रत्नप्रकाश शील की रचनाएँ

अक्कड़-बक्कड़ 

अक्कड़-बक्कड़,
लाल बुझक्कड़!
कितना पानी बीच समंदर,
कितना पानी धरती अंदर!
आसमान में कितने तारे,
वन में पत्ते कितने सारे।
दाएँ बाएँ देखें अक्कड़,
ऊपर-नीचे देखे बक्कड़!
अक्कड़-बक्कड़,
लाल बुझक्कड़!

लाल बुझक्कड़, जेब टटोलें,
फिर जने क्या, खुद से बोले-
अरे हो गया यह सब कैसे,
कहाँ गए पॉकेट के पैसे!
अकल नदारद, बिल्कुल फक्कड़,
अक्ल नहीं तो सूखे लक्कड़!
अक्कड़-बक्कड़,
लाल बुझक्कड़!

सोन चिरैया! 

सोन चिरैया आ जा, आ जा
खा जा हप्पा!
फिर गाएँगे दोनों मिलकर
लारालप्पा!

तू उड़ना, मैं बैठ परों पर जऊँगा,
धरती के बारे में तुझे बताऊँगा।
दोनों देखेंगे दुनिया का
चप्पा-चप्पा!

तू छोटी मैं बड़ा, नहीं कुछ इससे होता,
बड़ी नदी बन ही जाता, छोटा-सा सोता।
सब हैं एक बराबर
कहते मेरे बप्पा!

मगर बात यह नहीं समझ में मेरे आती,
‘छोटे’ पर अम्मा क्यों ज्यादा प्यार जताती।
मैं जिद करता तो मिलता
बदले में धप्पा!
सोन चिरैया आ जा, आ जा
खा जा हप्पा!
-साभार: नंदन, अक्तूबर, 1995

 

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