यमुना प्रसाद चतुर्वेदी ‘प्रीतम’ की रचनाएँ

श्री गुरु पद नख वन्दना

सोभित सलौने सुभ्र सरस सुधा सों सने,
सील सिंधु रूप लसें जिन सम चन्द ना।

कैधों रवि प्रभा पुंज कुंज सेज लोभें मंजु,
हिय लौ प्रकासें भासें राखें मति मन्द ना।

जप तप जोग जाग जुरि कें समाने किधौं,
जिन्हें हेर-हेर अघ करत हैं क्रन्दना।

‘प्रीतम’ अनन्द नाम श्री गुरु श्री ‘विट्ठलेश’,
रटों नि सियाम करौं पद नख वन्दना।।

कीनी जो कृपा है ताहि कोविद बखानें कौन,
होत हिय द्रब सब भाँति ते अनन्दों मैं।

जनम सुधारौ उर भरम निकारौ सुभ,
कर्म निरधारौ जाते भ्रमों नाँहि द्वंदों में।

‘प्रीतम’ सु सिच्छा पाइ परम प्रबीन बन्यौ,
सन्यों गुन गौरब तें गन्योंबिग्य बृन्दों में।

छंदों में निखार प्यार-सार जिय जानि त्यों,
श्री वर गुरु पाद पद्म बार-बार बन्दों मैं।।

श्री गणेश वन्दना

बिघन बिदारबे कौ, सगुन सुधारीबे कौ,
अघन उधारिबे कौ जाकौ नित्य काम है।

मोद के मनाइबे कौ, मोदक के खाइबे कौ,
सोध के सुझाइबे कौ, गुन अभिराम है।

विद्या-बुद्धि, ऋद्धि-सिद्धि, भक्ति-मुक्ति दैवे ही कौ,
परिगौ सुभाव सदा ललित ललाम है।

‘प्रीतम’ पियारे प्राण ग्यान गुन बारे ऐसे,
देव गनराज जू कों सतत प्रणाम है।।

बुद्धि ते ही बिपति बिदारबौ ही भायौ जिन,
सारिबौ सु-काज सदा गायौ यह गान है।

बिस्व कियौ नत, हट बिघन किए हैं सब,
सत गुन पुंड ध्वज सीस कौ निसान है।

बलिन में बली, उग्र-उन्नति में अग्रगन्य,
बन्दित बिदित जग महिमा महान है।

‘प्रीतम’ स्वतंत्र महामंत्र के प्रणेता, गण-
तंत्र, औ गनेस दोऊ एक ही समान है।।

दाता हैं सु-बुद्धि के, प्रदाता ऋद्धि-सिद्धि ही के,
बिस्व के बिधाता जो राखत दुख-द्वन्द ना।

आये सुन्ड-तुन्ड कों हलात दीन द्वारेन पै,
देखत ही पापिन कें भए हैं अनन्द ना।

बारौ री दीपकें, सँभारौ री ब्यंजन बहु,
पूजौ री बिबिध भाँति, करौ मन मन्द ना।

‘प्रीतम’ कविन्द छन्द रचना सुरुचि रचि,
गाबै गौरि सुत श्री गजानन की बन्दना।।

श्री सरस्वती वन्दना 

बिपति बिदारीबे की, कुमति निबारबे की,
सुरति सँभारबे की, जाकी परी बान है।

सुजस दिबाइबे की, सु-रस पिबाइबे की,
सरस बनाइबे की अदभुत आन है।

भाबना बढ़ाइबे की, भाउ बिकसाइबे की,
सुख सरसाइबे की रुचि-सुचि सान है।

‘प्रीतम’ सुजान जान ऐसी बुद्धि दायनी कों,
बन्दों बार-बार जाकी महिमा महान है।।

तो सों ही सरंगे मन मोद के मनोरथ औ,
सुलभ समृद्धि के जु सुगम सुरुचि काज।

बैभव बिपुल भव भोग के सुभावन सों,
प्रचुर प्रभाबन सों पूरित रहंगे साज।

तेरे ही प्रसाद दुख दारिद दहंगे अब,
सुखद सजैगी तब ‘प्रीतम’ सु कवि लाज।

चित्त के अनन्द छन्द बन्दन करन हेतु,
ए री जगदम्ब मेरे रसना पै बैठ आज।।

तेरे ही बिहरिबे कों अजिर बनायौ हिय,
भाबना के भौनन में सुभग सजाये साज।

कल्पना कुसुम कमनीय बिकसित भए,
भाग भौर भ्रमन हूँ करें जहाँ गंध काज।

‘प्रीतम’ सुकवि काव्य कौमुदी खिली है बेलि,
मेल की थली है जित तेरौ ही रहैगौ राज।

साँच जिय जान, आन छन्दन प्रबन्ध हेतु-
ए री जगदम्ब मेरे रसना पै बैठ आज।।

सरस बती हौ मातु, सरस स्रुतीन गायौ,
सरस दै सुधी निधी राखौ मति मन्द ना।

सरस सु ग्रन्थ बीना धार हार धौरौ सुभ्र,
हँसन बसन सुभ्र जा के सम चन्द ना।

फन्द ना रहें हैं कछू, ओपै जो तिहारी दया,
मो पै करौ त्यों ही, जो पै रहें दुख द्वन्द ना।

