद है न तुमको
फ़िर अचकचाकर तुम पूछती-“हो गई पूजा !”
और मैं कह देता नहीं-“करने आया हूं दीप-शिखा की अर्चना..”
अधरों पर उतर आती थी
मदालस मुस्कान
ताज़ा हो जातीं हैं वो यादें
जब रंगोलियां आंगन सजातीं हैं

तुमसे मिलकर

हां बरसों बाद
तुमसे मिलकर
अतीत के उस छोर पर
पाता हूं ख़ुद को
जहां
जकड़ गई थी जुबां
“पता नही क्या कहोगी
क्या सोचोगी
हां या न
कह न सका
मुझे तुमसे प्यार है..!!”-
कह न सका था
शायद वही जो तुम सुनना चाहतीं थीं
है..न…?
अरे हां याद आया
एक बार तुमने पूछा तो था..
मेरे कल के बारे में
आकाश को देखता
तुम्हारे सवाल पर अपने उत्तर का
सुनहरा-सपनीला रोगन न छिड़क सका
पर जवाब न देने का दर्द भोगता मैं
आज़ तुमको खुश देख खुश हूं..
फ़िर भी अतीत के उस छोर तक
निगाहों को जाने से कैसे रोकूं
तुम्ही कहो न

तुम जो हासिये पर 

तुम जो हासिये पर
रखती हो अपने सपने
तुम जो रो रो कर
सूनी रातों में
यादों के तकिया लगाकर..
भिगो देतीं हो तकिया
फ़िर इस डर से कि
बेटी पूछेगी सफ़ेद तकिये पर
खारे आंसुओं के निशान देख -“मां, आज़ फ़िर तुम..गलत बात ”
तुम जो उठ उठ कर
आज़ भी इंतज़ार करती हो !!
सुनहरी यादों के उन पलों को..!
मैं कब से
हाथों में संजोए बैठा हूं !
बस एक बार देख लो
तुम्हारे ही पल हैं न ये पल ?
जो तुमसे छिटक कर छले गये थे
हां सुनहरी यादों वाले !!

तुमने अबोले नयनों से जो बोला

तुमने अबोले नयनों से जो बोला
उस कहे को हमने –
आज़ रात चांद को तक तक के तोला.
देर तलक
दूर तलक सोचता रहा
शायद तुमने ये कहा ?
न तुमने वो कहा ?
जो भी
मन कहता है – तुमने कहा था !
“मुझे, तुमसे प्यार है !”
सच यही तो कहा था है न ?
अबोले नयनों से !!

चिंतन की सिगड़ी पे प्रीत का भगौना 

चिंतन की सिगड़ी पे प्रीत का भगौना
रख के फ़िर भूल गई, लेटी जा बिछौना

पल में घट भर जाते,
नयन नीर की गति से
हारतीं हैं किरनें अब –
आकुल मन की गति से.
चुनरी को चाबता, मन बनके मृग-छौना ?

बिसर गई जाते पल,
डिबिया भर काज़ल था
सौतन के डर से मन –
आज़ मोरा व्याकुल सा
माथे प्रियतम के न तिल न डिठौना ?

पीर हिय की- हरियाई
तपती इस धूप में
असुंअन जल सींचूं मैं
बिरहन के रूप में..!
बंद नयन देखूं,प्रिय मुख सलौना !!

मृत्यु…!!

मृत्यु…!!
तुम
सच बेहद खूबसूरत हो
नाहक भयभीत होते है
तुमसे अभिसार करने
तुम बेशक़ अनिद्य सुंदरी हो
अव्यक्त मधुरता मदालस माधुरी हो
बेजुबां बना देती हो तुम
बेसुधी क्या है- बता देती हो तुम
तुम्हारे अंक पाश में बंध देव सा पूजा जाऊंगा
पलट के फ़िर
कभी न आऊंगा बीहड़ों में इस दुनियां के
ओ मेरी सपनीली तारिका
शाश्वत पावन अभिसारिका
तुम प्रतीक्षा करो मैं ज़ल्द ही मिलूंगा !!

