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सीमा ‘असीम’ सक्सेना की रचनाएँ

औपचारिक

इतनी औपचारिक
इतनी बेरूखी
तुम कैसे कर सकती हो
तुम तो प्यार करती हो
हाँ सच कहा
मैं ही तो करती हूँ
तुमसे प्यार
तुम्हारा इंतजार
तुम्हारी हर गलती को
माफ करते हुए
तुम्हारी अपेक्षाओं
पर भी नाराज ना होते हुए
और तुम करते हो
मेरा उपयोग
तभी तो लाद देते हो
गहनों के बोझ तले,
तुम्हें चूड़ियों की खनकार
पायलों की झनकार लुभाती है
और मुझे बनाती है
हथकड़ी बेड़ी के सामान लाचार
मेरे काले लम्बे घने बालों से खेलते हुए
कजरारे नैनों की गहराइयों में उतर जाते हो
तो मैं शरमा सकुचा जाती हूं
तो उन्हीं पलों में
डाल देते हो भार
एक अनचाही संतान का!!

प्रिये

कितना माधुर्य
कितना प्रेम
छलक उठता है
जीवन में
एक मधुमास आ जाता है
बसंत दस्तक देने लगता है
हर समां रंगीन
खुशनुमा लगने लगता है
जब तुम कह देते हो
ओ प्रिये
मेरी प्रिया।

वसंत

वसंत मेरे भीतर उतर आया है
कोयल की कूक सा कुहुँकता वसंत
मेरे मन के भीतर उतर आया है
जबसे तुम्हारे होने के अहसास ने
मेरे आसपास पडाव बनाया है
शहद सा झडता है मेरी ऑंखों से
कच्चे टेसू के रंग से मेरी हथेलियॉं रंग गयी हैं
पीले फूलों सी तितली तुम्हारी स्मृतियॉं सहेजे मंडरा रही है
सौंधी सी खुशबू मेरे मन की धरा पर बिखर गई है

उमंगों के कचनार खिल उठे हैं
मेरा दिल धडकते हुए मचल उठा है
तुम बदलते मौसम की तरह
चुपचाप मेरे मन की बगिया में आकर ठिठक गये हो
मुझमें ही उलझते हुए से
तुम्हारे आते ही मन में सारे मौसम
रंग बिखेरने लगे हैं
यह पीला वसंत और भी वासंती हो गया है
सपने में भी, पल भर को, तुमसे दूर जाने का अहसास

मेरी पलकों को गीली कर देता है
और ढुलकने लगता है गालों पर
हे बहती हुई पुरवाई! जरा ध्यान से सुन ले
मैं उस नेह की डोर से बंधी मुस्कुरा उठी हूं तो
तुम जरा हौले से चलो
कहीं जमाने की नजर न लग जाये
पीले फूलों सा खिलता वसंत
अब हर मौसम में
मुझ में ही मिल जायेगा
क्योंकि वसंत मेरे मन के भीतर उतर आया है।

बरखा

बरखा बादल फुहारें
कितना हसीन मौसम है
हर बार आता है
पर इस बार कुछ अलग है
कुछ पाने का, कुछ खोने का
यह मौसम का तकाजा है
या प्यार का नशा
नहीं जानती
कभी काली घटायें ले आती हैं
मन में उदासी
तो कभी बादलों के बीच से
फूटती किरण
भर जाती हैं
खुशी का उजाला
तन मन चमक उठता है
उस प्रकाश में
धानी चुनर ओढ़
निखर उठती हूँ
सज संवर जाती हूं
इतराती, इठलाती
फुहारों का आनन्द लेती
निकलती हूं
तो एक बिजली की कड़क
डरा जाती है
सहम जाती हूँ
कि कहीं सूर्य को तो कुछ नहीं हुआ
वह सुरक्षित तो है न
बादलों के पीछे
तभी बादलों के सीने को चीरता
अपने अस्तीत्व और तेज के साथ
हॅसता मुस्कुराता माथे को चूमता
आकाश की धाती पर चमक उठता है
अपने पूरे तेज के साथ
गीली धरा की
प्यास को कुछ और बढ़ाने को।

मैं मौन थी

मैं मौन थी
फिर भी तुम ताड़ गये
पढ़ लिया मुझे
मेरे भावों से
स्वप्नों से भरी
मेरी आँखें देख
चूम कर सजीव कर गये
मेरे मौन को भी
अब सुन रहे हो
समझ रहे हो
एक साथ है तुम्हारा
तो कुछ बोझिल नहीं
हॅसी है, खुशी है
और है मुस्कुराहट होठों पर
साथ हो तुम
तो सब रास्ते
आसान हो जाते हैं
किसी राह पर डगमगा जाती हूं
तो तुम्हारी बाहें
दे देती हैं सहारा
घबरा जाती हूं
जब कभी
तब तुम्हारी बातें
बंधा जाती हैं ढांढस
प्यार से समझाते हुए
काई भी पथ कोई भी डगर
आसान हो जाती है
जब साथ हो तुम्हारा।

उदास नज़्म

जब कभी उकेर लेती हूँ तुम्हे
अपनी नज्मों में!
आसुओं से भीगे
गीले, अधसूखे शब्दों से!!
सूख जायेंगी गर कभी
वे उदास नज़्मे!
सबसे पहले सुनाउंगी
या दिखाउंगी!!
सच में गीली है
अभी तो!
वाकई बहुत भीगी भीगी सी
न जाने कैसे सूखेंगी???
इस गीले मौसम को भी
अभी ही आना था?