‘प्रीतम’ कबिन्द बृन्द छन्दन सराहिबे कों,
बानी मम करै बीना पानी की सु बन्दना।।

भारत की भब्यता कों, भावन की स्वच्छता कों,
अच्छ रच्छ लच्छन प्रतच्छ ह्वै प्रसारती।

राष्ट्र हित एकता कों, बुद्धि की बिबेकता कों,
जग-जन जीवन में नेकता उभारती।

नित नव गहन में नेह की निकुंज रचि,
बनि अलि मधुरिम गुनन गुंजारती।

‘प्रीतम’ निधि आरती कों बानी ते उतारती, औ,
गावत जस भारती, जै-जै रस भारती।।

तेरी ही कृपा ते मेरी बिपति नसैगी मातु,
सुमति सजैगी एक सुरति तिहारी पै।

‘प्रीतम’ सुकवि रस रसना रसैगी जब,
आय निबसैगी हिय-हंस की सबारी पै।

भावना लसैगी बुद्धि भाग्य की बिधाता बन,
वर बिलसैगी बानी बोलिबे की बारी पै।

ए हो बीन बारी औ कमल कर धारी अब,
दीजै वर आज शुद्ध साधना हमारी पै।।

बानी के बोलिबे की, सु सब्द रस घोलिबे की,
भाव अनमोल की जु हिय अनुरक्ति दै।

बासना बिलासिता ते करि कें बिलग मन,
धन्य कर जन्म चरणारबिंद भक्ति दै।

त्रास ना रहें ता सों सु तन में तनक कहूँ,
ऐसी दुर्व्यसना ते बेगि ही बिरक्ति दै।

‘प्रीतम’ सुकवि उक्ति साधना ससक्त हेतु,
ए री मातु मेरी, मो करन में सु-सक्ति दै।।

जय जयति बीना बादिनी सुर साधिनी माँ सारदे।
मन मोहिनी जन मोद मति गो दोहिनी अनुसार दे।।
रस रागिनी अनुरागिनी भव भाग के सुख सार दे।
वैभव बिमल जस हंस वाहिनि बिपुल बिस्व प्रसार दे।।

कर कलित कीरत कामना कर पूर्न हे कमलासने।
करमाल पुस्तक धारिनी सुभ सारिनी मृदुभासने।।
सुचि स्वेत बसना सरस रसना रुचिर रम्य सुहासने।
कवि कल्पना कृति काव्य कलिका कुंज पुंज बिकासने।।

हे गुन गिरा गोतीत गम्या गान धुनि झंकारनी।
रति गति सुगमना तरनि तुम भव सिन्धु की हौ तारिनी।।
निज जन मनोरथ पूरि पुनि-पुनि भाव भृंग बिहारिनी।
माँ भारती हौ बिस्व के तुम कोटि कष्ट निबारिनी।।

जय जयति जग अघ हारिनी, हित कारिनी, चित चायिनी।
सदुपायनी हरसायनी, हिय सरस रस सर पायिनी।।
सुर सिद्धि दायिनि, बुधि प्रदायिनि, जननि जन अनुपयिनी।
‘प्रीतम’ प्रवर जिव्हाग्र बसि वर देहु हे वरदायिनी।।

देवी वन्दना 

काहे कों कियो है अम्बे तैनें ये बिलम्ब आज,
कर दै इस्तम्भ सत्रु सस्त्र-अस्त्र बल कों।

