इंदिरा गौड़ की रचनाएँ

घुमक्कड़ चिड़िया

अरी! घुमक्कड़ चिड़िया सुन
उड़ती फिरे कहाँ दिन-भर,
कुछ तो आखिर पता चले
कब जाती है अपने घर।

रोज-रोज घर में आती
पर अनबूझ पहेली-सी
फिर भी जाने क्यों लगती
अपनी सगी सहेली-सी।
कितना अच्छा लगता जब-
मुझे ताकती टुकर-टुकर!

आँखें, गरदन मटकाती
साथ लिए चिड़ियों का दल
चौके में घुस धीरे-से
लेकर गई दाल-चावल।
मुझको देख उड़न-छू क्यों,
क्या लगता है मुझसे डर!

कितना अच्छा होता जो
मैं भी चिड़िया बन जाती,
जाकर पार बादलों के
चाँद-सितारे छू आती।
अपना फ्रॉक तुझे दूँगी,
तू मुझको दे अपने पर।

बादल भैया 

बादल भैया, बादल भैया,
बड़े घुमक्कड़ बादल भैया!

आदत पाई है सैलानी
कभी किसी की बात न मानी,
कड़के बिजली जरा जोर से-
आँखों में भर लाते पानी।
कभी-कभी इतना रोते हो
भर जाते हैं ताल-तलैया!

सूरज, चंदा और सितारे,
सबके सब तुमसे हैं हारे,
तुम जब आ जाते अपनी पर
डरकर छिप जाते बेचारे।
गुस्सा थूको, अब मत गरजो,
बदलो अपना गलत रवैया!

बरस बरस यह हालत कर दी
बिन मौसम के आई सर्दी,
घर में घुसकर गुमसुम बैठे
बंद हुई आवारागर्दी।
चार दिनों से खेल न पाए
चोर-सिपाही, छुपम-छुपैया!
बंद करो पानी बरसाना
चिड़ियाँ कहाँ चुगेगी दाना,
भला ठान ली इतनी जिद क्यों
भैया कुछ तो हमें बताना।
‘पाकिट मनी’ मिलेगा जब भी
ले लेना दो-चार रुपैया!

दादी वाला गाँव

पापा याद बहुत आता है
मुझको दादी वाला गाँव,
दिन-दिन भर घूमना खेत में
वह भी बिल्कुल नंगे पाँव।

मम्मी थीं बीमार इसी से
पिछले साल नहीं जा पाए,
आमों का मौसम था फिर भी
छककर आम नहीं खा पाए।

वहाँ न कोई रोक टोक है
दिन भर खेलो मौज मनाओ,
चाहे किसी खेत में घुसकर
गन्ने चूसो भुट्टे खाओ।

भरी धूप में भी देता है
बूढ़ा बरगद ठंडी छाँव,
जिस पर बैठी करतीं चिड़ियाँ-
चूँ-चूँ कौए करते काँव।

माँ, किसने संसार बसाया 

माँ, किसने यह फूल खिलाया?
बेटा, जिसने परियाँ, तितली-
खुशबू, सौरभ और पवन को।
नागफनी को चुभन सौंप दी,
पतझड़ और बहार चमन को।
है यह सभी उसी की माया,
उसने ही यह फूल खिलाया।

माँ, किसने आकाश बनाया?
बेटा, जिसने सूरज, चंदा-
धूप, चाँदनी और सितारे।
बादल बिजली इंद्रधनुष के
रंग अनोखे प्यारे-प्यारे।
खुद भी इनके बीच समाया,
उसने ही आकाश बनाया।

माँ, किसने संसार बसाया?
बेटा, जिसने पर्वत, सागर-
नील गगन और इस धरती को।
जिसने मुझको, तुझको, सबको
सुख-दुख, आँसू और खुशी को
जिसने सारा जाल बिछाया,
उसने ही संसार बसाया।

-साभार: बालहंस, दिसंबर-द्वितीय, 1996

सूरज दादा 

तुम बिन चले न जग का काम,
सूरज दादा राम राम!

लादे हुए धूप की गठरी
चलें रात भर पटरी-पटरी,
माँ खाने को रखती होगी
शक्कर पारे, लड्डू, मठरी।
तुम मंजिल पर ही दम लेते,
करते नहीं तनिक आराम!

कभी नहीं करते हो देरी
दिन भर रोज लगाते फेरी
मुफ्त बाँटते धूप सभी को-
कभी न करते तेरा मेरी।
काँधे गठरी धर चल देते-
साँझ हाथ जब लेती थाम।

चाहे गर्मी हो या जाड़ा
तुम्हें ज़माना रोज अखाड़ा,
बोर कभी तो होते होगे
रटते-रटते वही पहाड़ा।
सब कुछ गड़बड़ कर देते हैं,
बादल करके चक्का जाम!

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