याद

याद तो बस याद है
जिसे दिल ने याद किया
और मन में बसा लिया
अक्सर
उन यादों को
मन में
समाहित करते हुए!

प्रेम के लिए

उपमायें, उपमानों को
बदल कर
नये प्रतिमान गड़ने है
और एक वादा भी करना होगा
अपने प्रेम से
प्रेम के लिए
भरना होगा उतना ही
वात्सल्य , स्नेह ,
प्रेम से आपूर्ण
छलकता ह्रदय
स्वार्थ से परे
एक निस्वार्थ मन
मैले कुचैले
शब्दों और अर्थो को
पोंछकर हाथों से
साफ़ कर देना है
खिला लेना है एक फूल
सारे रंग, खुशबू भर के
अपनी प्रेम की बगियाँ में
दबी हुई भोली इच्छायें
मन की परतों में
सुलझी अनसुलझी बातें
कुछ सकूं के पल
नेह से भरे
स्वर्णिम छण
गुज़ारने हैं
और अंकित कर लेना है
ललाट पर
सुहाग चिन्ह बनाकर
बिंदी, सिन्दूर की तरह
सजाकर!!!

वे दरख़्त

उन दरख्तों का तिलिस्मी साया
जकड लेता है अपनी छाँव तले
भर देता है अहसास
सुस्ताने का कुछ पल ठिठक जाने का
बिछा देता है नर्म मुलायम कोमल पत्तियां
प्रेम की सलाखों पर चले पावों के नीचे
उसूल गुरुर को तोडकर
काल्पनिक स्वप्निल हयात में विचरते हुए
दुआओं को उठ जाते है हाथ
उनकी सलामती को
संतुष्टि को खुशहाली को!!

आँसू

मन में भर आया है
दुःख बिछोह का
आँसू बहते हैं झर झर
मिलन इतना सुखद
विरह इतना दुखद
काश ये मन न होता
तो न होता प्रेम
न मिलन और बिछोह
या फिर मन होता पत्थर का
न बहते ये आँसू!

हाइकु1

१)हम तुम है
जजवातों से भरे
फिर भी तन्हा!!

२)अबकी बर्सा
जमकर बरसो
सब ठहरा!!

३)तुम्हारा आना
पतझड़ में पत्ते
कोमल हरे!!

४)सूखे गुलाब
रखे जो डायरी में
मन में हरे!!

५)पर्बत नाले
फलांगती चली वो
सागर बसी!!

६)लेती सहारा
लताएँ भी पेड़ का
मजबूती को!!

७)विशाल पेड़
फलों से लदकर
झुक सा आया!!

८)देर तलक
रोती रही वो माँ
विदा बेटी की!!

९)नदी किनारे
हाथों में हाथ डाले
चलते रहे!!

१०)मन कागज
चित्र उकेरे तेरे
रंग भर दो!!

११)बिन बदरा
बरस बरस जाएँ
मेरी अंखिया !!

१२)कट ही गयी
बिन झपके पलक
समूंची रैना!!

१३) ऊँची उड़ान
न की है परवाह
हार या जीत!!

१४)उभरी टीस
उन चेहरों पर
योन शोषण!!

१५)खंडहरों में
आहटें सल्नत की
दस्तखत भी!!

हाइकु2

१६)माँ की अर्थी
काँधे पर सजाई
न रो तू बेटा!!

१७)सारा आकाश
समां गया मुझमे
पाकर तुम्हें!!

१८)आम का बौर
आने से भी पहले
आम आ गए!!

१९)यूँ रीझ जाना
पलकों में सजाना
जी में बसना!!

२०)ढाई आखर
समुद्र से गहरा
नभ से ऊँचा!!

२१)आते हो याद
भूलने की कोशिश
नाकाम करके!!

२२)बाप से प्यार
जब तक रहे है
जेब में पैसा!!

२३)तकते रहे
तेरे आने की राह
नयन मेरे!!

२४)दर्द की पोटली
भर लायी है अब
जाना तुम्हारा !!

२५)अच्छे दिन है
खिल आया कमल
पंजे को हटा!!

२६)कब आओगे
भ्रम सा बना रहा
आहट पर!!

२७)लांघी सीमाये
बने बंदी दुश्मनों के
गवां दी जान !!

२८)बिन संवाद
जिन्दगी है नीरस
बैठो करीब!!

२९)पृथ्वी पे अब
न बची हरियाली
उड़ती धूल!!

३०)कोख में बेटी
जानके भ्रूण हत्या
बेटी सहेजो!!

३१)भगवा वस्त्र
उजले खिले मुख
मन है काला!!

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