साधना तिहारी में जु बाधक बने हैं जेते,
भौन ते निकारि बेगि उन हीं के दल कों।

‘प्रीतम’ सरन रन टारि कें सु पूर्न प्रन,
दृन दया दृष्टि ते दलन कर खल कों।

कामना की काम धेनु तुम्हीं एक जग माँहि,
पूरौ आज मेरी मातु कामना प्रबल कों।।

श्री गोपाल वन्दना 

सौने कौ मुकुट मोर चन्द्रिका ढरारी सीस,
तिलक बिछौना खौर किसरिया भाल पै।

कुंडल कपोल बिच कुंतल अलक ढ़री,
परी-परी डोलें मनों पन्नगी सु ताल पै।

कंठ लर हार भुजबंद भुज सोहें अति,
कंकन कर किंकिनी कटि की उछाल पै।

‘प्रीतम’ पिताम्बर औ नूपुरन छटा हेरि,
बारी मन होत बेरि-बेरि या गुपाल पै।।

श्री मुकुन्द गोपाल वन्दना

मथुरा महिमा कहि शेष महेश थके औ थकी विधि वेद ऋचा रे।
जित जाइ अजन्मा नें जन्म लियौ करि कौन सकै तिह की समता रे।
जग पालक ह्वै कवि ‘प्रीतम’जू बनि बालक खेलत नित्य तहाँ रे।
सुर लोक चतुर्दस जाहि रटें सोइ इष्ट गुपाल मुकुन्द हमारे।।

श्री गुरु-गोपाल वन्दना

परम दयालु दीनबन्धु ह्वै कृपालु प्रभु,
दीजै वर एक, रमों भक्तवर बृंदों में।

‘प्रीतम’ प्रवीन चुनि भावना प्रसून अब,
नित सुचि माल गुहों नव गुन छंदों में।

फन्द भव काट, द्वन्द-हाट सों निराट रहों,
ठाट-बाट हू सों रहों पूरन अनन्दों में।

सेवों श्री विट्ठलेश गुरु की चरण रज,
सरन प्रतिपाल गोपाल पद बन्दों मैं।।

कब लों रहों मैं दीन, दीनबन्धु तेरौ बनि,
बसिबौ न चाहों यों फरेब फर फन्दों में।

बिलम न कीजै, भरि दीजै, भौन कौंन सबै,
वैभव बिसुद्ध कर बरस अनन्दों में।

‘प्रीतम’ सुकवि छवि छटा त्यों निहारें रहों,
बारें रहों भाव-पुष्प गुहि गुन छंदों में।

सेवों श्री विट्ठलेश गुरु की चरण रज,
सरन प्रतिपाल गोपाल पद बन्दों मैं।।

धारै है जो मोर पच्छ कोर है कटाच्छ रच्छ,
यै ही है प्रतच्छ लच्छ बिचरों स्वच्छंदों में।

दृन है बिस्वास आस पूरौगे अबस अब,
होंउ ना निरास नाहिं फँसों त्रास द्वंदों में।

‘प्रीतम’ प्रवर वर वैभव बिपुल पाइ,
सुजस प्रवाह बढ़ै रसमयी छंदों में।

सेवों श्री विट्ठलेश गुरु की चरण रज,
सरन प्रतिपाल गोपाल पद बन्दों मैं।।

श्री गिरिराज वन्दना

जय-जय-जय गिरिवर धरन, जय-जय-जय गिरिराज।
बंदों जुग-जुग जुग-चरन, राखन साखन लाज।।
राखन साखन लाज, नित्य माखन रस भोगी।
लाखन सारन काज, बिमल मन करतसँयोगी।
कवि ‘प्रीतम’ जग बंधु वर, ब्रज रच्छक स्यामल बरन।
दु:ख हरण असरन सरन, जय-जय-जय गिरिवर धरन।।

बलदेव दाऊजी वन्दना 

चाहें जो सु जीवन में जीवन कौ लाभ कछु-
तौ पै मन मेरे तज भावना दै छुद्र की।

जो पै चहें बैभव बिपुल औ बिभूति श्रेष्ठ,
तौ पै कर साधना आराधना तू रुद्र की।

शक्ति हेतु शक्ति रिद्धि-सिद्धि कौं गणेश की त्यों,
मुक्ति कौं मुकुन्द भक्ति हेतु ब्रज अद्रि की।

‘प्रीतम’ प्रबुद्धि हेतु सरसुती कौं ध्यावें ज्यों,
सभी कामना कौं कर सेवा बलभद्र की।।

खात सदा मिसरी अरु माखन लाखन भकतान के प्रतिपाल।
‘प्रीतम’ प्रान हैं रेवती के प्रिय भ्रात हैं जाके जसोमत लाल।
दिव्य है रूप अनूप अभूसन ह्वै कें कृपाल करें हैं निहाल।
बारहु ठौर पै राजत हैं ब्रज के नृप ठाकुर दाऊ दयाल।।

श्री राधा वन्दना 

श्री राधा आराध्य सुगम गति आराधन की।
जो अति अगम अपार न है मति जहँनिगमन की।
ज्ञान मान की खान ध्यान धारा भगतन की।
प्रिय ‘प्रीतम’ की प्रान प्रमान पतित पावन की।।