एक किताब 

एक किताब
सखी के साथ
बांचती बिटिया
पीछे से दादी देखती है गौर से
बिटिया को लगभग पढ़ती है
टकटकी लगाये उनको देखती
कभी पराई हो जाने का भाव
तो कभी
कन्यादान के ज़रिये पुण्य कमाने के लिये
मन में उसके बड़े हो जाने का इंतज़ार भी तो कर रही है ?
इसके आगे और क्या सोच सकती है मां
हां सोचती तो है कभी कभार
छै: बरस की थी तब वो भी तो बन गई थी दुलहनियां
तेरह की थी तो गरभ में कल्लू आ गया था
बाद वाली चार मरी संतानें भी गिन रही है
कुल आठ औलादों की जननी
पौत्रियों
के बारे में खूब सोचती हैं
दादियां उसकी ज़ल्द शादी के सपने
पर ख़त्म हो जाती है ये सोच

अनचेते अमलतास

अनचेते अमलतास
नन्हें
कतिपय पलाश।
रेणु सने शिशुओं-सी
नयनों में लिए आस।।
अनचेते चेतेंगें
सावन में नन्हें
इतराएँगे आँगन में
पालो दोनों को ढँक दामन में।
आँगन अरु उपवन के
ये उजास।
ख़्वाबों में हम सबके बचपन भी
उपवन भी।
मानस में हम सबके
अवगुंठित चिंतन भी।
हम सब खोजते
स्वप्नों के नित विकास।।
मौसम जब बदलें तो
पूत अरु पलाश की
देखभाल तेज़ हुई साथ
अमलतास की
आओ सम्हालें इन्हें ये तो
अपने न्यास ।।

प्राप्ति और प्रतीति

परिंदों,
तुम आज़ाद हो,
उड़ो, ऊँचे और ऊँचे,
जहाँ, सफलता का दृश्य,
बाट जोहता है।
जहाँ से कोई योगी,
पहले पहल सोचता है ?
इस आव्हान का असर,
एक पाखी ने फड़फड़ाए पर,
टकराकर, जाने किस से –
गिर गया -विस्तृत बयाबान में,
और
तब से अब तक हम,
आप और मैं. . .
ताड़ के पत्तों से,
किताबों के जंगल तक-
अन्वेषणरत-
खोजते-
कराहों का कारण

गुमशुदा मानसून

कुछ पर्यावरण प्रेमियों के,
प्रकृति को बचाने की कोशिशें,
जिनके हाथ लगती है-
एक तपती हुई दोपहरी
और तड़पती देहों का मेला।।
मौसम विभाग की सलाह
अनदेखे ऊसरी दस्तावेज़,
मुँह चिढ़ाते,
धूप में खेतिहर मजूर-
साधना के वादे निभाते।।
उन्हें भी हासिल है,
तपती दोपहरी,
और तड़पती देह का मेला।।
मेधा से बहुगुणा तक अनशनरत तपस्वी,
रियो-डि-जेनरियो के दस्तावेज़।
उगाने को तत्पर-
नई प्रकृति – नए अनुदेश।
मिलेगी-हमें-
दरकती भू
तपती दोपहरियाँ
और तड़पती देहों का मेला।

कोई उदास था 

कोई उदास था तो कोई बोल रहा था
हरेक मैकदे में खुद को तोल रहा था !
साक़ी पिलाई तूने ये कौन सी शराब
सागर ही होश में था जो बोल रहा था.?

उनको यक़ीन हो कि न हो हैं हम तो बेक़रार

उनको यक़ीन हो कि न हो हैं हम तो बेक़रार
चुभती हवा रुकेगी क्या कंबल है तारतार !!
मंहगा हुआ बाज़ार औ’जाड़ा है इस क़दर-
हमने किया है रात भर सूरज का इंतज़ार.!!

हाक़िम ने फ़ुटपाथ पे आ बेदख़ल किया –
औरों की तरह हमने भी डेरा बदल दिया !
सुनतें हैं कि सरकार कल शाम आएंगें-
जलते हुए सवालों से जाड़ा मिटाएंगें !

हाक़िम से कह दूं सोचा कि सरकार से कहे
मुद्दे हैं बहुत उनको को ही वो तापते रहें….!
लकड़ी कहां है आपतो – मुद्दे जलाईये
जाड़ों से मरे जिस्मों की गिनती छिपाईये..!!

जी आज़ ही सूरज ने मुझको बता दिया
कल धूप तेज़ होगी ये वादा सुना दिया !
तू चाहे मान ले भगवान किसी को भी
हमने तो पत्थरों में भगवान पा लिया !!
कहता हूं कि मेरे नाम पे आंसू गिराना मत
फ़ुटपाथ के कुत्तों से मेरा नाता छुड़ाना मत
उससे ही लिपट के सच कुछ देर सोया था-
ज़हर का बिस्किट उसको खिलाना मत !!

Leave a Reply

Your email address will not be published.