बाधा मेरी हरें चरन श्री राधा जी के।
आराधन कर रहों सतत सुख साधन नीके।
मन क्रम बच ते सेव्य रहे जे रिसि मुनि ही के।
जिन पग नख दुति निरख लगत उडुगन बिधु फीके।।

श्री राधा सर्वेश्वरी, राधा सरबस ग्यान।
रसिकन निधि राधा हिये, राधा रसिकन प्रान।।
राधा रसिकन प्रान, नित्य गति आराधन की।
हरन सदा त्रय ताप, सकल रूजि भव बाधन की।
साधन सुलभ सुगम्य रम्य रस रूप अगाधा।
‘प्रीतम’ पीवत रहत सतत भज जै श्री राधा।।

राधा बैन रसाल, नवल राधा पिक-बैनी।
राधा मोहिनि नवल, राधिका सहचरि श्रेनी।
राधा सहचरि रंग बिहारिनि राधा-राधा।
राधा ‘प्रीतम’ प्रान पियारी जै श्री राधा।।

हीरा हेम पत्र में जड़े हैं कमनीय किधौं
कैधौं चित्र चिन्हित हैं बिद्युत बौरानी के।

कैधौं सांत सीलता के सुंदर प्रतीक पुंज
दिपै रहे दिव्य रूप सुख की निसानी के।

‘प्रीतम’ प्रवीन भक्त हीय की सरसता के
सहज समानी ग्यानी बपु बरदानी के।

बिचल पारी कै बिभा बिधु की बिलास हेतु
सो ही पग-नख बन्दों राधा महारानी के।।

अँखियाँ चकोरन कौं सु सांत्वना देन हेतु
बिरमे हैं चंद मनों नेह की निसानी के।

कैधों जपी तपीन के तप के सु तेज पुंज
पगन समाने आन ब्रह्म रजधानी के।

‘प्रीतम’ सु कवि भक्त भाव के विराम थल
कै सोभा के सिन्धु अवगाहन हैं प्रानी के।

तरनी के रूप, भव तारन तरन जो हैं
सो ही पग-नखबन्दों राधा ब्रजरानी के।।

जप तप तीर्थ ब्रत नेम धर्म कर्म पुन्य
तीन लोक दान हूँ की पूरन प्रसाधिका।

रिसि मुनि सिद्ध सुर साधन प्रवाहिका औ
रास रस वर्द्धनी रसेश्वरी उपाधिका।

‘प्रीतम’ सु कवि आधि-ब्याधि की बिनासिका ह्वै
ब्रज बन बीच बनि नित्य निरबाधिका।

अगम निगम जग सुगम अराधिता सी
प्रगटी हीं ब्रज ब्रजराज प्रिया राधिका।।

श्री यमुना वन्दना

बन्दों श्री पद पद्म बंधु तनया, स्यामा प्रिया स्याम की।
कालिन्दी कल कूल केलि सलिला, धारा धरा धाम की।
पूर्णानन्द करी सदैव सुभगा, सारा सभी काम की।
प्यारी ‘प्रीतम’ प्रान पुन्य फलदा, सोभा सु विश्राम की।।

जम फाँस की त्रास बिनास के बेग सदा तट बास कौ ही बर दै।
कवि ‘प्रीतम’ पाप पहारन कों निज कूल कछारन में छर दै।
भव बैभव भाग के भौनहि में स्व सुभाउ ते भामते ही भर दै।
जमुने सुख बारिद की झर दै, अरु मो दुख दारिद कों दर दै।।

भाखें जमराज सुनों सेबक हमारे सब
काहू मानुस कों लाइबे कौ धर्म ना है रे

‘प्रीतम’ कवि जेते या जग माँहि पापी जन
जमना नहाइ तिन्हें रहै भ्रम ना है रे

या ही सों तुम सों बात खोलि कें क़हत आज
मेरी गम ना है तौ तिहारी गम ना है रे

आस जमना है जाके, पास जाम ना है वहाँ
बास जमना है तहाँ त्रास जम ना है रे

निकट बसाइ जनु गोद में बिठाइ मन
मोद में मढ़ाइ लियौ दारिद निकन्दिनी

कियौ है मुकुन्द पद सेबक स्व्छन्द पाइ
मुकुन्द रति वर्द्धिनी अमित अनन्दिनी

चार फल दायिनी प्रदायिनी मनोरथ की
तुम सी तुम्हीं हौ मातु सग जग बन्दिनी

‘प्रीतम’ सुकवि अघ बृंदन प्रभंजनी जु
बन्दों पद पद्म कालिन्द गिरि नन्दिनी

रोग-हर, ताप-हर, दु:ख-हर, दया-कर
दीन जान, आन मम गेह माँहि रहियै

‘प्रीतम’ सुकवि वाक-सिद्धि, बुद्धि-सुद्धि हेतु
बैठि रसना पै, देवि! साँच-साँच कहियै

बैभव की बृद्धि होइ, सुख में समृद्धि होइ
दीजै बरदान मोहि जो जो जब चहियै

लाज कौ जहाज आज बूढ़ौ जात जाति मध्य
तासों माँ उबारिबे कौं, बेगि बाँह गहियै
[कवि के जीवन में एक विशेष घटना पर उद्भूत छन्द]

जमना जब नाम कढै मुख ते, सुनते तब पास रहै जम ना
जम नाम न राखत खातेन में, जिनके जिय आन बसी जमना
जमना के प्रसाद भए कवि ‘प्रीतम’ गावत त्यों तब ते जु मना
भज रे जमना, जप रे जमना, जित है जमना, तित है जम ना

अब जो जनमों तो बसौं जमना तट, औ तनु मानुस कौ ही जु धारौं
कवि ‘प्रीतम’ जू रसना सों सदा, रस नाम गुपालहि कौ सु उचारौं
निरधारौं यही मन में इक आस प्रभो, ह्वै निरास न ताहि बिसारौं
जिति केलि कला तुम कीन्हीं, वही ब्रज के बन-बाग-तड़ाग निहारौं

हौं तो हौं जु टेरौ चेरौ, तेरौ ह्वै बन्यौ ही रहौं
या ही आन-बान कौं सु धारियै श्री यमुने

पातक अनेक एक आसरौ तिहारौ बड़ौ
अडौ खडौ द्वार पै निबारियै श्री यमुने

‘प्रीतम’ मनोरथन पूरन करन बेगि
ध्यान के धरत ही पधारियै श्री यमुने

राज औ समाज के सु काज हित आज मेरे
लाज के जहाज कौं सँभारियै श्री यमुने

जुगन विताने सब जतन सिराने तब
भागीरथ ठाने ब्रत माने सुख मन्द ना

ब्रह्म जब लाने केस संकर सुहाने पुनि
धरा पै गिराने हेतु राखे कछु फन्द ना

पूर्वज तराने सुनि देव हरसाने पुन्य-
पुंज सरसाने भए, अघ्घर अनन्द ना

‘प्रीतम’ वौ कविन्द ना सु छन्दना अमंद ना
जो न नर गावत गौरि गंगा की वन्दना
अघ-घर = अघ्घर

गंगा वन्दना

बुलायौ है जैसें मो पै करि कें कृपा महान
त्यों ही लोक लाजन के काज अनुसरियो

श्याम लता तेरी ब्रज बिपिन बिलासी बनी
ताके फल ऋद्धि-सिद्धि ही ते भौन भरियो

सिंचन तिहारौ है अकिंचन तरैया मातु
ऐसी दृग कोर द्रवि मेरी ओर ठरियो

‘प्रीतम’ पहार जन्म-जन्म के जुरे हैं जेते
तेते अरि अघन पछार, छार करियो

नर्मदा वन्दना

आयौ हौं दौरि द्वार श्री नर्मदा तिहारे पै जु
तुम्हीं अब मेरे सब कारज सँभारौगी

भारी भार सीस पै अचानक ही पर्यौ आन
ताकौं निज कृपा कर, बर दै उतारौगी

‘प्रीतम’ सु कवि कामना की हौ जु कामधेनु
प्याइ पय तृप्ति कर जनम सुधारौगी

ए हो मातु मेखलजा, रविजा सपूत हेतु
सेतु बाँधि शीघ्र, भव सिन्धु सों उबारौगी

शिव वन्दना

चन्द्रमा ललाट जा के जटा जूट सीस सोहें
भूसन भुजंग भूरि भावना हू भारी है

भस्म अंग धारी ह्वै अनंग संग जारी जिन
त्रिपुरासुर मार जो बन्यौ त्रिपुरारी है

‘प्रीतम’ पियारी जा की हिमगिरि कुमारी, औ
मृग चर्म धारी, बरु नंदी की सवारी है

भूत सैन्य सारी, जिन सँभारी, भंग प्यालौ पी
ऐसे बिसधारी जू कौं वन्दना हमारी है

महिमा कौं जा की वेद-वेदान्त बखान करें
ऋषि मुनि ध्यान धर तत्व कों रटत हैं

जटा गंग सीस सोहें, भाल पै त्रिपुंड मोहे
सर्पन की माल धार, कष्ट कों हरत हैं

भस्म कों रमाएँ सुभ डमरू धराय हस्त
‘प्रीतम’ के काम संग नंदी लै फिरत हैं

उतपति स्थिति संहार के करन हार
बाबा बिश्वनाथ जी की वन्दना करत हैं

जय जयति जगदाधार जगपति जय महेश नमामिते
वाहन वृषभ वर सिद्धि दायक विश्वनाथ उमापते
सिर गंग भव्य भुजंग भूसन भस्म अंग सुसोभिते
सुर जपति शिव, शशि धर कपाली, भूत पति शरणागते

जय जयति गौरीनाथ जय काशीश जय कामेश्वरम
कैलाशपति, जोगीश, जय भोगीश, वपु गोपेश्वरम
जय नील लोहित गरल-गर-हर-हर विभो विश्वंभरम
रस रास रति रमणीय रंजित नवल नृत्यति नटवरम

तत्तत्त ताता ता तताता थे ई तत्ता ताण्डवम
कर बजत डमरू डिमक-डिम-डिम गूंज मृदु गुंजित भवम
बम-बम बदत वेताल भूत पिशाच भूधर भैरवम
जय जयति खेचर यक्ष किन्नर नित्य नव गुण गौरवम

जय प्रणति जन पूरण मनोरथ करत मन महि रंजने
अघ मूरि हारी धूरि जटि तुम त्रिपुर अरि-दल गंजने
जय शूल पाणि पिनाक धर कंदर्प दर्प विमोचने
‘प्रीतम’ परसि पद होइ पावन हरहु कष्ट त्रिलोचने

द्वारिकाधीश वन्दना

द्वारकेश वंदन करों, हरों सकल तन-ताप
अब नहीं जानों और कछु, जोग जाग तप जाप
जोग जाग तप जाप, कियें नहिंमन संतोसौ
रोसौ, पोसौ भलें आप कौ मोइ भरोसौ
कवि ‘प्रीतम’ कर भेंट पत्र फल फूलरूचन्दन
द्वारकेश निसियाम तिहारौ करौं सु वंदन

सोभित सजीलौ सुचि स्वर्णिम सिंहासन पै
साज सजी लक्ष्मी वाम बाम छबि छाजै है

अमित अनूप रूप उपमा न पाई कहूँ
देखि कें अनंग अंग कोटि कोटि लाजे है

दर्सन कारण हेतु भक्त भीर भारी होत
भावुकन भाव अष्ट भूरि भव्य भ्राजै है

‘प्रीतम’ पियारे सब दूसन हरन वारौ
भूसन हमारौ द्वारकेश जू बिराजै है

मंगल मंगला कीने ते होत, श्रिंगार ते राज पै राजत है नर
ग्वाल ते गो प्रतिपाल बनें अरु राजसी भोग ते भोग मिलें हर
भोग उत्थापन देंय उत्थान औ आरती देख रहै तन सुन्दर
‘प्रीतम’ सैन की झाँकी अपार निहार मनोच्छित पावत है वर

बद्रीनाथ वन्दना 

जयतु-जयतु बद्री विशाल -लघु स्वरुप अद्रि भुआल
सीस स्वर्णिम मुकुट सोहत, गंध अंकित तिलक भाल

कर्ण कुंडल पुहुप गुम्फित – कंठ तुलसी लसत माल
पीट अम्बर कटि विराजत – करत विद्युत् केलि वाल

पद्म आसन तपसि मुद्रा – स्याम तन लखि कटत जाल
परम पूजित नर नारायण – दिव्य दरसन दृग दयाल

निगम नारद गात उद्धव – गरुण काटत कोटि काल
अलक नंदा करत आनँद – सलिल शीतल मनु हिमाल

तप्त तीरथ हरत पापन – पितृ तारत विधि कपाल
‘प्रीतम’ सु कवि बद्रीश अघ हर – परम प्रिय प्रभु प्रणतिपाल

वल्लभाचार्य

रे पियूष आगार ससि, क्यों न झरत इत ओरि
ये चकोर मन कन त्रसित, बस्यौ तिहारी पौरि

स्वस्ति श्री मन्मदमन सुमोहन जयति जयति जय
श्री वल्लभ आचार्य चरन जग वन्दित जय जय
श्री विट्ठल गोस्वामि वर्य गोकुलपति जय जय
जयति पुष्टि जन सकल कृष्ण जिहिं नाम जपति जय

श्री मद वल्लभ वंश बाल गुण गौरव शाली
अमर बेलि सी फलित कल्प तरु वेष्टित डाली
जस पुहुपन के पुंज सु-वासित दिशि दिशि फूले
कवि ‘प्रीतम’ प्रिय मधुप पुष्टि सौरभ रस झूले

ए हो पुष्टि प्रकाश शिष्य उडुगन के स्वामी
कृष्ण भक्ति रस भाव व्योम के तुम अनुगामी
भव रुजि औषधि ईश रजनि हिय अघ तम नाशी
सुयश शरद सौंदर्य रूप गुण रश्मि स्वराशी
पूर्णकला पीयूष मय, मन-वपु निगमन श्रुति कहत
क्यों चकोर ‘प्रीतम’ तबहु, कहु शशि आपन तन दहत

श्री मद वल्लभ बन्हि वंश प्रगटौ जब जग में
जीव ब्रह्म सम्बन्ध पुष्टि भौ तब ता मग में
अधम अभागे अघी दया तिन पै हू कीन्ही

मिश्री भोग धराय सुलभ सेवा हू दीन्ही
कवि ‘प्रीतम’ पावन सदा, पायौ जिन गोस्वामि पद
पतितोद्धारक पथ पुष्टि रच्यौ जग बंदित श्रीमद

चैतन्य महाप्रभु

ब्रज कौ बिकास कियौ, वृन्दावन वास कियौ
रास महारास कियौ, पियौ रस हु अनन्य

धाम धाम गौर स्याम छायौ है अनूप रूप
ताहि देख कोटि काम हु कौ लाजौ लवन्य

‘प्रीतम’ मधूकरी औ तुलसी कौं मान दियौ
राधा कृष्ण गान ही तें जग कौं कियौ सु धन्य

हरी हरी बोल घोल अमरित पिवायौ श्री
महाप्रभु नित्यानन्द जू हरे कृष्ण चैतन्य

तीरथ अनेक जिन कीरत श्रुतिन गाई
कीरत लाली बिना भली नांहि ठौर अन्य

देखी कर गौर और लेखिन परेखी तबै
पाई मधुपरी धुरी तीन लोक तें जु धन्य

पात पात बंसीवट कुंड कुंड कृष्णा तट
कुंज कुंज नटखट लीलान लखी अनन्य

‘प्रीतम’ प्रगत घट सुधा सों भरौ है ब्रज
रट रट हरी नाम नित्यानन्द चैतन्य

प्यारी के भावन सुख मिलत हिये में कहा
रूप रंग रीझ खीझ रति रस का ललाम

मान कर मनाइवौ दान मिस रिझाइवौ
आन दै बुलाइवौ सु केलि हित कुंज धाम

वा ही हेतु औतरे जु स्याम बाम बेस धार
अमित आवेस प्यार बगरायौ ठाम ठाम

‘प्रीतम’ सु नाम धन्य स्याम राधा राधा रटें
राधा राधा रटि पुनि हेरत है स्याम स्याम

नवद्वीप तें आइ अतीब समीप सुनीपन क्यार परोस कियौ है
कल कुंजन पुंजन में अलि गुंजन कौ रस हु निस द्यौस पियौ है
रट नाम हरी हरे कृस्न चैतन्य जु ‘प्रीतम’ धामहि पोस लियौ है
ब्रज बैभव गौरव सौष्ठव कौ पुनि विस्वहि में उद्घोष कियौ है

नव्स्वीप तें आइ कियौ ब्रजवास बिकास कियौ पुनि यौं ब्रज ही कौ
तरु बेलि औ कुंड निकंजरू कुंज किये सब तीर्थ प्रमाण दै जी कौ
रस सिक्त तें भक्त किये जड़ चेतन चैतन्य नाम पिवाय अमी कौ
कवि ‘प्रीतम’ प्राण हरी हरी बोल हरी जन पीर कियौ जग नीकौ

श्री हरिदास वन्दना

श्री हरिदासी रूप वर परगते श्री हरिदास
बन्दहुं तिन के पद कमल, ‘प्रीतम’ प्रिय हिय आस

बन्दहुं वृन्दा विपिन कुंज निधिवन द्रुम बेली
रंग महल अतरंग रँगे जित क्रीडत केली
पौढ़ि कबहु पर्यंक अंक पिय प्यारी गहि गहि
रहि रहि लहि लहि सहज कपोलन चुंबत नहिं कहि
‘प्रीतम’ रस निधि नित्य नवल लीलान अनन्दों
श्री स्वामी हरिदास स्याम स्यामा पद बन्दों

श्री हरिदास सुहाग, श्री हरिदास हुलास हिय
श्री हरिदासनुराग, ‘प्रीतम’ श्री हरिदास प्रिय

श्री – स्यामा रस दान दियौ पाई तब निधि -श्री
स्वा – गत तब तिन कियों निरख छवि बीसौ बि -स्वा
मी – ठौ या ते और न कछु है अन्तरया – मी
ह – र दिन पल छिन निरत रहत रस ही पै सुख ल -ह
रि – स मुनि जाकौ पार न पायौ व्रत तप करि क -रि
दा- मन लीनों थाम बसे हिय स्याम सर्व -दा
स- रबस रस में रँगे पगे रस ही में सरब -स
जी – वन धन सर्वस्व प्राण बिहारिन हैं -जी

श्री- निधि कौ प्रागट्य भयौ निधिबन के मधि -जी
स्वा- रत स्यामा स्याम किये तिन नें अपने ब -स
मी- न मेख ना रही बसे हिय सदा सर्व -दा
ह- र पल छिन रस पियौ रूप माधुर्य सु जिय भ -रि
रि- धि सिधि बारत केलि कला पै कला सकल जँ -ह
दा- न कियौ रस बही रसिक वर रस अनुगा -मी
स – ब विधि रस बस रहे जगत में बीसौ बि -स्वा
जी- वन प्राण बिहारि बिहारिनि ‘प्रीतम’ के -श्री

जय जय कुंज बिहारिणे, जय वृन्दावन धाम
कोटि कोटि कंदर्प हू, लाजत आठौ याम
लाजत आठौ याम, रसिक लीला लख सरबस
बरबस रस बस होत, सकल जग गावत गुन जस
‘प्रीतम’ स्यामा स्याम प्रिय, विहरत जित अनवरत मय
नित नव वय रहि करत रति, सो स्वामी हरिदास जय

कर अनुराग राग भाग कौ जगायौ जिन
राखौ है सुहाग रागनीन के प्रमान कौ

सप्त सुर भेद ही ते मोहे सुर लोक सप्त
तृप्त जग कीनों धरि रूप रस दान कौ

‘प्रीतम’ सु जान प्रान रसिकन कौ है सदा
गायौ गान स्यामा स्याम जू के ही रिझान कौ

ए ते गुन गढ़यौ चढ़यौ त्यौं ही हरिदास पानि
ज्ञान कौ तमूरा मढ़्यौ पूरा यै सु तान कौ

काहू नें तौ मूल कौ अधार लियौ सार जान
साखन ते प्यार काहू कीन्हों है बिचारि कें

बसंती बहार सजे पातन की छांह काहू
गातन सुहानी तहाँ बैठे ध्यार धारि कें

फूलन सुबास काहू हिय में बसी है जहाँ
भक्त मन भीर रमें हित निरधारि कें

‘प्रीतम’ निचोरि नेह फल कौ सु तत्व रस
पियौ हरिदास स्यामा स्याम कों निहारि कें

सेवा भोग राग कौ सजायौ बाग बल्लभ औ
तरु बेलि लिपटानी चैतन्य के रास नें

फूले हैं अनेक भाँति-भाँति के सुफूल पंथ
गंध भरी तिन में सु वृन्दावन बास में

सदा ही बसन्त बने पल्लव प्रवीन भक्त
छांह तरें पायौ सुख जग जन त्रास नें

‘प्रीतम’ के प्रान प्रभू सबै फल दान दियौ
पै पियौ रस एक ही स्वामी हरिदास नें

देखे हैं अनेक पंथ पढे हैं अनेक ग्रन्थ
संत औ महंतन की बात बड़ी सुनी है

सिद्ध है सिद्धान्त सुद्ध साधना आराधना के
साधुता में रत सभी रिसी और मुनी हैं

धनी है सुभावना के भक्ति के प्रचारक हू
ज्ञान उपदेस ही की राह काहू चुनी है

‘प्रीतम’ है सार रस सब ही कौ तब ही तौ
स्वामी हरिदास रसोपासना की मनी है

करूआ मृन तें भयौ कंचन पात्र सजी तन स्वर्न स्रिंगार ते धूरा
गुदरी सुधरी लिपटी जब ही जु करे सब साल दुसाल अनूरा
कवि ‘प्रीतम’ स्यामा औ स्याम बिहार निहार बनी कविता रस सूरा
ब्रज के बन बागन भाग जगे जब राग रंग्यौ हरिदास तमूरा

रस निकुंज मधि केलि रस, करत प्रिया प्रिय स्याम
हेरत श्री हरिदास जू, सो रस आठौ याम
सो रस आठौ याम, स्रवित हिय सरबर माँही
आनंद पद्म पराग, गंध विहरत चहुं घाही
‘प्रीतम’ भावन भृंग भ्रमि गावत गुन नव नव सरस
सुन सुन रसिक विहंग बन बेलि बिटप मिल द्रबहि रस

रस निकुंज रसना रसिक रस ब्रज बनि तन रास
‘प्रीतम’ रस बस प्रान धन, रस निधि श्री हरिदास

ब्रज रस ब्रज बगरयौ सकल, ब्रज राज कन-कन मांहि
‘प्रीतम’ ब्रज सुख कों सतत देव मनुज ललचांहि

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